Saturday, August 19, 2017

इतना तोहफ़ा तो दें!

PANKAJ SHARMA
भारत छोड़ो आंदोलन के दो साल बाद और भारत को आज़ादी मिलने से तीन साल पहले, राजीव गांधी जन्मे थे। कल, रविवार को, वे 73 साल के हो जाते। आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वे सिर्फ़ छह साल ही बड़े होते। वे पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से 12 साल छोटे होते। आज की कांग्रेस को चला रहे दिग्गजों में, मोतीलाल वोरा से उनकी उम्र 16 साल कम होती; ए. के. एंटोनी से वे 4 साल छोटे होते; अहमद पटेल और गुलाम नबी आज़ाद से 5 साल बड़े होते; ऑस्कर फर्नांडिस से 3 साल छोटे होते; मल्लिकार्जुन खड़गे से 2 साल छोटे होते;  कमलनाथ से 2 और दिग्विजय सिंह से 3 साल बड़े होते। जनार्दन द्विवेदी की उम्र के बराबर होते; अशोक गहलोत से 7, सी. पी. जोशी से 6 और आनंद शर्मा से 9 साल ही बड़े होते; और, सुशील कुमार शिंदे से वे 3 साल छोटे होते। कांग्रेसी सियासत के बरामदों में अब भी मौजूद डॉ. कर्ण सिंहं से राजीव गांधी 13 साल, मोहसिना किदवई से 12 साल  और शीला दीक्षित से 6 साल छोटे होते।
यानी, राजीव गांधी अगर आज होते तो अपनी पूरी शिद्दत और ऊर्जा के साथ कांग्रेस का संचालन कर रहे होते। वे होते तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की गद्दी पर शायद होते ही नहीं। क्योंकि तब या तो गुजरात में वो काले बादल मंडराए ही न होते, जिन्होंने मोदी को मोदी बना दिया और अगर वे काली घटाएं उसी तरह छाई भी होतीं, जैसी कि छाई थीं तो उनकी सवारी करने का मोदी ने ऐसा खामियाजा भुगता होता कि देश के राजनीतिक पन्ने से उनकी विदाई ही हो गई होती। और, ऐसे में इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि राजीव प्रधानमंत्री हैं या विपक्ष में बैठे हैं। लालकृष्ण आडवाणी के चलते अटल बिहारी वाजपेयी तो 2002 के गुजरात-दंगों के बाद मोदी से राजधर्म का पालन नहीं करा पाए, लेकिन अगर तब राजीव प्रधानमंत्री होते तो कोई भी उनका हाथ इस तरह नहीं बांध सकता था।
20 अगस्त 1944 की सुबह राजीव गांधी का जन्म गणेश और हनुमान के अनवरत स्तुति-उच्चारण के बीच हुआ था। उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू सर्वशक्तिमान में आस्था तो खूब रखते थे, मगर उतने पूजा-पाठी नहीं थे। पर बाकी परिवार कर्मकांडों में रमने से कतराता नहीं था। लगता है कि गणेश ने अपना विध्नहर्ता और हनुमान ने अपना संकटमोचक संस्कार राजीव की आत्मा में जन्म के समय ही पिरो दिया था। वरना सिर्फ़ एक दशक के कुल राजनीतिक जीवन में देश-दुनिया की याद में इस तरह बस जाना बिना दैवीय-कृपा से संभव हुआ करता तो हम-आप-सब सिरमौर बने बैठे होते। ज़ोर-जबरदस्ती से भी अपने मन की बात लोगों के मन में न उतार पाने वाले परम-शक्ति की इस सकारात्मकता का स्वाद भला क्या जानें! पृथ्वी के किसी भू-भाग के विधाता की भूमिका तो बहुत लोग हथिया लेते हैं, लेकिन राज उन्हीं का याद किया जाता है, जो चक्रवात रच कर नहीं, स्वाभाविक बहाव में बहते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंचते हैं।
सियासत की चकरघिन्नी में अपने दिन-रात एक करने वालों को तो इस बात का अंदाज़ भी नहीं होगा कि भारत जैसे बड़े मुल्क़ की ऐसी ताक़तवार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव को पढ़ाई की शुरुआत करने के लिए एलिजाबेथ गौबा के स्कूल में भेजने के दिनों से ही यह ख़्याल रखना शुरू कर दिया था कि कहीं बड़े घर की संतान होने की वज़ह से वह अनावश्यक खेल-खिलौनों की दुनिया में न फंस जाए। चाहा तो उन्होंने यही संजय गांधी के लिए भी होगा। मगर आगे चल कर जिस तरह के संजय और जिस तरह के राजीव को दुनिया ने देखा, उसके पीछे हम किसकी मर्ज़ी समझें? एक माता-पिता की, एक घर और एक माहौल में पली-बढ़ी दो संतानों में, ऐसा विपरीत-धुव्रीय अंतर आखि़र किसके इशारे पर पनपता है? 
एक लोकतांत्रिक मुल्क़ को अपनी सल्तनत न समझने और जनतंत्र के उसूलों का हर हाल में आदर करने की जन्मजात प्रतिबद्धता अगर राजीव गांधी में न होती तो अपने सवा चार सौ कांग्रेसी सांसदों वाली लोकसभा के ज़रिए वे मनमाने भी हो सकते थे। मगर वे हंटरबाज़ी पर उतारू नहीं हुए। आज चुनाव में स्पष्ट बहुमत भर मिल जाने पर जिनकी सत्ताधीशी बेतरह रिसने लगती है, उन्हें यह मालूम ही नहीं है कि राजीव अपने ही सगे भाई की गै़र-जनतांत्रिक हरक़तों पर किस क़दर अनमने रहा करते थे! कितने लोग यह जानते हैं कि संजय का अंतिम संस्कार शांतिवन के नज़दीक करने के फ़ैसले से राजीव सहमत नहीं थे! इसलिए, कि उनका छोटा भाई कभी ऐसे किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहा था कि इस तरह के सम्मान का औचित्य लोग मान पाएंगे। जब संजय की मौत हुई तो राजीव विदेश में थे और उनके लौटने के पहले ही कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों और फ़ारूख अब्दुल्ला वगैरह के इसरार पर शांतिवन से लगी भूमि पर दाह-क्रिया की तैयारियां पूरी हो गई थीं।
31 अक्टूबर 1984 की दिल्ली का कई औरों की तरह मैं भी चश्मदीद हूं। इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन राजीव गांधी पश्चिम बंगाल के दौरे पर थे। कोलकाता से वायुसेना का विमान उन्हें ले कर दोपहर साढ़े तीन बजे दिल्ली उतरा। प्रणव मुखर्जी साथ थे। राजीव सीधे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पहुंचे। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी दिल्ली से बाहर थे। वे पांच बजे लौटे। उसी रात राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। किस्से गढ़ने वालों ने उस दौर की कई कहानियां जन-मानस में छिड़क रखी हैं। लेकिन जानने वाले आपको आज भी बता सकते हैं कि अपनी पुत्रवत सिसकियों पर काबू रख कर एक प्रधानमंत्री की दृढ़ता से राजीव ने देश भर में उपजे गुस्सैल उबाल पर कैसे काबू पाया था।

36 से 46 बरस की उम्र के बीच अपनी सियासी ज़िंदगी पूरी कर लेने वाले राजीव गांधी की याद करना इसलिए ज़रूरी है कि लालकिले से टपकते घनघोर व्यक्तिवाद के जिस दौर में आज हम जी रहे हैं, उसकी दीर्घजीविता पर राजीव-शैली से ही काबू पाया जा सकता है। विपक्ष की राजनीति में राजीव के डेढ़ बरस का एक-एक दिन कांग्रेस की मौजूदा मंत्र-माला में जिस दिन एक-एक मनके की जगह ले लेगा, मुल्क़ की उदासी दूर होने लगेगी। इसके अलावा कोई और टोटका अब काम नहीं आने वाला। कांग्रेस को सच्चे-भारत के निर्माण-पथ पर चलने के लिए सत्याग्रही-स्वभाव को अपने व्यक्तित्व का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। मुल्क़ की हक़ीक़त बदलने की जैसी ताब राजीव गांधी के दिल में बसी थी, वैसी ही ताब कांग्रेस की हक़ीक़त बदल पाएगी। कांग्रेस का सामना उन ताक़तों से है, जो हर जंग मक्कारी से जीतने की महारत रखती हैं। राजीव गांधी को याद करना इसलिए ज़रूरी है कि यह भाव मज़बूत हो कि मक्कारी के बिना भी जंग जीती जाती रही हैं। तूफ़ानों के क़हर में कांग्रेस ने कब-कब क्या-क्या नहीं सहा है? लेकिन दिन तब-तब ही निकला, जब-जब अपने हाथों की लकीरों में उलझे बिना कांग्रेस की रहनुमाई करने वालों ने सुदर्शन-चक्र उठाया। यही आज की भी पुकार है। इस पुकार की सुनवाई के अलाव राजीव गांधी को उनके जन्म दिन पर हम और क्या तोहफ़ा दे सकते हैं! 

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