Monday, July 9, 2018

शबरी-प्रवृत्ति, मारीच-कथा और इम्तहान



पंकज शर्मा

    
    
    
    
अगले आम चुनाव से पहले अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा या नहीं, नरेंद्र भाई मोदी, अमित भाई शाह और मोहन भागवत जानें। लेकिन हम सब इतना तो जानते ही हैं कि इन तीनों में से कोई भी उतना बड़ा राम-भक्त नहीं है, जितने बाबा तुलसीदास थे। इसीलिए राम के चरित्र को जैसा तुलसीदास ने समझा, मोदी-शाह-भागवत की तिकड़ी उसका रत्ती भर भी समझने की लियाकत नहीं रखती है। सो, राम का मंदिर अयोध्या में भले ही बन जाए, राम तो बाबा तुलसीदास के रामचरित मानस में ही विराजेंगे।
संघ कुनबे और भारतीय जनता पार्टी के शिखर-नायकों को राम से अगर ज़रा भी लेना-देना होता तो उन्होंने तुलसी के मानस में गोता लगा कर कभी तो वे मोती तलाशे होते, जो बताते हैं कि नायक होना आख़िर होता क्या है? तुलसी का मानस अलग-अलग नायकों और उनकी क़ुर्बानियों का दस्तावेज़ है। वह बताता है कि नायक को कैसा होना चाहिए। वह बताता है कि नायकत्व क्या होता है। वह बताता है कि नायक का व्यवहार, प्रवृत्ति, संप्रेषण और शैली कैसी होनी चाहिए।
तुलसी ने रामचरित मानस में कई बार यह सवाल उठाया है कि क्या हम किसी को सिर्फ़ इसलिए अपना नायक मान लें कि वह राजा है? या वह राजा का पुत्र है? या उसने कोई युद्ध जीत लिया है? तुलसी पूछते हैं: ‘राम कवन कहि प्रभु पूछहि तोहि, कहिय बुझाई कृपानिधि मोहि’। ‘एक राम अवधेश कुमारा, तेहि चरित बिदित संसारा‘। ‘नारि विरह दुःख लहुन अपारा, भायु रोष रण रावण मारा’। ‘राम अवध नृपति सुत सोई, कि अज अगुन अलख गति सोई’। तुलसी के मन में प्रश्न हैं कि हम किस राम को अपना नायक मानें? उसे, जो अयोध्या-नरेश का पुत्र है? या उसे, जिसने रावध का वध किया? या उसे, जो अपनी पत्नी के विरह से व्याकुल हो कर युद्ध-रत रहा?
हम भले ही अपने नायक तय करते वक़्त ज़्यादा न सोचें और किसी को भी अपना भाग्य-विधाता बना कर बाद में कलपते रहें, मगर तुलसी बाबा सिर्फ़ इसलिए किसी को भी अपना नायक मानने को तैयार नहीं हैं कि वह योद्धा है और किसी युद्ध का विजेता है। राम को भी नहीं। वे कहते हैं: ‘जासु कृपा अस भ्रम मिट जाई, गिरिजा सोई कृप्याल रघुराई’। ‘दलन मोह तम सो सप्रकाशु, बड़े भाग्य उर आव्ये जासु’। ‘आदि अंत कोई जासु न पावा, मति अनुमानि निगम अस गावा’। नायक वह है, जो हमारे भ्रम दूर कर दे, हमें भ्रंतियों से बाहर ले आए, जो कभी दुविधा में न रहे, जो अंधकार दूर करे, प्रकाश-पुंज हो और जो इतना सहज हो कि सब उस तक पहुंच सकें। तुलसी ने मानस में कहा है कि नायक को अपार ज्ञान होना चाहिए, मगर जो ज्ञानी होने के बावजूद, जो अपनी बात लोगों तक न पहुंचा सके, ऐसे नायक का कोई मतलब नहीं।
सैकड़ों बरस पहले तुलसीदास ने हमें बता दिया था कि नायकत्व और कुछ नहीं, सिर्फ़ अवधारणा है। नेतृत्व महज मनोभाव है, संकल्पना है, संधारणा है। मानस में वे कहते हैं: ‘एक अनिह अरूप अनामा, अज सच्चिदानंद परधामा’। ‘व्यापक विश्व रूप भगवाना, तेहि धरि देह चरित कृत नाना’। ‘व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी, सत चेतन घन आनंद राशी’। नायकत्व अपरिभाषित होता है। राम के देह-स्वरूप के नेतृत्व-गुणों को परिभाषित किया जा सकता है? मगर ब्रह्म की परिभाषा संभव नहीं है। नेतृत्व दरअसल है क्या? वह किसी एक व्यक्ति के प्रति, उसकी कार्य-शैली के प्रति, उसकी जीवन-शैली के प्रति और उसकी विचार-प्रक्रिया के प्रति हमारा मनोभाव है। हमारा यह सामूहिक मनोभाव ही किसी को नायकत्व प्रदान कर देता है।
इसलिए तुलसीदास बताते हैं कि छल-कपट से भरे लोग कभी नायक नहीं हो सकते। ‘सोचिय नृपत जो नीति न जाना, जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना’। ‘सुनु सर्वज्ञ प्रणत सुखकारी, मुकुट न होई भूप गुण चारी’। ‘साम, दाम अरु दंड विभेदा, नृप उर बषिन नाथ कह वेदा’। जो नीति नहीं जानता, जिसे प्रजा अपने प्राणों से भी ज़्यादा प्यारी न हो और जो साम-दाम-दंड-भेद के ज़रिए राज करना चाहता हो, वह क्या ख़ाक नेतृत्व करेगा? तुलसी बाबा की नज़र में ऐसा व्यक्ति नायक हो ही नहीं सकता।
तुलसी का मानस हमें दो क़िस्म के मुख्य नायकों के सामने खड़ा करता है। एक है रावण, जो इतना महाज्ञानी है कि खुद राम भी अपने छोटे भाई लक्ष्मण को ज्ञान हासिल करने उसके पास भेजते हैं। वह छह शास्त्रों और चार वेदों का ज्ञाता है। इतना महाशक्तिशाली है कि यमराज भी थर-थर कांपते हैं। इतना संपन्न है कि कुबेर उसका भाई है और उसकी लंका तक सोने की है। दूसरी तरफ़ ‘विरथ रघुबीरा’ हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। अनीति और मर्यादा के इस संघर्ष में विजय मर्यादा की होती है। अहंकार और विनम्रता के इस संघर्ष में विजय विनम्रता की होती है। एकालाप और वार्तालाप के इस संघर्ष में एकालाप हारता है।
सो, चुनाव आते ही ‘सौगंध राम की खाते हैं कि मंदिर वहीं बनाएंगे’ का आलाप शुरू कर देने वालों से कहिए कि पहले वे रामचरित मानस पढ़ें। पढें और विचार करें कि हमने अपने लिए कौन-से नायक गढ़ लिए हैं? ख़ुद से पूछें कि क्या हम इसी तिकड़ी-नेतृत्व के लायक हैं? सोचें कि हमारी शबरी-प्रवृत्ति से झरने वाले बेर हम असली नायकों को समर्पित कर रहे हैं या छले जा रहे हैं? हमारी झोंपड़ी में प्रभु ही पधारे हैं या उनका वेश धर कर कोई मारीच घुस आया है?
आम चुनावों तक का समय भारत का इम्तहान-दौर है। इसमें हमें लगातार तेज़ होती राम-धुन सुननी है। सरहदी-हवा को और बारूदी होते हुए देखना है। ख़ुशनुमा स्वर्ग तक ले जानी वाली सपनीली सीढ़ियों पर चढ़ना है। चार बरस में हुए विकास की आभासी-राह पर दौड़ना है। इसलिए यह बेहद सावधानी से काम लेने का दौर है। ठहरे हुए आंसुओं वाली ज़िंदगी से अगर हमारी निग़ाह हटी, फटेहालों का विलाप अगर हम अनसुना कर गए और राजधर्म की तार-तार होती मर्यादाओं की अगर हमने अनदेखी कर दी तो अपना बाकी जीवन अयोध्या में रामलला की दहलीज़ पर पड़े-पड़े बिताने से भी वैतरणी पार नहीं होगी। मुसीबत का जो पर्वत सामने है, उसके बगल से गुज़रना असली समाधान नहीं है। इस पर्वत को तो चढ़ कर उस पार पहुंचना होगा। 
नरेंद्र भाई ने कहा कि मैं आपका चौकीदार हूं। हमने मान लिया। चौकीदारी उन्हें सौंप दी। चार साल में चौकीदार ने हमें चौकन्ना कर दिया है कि यह चौकीदारी हम अब उससे वापस ले लें। अपनी दरबानी अगर अब हमने ख़ुद नहीं की तो आत्म-विलाप ही हमारा भविष्य होगा। इसलिए हमें अपनी दुनिया फिर से शुरू करनी होगी। अवाम को कमतर आंकने की चूक हुक़मरानों से आमतौर पर हो जाती है। लेकिन जो समझते हैं कि वे हमारे नायक बन गए हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि आम आदमी जीवन नाम के महाकाव्य का महानायक है। उसके सामूहिक अवचेतन में थोड़ी देर के लिए तो घुसपैठ की जा सकती है, मगर वहां स्थाई डेरा वे नहीं डाल सकते, जिनके मन में खोट है। लोग अभी इतने भी गए-बीते नहीं हो गए हैं कि शहर जलता रहे और वे अपने घर से भी न निकलें। 

Wednesday, July 4, 2018

लोकतंत्र को सेनानी नहीं, समन्वयक चाहिए


पंकज शर्मा
    
    
इन दिनों तीन सवाल हर जगह पूछे जा रहे हैं। एक, क्या अगले लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बन पाएंगे? दो, क्या समूचा विपक्ष एकजुट हो पाएगा? तीन, क्या विपक्षी गठबंधन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने को तैयार होगा?
इन सवालों के जवाब तलाशना आसान भी है और आसान नहीं भी है। इसलिए कि शक़्ल अभी आकार ले रही है और जब चीज़ें प्रक्रिया के गर्भ में होती हैं तो सूरत बनने-बिगड़ने में एक लमहा भी बहुत होता है। भारत जैसे भावना-प्रधान देश में राजनीति की दिशा ज़मीनी तथ्यों से तय होती ही नहीं है। ऐसा होता तो चार साल पहले भारतीय जनता पार्टी फर्राटे भरती दिल्ली पहुंचती ही नहीं।
बड़ी बात यह है कि बीस नहीं, तो कम-से-कम दस साल तो निश्चित ही, राज करने आए मोदी अपने पांचवे बरस में ही इस सवाल का सामना करने लगे हैं कि अगली पारी उनकी होगी या किसी और की? वे ही नहीं, जो भाजपा के अपने राज में भी किनारे हैं; वे भी, जो दरबार के भीतर हैं; खुले दिल से मान रहे हैं कि अगले चुनाव में अपने बूते स्पष्ट बहुमत जुटा लेने का ख़्वाब तो भाजपा को देखना ही नहीं चाहिए। भाजपा और संघ के बेहद आशावादी लोग भी अगले चुनाव में 220 सीटों से ज़्यादा की उम्मीद नहीं कर रहे हैं। संघ-कुनबे के यथार्थवादी-पुरोधा मानते हैं कि भाजपा को 175-180 सीटें मिलेंगी।
सो, माहौल यह है कि पांच साल पहले मरने-मारने पर उतारू, और चार साल पहले तक मोदी के बीस साल प्रधानमंत्री रहने पर सट्टा लगाने को तैयार, रुस्तम-ए-जहां भी अब मिमियां कर दो दलीलें दे रहे हैं। पहली कि मोदी के अलावा और है ही कौन? दूसरी कि सहयोगी दलों के साथ सरकार तो भाजपा ही बनाएगी, प्रधानमंत्री मोदी भले न बनें, बनेगा तो भाजपा का ही। मैं मानता हूं कि भाजपा के भीतर मोदी के स्थानापन्न के ये कयास भी अपने में बड़ी अहमियत रखते हैं। 
आपको याद होगा कि चंद बरस पहले तक स्थानापन्नों की इस सूची में सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, मनोहर पर्रिकर और नितिन गड़करी के नाम हुआ करते थे। उनकी संभावनाएं कितनी थीं, कितनी नहीं, अलग बात है। मगर अब सुषमा, जेटली और पर्रिकर की संभावनाओं को तो उनके स्वास्थ्य ने ही परे धकेल दिया है। गड़करी संभावनाओं की इस दौड़ में अब भी सबसे आगे हैं और राजनाथ सिंह की उम्मीदों पर भी पानी नहीं फिरा है। चर्चा में अभी ज़्यादा नहीं है, मगर एक नाम झरोखे से और झांकने लगा है--देवेंद्र फड़नवीस। मैं आपको उन्हें सचमुच बेहद गंभीरता से लेने की सलाह देता हूं।
जम्मू-कश्मीर में कलाबाज़ी दिखाने के बाद यह अंदाज़ भी गहरा हो गया है कि लोकसभा के चुनाव अगले साल मई में नहीं, इसी साल दिसंबर में हो जाएंगे। महबूबा मुफ़्ती की गुपचुप तैयारी जून के आख़ीर में भाजपा से नाता तोड़ने की थी। लेकिन वे गच्चा खा गईं। उन्हें मालूम होना चाहिए था कि मोदी के राज में मोदी की आंख से भला कुछ छिपा रह सकता है? भनक मिलते ही मोदी ने पहले दांव खेल दिया। कहते हैं कि आने वाले दिनों में घटनाओं का मंचन होते ही आम चुनाव का ऐलान भी हो जाएगा। मोदी-मंडली का मानना है कि कश्मीर-केंद्रित चुनाव भाजपा को फिर स्पष्ट बहुमत के आंकड़े तक पहुंचा देगा।
तो क्या विपक्ष इस बीच एकजुट हो पाएगा? एकजुटता की इच्छा एक बात हैं और ललचाने-डराने वाली आवाज़ों को अनसुना करना दूसरी बात। इसलिए विपक्षी एकजुटता का रास्ता बहुत समतल नहीं है। जीवन-मरण का प्रश्न न होता तो विपक्ष के सारे दल अपनी-अपनी ढपली पर अपने-अपने राग ही बजाते। उनमें से कई अब भी अपना ही राग अलाप रहे हैं। मगर मुझे लगता है कि उधर स्वतंत्रता-दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री लालकिले से अपना भाषण दे रहे होंगे और इधर विपक्षी एकजुटता का छाता पूरी तरह तन चुका होगा। मोदी-विरोधी मंच पर चेहरों की तादाद बढ़ती जा रही है। शरद पवार, मायावती, अखिलेश यादव, लालू प्रसाद, देवेगौड़ा, करुणानिधि, चंद्राबाबू नायडू, ममता बनर्जी--सब साथ हैं ही। तमाम किंतु-परंतु के बावजूद वाम दल, अरविंद केजरीवाल, नवीन पटनायक और के. चंद्रशेखर राव भी मौक़े की नज़ाकत समझ गए हैं। और-तो-और, शिवसेना तक भाजपा को कभी की नामंजूर कर चुकी है। अब महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला भी एक दस्तरख़ान पर नहीं बैठेंगे तो क्या करेंगे?
कांग्रेस, ज़ाहिर है कि, इस गठजोड़ का सबसे अहम हिस्सा है। गई-बीती हालत में उसे अपने बूते सवा सौ सीटें मिलने के आसार हैं। हालात बेहतर हो गए तो वह डेढ़ सौ सीटों का आंकड़ा छूने लगेगी। सियासी एकजुटता में दिलों का मेलजोल भी ठीक-ठाक रहा तो विपक्षी गठबंधन तीन सौ सीटों के नज़दीक पहुंचने की कूवत रखता है। शर्त एक ही है कि सब अपने दिल बड़े रखें।
अब रही बात राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की। भाजपा-संघ के डिस्को में आजकल एक ही गीत बज रहा है कि विपक्षी दिग्गज राहुल को अपना नेता मानेंगे नहीं और ऐसे में ‘मेरा कोई विकल्प नहीं’ की धुन पर नाचते मोदी फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जा बैठेंगे। उनकी आस, उन्हें मुबारक! मुझे तो दिख रहा है कि भाजपा अगर सबसे बड़ा राजनीतिक दल बन कर उभर भी आई तो मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे। ऐसे में उनका वैकल्पिक विपक्षी चेहरा कौन-सा है, इसकी कोई अहमियत ही नहीं है। 
अगले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा विपक्षी दल तो कांग्रेस ही रहेगी। मुझे नहीं लगता कि ऐसे में राहुल को सरकार का मुखिया बनाने में किसी को कोई ऐतराज़ होगा। ठीक है कि वे प्रशासनिक अनुभव के लिहाज़ से थोड़े कमज़ोर होंगे, लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि वे शरद पवार, मायावती और चंद्राबाबू नायडू जैसे अनुभवी उप-प्रधानमंत्रियों के सहयोग से अपनी सरकार चलाएं? कांग्रेस के पास अपने खुद के भी ऐसे-ऐसे चेहरे हैं, जिनके तजु़र्बे के सामने आज भी भाजपा की शिखर-शक़्लें पानी भरती हैं। इसलिए गुजरात और उड़ीसा के चंद नौकरशाहों की बदौलत किसी-न-किसी तरह अपनी गाड़ी हांकने वाले प्रधानमंत्री मोदी से तो वे राहुल गांधी लाख दर्ज़ा बेहतर साबित होंगे, जिनकी सरकार भारतीय राजनीति के सबसे आला-दिमाग़ों के साए तले चल रही हो।
आप ही बताइए, क्या बेहतर है? निराकार गृहमंत्री, निराकार वित्त मंत्री, निराकार रक्षा मंत्री और निराकार विदेश मंत्री समेत अपनी निराकार मंत्रिपरिषद की छाती पर चढ़ कर तांडव में मशगूल एक प्रधानमंत्री या एक मज़बूत और साकार मंत्रिपरिषद के बीच समन्वय की ताल से ताल मिलाता समावेशी प्रधानमंत्री? पिछले चार साल में भारत की शासन व्यवस्था ने संवेदनाओं को निचोड़ कर खूंटी पर टांग दिया है। देशवासी आज ‘शासित’ नहीं, ‘अधीनस्थ’ हैं। भारत को लोकतंत्र के नाम पर सैन्य-गर्व से ग्रस्त किसी राजनीतिक-सेनानी की नहीं, भ्रातृ-धर्म के उत्तरदायित्व-बोध का अहसास रखने वाले एक सियासी-समन्वयक की ज़रूरत है। मुल्क़ की अनुभवी आंखों ने सब देखा है। देखा है कि राजनीति के वे हरे-भरे खेत सूख कर जंगल कैसे हो गए, जिनमें चार-पांच साल पहले तक ख़ुशनुमा मौसम आ कर अपना डेरा डाला करते थे। इसलिए अब देश इंतज़ार कर रहा है कि विपक्ष की विपरीत दिशाओं में बहती धाराएं एक हों। ऐसा हुआ तो उसकी सूनामी में भाजपा का बहना न नरेंद्र मोदी बचा पाएंगे, न मोहन भागवत। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

आपातकाल भारत की असली प्रेत-बाधा नहीं है



पंकज शर्मा
    
    
आपातकाल की 43वीं सालगिरह के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी, उनकी आंख के इशारे पर अपने हाथ खड़े कर देने वाले मंत्रियों और अमित शाह की पूरी भारतीय जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी को हिटलर घोषित कर दिया। चार साल से हिटलर से हो रही अपनी तुलना का यह प्रतिकार करते वक़्त नरेंद्र भाई को इतना भी याद नहीं रहा कि तात्कालिक परिस्थितियों के चलते जिन इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था, ज़्यादतियों की बातें सामने आने के बाद विह्वल हो कर उन्हीं इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाया भी था। भाजपा को आज यह भूलने की सहूलियत है कि संजय गांधी तो संजय गांधी, इंदिरा जी के दूसरे तमाम नजदीकी भी आपातकाल हटाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन बिना किसी के दबाव में आए उन्होंने आपातकाल हटाने का ऐलान कर दिया। 
इसलिए मैं मानता हूं कि अगर 25 जून 1975 को आपातकाल लगाना इंदिरा जी की ‘ऐतिहासिक भूल’ थी तो 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटाना इंदिरा जी की ‘ऐतिहासिक पुण्याई’ भी थी। इंदिरा जी की ऐतिहासिक भूल के एहसास-बोझ से कांग्रेस को बगलें झांकने की ज़रूरत नहीं है। आपातकाल की शव-समीक्षा चार दशक से चल रही है। कांग्रेस एक बार नहीं, बार-बार यह ग़लती मान चुकी है। मगर आपातकाल के दिनों में गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ा कर खुद को जेल से रिहा कर देने की गुहार करने वालों की दत्तक-ज़मात मौक़ा मिलते ही आज भी इस ‘भूल’ के लिए कांग्रेस पर पिल पड़ती है और ज़्यादातर कांग्रेसी अपने चेहरे पर रूमाल रखने लगते हैं।
मुझे नहीं लगता कि आपातकाल कांग्रेस के लिए शर्म से डूब मरने का प्रसंग है। जब आपातकाल लगा तो मैं विक्रम विश्वविद्यालय में स्नातक का छात्र था। हिंदी के महान कवियों में से एक शिवमंगल सिंह सुमन हमारे कुलपति थे। आपातकाल में काॅलेज और विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनाव मुल्तवी कर दिए गए थे। कुलपति को पदाधिकारियों के मनोनयन का अधिकार दे दिया गया। सुमन जी ने मुझे विक्रम विश्वविद्यालय के छात्र संघ का सचिव मनोनीत कर दिया और मैं ताल ठोक कर कह सकता हूं कि छात्र संघ की गतिविधियों ने 
आपातकाल के दौर में जैसा रचनात्मक मोड़ लिया, उसकी कल्पना पहले कभी की ही नहीं जा सकती थी। पहली बार सारे इम्तहान तब ठीक समय पर हुए। पहली बार विश्वविद्यालय परिसर तब साइकिल की चैनों से बनी बेल्टों और रामपुरियों से मुक्त हो कर कालिदास समारोह और युवा महोत्सव का सचमुच आनंद लेने लगा।
इसलिए, बावजूद इसके कि आपातकाल में हुई चंद ज़्यादतियों को किसी भी लिहाज़ से सही नहीं ठहराया जा सकता, कांग्रेस को आपातकाल की भूल के अवसाद से बाहर आने की ज़रूरत है। कम-से-कम उन्हें तो इस भूल का सालाना-ज़िक्र कर के कांग्रेस को नीचा दिखाने का कोई हक़ नहीं है, जिनके दामन से गुजरात के दंगों का खून लाख निचोड़ने पर भी नहीं निचुड़ रहा। सोमनाथ से चले जिस रथ के पहियों पर जमे रक्त के थक्के आज भी भारत की प्रेत-बाधा बने हुए हैं, उस रथ-यात्रा का प्रबंधन किस के हाथ में था? जिन्हें अपने किए किसी भी धत-कर्म पर कोई शर्म नहीं, उनकी कही बातों पर कांग्रेस को इतना भी क्या पानी-पानी होना कि बोलती बंद हो जाए? कोई नहीं कहता कि आपातकाल मंे अगर कुछ ग़लतियां हुईं तो कांग्रेस बेशर्मी से उनका बचाव करे। मगर उन घरेलू और वैश्विक हालात का बखान करने से कांग्रेस को कौन रोकता है, जिनके चलते इंदिरा जी को आपातकाल लगाना पड़ा था! 
जो कहते हैं कि इंदिरा जी ने महज अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लगा दिया था, वे उस दौर की गुत्थियों का अति-सरलीकरण करते हैं। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि जब बाकी लोग देश को आपातकाल की याद दिला रहे हों, कांग्रेस देश को ज़ोर-ज़ोर से याद दिलाए कि आपातकाल लगा क्यों था? यह साबित करने के लिए हज़ारों पन्नों के दस्तावेज़ मौजूद हैं कि वे क्या हालात थे, जिन्होंने देश को आपातकाल की तरफ़ ठेला। जिन्होंने बिना किसी बाहरी-भीतरी खतरे के पिछले चार साल से भारत की हर संवैधानिक व्यवस्था को बंधक बना रखा है, क्या वे हमें हिटलर के मायने बताएंगे?
ऐसे भी पचासों दस्तावेज़ी प्रमाण मौजूद हैं, जो बताते हैं कि आपातकाल में घटी बहुत-सी घटनाओं की जानकारी तब इंदिरा जी तक नहीं पहुंचने दी जाती थी और जब उन्हें इन बातों की भनक मिलने लगी तो वे कितनी विचलित रहने लगी थीं। उन दिनों दार्शनिक जिड्डू कृष्णमूर्ति से हुई उनकी मुलाक़ातों की तफ़सील जिन्हें मालूम है, वे आपको बताएंगे कि इंदिरा जी की विह्वलता का स्तर क्या था, कैसे उन्होंने तमाम दबावों को नकार कर आपातकाल हटाने का फ़ैसला किया और कैसे उन्होंने गुप्तचर ब्यूरो की इस सूचना के बावजूद आम-चुनाव कराने का ऐलान कर दिया कि कांग्रेस बुरी तरह हार जाएगी। आज एक-एक चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र की तमाम मर्यादाओं को सरेआम खूंटी पर लटका देने वाले आपातकाल की हायतौबा तो मचाते हैं, यह ज़िक्र क्यों नहीं करते कि इंदिरा जी ने आपातकाल हटाने और चुनाव करा कर लोकतंत्र-बहाली का ऐतिहासिक क़दम भी उठाया था?
मैं तो कहता हूं कि कांग्रेस को हर साल 18 जनवरी का वह दिन ज़ोर-शोर से मनाना चाहिए, जिस दिन 1977 में इंदिरा जी ने सब को हक्काबक्का करते हुए ऐलान किया था कि वे मार्च में आम-चुनाव करा रही हैं। आपातकाल तो उसके बाद भी क़रीब दो महीने क़ायम रहा था। आपातकाल लगाना अगर ग़लती थी तो इंदिरा जी और कांग्रेस को उसकी बहुत सज़ा मिल चुकी है। लेकिन क्या आपातकाल हटाना और चुनाव कराना भी इंदिरा जी की ग़लती थी? अगर ऐसा नहीं है तो इस पुण्याई की प्रशंसा से हम उन्हें क्यों वंचित रखें? जिन्हें इंदिरा जी में हिटलर दिखाई दे रहे हैं, उन्हें उनके हाल पर छोड़िए। बाकी सब तो इंदिरा जी के सत्कर्मों पर इठलाने की हिचक त्यागें! राम मेरे भी आराध्य हैं, लेकिन नरेंद्र भाई की तरह मैं तो दावे से नहीं कह सकता कि हमारे आधुनिक विमानन विज्ञान का जन्मदाता पुष्पक है। सीता माता मेरे लिए भी पूजनीय हैं, लेकिन मैं नहीं मानता कि वे परखनली से जन्मी थीं। गणेश जी को मैं भी हर पूजन में सबसे पहले नमन करता हूं, लेकिन इसलिए नहीं कि हमारे आज के शल्य चिकित्सा विज्ञान की वे पौराणिक मिसाल हैं। कर्ण का पराक्रम मुझे भी अभिभूत करता है, लेकिन मैं उन्हें आज के मूल-कोशिका विज्ञान की प्राचीन उपस्थिति का सबूत कैसे मान लूं? सो, नरेंद्र भाई और उनकी मंडली का आपातकाल-आलाप भी मेरे लिए अतिरंजना के अलावा कुछ नहीं है। इस शोरगुल का कुहासा दूर करना इंदिरा जी के अनुयायियों की पहली ज़िम्मेदारी है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

Monday, June 18, 2018

पंचमुखी रुद्राक्ष और शव-राज का विदाई-पूजन


पंकज शर्मा

    राहुल गांधी के मंदसौर दौरे से उपजी ऊष्मा ने मध्यप्रदेश के कांग्रेसजन को जितना सराबोर किया है, उतना ही मुझे भी किया है। कमलनाथ-ज्योतिरादित्य सिंधिया-दिग्विजय सिंह-अजय सिंह-सुरेश पचौरी का पंचमुखी रुद्राक्ष मध्यप्रदेश में कांग्रेस को इस बार इसलिए सत्तासीन बनाने की कूवत रखता है, क्योंकि मतदाताओं का हर वर्ग शिवराज सिंह चौहान की सियासी वाम-साधना से बेतरह त्रस्त है। मगर बावजूद इसके कि मध्यप्रदेश-वासी अब भारतीय जनता पार्टी का मुंह भी नहीं देखना चाहते, मैं अपनी विजय-यात्रा पर निकल चुकी कांग्रेस से गुज़ारिश करना चाहता हूं कि वह नीचे दिए तथ्यों की सूची अगले छह महीने अपने गले में लटका कर घूमे।
    पिछले, यानी 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36.3 प्रतिशत वोट मिले थे और उसके 57 विधायक जीते थे। इसके पहले 2008 में भी कांग्रेस को 36 प्रतिशत वोट मिले थे। इसका मोटा मतलब है कि गई-बीती हालत में भी कांग्रेस को एक तिहाई से ज़्यादा वोट तो मिल ही जाते हैं। लेकिन कांग्रेस को 2013 भूल जाना चाहिए और 2014 के मई में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान मध्यप्रदेश में विधानसभावार नतीजों को गांठ बांध कर आगे बढ़ना चाहिए।
    2014 की सच्चाई यह है कि जिन 57 सीटों पर कांग्रेस 2013 में जीती थी, उनमें से सिर्फ़ 18 पर ही उसकी बढ़त 2014 में क़ायम रह पाई थी। बाकी 39 में वह भाजपा से पिछड़ गई थी। यह सही है कि पिछले चार साल में नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भाजपा कई पायदान नीचे लुढ़क गई है, मगर यह भी सही है कि मोदी-लहर ने जिन सीटों पर कांग्रेस की जीत को पीछे धकेल दिया था, वे कांग्रेसी-रुस्तमों के प्रभाव-क्षेत्र में थीं।
    2014 के लोकसभा चुनाव के मतदान में कांग्रेस को मध्यप्रदेश में सिर्फ़ 35 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। भाजपा 195 सीटों पर आगे थी। 17 संसदीय क्षेत्र ऐसे थे, जहां कांग्रेस विधानसभा की एक भी सीट पर बढ़त हासिल नहीं कर पाई। कोई बुरा न माने तो कहूं कि दिग्विजय सिंह के राजगढ़ संसदीय क्षेत्र की सभी 8 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस पीछे रही। अरुण यादव के खंडवा की आठों विधानसभा सीटें भी कांग्रेस ने गवांई। मीनाक्षी नटराजन के मंदसौर की सभी 8 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस पिछड़ी। सुरेश पचौरी के होशंगाबाद की आठों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस पीछे रही। विवेक तनखा के जबलपुर की आठों सीटों पर भी कांग्रेस पिछड़ गई।
    लोकसभा चुनाव के वक़्त कमलनाथ का छिंदवाड़ा अकेला ऐसा संसदीय क्षेत्र था, जहां कांग्रेस विधानसभा की सभी 7 सीटों पर आगे रही थी। सिंधिया के गुना में कांग्रेस 8 में से 6 और ग्वालियर में 8 में से 4 विधानसभा सीटों पर आगे थी। अर्जुन सिंह और अब उनके पुत्र अजय सिंह के प्रभाव वाले इलाक़े सतना में कांग्रेस 4 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी और सीधी में 2 विधानसभा क्षेत्रों में। दिग्विजय और सिंधिया के मिले-जुले प्रभाव वाले धार की 8 में से 4 सीटों पर कांग्रेस की बढ़त थी।
    कांग्रेस के लिए यह भूलना भी ठीक नहीं होगा कि 2014 की मोदी-लहर ने जिन 17 संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस को हर-एक विधानसभा सीट पर मीलों पीछे छोड़ दिया था, उनमें अनुसूचित जाति के चारों संसदीय क्षेत्र--भिंड, टीकमगढ़, देवास और उज्जैन--शामिल थे। आदिवासियों के लिए आरक्षित लोकसभा की 6 सीटों में से 2 ऐसी थीं, जिनमें कांग्रेस को एक भी विधानसभा क्षेत्र में बढ़त नहीं मिली। इनमें से एक थी अरुण यादव के पिता सुभाष यादव की राजनीतिक जन्म-कर्मस्थली खरगोन। दूसरी थी बैतूल। अनुसूचित जनजाति के बाकी चार संसदीय क्षेत्रों में भी धार को छोड़ कर बाकी सभी जगह कांग्रेस की हालत बदतर ही थी।
    जब अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षित इलाक़ों में ही कांग्रेस की हालत यह हो गई तो 2014 की लहर में सामान्य वर्ग की सीटों पर उसके गाल कहां से गुलाबी होते? लोकसभा की 19 सामान्य सीटों में सिर्फ़ 7 ऐसी थीं, जहां के विधानसभा क्षेत्रों में कहीं-कहीं कांग्रेस को बढ़त मिली। इन 19 संसदीय क्षेत्रों में भाजपा को कांग्रेस से क़रीब 36 लाख वोट ज़्यादा मिले। यह तथ्य भी ध्यान रखना कांग्रेस के लिए अच्छा रहेगा कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित क्षेत्रों को तो छोड़िए, सामान्य क्षेत्रों की इन सीटों पर बहुजन समाज पार्टी को साढ़े नौ लाख वोट मिले थे और समाजवादी पार्टी को पौने दो लाख। निर्दलीय और अन्य उम्मीदवार भी नौ लाख वोट बटोर ले गए थे। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित लोकसभा की चार सीटों पर भाजपा को सवा 21 लाख से कुछ ज़्यादा, कांग्रेस को क़रीब 12 लाख, बसपा को 85 हज़ार और सपा को 52 हज़ार वोट मिले। अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित छह सीटों पर भाजपा को 35 लाख, कांग्रेस को साढ़े 23 लाख और बसपा को क़रीब एक लाख वोट मिले। निर्दलीय और अन्य उम्मीदवार सवा चार लाख से ज़्यादा वोट ले भागे। इसलिए मत-विभाजन के जाल-बट्टे का इस्तेमाल करने में माहिर भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए कांग्रेस को इन सर्दियों के लिए अभी से व्यूह-रचना करनी होगी।
    अपनी-अपनी सियासी-रियासत को लेकर सौतिया-डाह से लबरेज़ नेताओं से भरी कांग्रेस को यह भी याद रखना होगा कि चार साल पहले जब नरेंद्र मोदी अपनी बनैटी घुमाते हुए निकले थे तो उनके छर्रे भी कांग्रेस के रुस्तमों पर बेहद भारी पड़ गए थे। तब मंदसौर में मीनाक्षी नटराजन को 34 प्रतिशत वोट पर समेट कर न जाने कौन सुधीर गुप्ता 60 फ़ीसदी से ज्यादा वोट अपनी झोली में डाल कर चलते बने। खंडवा में अरुण यादव को 36 प्रतिशत वोट पर ढकेल कर नंदकुमार चौहान 57 प्रतिशत वोट ले भागे। दिग्विजय सिंह के छोटे भाई लक्ष्मण सिंह विदिशा में 28 प्रतिशत वोट पर सिमट गए थे और रीवा में सुंदरलाल तिवारी क़रीब 26 प्रतिशत पर। सिंधिया को भाजपा के उम्मीदवार से 12 प्रतिशत वोट ज़्यादा मिले थे और कमलनाथ को 10 प्रतिशत। मगर सबसे ज़्यादा मतों के अंतर से जीतने वाले उम्मीदवारों की सूची में सिंधिया 20वें क्रम पर थे और कमलनाथ 22वें पर। कुल 29 में से। यानी सिंधिया और कमलनाथ से भी अधिक वोटों के फ़र्क से जीतने वाले 19 ऐसे लोग थे, जिनके नाम आप जानते तक नहीं हैं।
    सो, बावजूद इसके कि; मैं जानता हूं कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में इस बार जीत रही है, कि विधानसभा का यह चुनाव भाजपा के खि़लाफ़ जनता खुद लड़ रही है, कि कोई मोदी-शाह लहर इस बार शिवराज की नैया पार नहीं लगा पाएगी; मैं कांग्रेस से अनुरोध करता हूं कि वह राहुल गांधी की मंदसौर यात्रा के बाद शुरू हुई चालीसा सुनने का आनंद लेने से बचे। रात तो पता नहीं क्या-क्या ख़्वाब दिखाती है। लेकिन असलियत तो वही है, जो सुबह हम जब नींद से जागते हैं, तो सामने आती है। इसलिए यह समय अपने घर की दीवारों के नीचे नींव के पत्थर को मज़बूत बनाए रखने का है। यह समय ‘जागते रहो’ की रट लगाए रखने का है। यह समय अतिशय व्यक्तिवादिता पर अंकुश लगाने का है। यह समय बैठक-बैठक खेलने के बजाय मैदान-मैदान दौड़ने का है। मध्यप्रदेश से भाजपा के जाने का समय आ गया है। कांग्रेस को अपना समय लाना है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    Monday, June 4, 2018

    ‘नमोरोगियों’ के देश में बजती विदा-गीत की धुन


    पंकज शर्मा

    पंकज शर्मा

      मैंने पिछले साल 30 सितंबर को इसी जगह छपे अपने लेख में नरेंद्र भाई मोदी को आग़ाह किया था कि उनकी उलटी गिनती शुरू हो गई है। उस दिन विजयादशमी थी। लेकिन आठ महीने बाद, गुरुवार को लोकसभा के 4 और विधानसभा के 10 उपचुनावों में अपनी ऐसी-तैसी करा लेने के बाद भी, भारतीय जनता पार्टी शुतुरमुर्ग-मुद्रा में इठलाए बिना नहीं मान रही है।
      शुतुरमुर्ग संसार का सबसे बड़ा पक्षी है। भाजपा भी संसार का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। शुतुरमुर्ग का अंडा भी बाकी सभी पक्षियों के अंडों में सबसे बड़ा होता है। भाजपा के वैचारिक-अंडे भी पिछले चार साल से बाकी तमाम वैचारिक-अंडों को मात दिए हुए हैं। शुतुरमुर्ग के पैरों में ऐसी जान होती है कि एक लात मारें तो शेर भी बिलबिला जाता है। भाजपा ने भी 2014 में विपक्ष को जब लात जमाई तो वह चारों खाने चित्त हो गया। शुतुरमुर्ग सबसे ऊंचा पक्षी है। सो, भाजपा पिछले चुनाव में सबसे ऊंची जगह पहुंच गई। शुतुरमुर्ग सबसे तेज़ दौड़ने वाला पक्षी है। सो, भाजपा भी ऐसी दौडी कि सब देखते रह गए।
      लेकिन भाजपा भूल गई कि बेचारे शुतुरमुर्ग के साथ तीन मुसीबतें हैं। एक, सबसे तेज़ भले ही दौड़ ले, मगर वह हवा में उड़ नहीं सकता। दस-पंद्रह फुट की छलांग तो लगा सकता है, लेकिन लाख पंख फड़फड़ाए, उड़ान नहीं भर सकता। दो, शुतुरमुर्ग के दांत नहीं होते। इसलिए उसे अपना भोजन पचाने के लिए तरह-तरह की जुगाड़ करनी पड़ती है। और तीन, जब तूफ़ान आता है तो शुतुरमुर्ग अपनी गर्दन रेत में घुसा लेता है और सोचता है कि वह बच गया। उसे यह अहसास ही नहीं होता है कि बाकी पूरा ज़िस्म तो बाहर है, सिर्फ़ गर्दन बचा कर क्या हो जाएगा?
      अपनी ताज़ा-ताज़ा पिटी भद्द के बावजूद भाजपा का यही हाल है। चार साल में उसने छलांग लगाने की कोशिशें तो बहुत कीं, मगर उड़ान वह नहीं भर सकी तो नहीं ही भर सकी। अपना वैचारिक नज़रिया देश के गले उतारने के लिए भी भाजपा ने हर तरह की जुगाली करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी, मगर भारत हिंदू राष्ट्र बनने को तैयार नहीं हुआ तो नहीं ही हुआ। और, अब जब तूफ़ानी हवाएं सांय-सांय कर रही हैं तो भाजपा अपनी गर्दन रेत में घुसा कर तूफ़ान के अस्तित्व को नकारने में दिन-रात एक कर रही है। लोकसभा में वह अल्पमत में आ गई है, तो नरेंद्र भाई की बला से! 4 साल में 14 राज्यों में हुए 27 उपचुनावों में से वह सिर्फ़ 5 जीती है, तो अमित शाह की बला से!
      मगर भाजपा के दिखाने के इन दांतों के पीछे से मुझे तो नरेंद्र भाई के ललाट पर गहरी होती जा रही लकीरें साफ दिखाई दे रही हैं। जिन्हें अमित भाई शाह के चेहरे पर उड़ती हवाइयां दूरबीन लगा कर भी नहीं देखनीं, न देखें; लेकिन देश तो नंगी आंखों से भी उन्हें देख रहा है। मैं तो चाहता हूं कि भाजपा ताज़ा नतीजों के बावजूद आत्म-मुग्ध रहे। अब भी न चेते। यही लोकतंत्र के लिए शुभ है। नरेंद्र भाई का आत्म-मोह ही तो 2019 में उन्हं  इंद्रासन से नीचे फेंकेगा। इसलिए उनकी तंद्रा बनी रहे तो ही बेहतर है। मुझे पक्का यक़ीन है कि वे नहीं चेतेंगे। चेतने वाला चेतने में चार साल थोड़े ही लगाता है। भारतीय संवेदनाओं की ज़रा भी चेतना होती तो क्या नरेंद्र भाई अपने प्यारे देशवासियों के बहते आंसुओं के बीच चार बरस से ऐसे ही ठुमके लगाते विचर रहे होते?
      इसलिए मैं घनघोर नमोरोगियों (मनोरोगियों मत समझिए) को छोड़ कर बाक़ी सबसे भाजपा की विदाई-डोली सजाने में हाथ बंटाने का अनुरोध करता हूं। इस अनुरोध के पीले चावल लेकर हम अगली गर्मियों तक जितने घरों के दरवाज़े खटखटा लेंगे, देश उतने ही क़दम आगे बढ़ जाएगा। चार साल में भारत चार सौ साल पीछे चला गया है। तब कबीर ने देह छोड़ी थी। आज भाजपा के हंटर हमारी तहज़ीब में बसी कबीर-तत्व की देह को बेतरह लहुलुहान कर चुके हैं। एक बरस बाद अगर भाजपा विदा नहीं हुई तो कबीर-भाव विदा हो जाएगा। तब या तो नरेंद्र भाई के मन की बात रहेगी या कबीर के मन की। इसलिए चुनना तो हमें है।
      हमें चुनना है कि हम निजी महत्वाकांक्षाओं के बरसते कोड़ों को अपनी पीठ देंगे या विचारधाराओं के युद्ध में अपना सीना तान कर खड़े होंगे? हमें चुनना है कि कौन हमारे लिए यह तय करेगा कि मुख्य-धारा क्या है और गौण-धारा क्या? हमें चुनना है कि हरियाली को ऐसे ही झुलस जाने देंगे या अपनी अंजुरियों में पानी ले कर उसे बचाने दौड़ेंगे? हमें चुनना है कि भारत के सांस्कृतिक गमले में लगे फूलों को हम कुम्हलाने देंगे या उनकी पंखुड़ियों को बचाने में अपना सब-कुछ लगाएंगे? क्या हमारे हाथ इतने बंध गए हैं कि अपनी ज़ंजीर भी हम नहीं खोल सकते?
      बस, एक धक्का भर और देना है। उसके बाद चार साल पहले उतरी रेल अपनी पटरी पर लौट आएगी। अपनी ग़लती है तो हमें ही सुधारनी भी होगी। जब रेल में एक से ज़्यादा यात्री बैठे हों तो किसी एक को यह हक़ नहीं मिलना चाहिए कि वह अपनी मर्ज़ी से रेल को चाहे जिस पटरी पर डाल दे। लेकिन हमने बेवज़ह अपनी लंगोट घुमाते घूम रहे एक तालठोकू को 2014 में अपने हाथ काट कर दे दिए। चार बरस में उसने भारतीय रेल को अंधी गली के हवाले कर दिया। अब हम अपनी यात्रा के अंतिम चरण में हैं। इस एक बरस में या तो हम इस रेल की पटरी बदल दें या फिर उस मुहाने पर जा कर खड़े होने की तैयारी कर लें, जिसके आगे कोई पटरी नहीं है। 
      इसलिए अब एक-एक लमहा बेहद अहम है। यक़ीन रखिए कि नरेंद्र भाई अगर अब आसमान के सारे बादलों को भी इकट्ठा कर लें तो वह बारिश नहीं होने वाली, जिससे नए अंकुर फूटते हैं। उनके आगमन के बाद से लगातार बांझ होती जा रही धरती की जब तक नए सिरे से जुताई-गुड़ाई नहीं होगी, फ़सल नहीं लहलहाएगी। अपनी राह में बिछे पत्थर अगर हम उठा कर नहीं फेंकेंगे तो कौन फेंकेगा? अपनी आंखों में जो सपने हमने संभाल कर रखे हैं, उन्हें कोई और आकर पूरे नहीं करेगा। यह तो हमें अब खुद करना होगा। 
      देश घोषणाओं का अंबार लगाने से नहीं, ज़मीनी क्रियान्वयन से आगे बढ़ते हैं। ऐसे नौ-नौ किलोमीटर की सड़क बनाने के बाद उसके किनारे खड़े किराए के चेहरों का हाथ हिला कर अभिवादन करने का शौक़ अगर दूसरे प्रधानमंत्रियों को भी होता तो सोचिए, भाखड़ा-नांगल बांध और भिलाई इस्पात कारखाने के निर्माण से लेकर हरित, श्वेत और कंप्यूटर क्रांति तक हम पहुंचते कैसे? इसलिए आइए, इस एक साल में, चार साल पहले अपने हाथों हुए पाप का प्रायश्चित करें और आज ही उस कांवड़-यात्रा पर निकल पड़ें, जो 2019 में जब संपन्न हो तो हमारे सारे पाप धुल जाएं। ऐसा नहीं हुआ तो ये पाप, हमारे नहीं, अगली पीढ़ी के सिंर चढ़ कर बोलेंगे और तब कोई काल-सर्प पूजा हमें मोक्ष नहीं देगी। 

      Monday, May 28, 2018

      बदन की होड़ करते प्रधानमंत्री का लज्जित देश



      पंकज शर्मा

        हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी सचमुच रुस्तम हैं। न होते तो विराट कोहली की शारीरिक-तंदुरुस्ती की चुनौती मंजूर कैसे करते? विराट का तो काम ही अपना शरीर फिट रखने का है। उनका सारा शौक या कारोबार, जो भी आप समझें, टिका ही इस पर है कि उनका शरीर कितना फिट है। इसलिए अपनी फिटनेस पर गर्व करते हुए उन्होंने अपना व्यायाम-वीडियो जारी किया और दो लोगों को चुनौती दी कि वे भी अपने फिटनेस-प्रमाण पेश करें। एक, पत्नी अनुष्का और दूसरे, प्रधानमंत्री मोदी। अनुष्का ने तो चुनौती स्वीकर करने में कोई बेताबी नहीं दिखाई, मगर नरेंद्र भाई ने आनन-फानन में ट्वीट कर दिया कि उन्हें चुनौती मंजूर है।
        बदन की तंदुरुस्ती अहम है। उस पर गर्व करने का किसी को भी हक़ होना चाहिए। अगर हमारे प्रधानमंत्री का बदन थुलथुल नहीं हैं तो मुझे भी इसका गर्व है। विराट उन्हें चुनौती देने का बचकानापन करें, इसके लिए मैं उन्हें इसलिए माफ़ करता हूं कि वे फिटनेस को जिम से आगे की चीज़ समझने का माद्दा अगर नहीं रखते हैं तो कोई बात नहीं। मगर उनकी चुनौती की गेंद को नरेंद्र भाई उसी अदा में हुलस कर लपक लें तो मैं इसकी कैसे अनदेखी कर दूं? हमारे प्रधानमंत्री को तो मालूम होना चाहिए कि तंदुरुस्ती का अर्थ महज भुजाओं, कंधों और छाती की मांसपेशियां बनाना नहीं है। सिक्स-पैक एब्स बनाना भर नहीं है। यह तो व्यक्ति की समूची खै़रियत से जुड़ा मसला है। मन की शांति के बिना कोई फिटनेस, फिटनेस नहीं। फिटनेस तो गतिशील रचनात्मक स्थिति है। सो, सिर्फ़ बदन की होड़ में विराट से पंजा लड़ाने को फटाफट तैयार हो जाने वाले प्रधानमंत्री को देख कर मुझे तो भारतवर्ष के क्षितिज पर बड़े-बड़े सवालिया निशान तैरते दिखाई देने लगे हैं।
        विराट-प्रसंग के बाद से मैं भीतर-ही-भीतर लज्जित महसूस कर रहा हूं। मेरा सिर ऐसे झुका हुआ है, जैसे कभी-कभी हमारा राष्ट्रीय ध्वज झुकता है। मेरी आंखें, लगता है, सदा के लिए नीची हो गई हैं। मालूम नहीं कि नरेंद्र भाई का व्यायाम-वीडियो जारी होने के बाद भी मेरी पलकें उठने की हिम्मत करेंगी या नहीं। मैं मानता हूं कि हमारे प्रधानमंत्री का बदन अमेरिका के मुखिया डोनाल्ड ट्रंप को मीलों पीछे छोड़े हुए है, चीन के शी जिंगपिंग को मात देता है और रूस के व्लादिमीर पुतिन के बदन की टक्कर का है। यह नरेंद्र भाई के वर्षों के सूर्य-नमस्कार का चमत्कार है। अपनी इस धरोहर पर नाज़ करने का उन्हें हक़ है। लेकिन भारत का प्रधानमंत्री अगर अपना बुनियादी काम करने के बजाय शारीरिक सौष्ठव के प्रदर्शन की होड़ में मंच पर उतरने लगे तो मेरा मन तो इतना झेलने से इनकार कर रहा है।
        चार साल पहले जब नरेंद्र भाई ने दिल्ली के इंद्रासन को अपना लक्ष्य बनाया था, तो बिना किसी के दिए, कई चुनौतियां खुद ही स्वीकार कर ली थीं। बोले थे कि सब का साथ लूंगा और सब का विकास करूंगा। बोले थे कि विदेशों में पड़ा खरबों काला रुपया सौ दिनों में वापस ले आऊंगा। बोले थे कि हर बरस दो करोड़ लोगों को रोज़गार दूंगा। बोले थे कि किसानों को उनकी उपज के लिए लागत से दुगना दाम दूंगा। बोले थे कि ग़रीब को महंगाई का निवाला नहीं बनने दूंगा। बोले थे कि दुश्मन आंख दिखाएगा तो उसकी आंख निकल लूंगा और एक सिर के बदले दुश्मन के दस सिर काट कर भारत माता के चरणों में डाल दूंगा। बोले थे कि गंगा का पुत्र हूं और अपनी गंगा मैया का आंचल चकाचक साफ कर दूंगा। बोले थे कि नोट बंदी का कष्ट पचास दिन झेल लो, उसके बाद भी अच्छे दिन न आएं तो मुझे जो चाहो, सज़ा देना। 
        चार साल बाद भी सारी चुनौतियां नरेंद्र भाई के कंधे पर बेताल की तरह वैसे ही लटकी हुई हैं। वे उनमें से एक का भी निपटारा नहीं कर पाए हैं। सूर्योदय से पहले थोड़े-बहुत दंड उन्होंने इन चुनौतियों से निपटने के लिए भी पेले होते तो क्या भारत का सिर इतना झुका दिखाई देता? 2014 के चुनाव में आंख बंद कर अपना वोट नरेंद्र भाई की झोली में डाल आए लोग पता नहीं कितने महीनों से चिल्ला-चिल्ला कर पूछ रहे हैं कि इन चुनौतियों का क्या हुआ? लेकिन विराट की चुनौती पर जवाबी-ट्वीट में एक लमहे की भी देरी न करने वाले हमारे प्रधानमंत्री जनता के सवालों का जवाब देने की कोई परवाह नहीं कर रहे। वे विराट से संवाद करते हैं, मगर जनता से सिर्फ़ एकालाप। हम सब हर महीने नरेंद्र भाई के मन की अंटशंट बात सुनें, मगर वे हमारे मन का सच्चा दर्द सुनने के लिए प्रधानमंत्री थोड़े ही बने हैं।
        विराट कोहली जिनकी आंखों के तारे हैं, उनकी आंखों को सलाम! मुझे तो उनकी अहंकारी उद्दंडता के किस्से तब से याद हैं, जब वे अंडर-नाइनटीन क्रिकेट खेला करते थे। छह साल पहले सिडनी में मैच के दौरान दर्शकों की अवमानना में उनकी दिखाई उंगली जिन्हें भूलना हो, भूलें। पिछले सात साल में खेल के दौरान अनुष्का की मौजूदगी को लेकर क्रिकेट संगठन की तरफ़ से विराट को मिली चेतावनियां जिन्हें भूलना हो, भूलें। ऐसे मसलों के प्रकाशन पर पत्रकारों को दी गई उनकी धमकियां जिन्हें भूलना हो, भूलें। अनिल कुंबले की आलोचना करने के बाद सुनील गावसकर द्वारा विराट के बारे में की गई टिप्पणी जिन्हें भूलनी हो, भूलें। लेकिन मैं यह कैसे भूलूं कि जो फिटनेस भीतरी परतों को इतना अशांत रखती है कि मन मौक़ा मिलते ही आपा खो दे, ऐसी फिटनेस का मतलब ही क्या? इससे तो थुलथुल बदन वाले स्माइलिंग-बुद्धा भले।
        सो, मैं तो नरेंद्र भाई की फिटनेस का उस दिन ही कायल हो पाऊंगा, जिस दिन वे ‘यह मोदी है, मोदी’ कह कर धमकाना बंद करने लायक बन जाएंगे; जिस दिन वे किसानों के आंसू और नौजवानों के खाली हाथ की पीड़ा महसूस करने लायक हो जाएंगे; जिस दिन वे भारत के हर, यानी हर, समुदाय को सचमुच अपना मानने लायक तंदुरुस्ती हासिल कर लेंगे; और, जिस दिन वे अपने दांत पीसने के बजाय मन से मुस्कराने लगेंगे। लोग कहते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा। मगर मुझे लगता है कि वह दिन कभी तो आएगा। अगर नहीं आएगा तो मत आए। यह कोई मेरा-आपका दुर्भाग्य थोड़े ही है। यह देश इतना भी बुद्धू नहीं है कि विराट कोहली और नरेंद्र भाई के शारीरिक सौष्ठव के कव्वाली-मुकाबले पर तालियों की थाप देता रहेगा।
        इसलिए, या तो नरेंद्र भाई बदलेंगे या फिर देश बदलेगा। देश में बदलाव की आहट तो अब सनसनाहट में तब्दील होती दिखाई देने लगी है। कतरे जब उठते हैं तो बहुत बार समंदर भी बहा ले जाते हैं। हुकूमत की मदिरा में ऐसा नशा होता है कि अक्सर वह खुद की अंतिम हिचकियां भी ठीक से नहीं सुन पाती है। लेकिन अब इन हिचकियों की आवाज़ रोज़-ब-रोज़ इतनी तेज़ होती जा रही है कि बाकी सबको ठीक से सुनाई देने लगी है। इसलिए शारीरिक दंड-बैठक लगाने की होड़ करने वालों को उनके हाल पर छोड़िए। देश ने भी अपनी फिटनेस के लिए दंड पेलने शुरू कर दिए हैं। उसका वीडियो अगली गर्मियों में जब जारी होगा तो ऐसा वायरल होगा कि बाकी सारे वीडियो लस्त-पस्त पड़े होंगे।

        अंकगणित की माफ़ी और बीजगणित के बोल



        पंकज शर्मा

          पिछले शनिवार को मैं ने लिखा था कि कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी 60 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर रही है, कांग्रेस स्पष्ट बहुमत की सरहद आसानी से पार कर रही है, जेडीएस पिछली बार से थोड़ी नीचे लुढ़क रही है और अन्य छुटपुट उम्मीदवारों की जीत के आसार थोड़े बढ़ गए हैं। इस मंगलवार कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो मेरी चारों बातें ग़लत साबित हुईं। भाजपा 40 से छलांग लगा कर 104 पर पहुंच गई। कांग्रेस 122 से फिसल कर 78 पर आ गई। जेडीएस सिर्फ़ तीन सीटें नीचे लुढ़क कर 37 पर थम गई। पिछली बार 23 छुटपुट उम्मीदवार जीते थे, इस बार महज तीन जीते।
          सो, मैं बिना किसी लीपापोती के आपसे क्षमा मांगता हूं। कर्नाटक में विधानसभा के लिए 2013 में हुए चुनाव की तुलना में अगर भाजपा 64 सीटें ज़्यादा जीत गई हो और कांग्रेस ने 44 सीटें खो दी हों तो अपने आकलन के लिए माफ़ी भी न मांगने की धृष्टता करूं, इतना ढीठ मैं तो नहीं हो सकता। लेकिन कर्नाटक से आ रही जिस शंख-घ्वनि के भरोसे मैं ने मोदी-शाह की ढीठ जुगल-जोड़ी की सिहरन देखी थी, चुनाव नतीजों से सामने आए उसके तथ्य आपके सामने न रखू ंतो भी मैं अपने आकलन से अन्याय करूंगा। सीटों का मेरा अंकगणित भले ही ग़लत साबित हुआ, मगर भीतर के बीजगणित की धुन और बोल आज भी वही गीत गा रहे हैं, जो मुझे सुनाई दे रहा था।
          इसलिए, इन तथ्यों पर गौर कीजिए।
          कर्नाटक में कांग्रेस को इस चुनाव में भाजपा से क़रीब दो फ़ीसदी ज़्यादा वोट मिले हैं। भाजपा को मिले 36.2 प्रतिशत वोट और कांग्रेस को मिले 38 प्रतिशत वोट। कांग्रेस को भाजपा से कुल 6 लाख 38 हज़ार 621 वोट भी ज़्यादा मिले। कांग्रेस को 1 करोड़ 38 लाख 24 हज़ार 5 वोट मिले और भाजपा को 1 करोड़ 31 लाख 85 हज़ार 384 वोट। 
          हालांकि कांग्रेस और जेडीएस के बीच चुनाव-पूर्व गठबंधन नहीं था, लेकिन अगर इन दोनों को, और जेडीएस के साथ मिल कर लड़ी बहुजन समाज पार्टी के वोट प्रतिशत को जोड़ लें तो इन्हें 56.6 प्रतिशत वोट मिले। यह भाजपा को मिले वोट से 20.4 प्रतिशत ज़्यादा है। कांग्रेस, जेडीएस और बसपा को कुल 2 करोड़ 5 लाख 98 हज़ार 904 वोट मिले। यानी भाजपा से 74 लाख 13 हज़ार 520 वोट ज़्यादा पा कर भी ये पिछड़ गए। 
          तथ्य तो यही है कि कर्नाटक के 63.8 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को वोट नहीं दिया। प्रसंगवश यह भी बता दूं कि जेडीएस को इस चुनाव में 18.3 प्रतिशत यानी कुल 66 लाख 66 हज़ार 307 वोट मिले। अन्य उम्मीदवारों को 5.3 प्रतिशत यानी कुल 19 लाख 61 हज़ार 682 वोट मिले। 
          अब एक तथ्य और समझिए। भाजपा को 2013 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ 19.9 प्रतिशत वोट और 40 सीटें मिली थीं। मोदी-लहर की चरम उफ़ान के दिनों में जब 2014 के लोकसभा चुनाव हुए तो भाजपा 43.4 प्रतिशत मतों के साथ विधानसभा की 133 सीटों पर आगे थी। इसका मतलब है कि 2018 में उसका वोट प्रतिशत 7.2 कम हो गया और उसने 29 सीटें भी खो दीं। यानी पिछले विधानसभा चुनाव के मुक़़ाबजे भले ही उसे ज़्यादा सीटें मिली हैं, मगर 2014 की तुलना में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कर्नाटक में भी तेज़ी से नीचे आई है। 2014 में कांग्रेस कर्नाटक विधानसभा की 76 सीटों पर आगे थी। अब उसे 78 सीटें मिली हैं। सो, इस लिहाज़ से सीटों का यह गणित तो कहता है कि हारने के बावजूद कांग्रेस पिछले चार साल में ज़रा मज़बूत ही हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में उसे डेढ़ प्रतिशत वोट भी ज़्यादा मिले हैं। 
          मगर इस सब के बावजूद कांग्रेस के लिए कई बातें सोचने की हैं। कर्नाटक में लिंगायत-भावना की हिलोरें थीं। किसानों के दर्द की कराह थी। कावेरी-जल का टंटा था। दलित समुदाय का दुखड़ा था। अल्पसंख्यक समुदाय की अपनी सोच थी। इन तमाम मसलों को ले कर मतदाताओं के मन में भाजपा से चिढ़-सी थी। इन तमाम मुद्दों पर कांग्रेस ने मतदाताओं के साथ खड़े रहने के लिए क़दम उठाने में कोई कसर भी नहीं रखी थी। तो भी भाजपा कांग्रेस को दहाई पर धकेल कर खुद तिहाई पर पहुंच गई। इस पहेली को बूझ कर अपने को सूझ-बूझ भरा बनाने का काम भी तो कांग्रेस को अब करना होगा।
          लिंगायत समुदाय के प्रभाव वाली 120 सीटों में आधी-61-भाजपा जीत गई। 2013 में वह इनमें से सिर्फ़ 20 जीती थीं। अपनी तरफ़ लुभाने की कोशिशों के बावजूद लिंगायत-क्षेत्र में कांग्रेस नीचे आ गई। पिछली बार 120 में से 74 सीटें उसके पास थीं, इस बार 33 कम हो कर 41 रह गईं। जेडीएस फिर भी तक़रीबन जस-की-तस रही। पिछली बार उसने 15 सीटें जीती थीं और इस बार 13 जीतीं। वोक्कालिंगा समुदाय के प्रभाव वाली 66 सीटों में पिछली बार भाजपा को 13 मिली थीं। इस बार बढ़ कर 18 हो गईं। कांग्रेस 24 से घट कर 20 पर थम गईं। जेडीएस की 24 से बढ़ कर 25 हुईं।
          कर्नाटक में 74 सीटें ऐसी थीं, जहां के किसान नरेंद्र मोदी की कृषि-नीति को पानी पी-पी कर कोस रहे थे। कर्नाटक की कांग्रेस-सरकार किसानों को राहत देने में कोई कोताही भी नहीं कर रही थी। कांग्रेस ने चुनाव-मैदान में इसे मुद्दा बनाने में भी कोई कसर नहीं रखी। कांग्रेस को सोचना होगा कि फिर भी बात क्यों नहीं बनी? इन 74 में से भाजपा को पिछली बार सिर्फ़ 11 सीटें मिली थीं। वे इस बार 33 कैसे हो गईं? उसका वोट प्रतिशत भी इन सीटों पर क़रीब दुगना हो गया। कांग्रेस को किसान-प्रभावित इलाक़ों में पिछली बार 40 सीटें मिली थीं। वे घट कर 25 क्यों रह गईं? यह अलग बात है कि इस बार कांग्रेस को इन 74 सीटों पर पिछली बार से पौने दो प्रतिशत ज़्यादा वोट मिले।
          कावेरी जल मसले से प्रभावित क्षेत्र में विधानसभा की 49 सीटें थीं। यहां भी भाजपा की सीटें पिछली बार की तुलना में बढ़ कर 3 से 8 हो गईं और कांग्रेस की 23 से घट कर 10 रह गईं। हां, कांग्रेस का वोट ज़रूर ढाई प्रतिशत बढ़ा। कावेरी जल क्षेत्र में जेडीएस को फ़ायदा मिला। उसकी सीटें 21 से बढ़ कर 27 हो गई। वोट भी क़रीब तीन प्रतिशत बढ़ा। कर्नाटक में ऐसी 82 सीटें हैं, जिनके चुनाव नतीजे दलित वोट से तय होते हैं। 2013 में भाजपा इनमें से सिर्फ़ 9 जीती थी। इस बार 31 जीत गई। कांग्रेस पिछली बाद 49 जीती थी, मगर इस बार 34 पर ही जीती। 78 सीटें ऐसी हैं, जिनका फ़ैसला अल्पसंख्यक मतदाताओं के रुख से तय होता है। पिछली बार इनमें से भाजपा को 19 मिली थीं। इस बार 36 मिल गईं-यानी क़रीब दुगनी। कांग्रेस को पिछली बार इनमें से 45 मिली थीं। इस बार 35 ही मिली हैं। कर्नाटक के शहरी इलाकों की 71 में से 35 सीटें इस बार भाजपा ने जीती हैं। पिछली बार उसे सिर्फ़ 15 मिली थीं। कांग्रेस शहरों में 42 से घट कर 30 पर आ गई है। सो, बावजूद इसके कि कांग्रेस का बीजगणित बेहतर है, उसे 2019 का अपना अंकगणित ठीक से साधना होगा।(

          कर्नाटक की शंख-ध्वनि से सिहरती जुगल-जोड़ी



          पंकज शर्मा

            कर्नाटक की शंख-ध्वनि से 2019 की गूंज न आ रही होती तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी वहां 17 रैलियां करने की ज़हमत नहीं उठाते, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित भाई अनिल चंद्र शाह टेलीविजन के परदों और अख़बारों के पन्नों को अपने इंटरव्यू से पाटने में दिन-रात एक नहीं करते, सोनिया गांधी चुनावी सभाओं से दूरी का दो साल पहले लिया गया अपना व्रत न तोड़तीं और कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी खेत की गुड़ाई में अपना सर्वस्व न लगा देते। यह सब कर्नाटक के लिए नहीं हुआ। यह 2019 के लिए हुआ। कर्नाटक के अंकगणित में अगले लोकसभा चुनाव का बीजगणित छिपा है। इसलिए वहां के विधानसभा चुनाव के अंतिम दौर में नरेंद्र भाई और अमित भाई की देह-भाषा अजीबोगरीब होती हमने देखी। उनकी ज़ुबानें आग उगल रही थीं, मगर चेहरों पर चिंता और तनाव था। उनके हाथ हमलावरी-मुद्रा में उठरहे थे, मगर माथे पर सलवटें थीं। उनका आत्मविश्वास आसमान छूता लगता था, मगर वे अपने दांत पीस रहे थे।
            शरीर-मुद्रा शास्त्र के सिद्धांत अगर सही हैं तो कर्नाटक में भाजपा 60 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर रही है। कांग्रेस स्पष्ट बहुमत की सरहद आसानी से पार कर रही है। जेडीएस पिछली बार से नीचे लुढ़क रही है। अन्य छुटपुट उम्मीदवारों की जीत के आसार थोड़े बढ़ गए हैं। अधर में लटकी विधानसभा की आस लगाए बैठी भाजपा और जेडीएस का छींका, लगता है कि, लटका ही रहेगा, टूटेगा नहीं। पांच साल पहले कांग्रेस को 122 सीटें मिली थीं, भाजपा और जेडीएस को चालीस-चालीस और 23 अन्य उम्मीदवार जीत कर आए थे। सच है कि 2018 और 2013 में फ़र्क़ है। लेकिन यह फ़र्क़ ऐसा नहीं है कि भाजपा दनदनाती हुई बंगलूर को अपनी बगल में दबा ले।
            नरेंद्र भाई का जज़्बा मानना पड़ेगा। कर्नाटक में उन्होंने अपने को इतना दांव पर लगा दिया कि चुनाव राज्य का रहा ही नहीं। चुनाव कांग्रेस-भाजपा के बीच भी नहीं रहा। वह नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी के बीच का हो गया। नरेंद्र भाई ने बहुत बड़ा जोखिम लिया है। तमाम उठापटक, हथकंडों और जोड़-तोड़ के बावजूद अगर कर्नाटक से कांग्रेस को वे विदा न कर पाए तो 2019 में केंद्र से उनकी खुद विदाई के बादल और गहरे हो जाएंगे। नवंबर-दिसंबर में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनाव जब होंगे तो देश के हृदय-प्रदेशों में भी भाजपा को अपनी सरकारें बचाना भारी पड़ जाएगा। भारी क्या पड़ जाएगा, उसका बोरिया-बिस्तर छह महीने पहले अभी ही सिमट जाएगा। सर्दियों में तो विदाई समारोह की सिर्फ़ औपचारिकता पूरी होगी।
            मध्यप्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 230 में से 165 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को सिर्फ़ 58। भाजपा को क़रीब 45 प्रतिशत वोट मिले थे और कांग्रेस को 36 प्रतिशत से कुछ ज्यादा। लेकिन पिछले पांच साल में मध्यप्रदेश की ज़मीन भाजपा के लिए लगातार बंजर हुई है और कांग्रेस के लिए उर्वर। इस बीच हुए स्थानीय निकायों और लोकसभा-विधानसभा के उपचुनाव नतीजे बता रहे हैं कि इस साल के आख़ीर में होने वाले चुनाव भाजपा की सीटें 90 के पार नहीं जाने देंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भीतरी आकलन तो इस आंकड़े को 75 के आसपास मान रहा है।
            राजस्थान में तो भाजपा की हालत और भी खराब है। पिछले चुनाव में वहां भाजपा को 200 में से 163 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को महज 21। भाजपा का वोट प्रतिशत 45 था और कांग्रेस का 33। पांच साल में राजस्थान की रेत भी इतनी गर्म हो गई है कि भाजपा के तलुवे उस पर टिक नहीं पा रहे हैं। राजस्थान में भी स्थानीय इकाइयों और बाकी उपचुनावों के नतीजों से यह साफ हो गया है कि वहां भाजपा के लौटने के कोई आसार नहीं हैं। कोई भी लठैती इस बार राजस्थान में भाजपा को सिरमौर नहीं बना सकती। 50 का आंकड़ा पर करने के लिए भी उसे मालूम नहीं कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ेंगे।
            छत्तीसगढ़ में भले ही अजीत जोगी कांग्रेस से अलग हो कर इधर-उधर का खेल जमाने में लगे हों, मगर भाजपा की हालत इस बार विधानसभा में 25 सीटों तक पहुंचने लायक भी नहीं है। पांच साल पहले भी उसकी सीटें कांग्रेस से महज 10 ही ज़्यादा थीं और दोनों के बीच वोट प्रतिशत में तो एक प्रतिशत से भी कम का फ़र्क़ था। भाजपा को 90 में से 49 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 39। भाजपा की बिछाई तमाम सुरंगें इन सर्दियों में वहां नाकारा साबित होने वाली हैं।
            मिजोरम का ज़िक्र करूं तो ठीक, न करूं तो भी ठीक। इसलिए कर्नाटक से शुरू हो कर छत्तीसगढ़ तक पसरे राजनीतिक कैनवस पर मुझे तो इस साल का अंत आते-आते भाजपा पूरी तरह हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है। 2019 की गर्मियों के आरंभ में जब हम लोकसभा के चुनाव की कतार में अपना वोट डालने खडंे होंगे तो आप पाएंगे कि आसपास खडंे लोगों में ज़्यादातर वे हैं, जिन्होंने 2014 में नरेंद्र भाई को हुलस कर अपना वोट दिया था और अब झुलस कर उनके खिलाफ़ वोट देने आए हैं। भाजपा को पिछली बार मिले 31 प्रतिशत वोट में कम-से-कम दस प्रतिशत की गिरावट आने वाली है।
            दीवार पर लिखी यह इबारत संघ-कुनबे ने पढ़ ली है। नरेंद्र भाई और अमित भाई अभी यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। लेकिन बाकी भाजपा को इसका अहसास हो गया है। अधिकारिक तौर वह भले ही इस इबारत की अनदेखी कर रही हो, मगर भीतर-ही-भीतर चिंता की लपटें बढ़ती जा रही हैं। विपक्ष की एकजुटता पर सब की निगाहें हैं। सबसे ज़्यादा नरेंद्र भाई की। इसीलिए कर्नाटक के चुनाव में उन्होंने राहुल गांधी को पानी पी-पी कर गांव का दबंग बताया। लेकिन सबसे आगे अपनी बाल्टी रख देने का ज़ुमला बूमरेंग कर गया। लोगों को वे दिन याद आ गए, जब नरेंद्र भाई अपने तमाम राजनीतिक गुरुजन को लात मार कर परे ठेल रहे थे और प्रधानमंत्री बनने की ललक में पूरी भाजपा को लील गए थे। छाती फुला कर जिस तरह उन्होंने अपनी बाल्टी सबसे आगे रख दी थी, वह किसने नहीं देखा था?
            कहने वालों को कहने का हक़ है कि इसमें कांग्रेस का क्या? इसमें राहुल गांधी का क्या? यह सब तो अपने आप हो रहा है। यह तो भाजपा की ग़लतियों से दूसरों को मिलने वाला स्वचलित-लाभ है। मैं नहीं मानता कि ऐसा है। चार साल में कांग्रेस ने परत-दर-परत अपने को खड़ा कर लिया है। चार साल में राहुल ने अपने को एक-एक सीढ़ी आगे बढ़ाया है। चार साल में कांग्रेस ने खोया विश्वास फिर अर्जित किया है। चार साल में राहुल ने अपने बारे में देश की धारणा पूरी तरह बदल डाली है। 2014 के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेसी होना गाली बन गया था। कांग्रेस के बहुत-से सिपाहसालार सुबक रहे थे। अगर चार साल के भीतर-भीतर आज कांग्रेस के कार्यकर्ता फिर ताल ठोक कर घूम रहे हैं, और सो भी मोदी और अमित शाह के सामने, तो यह इसलिए हुआ है कि सोनिया गांधी और राहुल ने इस बीच संघ और भाजपा को ललकारने में एक दिन भी हिचक नहीं दिखाई। अगर विपक्षी घर की दरारों ने नरेंद्र भाई के बारूद को जगह नहीं दी तो तय मानिए कि एक साल बाद लोकसभा में भाजपा पौने दो सौ की गिनती पार नहीं कर पाएगी।

            Wednesday, May 9, 2018

            लंतरानी पर लोकाचार की जीत और ताताथैया



            पंकज शर्मा

              अब से चार साल पहले कांग्रेस की फांस समझे जा रहे राहुल गांधी आज देश की आस बन गए हैं और चार साल पहले मुल्क़ की सांस समझे जा रहे नरेंद्र मोदी अब, देश तो छोड़िए, भारतीय जनता पार्टी की भी फांस बन गए हैं। ऐसी उलटबांसी भारत की राजनीति ने पहले कभी नहीं देखी। जिन्हें लगता है कि मोदी 2019 का चुनाव इसलिए जीत जाएंगे कि उनका कोई विकल्प नहीं हैं, वे अगर अपनी आंखें ठीक से मसल कर देखें तो पाएंगे कि 2014 में 44 लोकसभा सीटों के छाती-पीट आंकड़े पर पहुंच गई कांग्रेस के बावजूद, चार बरस के भीतर-भीतर, राहुल किस तरह मोदी का विकल्प बन कर उभर गए हैं और तीन दशक बाद स्पष्ट बहुमत ले कर लोकसभा में पहुंचा एक प्रधानमंत्री आज किस तरह हांफ रहा है।
              नरेंद्र मोदी के वादों के लहरिएदार पल्लू को देख-देख ठुमक रहे लोगों का मानना है कि राहुल गांधी की मोदी से कोई तुलना नहीं है। मैं भी यह बात मानता हूं कि राहुल की मोदी से कोई तुलना नहीं है। राहुल गांधी 14 साल पहले जब राजनीति में आए तब तक नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बने 3 साल हो चुके थे। राहुल का जब जन्म हुआ, तब तक तो मोदी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में काम शुरू कर चुके थे, जो अपने अनुगामियों की रग-रग को एक अलग राजनीतिक दर्शन से प्रशिक्षित करने का महारथी है। राहुल के राजनीति में पहला क़दम रखते समय मोदी को संघ का पूर्ण स्वयंसेवक बने 33 बरस बीत चुके थे और संघ का खांटी प्रचारक बने उन्हें 26 साल हो गए थे। लालकृष्ण आडवाणी के भाजपा अध्यक्ष बनने के चंद महीने बाद मोदी संघ से भाजपा में आ गए और गुजरात के संगठन मंत्री हो गए। राहुल के राजनीति में प्रवेश के समय मोदी के भाजपा-प्रवेश को 17 वर्ष हो गए थे और राहुल की तो तब कुल उम्र ही 17 वर्ष की थी।
              सो, राहुल जब सियासत का ककहरा सीख रहे थे, तब तक मोदी तो आडवाणी की रथ यात्रा करा चुके थे, गुजरात के दंगों से फ़ारिग हो चुके थे और भाजपा की प्रादेशिक राजनीति में अपने कई शिल्पियों को ठिकाने लगा चुके थे। उठापटक, फ़रेब और गच्चेबाज़ी की यह सिफ़त तो राहुल में आज तक नहीं आई है। ऐसे में नरेंद्र मोदी से राहुल गांधी का सचमुच कैसे कोई मुक़ाबला हो सकता था? मगर फिर भी अगर राहुल के पंद्रह मिनट आज मोदी को ताताथैया करा रहे हैं तो क्या आप इसे तिकड़मों पर तन्मयता और लंतरानी पर लोकाचार की जीत नहीं मानेंगे? भारतीय राजनीति का इससे सुखद दौर क्या हो सकता है कि नरेंद्र मोदी के लटकों-झटकों को देख कर मजनूं के टीले पर जा बैठे लोग चार साल बीतते-बीतते राहुल गांधी की अ-राजनीतिक शैली के पथ-गामी हो गए!
              मैं इसे भारत की बेहद परिपक्व बुनियादी लोक-चेतना का नतीजा मानता हूं। भारतवासी भावनामयी हैं। वे भावुक हैं। वे सजह-विश्वासी हैं। वे जब बहते हैं तो किसी के भी पीछे चल पड़ते हैं। लेकिन बावजूद इस सब के हमारी लोक-चेतना में समझदारी के ऐसे बीज हैं कि ज़रा-सा खटका होते ही हमारी आंख फड़कने लगती है। पांच इंद्रियां कुछ भी कहें, भारतवासियों की छटी इंद्री सही वक़्त पर सक्रिय होने में एक क्षण की भी देर नहीं लगाती है। सियासत के स्थूल संसार की सैर कर रहे सियासतदानों को भले ही इसका अहसास न हो रहा हो, मगर जो देख सकते हैं, वे देख रहे हैं कि मुल्क़ का अंदाज़ पिछले छह महीनों में बदल गया है। देश अब राजनीतिक लीपापोती से परे चला गया है। इसलिए मैं मानता हूं कि मोदी-मंडली राहुल को उनसे तुलना लायक़ माने-न-माने, भारतवासी अब मोदी की राहुल से तुलना करने लगे हैं।
              ऐसा न होता तो खुद का गुजरात मोदी पर इतना भारी न पड़ता। ऐसा न होता तो कर्नाटक में मोदी को इतने पापड़ बेलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ऐसा न होता तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का मौसम इस साल की सर्दियां आने के पहले ही मोदी के लिए बर्फ़ीला न हो रहा होता। इसलिए 2019 में अब कोई जुगत काम आती नहीं दीखती--न राम मंदिर का निर्माण, न सरहदी तनाव, न किसी नए ख़्वाब की ताबीर। समय की रेत मोदी की मुट्ठी से बहुत तेज़ी से फिसल रही है। इस रेत पर नए क़दमों के निशान बनने लगे हैं।
              मुझे लगता है कि कांग्रेस इतना कु़दरती क़िस्म का संगठन रहा कि कभी किसी ने यह सोचा ही नहीं कि कभी ऐसा समय भी आएगा कि बंजर हो रही ज़मीन को सींचने की ज़रूरत पड़ेगी। सो, न तो कांग्रेसी राजनीति की नदी पर कभी कोई बांध बने और न उनसे कोई नहरें निकलीं। संघ-कुनबे की तरह काग़ज़ पर नक्शा बना कर समाज, समुदायों और जातियों की सड़क-पुल बनाने-बिगाड़ने का सिलसिलेवार काम करने की बात कांग्रेस के दिमाग़ में कभी आई ही नहीं। जो हुआ, बस, होता गया। एक नदी के पास उसका वेग था, वह बहती रही, अपनी राह बनाती रही और लोग उसके किनारे आ-आ कर बसते रहे। राहुल ने भी यही देखा-सुना-गुना था। लेकिन इतना वे समझ गए थे कि सियासी यांत्रिकता के इस युग में प्राकृतिक बहाव के भरोसे कांग्रेसी-नदी की रक्षा करना मुमक़िन नहीं होगा।
              इसलिए राहुल ने कांग्रेस-संगठन को मज़बूत बनाने के इरादे से प्रयोग शुरू किए। एक जोखि़म उठाया। उनके मार्गदर्शन के लिए लिखा-लिखाया पाठ्यक्रम नहीं था। कोई प्रशिक्षण अकादमी नहीं थी। सिर्फ़ कांग्रेसी इतिहास के बुनियादी उसूलों की विरासत थी; खुद के ही नहीं, पूरी कांग्रेस के पूर्वजों की उतार-चढ़ाव भरी ज़िदगियों का सुना-पढ़ा अनुभव था; और, खुद की नेकनीयती, जज़्बा और प्रयोगधर्मिता थी। राहुल को गिरते-उठते खुद चलना सीखना था। ऐसे में उनके नसीब में सफलता-असफलता की मिश्रित झोली होना स्वाभाविक था। 
              जो सोचते हैं कि राहुल तो मुंह में चांदी का चम्मच ले कर जन्मे और वे खुद चाय की केतली ले कर घूमे, उन्हें बताना ज़रूरी है कि राहुल की जद्दोज़हद किसी भी और के संघर्ष से गहन है। एक तरफ़ वे नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने 31 साल पहले भाजपा में घुसपैठ करने के बाद से हर दिन अपना क़दम आसमान की तरफ़ बढ़ाया और ”हटो-बचो” चिल्लाते हुए ”भारत भाग्य-विधाता” बन बैठे। दूसरी तरफ़ वे राहुल गांधी हैं, जिनके राजनीति-प्रवेश के बाद 14 बरस का एक-एक दिन वनवासी मशक़्कत में गुज़रा। इस पर भी अगर आज राहुल ने मोदी के इंद्रासन को डोलने पर मजबूर कर दिया है तो ऐसे राहुल गांधी की नरेंद्र मोदी से क्या कहीं कोई तुलना है? मुझे तो लगता है कि रात के एकांत में आजकल जब मोदी भी राहुल से अपनी तुलना करते होंगे तो अपने पांव देख कर रुआंसे हो जाते होंगे।

              एकांत-मिलन की ललक से टूटते दिल



              पंकज शर्मा

                51 साल पहले, 1967 में एक फ़िल्म आई थी--एन ईवनिंग इन पेरिस--पेरिस में एक शाम। उसमें एक गीत था। मुहम्मद रफ़ी ने गाया था। शंकर-जयकिशन ने उसका संगीत दिया था। शम्मी कपूर पर वह फ़िल्माया गया था। गीत बहुत मशहूर हुआ। आपने भी ज़रूर सुना होगा। बोल थेः ’अकेले-अकेले कहां जा रहे हो, हमें साथ ले लो जहां जा रहे हो...’। आज पूरा भारत यह गीत गा रहा है। चार साल से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी अकेले-अकेले देश को पता नहीं कहां ले जा रहे हैं? पूरा देश गुहार लगा रहा है कि हमें भी साथ ले लो, मगर वे सुनने को तैयार नहीं हैं और बस चले जा रहे हैं। ईश्वर करे, उन्हें यह पता हो कि, अकेले ही सही, वे जा कहां रहे हैं? मुझे लगता है कि अच्छा ही है कि वे देश की अनसुनी कर रहे हैं। अगर कहीं वे सुन लें, और देश को साथ ले जाने पर आमादा हो जाएं, तो भगवान भली करे, वे हमें पता नहीं कहां ले जा कर छोड़ेंगे!
                नरेंद्र भाई को क्या? वे तो हमें तक़रीबन डेढ़ बरस पहले मुरादाबाद से ही आगाह कर चुके हैं कि कोई उनका क्या बिगाड़ लेगा, वे तो फ़कीर हैं और झोला उठा कर चल देंगे। जब मेरे प्रधानमंत्री ने यह चेतावनी दी थी तो मुझे वह कहानी याद आ गई, जिसमें एक ऐसे राज्य का किस्सा था, जिसका राजा स्वर्ग सिधार गया और उसका कोई वारिस नहीं था तो परंपरानुसार यह तय किया गया कि अगली सुबह सूरज की पहली किरण पड़ते ही जो पहला व्यक्ति राज्य के प्रवेश द्वार से भीतर आता दिखेगा, उसका राजतिलक कर दिया जाएगा। वह व्यक्ति एक साधु था। वह बहुत रोया-गिड़गिड़ाया, नहीं माना, मगर परंपरा तो परंपरा ठहरी। सो, दरबारियों ने जबरदस्ती उसका राजतिलक कर दिया।
                फ़कीर राजगद्दी पर बैठ गया। उसने अपना कमंडल अपने शयनकक्ष के एक आले में सुरक्षित रखने को दे दिया। राजकाज जैसे-तैसे चलता चलता रहा। कहानी में यह ज़िक्र नहीं था कि राज चार साल चला, पांच साल या बीस साल। लेकिन यह ज़रूर बताया गया था कि एक वक़्त आया, जब दुश्मनों ने उस राज्य पर हमला कर दिया। हमले की ख़बर मिलते ही राजा को ख़बर की गई। राजा ने आशीर्वाद-मुद्रा में हाथ उठाया और सोने चला गया। सुबह तक शत्रु-सेना किले के मुख्य-द्वार तक पहुंच गई। दरबारी फिर राजा के पास पहुंचे कि अपनी सेना को मुक़ाबले का हुक़्म दें। राजा ने आशीर्वाद-मुद्रा में हाथ उठाया और बगीचे में टहलने चला गया। दरबारियों को मालूम था कि राजा, राजा ही नहीं, साधु भी है, फ़कीर भी है। वे जानते थे कि फ़कीरों के पास चमत्कारी शक्तियां होती हैं। वे राजा की आत्मविश्वासी-मुद्रा से आश्वस्त थे। उन्हें भरोसा था कि ऐन वक़्त पर फ़कीर कोई जादू दिखाएगा और सारी चुनौतियां ढह जाएंगी। सो, वे भी मलमल कर खैनी खाते रहे।
                दोपहर को जब दुश्मन महल के दरवाज़े तक आ गया तो हड़बड़ाहट मची। राजा को सूचना दी गई कि अब तो पानी नाक से ऊपर निकल गया है। सेना को प्रतिकार का आदेश दें। फ़कीर ने शयनकक्ष से अपना कमंडल लाने का आदेश दिया। दरबारी दौड़े। वे जानते थे कि फ़कीरों के कमंडल में बड़ा दम होता है। उससे एक चुल्लू जल ले कर जब वे मंतर फूंकते हैं तो सल्तनतें ढेर हो जाती हैं। सो, दुश्मन सेना की क्या बिसात? कमंडल जैसे ही फ़कीर के हाथ में आया, उसने अपना झोला ले कर महल से बाहर कूच कर दिया। कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया।
                लेकिन भारतवासियों ने तो नरेंद्र भाई को जबरदस्ती राजा बनाया नहीं था। वे तो जबरदस्ती राजा बन गए। देश के दो तिहाई मतदाता ना-ना करते रहे। मगर एक तिहाई समर्थन के ऐरावत पर वे मुकुट लगा कर बैठ गए। राज-सिंहासन पर पहुंचने के लिए उन्होंने अपना-पराया जो सामने आया, उसे रौंदा। सिंहासन पर जमने के बाद उन्होंने हर व्यवस्था और परंपरा को रौंदा। इसलिए यह कैसे मान लें कि दोबारा सिंहासन हासिल करने के लिए वे सब-कुछ रौंदने से परहेज़ करेंगे? नरेंद्र भाई क्या आपको ऐसे लगते हैं कि झोला उठा कर चल दें? ऐसे भी फ़कीर वे नहीं हैं। होते तो क्या यहां होते?
                झोला उठा कर वे कहीं नहीं जाने वाले। हमें-आपको ही अपनी झोली लेकर उनके पीछे घूमना है। समूह-गान गाना है--हमको भी साथ ले लो...। लेकिन क्या हमारे गाने भर से वे हमें साथ ले लेंगे? लेना होता तो चार साल से क्या वे भाड़ झौंक रहे हैं? नरेंद्र भाई ने रायसीना पहाड़ी चढ़ते ही हमें एक झुनझुना पकड़ा दिया था--’सबका साथ, सबका विकास’। हम यह मजीरा बजाते घूम रहे हैं और वे अकेले चलते चले जा रहे हैं। कहां जा रहे हैं, वे भी शायद नहीं जानते। बस, इतना जानते हैं कि चलना ही जीवन है। चरैवेति, चरैवेति। दिशा से क्या? प्रभु दसों दिशाओं में विराजमान हैं। जहां भी पहुंचेंगे, प्रभु की शरण मिलेगी।
                अब वे अकेले वूहान चले गए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने। एकदम अकेले। आज भी वहीं हैं। कल तक चीन को सबक सिखाने की हुंकार लगा रहे थे। डोकलाम पर लाल-पीले हो रहे थे। मगर एकाएक जिनपिंग के साथ एकांतवास का मन हो आया। इस एकांतवास के लिए नरेंद्र भाई को क्या-क्या नहीं करना पड़ा! देश के लिए सब करना ही पड़ता है। तिब्बत की तरफ़ से आंखें थोड़ी फेरनी पड़ीं। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और सरकार के अफ़सरों को ’सलाह’ देनी पड़ी कि दलाई लामा के भारत में निर्वासित जीवन के साठ साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रमों से दूर रहें। दलाई लामा को ’संकेत’ देना पड़ा कि वे मणिपुर में होने वाले राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन में शिरकत करने न जाएं तो मेहरबानी! तब जा कर नरेंद्र भाई का जिनपिंग से वूहान में एकांत-मिलन हुआ।
                मुझे तीस साल पहले 1988 की सर्दियां याद आ गईं। तब राजीव गांधी चीन गए थे। 1960 में भारत ने दलाई लामा को शरण दे दी तो चीन के नथुने फूल गए थे। दो साल बाद उसने भारत पर हमला कर दिया। अरुणाचल प्रदेश तक घुस आया। भारत-चीन के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए। नेहरू 1954 में चीन गए थे। ’62 के बाद की तनातनी के दौर में कोई भारतीय प्रधानमंत्री चीन नहीं गया। राजीव पहले थे, जो 34 साल बाद चीन जा रहे थे। अरुणाचल तब तक केंद्रशासित क्षेत्र था। चीन रवाना होने से चंद रोज़ पहले राजीव ने उसे भारत के पूर्ण-राज्य का दर्ज़ा दे दिया और तब जाकर देंग श्याओ पेंग से मिले। सोचिए, चीन पर क्या गुज़री होगी? मगर पेंग ने राजीव की अगवानी में सारे राजनयिक नियमों को उठा कर ताक पर रख दिया। मुझे नहीं पता कि राजीव गांधी का सीना कितने इंच का था। लेकिन मुझे इतना पता है कि आज वे होते तो चीन से संबंध सुधारने की कितनी ही ललक के बावजूद तिब्बत और दलाई लामा का दिल नहीं दुखाते। इसलिए मैं मानता हूं कि नरेंद्र भाई अकेले-अकेले कहीं भी जा रहे हों, हमें उनसे अपने को साथ लेने की चिरौरी करने के बजाय उनकी एकल-यात्रा पर रोक लगाने के लिए घर से निकलना होगा। हमारे शेर-प्रधानमंत्री पेरिस में शाम बिताएं या वूहान में, हम भेड़ बनेंगे तो गड्ढे में गिरेंगे।