Wednesday, May 9, 2018

लंतरानी पर लोकाचार की जीत और ताताथैया



पंकज शर्मा

    अब से चार साल पहले कांग्रेस की फांस समझे जा रहे राहुल गांधी आज देश की आस बन गए हैं और चार साल पहले मुल्क़ की सांस समझे जा रहे नरेंद्र मोदी अब, देश तो छोड़िए, भारतीय जनता पार्टी की भी फांस बन गए हैं। ऐसी उलटबांसी भारत की राजनीति ने पहले कभी नहीं देखी। जिन्हें लगता है कि मोदी 2019 का चुनाव इसलिए जीत जाएंगे कि उनका कोई विकल्प नहीं हैं, वे अगर अपनी आंखें ठीक से मसल कर देखें तो पाएंगे कि 2014 में 44 लोकसभा सीटों के छाती-पीट आंकड़े पर पहुंच गई कांग्रेस के बावजूद, चार बरस के भीतर-भीतर, राहुल किस तरह मोदी का विकल्प बन कर उभर गए हैं और तीन दशक बाद स्पष्ट बहुमत ले कर लोकसभा में पहुंचा एक प्रधानमंत्री आज किस तरह हांफ रहा है।
    नरेंद्र मोदी के वादों के लहरिएदार पल्लू को देख-देख ठुमक रहे लोगों का मानना है कि राहुल गांधी की मोदी से कोई तुलना नहीं है। मैं भी यह बात मानता हूं कि राहुल की मोदी से कोई तुलना नहीं है। राहुल गांधी 14 साल पहले जब राजनीति में आए तब तक नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बने 3 साल हो चुके थे। राहुल का जब जन्म हुआ, तब तक तो मोदी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में काम शुरू कर चुके थे, जो अपने अनुगामियों की रग-रग को एक अलग राजनीतिक दर्शन से प्रशिक्षित करने का महारथी है। राहुल के राजनीति में पहला क़दम रखते समय मोदी को संघ का पूर्ण स्वयंसेवक बने 33 बरस बीत चुके थे और संघ का खांटी प्रचारक बने उन्हें 26 साल हो गए थे। लालकृष्ण आडवाणी के भाजपा अध्यक्ष बनने के चंद महीने बाद मोदी संघ से भाजपा में आ गए और गुजरात के संगठन मंत्री हो गए। राहुल के राजनीति में प्रवेश के समय मोदी के भाजपा-प्रवेश को 17 वर्ष हो गए थे और राहुल की तो तब कुल उम्र ही 17 वर्ष की थी।
    सो, राहुल जब सियासत का ककहरा सीख रहे थे, तब तक मोदी तो आडवाणी की रथ यात्रा करा चुके थे, गुजरात के दंगों से फ़ारिग हो चुके थे और भाजपा की प्रादेशिक राजनीति में अपने कई शिल्पियों को ठिकाने लगा चुके थे। उठापटक, फ़रेब और गच्चेबाज़ी की यह सिफ़त तो राहुल में आज तक नहीं आई है। ऐसे में नरेंद्र मोदी से राहुल गांधी का सचमुच कैसे कोई मुक़ाबला हो सकता था? मगर फिर भी अगर राहुल के पंद्रह मिनट आज मोदी को ताताथैया करा रहे हैं तो क्या आप इसे तिकड़मों पर तन्मयता और लंतरानी पर लोकाचार की जीत नहीं मानेंगे? भारतीय राजनीति का इससे सुखद दौर क्या हो सकता है कि नरेंद्र मोदी के लटकों-झटकों को देख कर मजनूं के टीले पर जा बैठे लोग चार साल बीतते-बीतते राहुल गांधी की अ-राजनीतिक शैली के पथ-गामी हो गए!
    मैं इसे भारत की बेहद परिपक्व बुनियादी लोक-चेतना का नतीजा मानता हूं। भारतवासी भावनामयी हैं। वे भावुक हैं। वे सजह-विश्वासी हैं। वे जब बहते हैं तो किसी के भी पीछे चल पड़ते हैं। लेकिन बावजूद इस सब के हमारी लोक-चेतना में समझदारी के ऐसे बीज हैं कि ज़रा-सा खटका होते ही हमारी आंख फड़कने लगती है। पांच इंद्रियां कुछ भी कहें, भारतवासियों की छटी इंद्री सही वक़्त पर सक्रिय होने में एक क्षण की भी देर नहीं लगाती है। सियासत के स्थूल संसार की सैर कर रहे सियासतदानों को भले ही इसका अहसास न हो रहा हो, मगर जो देख सकते हैं, वे देख रहे हैं कि मुल्क़ का अंदाज़ पिछले छह महीनों में बदल गया है। देश अब राजनीतिक लीपापोती से परे चला गया है। इसलिए मैं मानता हूं कि मोदी-मंडली राहुल को उनसे तुलना लायक़ माने-न-माने, भारतवासी अब मोदी की राहुल से तुलना करने लगे हैं।
    ऐसा न होता तो खुद का गुजरात मोदी पर इतना भारी न पड़ता। ऐसा न होता तो कर्नाटक में मोदी को इतने पापड़ बेलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ऐसा न होता तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का मौसम इस साल की सर्दियां आने के पहले ही मोदी के लिए बर्फ़ीला न हो रहा होता। इसलिए 2019 में अब कोई जुगत काम आती नहीं दीखती--न राम मंदिर का निर्माण, न सरहदी तनाव, न किसी नए ख़्वाब की ताबीर। समय की रेत मोदी की मुट्ठी से बहुत तेज़ी से फिसल रही है। इस रेत पर नए क़दमों के निशान बनने लगे हैं।
    मुझे लगता है कि कांग्रेस इतना कु़दरती क़िस्म का संगठन रहा कि कभी किसी ने यह सोचा ही नहीं कि कभी ऐसा समय भी आएगा कि बंजर हो रही ज़मीन को सींचने की ज़रूरत पड़ेगी। सो, न तो कांग्रेसी राजनीति की नदी पर कभी कोई बांध बने और न उनसे कोई नहरें निकलीं। संघ-कुनबे की तरह काग़ज़ पर नक्शा बना कर समाज, समुदायों और जातियों की सड़क-पुल बनाने-बिगाड़ने का सिलसिलेवार काम करने की बात कांग्रेस के दिमाग़ में कभी आई ही नहीं। जो हुआ, बस, होता गया। एक नदी के पास उसका वेग था, वह बहती रही, अपनी राह बनाती रही और लोग उसके किनारे आ-आ कर बसते रहे। राहुल ने भी यही देखा-सुना-गुना था। लेकिन इतना वे समझ गए थे कि सियासी यांत्रिकता के इस युग में प्राकृतिक बहाव के भरोसे कांग्रेसी-नदी की रक्षा करना मुमक़िन नहीं होगा।
    इसलिए राहुल ने कांग्रेस-संगठन को मज़बूत बनाने के इरादे से प्रयोग शुरू किए। एक जोखि़म उठाया। उनके मार्गदर्शन के लिए लिखा-लिखाया पाठ्यक्रम नहीं था। कोई प्रशिक्षण अकादमी नहीं थी। सिर्फ़ कांग्रेसी इतिहास के बुनियादी उसूलों की विरासत थी; खुद के ही नहीं, पूरी कांग्रेस के पूर्वजों की उतार-चढ़ाव भरी ज़िदगियों का सुना-पढ़ा अनुभव था; और, खुद की नेकनीयती, जज़्बा और प्रयोगधर्मिता थी। राहुल को गिरते-उठते खुद चलना सीखना था। ऐसे में उनके नसीब में सफलता-असफलता की मिश्रित झोली होना स्वाभाविक था। 
    जो सोचते हैं कि राहुल तो मुंह में चांदी का चम्मच ले कर जन्मे और वे खुद चाय की केतली ले कर घूमे, उन्हें बताना ज़रूरी है कि राहुल की जद्दोज़हद किसी भी और के संघर्ष से गहन है। एक तरफ़ वे नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने 31 साल पहले भाजपा में घुसपैठ करने के बाद से हर दिन अपना क़दम आसमान की तरफ़ बढ़ाया और ”हटो-बचो” चिल्लाते हुए ”भारत भाग्य-विधाता” बन बैठे। दूसरी तरफ़ वे राहुल गांधी हैं, जिनके राजनीति-प्रवेश के बाद 14 बरस का एक-एक दिन वनवासी मशक़्कत में गुज़रा। इस पर भी अगर आज राहुल ने मोदी के इंद्रासन को डोलने पर मजबूर कर दिया है तो ऐसे राहुल गांधी की नरेंद्र मोदी से क्या कहीं कोई तुलना है? मुझे तो लगता है कि रात के एकांत में आजकल जब मोदी भी राहुल से अपनी तुलना करते होंगे तो अपने पांव देख कर रुआंसे हो जाते होंगे।

    एकांत-मिलन की ललक से टूटते दिल



    पंकज शर्मा

      51 साल पहले, 1967 में एक फ़िल्म आई थी--एन ईवनिंग इन पेरिस--पेरिस में एक शाम। उसमें एक गीत था। मुहम्मद रफ़ी ने गाया था। शंकर-जयकिशन ने उसका संगीत दिया था। शम्मी कपूर पर वह फ़िल्माया गया था। गीत बहुत मशहूर हुआ। आपने भी ज़रूर सुना होगा। बोल थेः ’अकेले-अकेले कहां जा रहे हो, हमें साथ ले लो जहां जा रहे हो...’। आज पूरा भारत यह गीत गा रहा है। चार साल से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी अकेले-अकेले देश को पता नहीं कहां ले जा रहे हैं? पूरा देश गुहार लगा रहा है कि हमें भी साथ ले लो, मगर वे सुनने को तैयार नहीं हैं और बस चले जा रहे हैं। ईश्वर करे, उन्हें यह पता हो कि, अकेले ही सही, वे जा कहां रहे हैं? मुझे लगता है कि अच्छा ही है कि वे देश की अनसुनी कर रहे हैं। अगर कहीं वे सुन लें, और देश को साथ ले जाने पर आमादा हो जाएं, तो भगवान भली करे, वे हमें पता नहीं कहां ले जा कर छोड़ेंगे!
      नरेंद्र भाई को क्या? वे तो हमें तक़रीबन डेढ़ बरस पहले मुरादाबाद से ही आगाह कर चुके हैं कि कोई उनका क्या बिगाड़ लेगा, वे तो फ़कीर हैं और झोला उठा कर चल देंगे। जब मेरे प्रधानमंत्री ने यह चेतावनी दी थी तो मुझे वह कहानी याद आ गई, जिसमें एक ऐसे राज्य का किस्सा था, जिसका राजा स्वर्ग सिधार गया और उसका कोई वारिस नहीं था तो परंपरानुसार यह तय किया गया कि अगली सुबह सूरज की पहली किरण पड़ते ही जो पहला व्यक्ति राज्य के प्रवेश द्वार से भीतर आता दिखेगा, उसका राजतिलक कर दिया जाएगा। वह व्यक्ति एक साधु था। वह बहुत रोया-गिड़गिड़ाया, नहीं माना, मगर परंपरा तो परंपरा ठहरी। सो, दरबारियों ने जबरदस्ती उसका राजतिलक कर दिया।
      फ़कीर राजगद्दी पर बैठ गया। उसने अपना कमंडल अपने शयनकक्ष के एक आले में सुरक्षित रखने को दे दिया। राजकाज जैसे-तैसे चलता चलता रहा। कहानी में यह ज़िक्र नहीं था कि राज चार साल चला, पांच साल या बीस साल। लेकिन यह ज़रूर बताया गया था कि एक वक़्त आया, जब दुश्मनों ने उस राज्य पर हमला कर दिया। हमले की ख़बर मिलते ही राजा को ख़बर की गई। राजा ने आशीर्वाद-मुद्रा में हाथ उठाया और सोने चला गया। सुबह तक शत्रु-सेना किले के मुख्य-द्वार तक पहुंच गई। दरबारी फिर राजा के पास पहुंचे कि अपनी सेना को मुक़ाबले का हुक़्म दें। राजा ने आशीर्वाद-मुद्रा में हाथ उठाया और बगीचे में टहलने चला गया। दरबारियों को मालूम था कि राजा, राजा ही नहीं, साधु भी है, फ़कीर भी है। वे जानते थे कि फ़कीरों के पास चमत्कारी शक्तियां होती हैं। वे राजा की आत्मविश्वासी-मुद्रा से आश्वस्त थे। उन्हें भरोसा था कि ऐन वक़्त पर फ़कीर कोई जादू दिखाएगा और सारी चुनौतियां ढह जाएंगी। सो, वे भी मलमल कर खैनी खाते रहे।
      दोपहर को जब दुश्मन महल के दरवाज़े तक आ गया तो हड़बड़ाहट मची। राजा को सूचना दी गई कि अब तो पानी नाक से ऊपर निकल गया है। सेना को प्रतिकार का आदेश दें। फ़कीर ने शयनकक्ष से अपना कमंडल लाने का आदेश दिया। दरबारी दौड़े। वे जानते थे कि फ़कीरों के कमंडल में बड़ा दम होता है। उससे एक चुल्लू जल ले कर जब वे मंतर फूंकते हैं तो सल्तनतें ढेर हो जाती हैं। सो, दुश्मन सेना की क्या बिसात? कमंडल जैसे ही फ़कीर के हाथ में आया, उसने अपना झोला ले कर महल से बाहर कूच कर दिया। कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया।
      लेकिन भारतवासियों ने तो नरेंद्र भाई को जबरदस्ती राजा बनाया नहीं था। वे तो जबरदस्ती राजा बन गए। देश के दो तिहाई मतदाता ना-ना करते रहे। मगर एक तिहाई समर्थन के ऐरावत पर वे मुकुट लगा कर बैठ गए। राज-सिंहासन पर पहुंचने के लिए उन्होंने अपना-पराया जो सामने आया, उसे रौंदा। सिंहासन पर जमने के बाद उन्होंने हर व्यवस्था और परंपरा को रौंदा। इसलिए यह कैसे मान लें कि दोबारा सिंहासन हासिल करने के लिए वे सब-कुछ रौंदने से परहेज़ करेंगे? नरेंद्र भाई क्या आपको ऐसे लगते हैं कि झोला उठा कर चल दें? ऐसे भी फ़कीर वे नहीं हैं। होते तो क्या यहां होते?
      झोला उठा कर वे कहीं नहीं जाने वाले। हमें-आपको ही अपनी झोली लेकर उनके पीछे घूमना है। समूह-गान गाना है--हमको भी साथ ले लो...। लेकिन क्या हमारे गाने भर से वे हमें साथ ले लेंगे? लेना होता तो चार साल से क्या वे भाड़ झौंक रहे हैं? नरेंद्र भाई ने रायसीना पहाड़ी चढ़ते ही हमें एक झुनझुना पकड़ा दिया था--’सबका साथ, सबका विकास’। हम यह मजीरा बजाते घूम रहे हैं और वे अकेले चलते चले जा रहे हैं। कहां जा रहे हैं, वे भी शायद नहीं जानते। बस, इतना जानते हैं कि चलना ही जीवन है। चरैवेति, चरैवेति। दिशा से क्या? प्रभु दसों दिशाओं में विराजमान हैं। जहां भी पहुंचेंगे, प्रभु की शरण मिलेगी।
      अब वे अकेले वूहान चले गए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने। एकदम अकेले। आज भी वहीं हैं। कल तक चीन को सबक सिखाने की हुंकार लगा रहे थे। डोकलाम पर लाल-पीले हो रहे थे। मगर एकाएक जिनपिंग के साथ एकांतवास का मन हो आया। इस एकांतवास के लिए नरेंद्र भाई को क्या-क्या नहीं करना पड़ा! देश के लिए सब करना ही पड़ता है। तिब्बत की तरफ़ से आंखें थोड़ी फेरनी पड़ीं। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और सरकार के अफ़सरों को ’सलाह’ देनी पड़ी कि दलाई लामा के भारत में निर्वासित जीवन के साठ साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रमों से दूर रहें। दलाई लामा को ’संकेत’ देना पड़ा कि वे मणिपुर में होने वाले राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन में शिरकत करने न जाएं तो मेहरबानी! तब जा कर नरेंद्र भाई का जिनपिंग से वूहान में एकांत-मिलन हुआ।
      मुझे तीस साल पहले 1988 की सर्दियां याद आ गईं। तब राजीव गांधी चीन गए थे। 1960 में भारत ने दलाई लामा को शरण दे दी तो चीन के नथुने फूल गए थे। दो साल बाद उसने भारत पर हमला कर दिया। अरुणाचल प्रदेश तक घुस आया। भारत-चीन के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए। नेहरू 1954 में चीन गए थे। ’62 के बाद की तनातनी के दौर में कोई भारतीय प्रधानमंत्री चीन नहीं गया। राजीव पहले थे, जो 34 साल बाद चीन जा रहे थे। अरुणाचल तब तक केंद्रशासित क्षेत्र था। चीन रवाना होने से चंद रोज़ पहले राजीव ने उसे भारत के पूर्ण-राज्य का दर्ज़ा दे दिया और तब जाकर देंग श्याओ पेंग से मिले। सोचिए, चीन पर क्या गुज़री होगी? मगर पेंग ने राजीव की अगवानी में सारे राजनयिक नियमों को उठा कर ताक पर रख दिया। मुझे नहीं पता कि राजीव गांधी का सीना कितने इंच का था। लेकिन मुझे इतना पता है कि आज वे होते तो चीन से संबंध सुधारने की कितनी ही ललक के बावजूद तिब्बत और दलाई लामा का दिल नहीं दुखाते। इसलिए मैं मानता हूं कि नरेंद्र भाई अकेले-अकेले कहीं भी जा रहे हों, हमें उनसे अपने को साथ लेने की चिरौरी करने के बजाय उनकी एकल-यात्रा पर रोक लगाने के लिए घर से निकलना होगा। हमारे शेर-प्रधानमंत्री पेरिस में शाम बिताएं या वूहान में, हम भेड़ बनेंगे तो गड्ढे में गिरेंगे। 

      इस सादगी पे कौन न मर जाए, ऐ खुदा!



      पंकज शर्मा

        इस बुधवार हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी ने लंदन में अपनी ज़ुबानी-लच्छेदारी का जो जलवा दिखाया, उसने मुझे तो झकझोर कर रख दिया। मैं अब तक अपना सिर खुजाते हुए सोच रहा हूं कि अगर नरेंद्र भाई की आत्मा इतनी पवित्र है और चार बरस में उन्होंने ऐसे-ऐसे पुण्य-कर्म किए हैं तो भारत भर में हाहाकार क्यों मचा हुआ है? जिस तरह लंदन में सभागार के भीतर तालियां पीट रहे प्रायोजित-दीवानों और भाट-भूमिका का कर्तव्य-पालन कर रहे अर्ध-कवि प्रसून जोशी को बाहर सड़कों पर हो रही नारेबाज़ी सुनाई नहीं दे रही थी, उसी तरह “रॉयल पैलेस” में हाथ मिलाने से अभिभूत बैठे हमारे प्रधानमंत्री को खुद के देश की हवा में तैर रही छटपटाहट का कोई अहसास नहीं है।
        वरना क्या कारण है कि विपक्ष तो विपक्ष, नरेंद्र भाई अपने पितृ-संगठन के शीर्ष-पुरुष की चिंताओं तक की चिंता नहीं कर रहे हैं; उन्हें अपने निर्माता लालकृष्ण आडवाणी के आंसू दिखाई नहीं दे रहे हैं; उन्हें अपने निर्देशक मुरली मनोहर जोशी और यशंवत सिन्हा की आहें सुनाई नहीं दे रही हैं; उन्हें अरुण शौरी और शत्रुध्न सिन्हा जैसे अपने हमजोलियों की आवाजें सुनाई नहीं देती हैं; और, उन्हें भारतीय जनता पार्टी के दलित सांसदों के मन की बात से भी कोई लेना-देना नहीं है? 
        लंदन में संत-मुद्रा में प्रधानमंत्री बोले कि अपने तीन बरस के लड़के को पीठ पर लादे पहाड़ चढ़ती लड़की को अगर इसलिए कोई बोझ महसूस नहीं होता कि वह लड़का उसका भाई है तो फिर सवा सौ करोड़ देशवासी भी तो मेरा परिवार हैं। वाह, वाह! इस सादगी पर कौन न मर जाए, ऐ खुदा!
         “भारत की बात, सबके साथ” करते हुए चारण-गति को प्राप्त हो गए प्रसून जोशी ने नरेंद्र भाई के कसीदे पढ़े और नरेंद्र भाई ने उनके। एक बानगी देखिए।
        चारणः मैं ने भारत के बारे में लिखा था कि धरती के अंतस में जो गहरा उतरेगा, उसी के नयनों में जीवन का राग दिखेगा। जिन पैरों में मिट्टी होगी, धूल सजेगी, उन्हीं के संग-संग इक दिन सारा विश्व चलेगा। रेलवे स्टेशन से आप का सफ़र शुरू होता है और आज रॉयल पैलेस में आप ख़ास मेहमान बने। इस सफ़र को कैसे देखते हैं आप?
        प्रधानमंत्रीः आप तो कविराज हैं। ज़िंदगी का रास्ता बड़ा कठिन होता है। रेलवे स्टेशन मेरी अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी की कहानी है, मेरी ज़िंदगी का स्वर्णिम पृष्ठ है, जिसने मुझे जीना सिखाया, जूझना सिखाया। लेकिन रॉयल पैलेस मेरी कहानी नहीं है। लोकतंत्र में जनता-जनार्दन, जो ईश्वर का रूप है; अगर वह फ़ैसला कर ले तो फिर एक चाय बेचने वाला भी उनका प्रतिनिधि बन कर रॉयल पैलेस में हाथ मिला सकता है।
        चारणः नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री जब एकमय हो जाते हैं, एकरस हो जाते हैं, सब मिल जाता है, कैसा लगता है?
        प्रधानमंत्रीः मैं तो आदिशंकर के अद्वैत सिद्धांत से बहुत ज़माने से जुड़ा हुआ हूं। तो मैं जानता हूं कि जहां मैं नहीं, तू ही तू है। जहां द्वैत नहीं, वहां द्वंद्व नहीं। मैं अगर अपने भीतर के नरेंद्र मोदी को ले कर जाता हूं तो शायद मैं देश के साथ अन्याय कर दूंगा। देश के साथ न्याय के लिए मुझे अपने आपको भुला देना होता है, मिटा देना होता है। स्वयं खप जाना होता है। तब जा कर वह पौधा खिलता है। बीज भी तो आख़िर खप ही जाता है, जो वटवृक्ष को पनपाता है।
        चारणः बदलाव अपने साथ एक और चीज़ ले कर आता है। अधीरता, आतुरता, बेसब्री। पहले अगर हम दो क़दम चलते थे तो अब कई गुना ज़्यादा चल रहे हैं। फिर भी बेसब्री? इसे कैसे देखते हैं आप?
        प्रधानमंत्रीः जिस पल संतोष का भाव पैदा हो जाता है तो ज़िंदगी आगे नहीं बढ़ती है। हर आयु में, हर युग में, हर अवस्था में, कुछ न कुछ नया करने का, नया पाने का मक़सद गति देता है। बेसब्री तरुणाई की पहचान है। एक कालखंड था, जिसमें हम निराशा के गर्त में डूब गए थे। आज से 15-20 साल पहले लोग अपेक्षा करते थे कि अकाल आ जाए और हमें मिट्टी के गड्ढे खोदने का काम मिल जाए। एक कच्ची सड़क बन जाए। आज सवा सौ करोड़ देशवासियों के मन में उमंग, उत्साह, आशा, अपेक्षा उभर कर बाहर आ रही है।
        चारणः लोग तो बेसब्र हो जाते हैं, लेकिन क्या कभी आप भी बेसब्र होते हैं? सरकारी कामकाज के तरीके से? कि चीजें उस गति से नहीं चल रहीं, जिस गति से आप चाहते हैं?
        प्रधानमंत्रीः मुझे नहीं पता था कि कवि के भीतर भी कोई पत्रकार बैठा होता है। मैं मानता हूं कि जिस दिन मेरी बेसब्री ख़त्म हो जाएगा, मैं देश के काम नहीं आऊंगा। मेरी बेसब्री मेरी ऊर्जा है। मैं दूसरे प्रकार का इंसान हूं। अगर एक गिलास आधा भरा हुआ है तो एक व्यक्ति कहेगा कि वह आधा भरा है, दूसरा कहेगा कि वह आधा खाली है। मुझे कोई पूछता है तो मैं कहता हूं कि वह आधा पानी से भरा है और आधा हवा से भरा है।
        फिर दिल्ली से प्रियंका वर्मा ने सवाल पूछा। प्रसून ने सवाल का भाव समझाया तो मोदी ने कहा कि प्रियंका ने बहुत अच्छा सवाल पूछा है। जवाब में बताया कि कैसे जिस तरह गांधी ने आज़ादी को जन-आंदोलन में परिवर्तित कर दिया था, वे भी राष्ट्र-निर्माण को जन-आंदोलन बना रहे हैं। बताया कि लोकतंत्र भागीदारी के बिना नहीं चल सकता। संसद के बजट-सत्र में नरेंद्र भाई यह बात पता नहीं क्यों भूल गए?
        मयूरेश ओझानी ने नरेंद्र भाई के पसंदीदा विषय सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल पूछा। उन्होंने तो कम शब्दों में सवाल पूछ डाला, मगर मोदी जी इतने भीग गए कि जवाब में बोले कि आप की देहभाषा मेरे मन को छू गई है। उन्हें लंका छोड़ते समय राम-लक्ष्मण संवाद की याद आ गई। फिर उन्होंने विस्तार से सब बताया। छप्पन इंच की छाती यह ऐलान करते फूल गई कि यह मोदी है, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना जानता है। अपनी नेकदिली के बारे में भी बताया कि मैं ने अफ़सरों से कहा कि आप हिंदुस्तान को पता चले, उससे पहले; मीडिया वहां पहुंचे, उससे पहले; पाकिस्तान की फ़ौज को फोन कर के बता दो कि आज रात हमने ये किया है। ये लाशें वहां पड़ी होंगी, तुम्हें समय हो तो जा कर के ले आओ। जाहिर है कि खूब तालियां बजीं।
        नरेंद्र भाई ने लंदन में बैठे भारतवासियों को बताया कि उनके पास प्रामाणिकता की पूंजी है। सवा सौ करोड़ देशवासियों के प्यार की पूंजी है। कहा कि मुझ से ग़लतियां हो सकती है, लेकिन मैं ग़लत इरादे से कभी काम नहीं करूंगा। मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों पर कोई कीचड़ नहीं उछाल रहा, कोई गालियां नहीं दे रहा। मैं अकेला हूं, झेलता रहता हूं। हम सब कवि नहीं बन सकते। वह तो प्रसून ही बन सकते हैं। लेकिन मैं ने कभी लिखा था। उस कविता के पूरे शब्द मुझे याद नहीं हैं लेकिन कुछ ऐसा था कि लोग मुझे पर जो पत्थर फैंकते हैं, मैं उनसे ही सीढ़ी बना लेता हूं और उस पर चढ़ कर आगे चलता हूं। नरेंद्र भाई की इस बात पर मैं भी रीझते-रीझते बचा। और अंत में प्रसून ने सांप पर एक लंबी कविता सुनाई, जिसका सिर-पैर मैं अब भी बैठा-बैठा खोज रहा हूं। 

        Wednesday, April 18, 2018

        अजय सिंह बिष्ट, सत्यपाल सिंह और राहुल गांधी




        पंकज शर्मा
         14 April 2018

                    न्नाव और कठुआ से उद्वेलित राहुल गांधी ने बृहस्पतिवार की रात 9 बज कर 39 मिनट पर लोगों से मोमबत्ती ले कर ठीक आधी रात इंडिया गेट पहंुचने का आह्वान किया और सवा दो घंटे बाद हज़ारों की भीड़ वहां उनके पीछे खड़ी थी। एक घंटे राहुल वहां रहे। प्रियंका गांधी भी उनके साथ थीं। उन्नाव-घटना के आरोपी विधायक को गिरफ़्तार करने से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अजय मोहन बिष्ट उर्फ़ आदित्यनाथ में अपना बिरादराना इनकार खुल कर घोषित करते हुए कह दिया था कि सरकार के पास विधायक के खिलाफ़ कोई सबूत नहीं है। दबाव बढ़ा तो जांच सीबीआई के हवाले कर के पल्ला झाड़ लिया गया। हीले-हवाले तो सीबीआई भी करती, मगर राहुल गांधी की लोक-मुद्रा देखने के बाद उसने शुक्रवार की सुबह पांच बजे विधायक को हिरासत में ले लिया।

                    उन्नाव-मसले पर अजय सिंह बिष्ट के प्रवचन के बाद नरेंद्र भाई मोदी की मंत्रिपरिषद में बैठे सत्यपाल सिंह ने भी हमें एक नई रोशनी दिखाई। उन्होंने देश को बताया कि ऐसे ज़्यादातर मामले झूठे होते हैं। और कोई कहता तो आप अनसुनी कर सकते थे। मगर सत्यपाल सिंह मानव संसाधन मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं। वे उच्च शिक्षा का ज़िम्मा संभाल रहे हैं। मुंबई के पुलिस आयुक्त रहे हैं। उस बागपत में जन्मे हैं, जहां के चरण सिंह थे। चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह को दो लाख से ज़्यादा मतों से हरा कर लोकसभा में आए हैं। पुलिस में रह कर महाराष्ट्र की सेवा करने के बाद सियासत में कर राष्ट्र-सेवा करने के जज़्बे ने उनके मन में ऐसी हिलोरें लीं कि पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए ही 2014 की जनवरी के आख़िरी दिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन कर दिया। आमतौर पर होता नहीं है, लेकिन चंद घंटों में राज्य की सरकार ने उनका आवेदन मंजूर कर लिया। महज़ 48 घंटे बाद सत्यपाल सिंह मेरठ में भारतीय जनता पार्टी की सभा के मंच पर नरेंद्र भाई की बगल में खड़े थे।

                    बागपत से बंबई तक के सफ़र में सत्यपाल सिंह ने नारी-अत्याचार के पता नहीं कैसे-कैसे रूपों से निगाहें मिलाई-चुराई होंगी। कनिष्ठ पुलिस अफ़सर के तौर पर उन्होंने नासिक से अपनी नौकरी शुरू की। बुल्ढाना, नागपुर, गढ़चिरौली, पुणे, कोंकण, कहां-कहां नहीं रहे। कुछ वक़्त सीबीआई में भी गुज़ारा है। सो, उन्नाव-मामला सीबीआई के हवाले हो जाने के बाद अगर सत्यपाल सिंह की यह राय सामने आई कि ऐसे ज़्यादातर मामले झूठे होते हैं तो हम क्या समझें? प्रसंगवश आपको यह बताना भी ज़रूरी लगता है कि ये वही सत्यपाल सिंह हैं, जिनके मुंबई के निजी मकान में वेश्यावृत्ति का अड्डा पकड़ा गया था। मकान उन्होंने किराए पर दे रखा था। सब को किराए पर मकान देने से पहले किराएदार का सत्यापन करा लेने की सलाह देने वाले पुलिस महकमे के मुखिया ने ऐसा किया था या नहीं, कौन पूछता? ये वही सत्यपाल सिंह हैं, जो पुलिस-सेवा में जाने से पहले दरअसल वैज्ञानिक बनना चाहते थे और जिन्होंने कुछ महीने पहले देश-दुनिया का ज्ञानवर्द्धन करते हुए ऐलान किया था कि मानव-विकास का डॉर्विन-सिद्धांत पूरी तरह ग़लत है।

                    अजय सिंह और सत्यपाल सिंह की जुगल-मानसिकता हमारे दौर का चरम-दुर्भाग्य है। उन्नाव और कठुआ हमारे समय के अमिट कलंक हैं। ऐसी घटनाओं के वक़्त सत्ताधीशों का जो चेहरा सामने आया है, उसकी कुरूपता उबकाई लाती है। कठुआ की आसिफ़ा के साथ हुए हादसे के बाद भाजपा के लाल सिंह और चंद्रप्रकाश गंगा के दिए निर्लज्ज बयानों ने पूरे देश की लाज लूटी है। सुकून इस बात का है कि सत्ता-शिखर पर पसरी संवेदनहीनता के नीचे सामाजिक संवेदनशीलता का एक गहरा समुद्र हिलोरें ले रहा है। ये वे लहरें हैं, जो समुदाय, बिरादरी और राजनीतिक दलों के दायरों को चीरती हुई उठती हैं और सवा दो घंटे में हज़ारों लोगों को इंडिया गेट पर ला कर खड़ा कर देती हैं। संवेदना का यह ज्वार राहुल गांधी को एक राजनीतिक से राजनेता में तब्दील करने की कूवत रखता है। जब-जब ऐसे रूपांतरण होते हैं, तब-तब पूरा समाज करवट लेता है। सियासत तो सियासत है। होती रही है और होती रहेगी। मगर महत्वपूर्ण यह है कि राजनीति से परे अपने सामाजिक दायित्व के बोध ने गुरुवार की रात राहुल गांधी को बेचैन किया और बेचेैनी का यह भाव जितना स्थायी होता जाएगा, मुल्क़ की सियासत उतनी ही निखरती जाएगी।

                    प्रतिबद्धता राजनीति का मूल-मंत्र है। लेकिन देखना तो यही होता है कि हम किस सोच से प्रतिबद्ध हैं? एक सोच अजय सिंह बिष्ट की है, जो अपने हमजोलियों के खिलाफ़ सबूतों को देखना सिखाती है। एक सोच सत्यपाल सिंह की है, जो शोषितों के आंसुओं पर संदेह करना सिखाती है। और, एक सोच उस समाज की है, जो मानता है कि न्याय के लिए अगर किसी ने भी जहांगीरी-घंटा बजाया है तो सबसे पहले उसकी सुनवाई होनी चाहिए। जिस राजनीतिक व्यवस्था से सहानुभूति का तत्व गायब हो जाता है, उसे संचालित करने वाला सत्ता-समूह भी काल-पात्र के हवाले हो जाता है। जो सरकारें संसद की बात नहीं सुनतीं, उन्हें अंततः सड़कें अपनी आवाज़ सुनाती हैं।

                    लोकतंत्र के रथ का घर्घर-नाद मौजूदा सत्ता-तंत्र को भले ही सुनाई दे रहा हो, मगर यह नाद शुरू हो गया है। एक प्रभावी, प्रखर, निर्णायक और धारदार सोच इन चार वर्षों में चुपचाप अपनी जड़ें जमा चुकी है। आने वाले महीनों में इस सोच की एकीकृत-शक़्ल अगर ठीक से आकार ले सकी तो सिंहासन-बत्तीसी की नई पटकथा का मंचन हम-आप देखेंगे। अभी इस राह में हमें वे सारे दृश्य भी देखने हैं, जिनमें भय फैलाने वाली आवाजे़ं होंगी, फुसलाने वाली फुसफुसाहट होगी और सौदेबाज़ी का सट्टा लगेगा। जो यह जंगल पार कर जाएंगे, वे रायसीना की पहाड़ियों तक पहुंचेंगे। जो बीच में बैठ जाएंगे, उनके सिर हुक़्मरानों की बैठक की दीवारों पर सजे होंगे।

                    कभी-कभी हमें लगता है कि हम इस विशालकाय राज्य-व्यवस्था के बेहद अदने पुर्ज़े हैं। हम सोचते हैं कि हम क्या कर पाएंगे? इसलिए हम बाहर नहीं निकलते। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि आस्था का पुर्ज़ा पूरी मशीन से बड़ा होता है। प्रतिबद्धता का पुर्ज़ा पूरी मशीन का प्राण-तत्व होता है। चार साल पहले राजनीति के पहिए को आस्था के पुजेऱ् ने ही पूरी तरह घुमा दिया था। प्रतिबद्धता का यही पुर्ज़ा अगले साल भी इस पहिए को घुमाएगा। यह पहिया उलटा घूमना शुरू हो गया है। यह कैसी रफ़्तार पकड़ेगा, वह आप तय करेंगे।

                    कुछ लड़ाइयां ऐसी होती हैं, जिनसे बच कर भागा नहीं जा सकता। उन्नाव और कठुआ प्रतीक हैं। वे शोषक और शोषित को परिभाषित करते हैं। वे शोषक-समर्थक शक्तियों को बेनक़ाब करते हैं। वे शोषित-समर्थक ताक़तों का इम्तहान लेते हैं। इस इम्तहान में असफल होने का कलंक माथे पर ले कर घूम पाएंगे आप? इतना बोझ ले कर कहां जाएंगे हम-आप? चालाकी भरे तर्कों से अपराध को जायज़ ठहराने की कुचालें कब नहीं चली जाती हैं? उन्नाव और कठुआ का संकट किसी एक धर्म का संकट नहीं है, किसी एक बिरादरी का संकट नहीं है, किसी एक राज्य का संकट नहीं है। यह हमारी प्रतिबद्धता का संकट है, यह हमारी आस्था का संकट है, यह हमारा राष्ट्रीय संकट है। इस संकट से मुंह चुराने वाले क्या मुंह दिखाएंगे?

        लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।