Saturday, January 30, 2021

भृतक-मीडिया के भुक्खड़ उचक्के और किसान

 January 30, 2021 

 Pankaj Sharma


यह दिसंबर 2020 के तीसरे शनिवार की बात है। भारत के किसान आंदोलन के समर्थन की आड़ में वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के पास लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा को कुछ तत्वों ने नुक़सान पहुंचाया और खालिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए तो श्वेत-भवन की तरफ़ से प्रेस सचिव कैली मैकेनी ने बयान ज़ारी किया कि शांति, न्याय और स्वतंत्रता के पुजारी का अपमान क़तई बरदाश्त नहीं किया जाएगा। पिछले साल जून में एक अश्वेत जॉर्ज फ्लायड की पुलिस के हाथों हुई मौत के बाद भी गांधी की इस प्रतिमा को कुछ लोगों ने बेसबब तोड़ डाला था।

वाशिंगटन में गांधी-प्रतिमा और दिल्ली में लालकिले की पवित्रता इसलिए एक-सी है कि वे उन मूल्यों के प्रतीक के तौर पर देखे जाते हैं, जिनका ताल्लुक हमारी आज़ादी से है। इसलिए प्रतीकों का अपमान भारत के शाश्वत मूल्यों की अवमानना है। इस नाते लालकिले पर इस गणतंत्र दिवस को तिरंगे के अलावा कोई और झंडा नहीं लहराया जाता तो बेहतर होता। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि वह झंडा सिखों का पावन ‘निशान साहिब’ था या कुछ और। इससे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि उसे लहराते वक़्त मन में कौन-सा जज़्बा हिलोरें ले रहा था। फ़र्क़ सिर्फ़ इस बात से पड़ता है कि जब हमारा मन अपनी हुक़ूमत के रवैए पर क्षोभ, कुंठा और गुस्से से बलबला रहा हो, तब भी हमने मर्यादाओं का पालन किया या नहीं। सरकारें राजधर्म की मर्यादा से बाहर चली जाएं, कोई बात नहीं; मगर जनता को प्रजा-कर्तव्य की लक्ष्मणरेखा का दायरा इत्ता-सा भी नहीं लांघना चाहिए।

यह वह युग नहीं है, जब हमारे पत्रकारीय संसार में दीन-ईमान हुआ करता था। आज मीडिया की दुनिया उचक्कों के हाथ में चली गई है। इक्कादुक्का को छोड़ कर मुख्यधारा मीडिया के तमाम चेहरों से गलाज़त का ऐसा मवाद टपक रहा है, जिसे धोने के लिए हमें उस वैषाख के शुक्ल पक्ष की सप्तमी का इंतज़ार करना होगा, जब कोई भगीरथ अपनी तपस्या से गंगा को अवतरित होने के लिए राज़ी कर ले। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हम उस गिद्ध-मंडली के बीच रहने को मजबूर हैं, जो मौक़ा मिलते ही अपने चोंच-पंजे लिए भुक्खड़ों की तरह सब कुछ चीथड़ा-चीथड़ा करने के लिए टूट पड़ेगी। आपने देखा न कि बित्ते भर का बहाना मिलते ही मीडिया-जमींदार जानबूझ कर यह भूल गए कि 64 दिनों से किसान कितने संयम, धैर्य और शांति से सरकारी और कुदरती मौसम के बर्फ़ीलेपन को झेल रहे थे।

चौथे स्तंभ के अर्थवान टुकड़े-टुकड़े एकजुट रह कर अपनी फ़र्ज़ अदायगी न करते रहते तो हमारे प्रजापालकों ने तो बागड़ खाने में कोई कोताही बाकी रखी ही नहीं थी। राज्य-व्यवस्था के भृतक-मीडिया ने मुद्दे की बात उठाने वाले हर एक को देशद्रोही होने का प्रमाणपत्र जारी करने का जैसा धंधा छह-सात साल से शुरू किया है, वैसा तो अंग्रेजों के ज़माने में भी नहीं था। होता तो बंगाल में नील पैदा करने वाले किसान लड़ पाते? पाबना के किसानों की कोई सुनता? तेभागा के किसानों का क्या होता? केरल में मोपला के किसान कहां जाते? बिहार के चंपारण में गांधी कुछ कर पाते? गुजरात के  बारदोली में सरदार वल्लभ भाई पटेल कैसे कामयाबी पाते? सो, सिंघू, टीकरी और गाज़ीपुर इसलिए रेखांकित किए जाने चाहिए कि अनुचर-मीडिया के ज़रिए हमारे हुक़्मरानों द्वारा किए गए दंद-फंदों के बावजूद किसानों ने ददनी-प्रथा के सामने हारने से अंततः इनकार कर दिया। उन्होंने तिनकठिया पद्धति के पुनर्जन्म की आशंकाओं के रास्ते में ठोस अवरोध खड़ा कर दिया।

जिन्हें नहीं मानना है, उन्हें कौन मनवा सकता है, मगर सच्चाई यही है कि किसान-आंदोलन ने पूरे भारतीय समाज के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया है। अपने सहचर-पूजीपतियों की मंशाओं पर फिर रहा पानी सुल्तान की सुल्तानी को नागवार गुज़र रहा है। वरना इतने ज़िद्दड़ तो यूरोपीय बाग़ान मालिकों की नुमाइंदगी करने वाले फर्ग्यूसन भी नहीं थे कि नील-किसानों पर ज़रा-सा भी रहम न खाएं। उन दिनों के एश्ली ईडन और हर्शेल जैसे अंग्रेज़ ज़िलाधिकारियों के तो नाम भी आज के कारकूनों को मालूम नहीं होंगे। अगर होते तो अपने सलामी शस्त्रों पर उन्हें यह सोच कर शर्म आ रही होती कि परायों की तुलना में वे अपने ही किसानों के आंसुओं की कितनी बेशर्मी से अनदेखी कर रहे हैं।

उस तोता-मैना युगल की कहानी जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि कैसे उल्लू द्वारा एक रात की दावत के फेरे में फंस कर तोता अपनी मैना को तक़रीबन गंवा बैठा था और फिर कैसे उल्लू ने उन्हें समझाया कि बस्ती में वीरानी तब नहीं आती, जब वहां उल्लू आ कर बस जाते हैं, बल्कि तब आती है, जब इंसाफ़ फ़ना हो जाता है। संवैधानिक न्याय चूंकि दरकता जा रहा है, ईश्वरीय न्याय की गुंज़ाइश बढ़ती जा रही है। इसलिए हमने देखा कि जब राज्य के सारे अस्त्र किसानों पर एकतरफ़ा प्रहार कर रहे थे तो किस तरह आंसुओं ने नए सैलाब को जन्म दे दिया। प्राकृतिक आपदाएं तो किसान की हमसफ़र हैं। उनसे तालमेल बिठा कर, लड़-झगड़ कर जीवन जीना वह जानता है। लेकिन अप्राकृतिक सियासी आपदाओं से दो-दो हाथ करने की सिफ़त का काइयांपन चूंकि किसानों में नहीं होता है, सो, वह चूक जाता है। लेकिन यही वह समय होता है, जब एकाएक कहीं दूर से ‘अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मनं सृज्याम्यहम’ का बिगुल बजने लगता है।

आपको तो सुनाई दे ही रहा होगा, मगर, जो अपने कानों में रुई ठूंसे बैठे हैं, वे भी अगर ध्यान से सुनेंगे, तो उन्हें भी उलटी गिनती का नाद-स्वर ठीक से सुनाई देने लगेगा। अपनी राजनीतिक दीर्घजीविता को सुनिश्चित करने के चक्कर में नरेंद्र भाई मोदी समूची भारतीय जनता पार्टी के अल्पायु-योग को लगातार मज़बूत कर रहे हैं। उनके किए की आंच से अब भाजपा का पितृ-संगठन भी झुलसने लगा है। जैसे, अगर नरेंद्र भाई के राजनीतिक दर्शन में उनके लंगोटिया-साझीदार डॉनल्ड ट्रंप दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बन जाते तो उनकी सियासी-ज़िंदगी भले ही थोड़ी और लंबी हो जाती, मगर रिपब्लिकन पार्टी आने वाले चार बरस में अपना आधार बुरी तरह खो देती; उसी तरह, पिछले साल की गर्मियों में हुए चुनावों से नरेंद्र भाई की राजनीतिक पारी ज़रूर लंबी हो गई है, लेकिन उसके बाद से भाजपा के प्रति लोगों का भाव-आधार लगातार भुरभुरा होता जा रहा है। सो, अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के भीतर यह खदबदाहट तेज़ होती जा रही है कि नरेंद्र भाई की राजकाज-शैली को आयुष्मान भवः कहें या भारतीय समाज में स्वयं की सांगठनिक जड़ें पिलपिली होने से बचाएं!

मेरी यह बात आपको अजीब लगेगी, मगर इसे गांठ बांध लीजिए कि मौजूदा सत्ताधीशों की राजनीति का अंतःप्रवाह जिस दिशा में जा रहा है, उससे उभर रही तसवीर में नरेंद्र भाई मोदी 2022 के स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले पर तिरंगा लहराते दिखाई नहीं दे रहे हैं। वे 2024 में भाजपा के चुनाव-सारथी की भूमिका में नज़र नहीं आ रहे हैं। उन्होंने पिछला चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद भाजपा के नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक में 10 अगस्त 2019 को ही कह दिया था कि 2024 के लिए वे अभी से ख़ुद मेहनत करें और उनके नाम-काम के संदर्भ पर अब निर्भर न रहें। वे हर अहम काम 2022 के मध्य तक पूरा कर लेने की हड़बड़ी में यूं ही नहीं हैं। वे मुझे 2022 की जुलाई में राष्ट्रपति भवन जाते दीख रहे हैं। संघ-भाजपा के बस्ते में उनसे निज़ात पा कर ख़ुद सलामत रहने का इससे न्यूनतम साझा कार्यक्रम और क्या हो सकता है? 

आगामी यथार्थ का शिला-पूजन

 January 23, 2021 

आपको दिख रहा है या नहीं कि वैश्विक सियासत के समंदर में प्राकृतिक न्याय की लहरें उफ़नने लगी हैं। जो बाइडन का आना और डॉनल्ड ट्रंप का जाना अमेरिका में ही नहीं, पूरे संसार में नए वसंत के आगमन का क़ुदरती पैग़ाम है। आने वाला समय बहुत-से देशों में पतझर लाएगा और वहां की राजनीतिक शाखों पर नए पत्ते लहलहाएंगे। यह सियासत के भीष्म-पर्व का आरंभ है। यह ‘अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृज्याम्यहम’ का शंखनाद है। इसे रूमानी फ़लसफ़ा न समझें। यह आगामी यथार्थ का षिला-पूजन है।

इस वक़्त दुनिया भर में मोटे तौर पर 50 मुल्क़ों में तानाशाह राज कर रहे हैं। सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में बसे 19 अफ़्रीकी देशों में, उत्तरी अफ़्रीका और मध्य-पूर्व के 12 देशों में, एशिया-प्रशांत के 6 देशों में, यूरेशिया के 7 देषों में, अमेरिकी महाद्वीप के 3 देशों में और यूरोप के 1 देश में तानाशाही सल्तनतें हुकू़मत कर रही हैं। दुनिया भर के देशों में स्वतंत्रता का वार्षिक आकलन करने वाले ख्यात संस्थानों की ताज़ा सूची में चीन, उत्तरी कोरिया और रूस से ले कर सऊदी अरब, टर्की, कंबोडिया, वियतनाम, सूडान म्यांमार, अंगोला और बु्रनेई तक के शासनाध्यक्षों के नाम दर्ज़ हैं। आप देखना कि 2021 में शुरू हुआ इक्कीसवीं सदी का इक्कीसवां साल अगले एक दशक में इनमें से कई मुल्क़ों का सियासी-चरित्र बदल कर रख देगा। इसलिए अगले पांच बरस प्रकृति की अंगड़ाइयों को आंख भर कर देखने के लिए अपने को तैयार कर लीजिए।

बाइडन तो प्रतीक हैं। उनका देश अमेरिका उस सूची में शामिल नहीं है, जिस पर कोई तानाशाह राज कर रहा था। मगर इससे क्या होता है? तानाशाही झेल रहे मुल्क़ों की सूची में तो बहुत-से ऐसे देश शामिल नहीं हैं, जहां के लोग तानाशाही-घुटन में जी रहे हैं। और, इस सूची में तो बहुत-से ऐसे देश शामिल हैं, जहां तकनीकी तौर पर कोई तानाशाह राज कर रहा है, लेकिन नागरिकों की स्वतंत्रता बाधित नहीं है। ट्रंप इस तकनीकी हिसाब-किताब से तानाशाह नहीं थे। मगर क्या वे व्यवहार में किसी भी तानाशाह से उन्नीसे थे? सो, हुक़ूमत में बैठा कौन तानाशाह है, कौन नहीं, इसका फ़ैसला उसे चुने जाने के तरीके से नहीं हो सकता। यह तो शासन कर रहे व्यक्ति की प्रवृत्तियों से तय होगा कि वह तानाषाह है या नहीं। इस लिहाज़ से ट्रंप तानाशाह थे, तानाशाह थे, तानाशाह थे।

इसलिए सुबह-दोपहर-शाम सिर्फ़ अपना रौब जमाते रहने में मशगूल रहने वाले ट्रंप का जाना अमेरिका से तानाशाही की विदाई है। इसलिए सुमधुर देह-भाषा और उदार विचारों के धनी 78 बरस के बाइडन का आना अमेरिका में जन के तंत्र की बहाली है। यह एक लठैत दादा की रुख़सत के बाद दुलार भरे बड़े भैया के प्रवेश का दृष्य है। ऐसे दृश्य देखने को दुनिया के पता नहीं कितने देश तरस रहे हैं। इसलिए क़ुदरत के इंसाफ़ का यह दौर आरंभ हुआ है। जब आंसू इतने ग़र्म हो जाते हैं कि उबलने लगें तो उनकी वाष्प चट्टानों को फोड़ कर बाहर आ जाती है। सो, यक़ीन मानिए, यह दशक चट्टानों के दरकने का दशक साबित होगा।

किसी भी तानाशाह को सबसे ज़्यादा डर किस बात से लगता है? वह तब सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ज़दा होता है, जब उसे लगता है कि लोगों ने अब उससे डरना बंद कर दिया है। अपने आसपास निग़ाह दौड़ा कर देखिए कि किस-किस मुल्क़ में पिछले कुछ वक़्त से यह माहौल बनना शुरू हो गया है? आप पाएंगे कि जहां-जहां जनता के पैर मज़बूत हो रहे हैं, वहां-वहां के सुल्तानों की टांगें कांपने लगी हैं। प्रकृति का नियम है कि जिन पेड़ों की जड़ें मज़बूत होती हैं, उनकी डालों पर सिरफ़िरे पत्ते नहीं उगा करते। कमज़ोर जड़ों का फ़ायदा उठा कर जब कभी वे उग जाते हैं तो जड़ों में खाद-पानी पड़ते ही फिर झड़ने लगते हैं। बाइडन और कमला हैरिस की सियासी-जोड़ी ने इसी व्याकरण की पुनर्स्थापना की है। एक चौथाई संसार अभी तो इस राह पर हौले-हौले चलता दिखाई दे रहा है, मगर इस साल शुक्रवार को शुरू हुआ यह दशक अपने अंतिम मंगलवार तक जब पहुंचेगा तो दुनिया का नया नज़ारा देख कर आप चकित रह जाएंगे।

जिस पृथ्वी के इतिहास पर चंगेज़ ख़ान से ले कर पोल पोट तक और शाका जुलू से ले कर एडॉल्फ़ हिटलर और जोसेफ़ स्तालिन तक के छींटे हैं, उस पृथ्वी पर ऐसा भरत-खंड आख़िर यूं ही तो मौजूद नहीं है, जहां सुशासन का पैमाना राम-राज्य को माना जाता है। जहां पुरुषों में सर्वोत्तम उसे माना जाता है, जो मर्यादा का पालन करता हो। जहां भटके हुए शासकों को समय आने पर उनके अपने भी राज-धर्म का पालन करने की सलाह देने को विवश हो जाते हैं। इसीलिए भारत धृतराष्ट्र और दुर्योधन के बावजूद विदुर का देश है। इसीलिए भारत हिरण्यकश्यप के बावजूद प्रह्लाद का देश है। भारत की इस बुनियादी तासीर को समझने से जिस-जिस ने इनकार किया, उस-उस को इतिहास ने कूड़ेदान के हवाले कर दिया। यही हमारी राज-नीति का केंद्र बिंदु है।

पिछले कुछ वर्षों से हम मानो हामितताई के क़िस्सों के बीच से गुज़र रहे हैं। इन क़िस्सों में एक शहर के हाक़िम का चेहरा नज़र आता है, जो कभी तो मसखरा-सा दिखाई देता है और कभी एकाएक विद्रूप-भरा हो जाता है। हातिमताई कितने नेकनीयत और दरियादिल थे, यह यमनवासी जानते होंगे। मैं तो इतना जानता हूं कि हातिमताई के तिलस्मी क़िस्सों की सच्चाई आसमानी थी। उनसे हमारा नन्हा-मुन्ना मन भले ही बहल जाता रहा हो, लेकिन समझ-बूझ सकने की उम्र आते ही हमने अपने को ऐसा ठगा महसूस किया कि तब से अपना सिर पीट रहे हैं। अच्छे दिनों के आगमन-युग का बचपन बीत जाने के बाद आज समूचा भारत अपना माथा ऐसे ही थोड़े पीट रहा है। अपना बावनवां गणतंत्र दिवास मनाते वक़्त भारतमाता का पल्लू अगर आंसुओं से भीगा हुआ है तो इसकी जवाबदेही मौजूदा अनुदार हुक़्मरानों के अलावा किस की है?

बेमुरव्वत होना क्या किसी की श्रेष्ठता का लक्षण है? अकड़ू होना क्या किसी को बेहतर मनुष्य बना देता है? फरसाधारी होने भर से क्या कोई पराक्रमी बन जाता है? ऐंठू होने से क्या कोई अविजित हो जाता है? एकलखुरा होना किसी को परिमार्जित करता है या और ज़्यादा मनोविकारों से भर देता है? उत्सवधर्मी होने भर से क्या किसी की सामाजिकता का विस्तार हो सकता है? क्या किसी-न-किसी तरह सिंहासन पर कब्जा जमाए रखने में कामयाब होने से कोई सर्वज्ञान और सर्वगुण संपन्न भी बन सकता है? अगर इन सारे सवालों का जवाब ना है तो क्या इस मसले पर संजीदगी से विमर्श नहीं होना चाहिए कि हमारे इंद्रप्रस्थ को हम किस के हवाले कर हाथ-पर-हाथ रखे बैठे हैं?

प्रकृति ने तो अपनी न्याय प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। लेकिन क्या हम भी इंसाफ़ की इस डगर पर चलने को तैयार हैं? मुद्दा इस या उस व्यक्ति का नहीं है। मुद्दा इस या उस प्रवृत्ति का है। मुद्दा यह है कि भारतीय समाज के अर्थवान वर्ग इससे पहले इतने सहमे हुए क्यों नहीं थे? मुद्दा यह है कि वैचारिक बाहुबलीपन का ऐसा बोलबाला हम कब तक बर्दाश्त करेंगे? मुद्दा यह है कि नए वसंत के स्वागत में हम कतारबद्ध होंगे या नहीं? और, मुद्दा यह है कि कोई पूछे-न-पूछे, हम चिल्ला-चिल्ला कर बताएंगे या नहीं कि मुद्दा क्या है?

शव-साधकों के दौर का महामृत्युंजय मंत्र

 


अपने सियासी आराध्यों के जुग-जुग जीने की दुआएं तो आराधक हमेशा से करते रहे होंगे, मगर मुझे नहीं लगता कि सियासी अनुचरों के भीतर नफ़रत का ऐसा पतनाला कभी भरभर गिरता रहा हो कि वे सोशल मीडिया पर ‘‘हाय-हाय-बुढ़िया-तू-मर-जा’’का हैशटैग चस्पा कर उस पर गरबा करते घूमें। आपका आप जानें, मगर इस बृहस्पतिवार ट्विटर पर महिषासुरों की यह लठैती देख कर अपने जनतंत्र की ताज़ा पतन-कहानी पर मेरा सिर तो शर्म से नीचे लटक गया।

लेकिन फिर मैं ने अपने को यह कह कर संबल बंधाने की कोशिश की कि नफ़रत की बुआई में माहिर व्यवस्थापकों ने जब 73 बरस पहले एक बूढ़े के सीने में तीन गोलियां उतार देने वाले पंजे उगाने का करतब कर दिखाया था तो उनके लिए कोई बुढ़िया तो चीज़ ही क्या है? जिन्हें बेइंतिहा घृणा के व्यवसाय का हुनर आता है, उनके लिए किसी बूढ़े की महात्माई और किसी बुढ़िया की तिल-तिल रीतती ज़िंदगी के भला क्या मायने? हुक़ूमत पर कब्ज़ा करने और फिर उसे अपने चंगुल में बनाए रखने के लिए, छल-प्रपंचों के हवस डूबे बिस्तर पर, जितने आसन हमने इन सात वर्षों में आकार लेते देखे हैं, क्या पहले कभी देखे थे?

सो, किसी बुढ़िया के मरने का उच्चाटन-मारण जाप करने वालों के प्रत्युत्तर में मैं उनके आराध्य के दीर्घजीवी होने का महामृत्युंजय पाठ करता हूं। किसी की बद्दुआओं से लोग सिधार रहे होते और किसी की दुआओं से वे विराज रहे होते तो फिर बात ही क्या थी? कलियुग में श्राप और आशीर्वाद के प्रतिफल भी, लगता है, उलट गए हैं। वरना रायसीना की पहाड़ियों पर उलटबांसी के इतने मटमैले बादल इस क़दर कैसे छाते? सियासी इल्ज़ामों के शब्दकोष में फूहड़ता-सने जितने नए शब्दों का प्रवेश इस दौर के असंस्कारी सत्ताधीशों की वज़ह से हुआ है, क्या वह आपको बेजोड़ नहीं लगता?

आज भले ही मार्गदर्षक मंडल के एक उम्रदराज़ सदस्य समेत सारे बरी हो गए हैं, मगर क्या इससे यह तथ्य धुल जाएगा कि हिंदू तन-मन और हिंदू जीवन में अतिवाद की शिराएं पिरोने के लिए 31 साल पहले रथ यात्रा किसने निकाली थी? तब रथी के चरणों में बैठा सारथी कौन था? उस रथ यात्रा के साए तले अहमदाबाद से ले कर बड़ौदा तक और हैदराबाद से ले कर जयपुर-जोधपुर तक भड़के 166 सांप्रदायिक दंगों को हम किसकी देन मानें? रथ यात्रा के बारह बरस बाद साबरमती नदी के किनारे तक पसरी घटनाओं को क्या आप ऐसे ही बिसरा सकते हैं? अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी से उठती हूक क्या आज भी आपको चैन से सोने देती है? क्या मोरजारी और चारोड़िया चौक की रुलाई आपकी नींद नहीं उड़ाती? क्या नारोड़ा-पाटिया की सामूहिक क़ब्र का दृश्य आप अगले जनम में भी भूल पाएंगे?

हुक़ूमत हासिल करने के लिए की गई इस अनवरत शव-साधना की पृष्ठभूमि में देखें तो आपको लगेगा कि कापालिक-मंडली का ‘हाय-हाय बुढ़िया तू मर जा’ गायन तो लोरी गाने जैसा है। यही क्या कम है कि वे सिर्फ़ हैशटैग गढ़ कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। वरना उन्हें यह मामला सीधे अपने हाथ में ले लेने से भी कौन रोक लेगा? जब कोतवाली सैंया के कब्ज़े में हो तो रक्षिताओं की तो पांचों उंगलियां घी में होती हैं। ऐसे में ये उंगलियां क्या कोई स्वेटर बुनने के लिए हुआ करती हैं? ये उंगलियां तो बंदूक का घोड़ा दबाने को ललकती हैं। मौत की सौदागरी का ख़ून जब एक बार मुंह से लग जाता है तो रक्त-पिपासा बढ़ती जाती है, घटती नहीं। इसीलिए ये ज़ुबानें 73 साल से लपलपा रही हैं। इनकी बढ़ती लपलपाहट का ही नतीजा है कि भारतीय जनतंत्र आज ओंधे मुंह पड़ा है और हम में से कोई इस डर से उसे उठाने आगे नहीं आ रहा है कि बाद में कोतवाल साहब के सवालों से कैसे निज़ात मिलेगी और वह अदालत हम कहां से लाएंगे, जो खुल कर कह दे कि समय कोतवाल से बड़ा होता है?

दूर से देखने पर यह हैशटैग इतनी बड़ी घटना नहीं लगती है, जिस पर ऐसे झर-झर आंसू बहाए जाएं। मगर आप इसकी शव-परीक्षा करेंगे तो पाएंगे कि भारतीय राजनीति की शिराओं में जानबूझ कर टप-टप टपकाए जा रहे इस नुनखरे द्रव्य के पीछे की मंशा इतनी मासूम नहीं है। यह नए राजनीतिक व्याकरण के प्रति आपको अनुकूलन-प्रक्रिया में ढालने का तरीका है। जब धीरे-धीरे ऐसी करतूतों की अनदेखी करने की आदत आपको हो जाएगी तो कापालिकों का काम और आसान होता जाएगा। वे चाहते ही यह हैं कि एक दिन ऐसा आए कि उनके क़त्लों की चर्चा करना हम-आप बंद कर दें।

आपने महसूस किया या नहीं कि पिछले दस महीनों में आप शासकीय-प्रशासकीय आदेशों का पालन बिना मीन-मेख निकाले जितने अनुशासित-भाव से करने लगे हैं, पहले नहीं किया करते थे। पहले आप हर फ़रमान को मानने से पहले उसके गुण-दोष के बाट-तराजू लेकर बैठ जाया करते थे। मगर एक महामारी के बहाने आपकी परिस्थिति-अनुकूलता का स्तर हमारे हुक़्मरान वहां ले आए, जहां वे दशकों के हथकंडों से भी नहीं ला पाते। हमारे देशद्रोहीपन के इतने उपादान इकट्ठे कर दिए गए हैं कि अपनी देशभक्ति साबित करते रहना ही हमारा एकमात्र काम रह गया है। हमारा उठाया हर सवाल देशद्रोह के दायरे में आता है। हालत यह है कि आनन-फानन बाज़ार में लाए गए किसी टीके की गुणवत्ता और दाम के बारे में प्रश्न करना भी आपको काला पानी श्रेणी में डाल सकता है।

आपदा में भी अवसर तलाश लेने की यह कला सब नहीं जानते। इसलिए, जो जानते हैं, आप पर राज कर रहे हैं। वे तब तक आप पर राज करते रहेंगे, जब तक आप उन्हें आपदा में अवसर प्रदान करते रहेंगे। अब उन्हें अवसर पाते रहने के लिए आपदाएं गढ़ते रहने का काम भर करना है। वे आपदाएं उपजाने के सफल प्रयोग आप पर कर चुके हैं। वे अपने प्रयोग आधी रात करते हैं। आपने एक नहीं, कई-कई बार उनकी प्रयोगशाला में कृतंक परिवार की विनम्र प्रजाति की तरह अपनी भूमिका का निर्वाह पिछले कुछ साल में किया है। इसलिए अगर वे बार-बार अपने प्रयोगों का विस्तार कर रहे हैं तो अब आपके छाती पीटने से क्या हो जाएगा?

सो, मेरी बात मानिए। यह समय छोटी-से-छोटी बात पर बड़ी-से-बड़ी नज़र रखने का है। इसलिए कि जो बात छोटी दिखाई देती है, वह दरअसल आजकल इतनी छोटी होती नहीं है। हमारे हुक़्मरान इन दिनों ऐसे फ़राख़दिल लोग नहीं हैं, जिनकी बाहें सब के लिए एक-सी खुली हों। वे ऐसे लोग हैं, जिनके जीवन-दर्शन में असहमतियों के लिए कोई जगह नहीं है। उनका मानना है कि जो उनके साथ नहीं हैं, वे गद्दार हैं। और, गद्दारों की एक ही सज़ा होती है कि उन्हें चौराहे पर घसीट कर लाया जाए। आप के आसपास पड़ने वाले हर चौराहे पर उनका पहरा है। उस चौराहे पर भी, जहां आ कर पचास दिनों बाद वे ख़ुद खड़े होने की पेशकश कर रहे थे। चौराहों के इस चक्रव्यूह में अगर आपको नहीं फंसना है तो अनुकूलन की इस प्रयोगशाला से जल्दी बाहर आइए। स्वयं को प्रयोगों के हवाले करने से खुल कर इनकार करिए। प्रयोगों पर प्रश्नचिह्न लगाइए। प्रयोगों की चीरफाड़ कीजिए। प्रयोगों का दासत्व त्यागिए। अपने को अपने अनुकूल बनाइए, उनके नहीं। जिस दिन आप यह कर लेंगे, शव-साधकों से मुक्त हो जाएंगे। वरना कापालिकों का अट्टहास सुनते रहने को अभिशप्त रहेंगे।

अधिनायकत्व के जनाज़े का उपसंहार

 

 Pankaj Sharma 

यह तो मेरी समझ में आ गया कि अमेरिका में जो हुआ, क्यों हुआ। लेकिन यह मेरी समझ में नहीं आया कि अमेरिकी-कुप्रसंग में, बिना किसी के दिखाए भी, भारतीय संदर्भ के डरावने साए लोगों को क्यों दिखाई देने लगे? बृहस्पतिवार को छोटे परदे पर बैठा हर सूत्रधार अर्चन-मंडली के भागीदारों को लगातार यह कह कर उकसाने में व्यस्त रहा कि अमेरिकी संसद में डॉनल्ड ट्रंप के अनुचरों की करतूत से निकले जनतंत्र के जनाज़े पर विलाप कर रहे लोग दरअसल भारत में ऐसे अंदेशे के परोक्ष संकेत दे रहे हैं।

वे दे रहे थे या नहीं, रामलला बेहतर जानें! लेकिन मीडिया पुजारियों के मन में अगर ऐसा सार्वजनीन अपराध-बोध खदबदा रहा था तो क्या यह बेबात है? सत्तासीन मंडली की पूरी शक्ति यह दिखाने की कोशिश में क्यों लगी हुई है कि न तो ट्रंप के व्यक्तित्व की पेचीदगियों की किसी भारतीय व्यक्तित्व के मकड़जाल से कोई तुलना की जानी चाहिए और न केपिटोल हिल पर हुई बेहूदगी के पीछे की मानसिकता को भारत में हुए किसी मज़हबी हादसे के पीछे काम कर रही दिमाग़ी सोच से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। मैं इन दोनों ही बातों से इत्तफ़ाक रखता हूं। मगर परेशान हूं कि पोंछा इतना ज़ोर-ज़ोर से क्यों लगाया जा रहा है? क्या हमारे कालीन के नीचे का फ़र्श सचमुच इतना गंदला हो गया है?

बुहस्पतिवार की रात मुझे रिपब्लिक टीवी के अर्णब गोस्वामी ने अपनी टीवी बहस में बुलाया। आप तो जानते ही हैं कि वे हमारे मुल्क़ के आत्ममुग्ध-क्लब के उन अनन्य सदस्यों में से हैं, जिन्हें लगता है कि वे सब जानते हैं और उनसे ज़्यादा जानने का हक़ किसी को है ही नहीं। आप यह भी जानते हैं कि अर्णब बहस के दौरान असहमतियों के स्वरों को हर-संभव हथकंडे अपना कर कुचलने के लिए कुख्यात हैं। बावजूद इसके कि मेरे कई मित्र-परिचित कहते हैं कि मुझे उनके चैनल पर नहीं जाना चाहिए, मैं जाता हूं, क्योंकि, एक तो, मैं किसी व्यक्ति और विचार के बहिष्कार का हामी नहीं हूं, और दूसरे, मुझे लगता है कि प्रतिकूल-मंच पर, जितनी भी हो सके, अपनी बात रखनी ही चाहिए। सो, इस बार भी मैं ने बहस में शिरक़त की।

अब मज़ा देखिए कि अर्णब ने उनके शतरंज-पटल पर मौजूद भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता नलिन कोहली को मेरे कुछ कहने से पहले ही अपना दरबान बना कर पेश कर दिया और जैसे ही मैं ने इतना भर कहा कि ‘मैं अमेरिका की घटना में भारत के किसी व्यक्तित्व या प्रसंग की समानार्थक छवि नहीं खोज रहा हूं, लेकिन सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूं कि चरम-विचारों के अनुगामी लोग दुनिया के किसी भी देश में लोकतंत्र के लिख खतरा ही साबित होते हैं’, अर्णब ने खच-खच अपनी कैंची चलानी शुरू कर दी। उन्होंने नलिन को बार-बार यह कह कर उकसाया कि देखिए, यह किसकी तरफ़ इशारे कर रहे हैं? मैं ने लाख कहा कि मैं तो किसी का नाम ले ही नहीं रहा, मगर कौन सुने?

नलिन ज़हीन हैं। वे अचैतन्य कुपात्राओं की तरह भौंभौंवादी नहीं हैं। लेकिन अपने कर्तव्य से बंधे थे, सो, उन्हें जिनका बचाव करना था, पूरे भक्ति-भाव से करते रहे। मेरे इन सवालों के जवाब न उनके पास थे और न उन्हें देने की ज़रूरत थी कि जब मैं ट्रंप के व्यक्तित्व की ख़ामियों का ज़िक्र कर रहा हूं तो वे इसे किसी और से नत्थी क्यों कर रहे हैं? मैं तो किसी का नाम ले नहीं रहा! अर्णब भी अपने सेवादार-फ़र्ज़ से बंधे थे, सो, मेरी असहमतियों को दरकिनार कर मुझ से असहमत शतरंजी मोहरों को सामने लाने का अपना काम करते रहे। अब मैं यूं परेशान हूं कि अर्णब-नलिन वग़ैरह के भीतर बिना बात इतना अपराध-बोध क्यों भरा हुआ है कि कोई कुछ कहता भी नहीं और वे सब समझ जाते हैं?

हिटलर का नाम लेते ही उचकने वाला धड़ा अगर अब ट्रंप का नाम लेते ही बिलबिलाने लगा है तो यह पाप क्या मेरा-आपका है? इस पाप-बोध का कोई क्या करे? लेकिन यह भी सुखद है कि निग़ाहें कहीं पर भी जाएं, लोग एकदम सही निशाना ताड़ लेते हैं। जो अपने आराध्य की मूर्ति भंजित होते नहीं देखना चाहते, वे भी मन-ही-मन सब-कुछ समझ जाते हैं। उनके भीतर कैसी कसक होगी, हम सब समझ सकते हैं। उनमें से शायद ही कोई चाहता हो कि नकारात्मक प्रतिमानों की तरफ़ होने वाले इशारों का अर्थ उनके षिखर-पुरुषों की कार्यशैली से जोड़ कर देखा जाए। लेकिन इस माहौल का वे करें क्या, जो बन गया है? यह माहौल कोई बैठे-ठाले तो बन नहीं गया है। इसमें किसी का कोई तो योगदान होगा? और, जिनका सीधे कोई योगदान नहीं है, उनका भी इतना तो योगदान है ही कि उन्होंने कभी समय पर यह नहीं कहा कि राजा निर्वस्त्र है।

आख़िर अब्राहम लिंकन कहते ही लोगों को उनका ध्यान क्यों नहीं आता, जिनका ट्रंप कहते ही आ जाता है? मैं उस दिन सचमुच ख़ुशी से नाचूंगा, जिस दिन बुद्ध या गांधी कहने भर से उनकी तसवीर निग़ाह में तैरेगी, जिनकी हिटलर कहने से फ़ौरन तैर जाती है। मैं जानता हूं कि ये निरे ख़्वाब हैं और अपना मन मार लेता हूं, लेकिन अनुचर मुंगेरीलालों को इस हसीन सपने की रजाई ओढ़े बैठे रहने से मैं कैसे रोकूं कि संसार में उनके गिरधर सरीखा दूसरा कोई नहीं है? जो समझते हैं कि एकल-व्यक्तित्व के स्वामी होना देवत्व के लक्षण हैं, वे सृष्टि में समावेशिता और परस्पर निर्भरता के बुनियादी दर्शन के कखग से भी कोसों दूर हैं।

चिंता यह नहीं है कि जो अमेरिका में हुआ, कभी भारत में न हो जाए! चिंता यह है कि, झूठे को ही सही, यह विचार मन में उपज क्यों रहा है? भले ही भारत की बुनियादी संवैधानिक संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में बेतरह दरक गई हैं, भले ही इस-उस बहाने सामाजिक दूरियों को बढ़ाने साज़िशें हो रही हैं, भले ही भारतीय प्रजा की सहनशीलता हरि-कथा की तरह अनंता है और भले ही हमारे मौजूदा शासक बुलडोज़री-सोच से गच्च हैं; एक बात जो भूलेगा, वह बुरी तरह गच्चा खा जाएगा, कि हमारे मुल्क़ ने एक बार नहीं, कई-कई बार, वे दृश्य देखे हैं, जब कटे हाथ भी सच्चाई-अच्छाई का परचम लहराने के लिए रातोंरात कतारबद्ध हो जाते हैं।

सो, अमेरिका में कुछ भी हो जाए, भारत में वैसी बिसात बिछाने की सोचना बड़े-से-बड़े पराक्रमी सुल्तान के भी वश के बाहर की बात है। आज हैं कि नहीं, पता नहीं, मगर ख़ुद को ख़ुदा मानने वाले लोग हर दौर में रहे हैं। इतिहास के कूड़ेदान ने उन्हें कब लील लिया, ख़बर भी न हुई। ट्रंप-प्रसंग का मैं इसलिए स्वागत करता हूं कि उसने दुनिया को नए सिरे से आगाह कर दिया है। सो, बची-खुची गुंज़ाइश भी अब ख़त्म हुई। अमेरिका अपने ट्रंप की वज़ह से लगे इस महाकलंक को कैसे धोएगा, वह जाने; भारत ऐसीअ िकिसी भी थू-थू घटना का कभी साक्षी नहीं बनेगा, यह तय था, तय है और अब और भी दृढ़़ता से तय हो गया है। ट्रंप की करतूत से उपजे नतीजे ने संसार भर के तमाम एकाधिकारवादियों के दिमाग़ों के जाले साफ़ कर दिए हैं। अधिनायकत्व के जनाज़े में यह अंतिम भले ही नहीं, मगर बहुत बड़ी कील है।

मूक विवशता के बरस की विदाई के बाद

 January 3, 2021 

मनहूसियत की तकनीकी विदाई का जश्न तो मरे मन से हम-आप ने बृहस्पतिवार की रात मना लिया। लेकिन बात तो तब बनेगी, जब शुक्रवार से शुरू हुआ बरस हमारे मन को सचमुच उमंगों से भरे। मगर वह भरेगा कैसे? कुदरत दो-चार महीने में मेहरबान शायद हो भी जाए, लेकिन उसकी कृतियों की करतूतों से निजात तो अभी मिलती दिखती नहीं। विषाणु तो चलिए आसमान से आ गया था, मगर उससे अपनी सियासी गठरी मोटी करने वाले सत्ताधीश तो अपनी ही धरती से उपजे लोग थे, उसके (कु)प्रबंधन में अपने हाथ की सफाई से ख़ुद की जेब भारी करने वाले अफ़सर तो अपने ही गांव के बेटे थे और बीमार जिस्मों को नोचने में दिन-रात एक करने वाला चिकित्सा-माफिया तो अपने ही मुल्क़ में पला-पनपा था।

सो, प्रकृति हमें दंडित करना छोड़ भी देगी तो हमारे अपने सहोदर कौन-सा हमें छोड़ने वाले हैं? इसलिए बीस के इक्कीस हो जाने भर से सब बदल जाएगा, ऐसी आस कैसे लगा लें? फिर भी बीस सौ बीस से मुक्ति राहत देने वाली है। बीस सौ इक्कीस का आगमन उम्मीदों की एक मद्धम लौ तो जगाता ही है। और कुछ नहीं तो पदोन्नति का इंतज़ार करते-करते निलंबित हो जाने वाले को अपना निलंबन रद्द हो जाने जैसी राहत तो मिलती लगेगी। कभी-कभी इतना भी बहुत होता है। इत्ते भर से बड़ा संबल मिल जाता है। बीस की विदाई ऐसा ही सहारा है। इसलिए इक्कीस प्रेत-मुक्ति के हवन का वर्ष है।

पिछले बरस हमने आत्मा को झकझोरने वाले दृश्य देखे। संसार का सबसे बेतुका और निष्ठुर लॉकडाउन देखा। अपने बूढ़े मां-बाप और नन्हें बच्चों को पीठ पर लादे सैकड़ों किलोमीटर पांव-पांव अपने गांव जाते लाखों-लाख प्रवासी मजदूर देखे। छप्पन इंची नेतृत्व में एकतरफ़ा चल रही सरकार की असंवेदनशीलता और घनघोर नाकामी देखी। हमारे नागरिक समाज में स्वस्फूर्त कर्तव्यबोध के ऐसे पारंपरिक बीज हैं कि हम हर चुनौती से अंततः पार पा ही लेते हैं। सोचिए, अगर ये स्वयंसेवी संगठन महामारी के दौरान अपने काम में न जुटे होते तो क्या होता? हमारे सुल्तानों ने तो हमारे हाथ से ताली बजवाने के बाद उन हाथों में थाली पकड़ा कर हमें अपने हाल पर छोड़ ही दिया था।

जिस देश में कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदल जाने की कहावतें हैं, उसके हुक़्मरानों ने विषाणु-प्रबंधन के सारे फ़ैसले, स्थानीयता की अनदेखी कर, दिल्ली से लागू करने में कौन-सी बुद्धिमानी की? नतीजे सामने आने के बाद ख़ुद को दुरुस्त करने में इतने महीने निकल गए कि तब तक सत्यानाश हो चुका था। और, फिर हमारे शहंशाह ने यह रवैया अपना लिया कि जहां सत्यानाश तो वहां सवा सत्यानाश से भी क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा? पूरी व्यवस्था जवाबदेही का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने में इस हद तक जुट गई कि मीडिया समेत उसके सारे अंग पूरी बेशर्मी से एक समुदाय विशेष की जान के पीछे ही पड़ गए।

मुल्क़ के सामने यह सनसनी परोस देने के बाद हमारे सुल्तान मोर और तोता-मैना के साथ खेलने में व्यस्त हो गए। फिर उनका मनवा ऐसा बेपरवाह हुआ कि उन्हें न सरहदों पर चीन की मौजूदगी की फ़िक्र ने कभी सताया और न निजी अस्पतालों में लुट-मर रहे कोरोना-धारकों ने। वे अपने मन की ढपली हर महीने उसी तरह बजाते रहे, इस-उस बहाने देश के सामने आ कर उपदेश पिलाते रहे। एक तरफ़ दो गज दूरी का आलाप होता रहा और दूसरी तरफ़ खचाखच भरी चुनाव सभाएं होती रहीं। इस कोहराम में धर्म-स्थल बंद रहे, स्कूल-कॉलेज बंद रहे, मगर पूरी धूमधाम से राम मंदिर की नींव रखने का पुण्य लूटे बिना नरेंद्र भाई मोदी नहीं माने।

पिछले साल हमने लोकतंत्र के चीरहरण की एक नहीं, कई मिसालें देखीं। हमारे प्रधानमंत्री ने संसद का शीतकालीन सत्र रद्द कर दिया, मगर नए संसद भवन के निर्माण का भूमिपूजन उनसे सर्वोच्च अदालत भी रद्द नहीं करा पाई। संसदीय व्यवस्था में विपक्ष के चरम अपमान का ऐसा साल पहले कभी नहीं आया होगा। अपने आकाओं को प्रसन्न रखने के लिए पीठासीनों का ऐसा फूहड़ मुजरा किसी और साल ने कभी नहीं देखा होगा। क़ानून बनाने की ठेंगेवादी ऐंठ का ऐसा नंगापन आज़ादी के बाद कभी किसी ने नहीं देखा था।

भारतीय जनता पार्टी की चुनावी मशीनरी के तालठोकू पराक्रम के चलते हार को जीत और जीत को हार में तब्दील होते हमने पिछले बरस देखा। राज्य सरकारों के गिरने-बनने में राज्यपालों को भागीदार बनते देखा। अदालतों के नक्कारखाने में वैयक्तिक स्वातंत्र्य की तूती को विलाप करते देखा। निजी आज़ादी की कीमत पर राज्य-व्यवस्था के शक्ति-प्रदर्शन के जलवे देखे। देश की विरासत को धन्ना सेठों की झोली में जाते देखा। पीएम केयर्स फंड की बेमिसाल झक्कूबाज़ी देखी। संवैधानिक संस्थानों को ढहते देखा। स्थापित परंपराओं की मीनारों को गिरते देखा।

क्या-क्या नहीं देखा? अभिव्यक्ति की आज़ादी का टेंटुआ दबाने के लिए जांच एजेंसियों का निर्लज्ज इस्तेमाल देखा। आतंकवाद विरोधी क़ानूनों का इस्तेमाल विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खि़लाफ़ होता देखा। 83 बरस के बूढ़े को अपनी फटी बिवाइयों के साथ जेल में चप्पल पहनने के लिए तरसते देखा। और, साल का आख़ीर आते-आते इंद्रप्रस्थ की सीमा पर बर्फ़ीली सर्दी में पड़े किसानों की दुर्दशा भी देखी। ऐसे हर मामले में न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी का सबसे विकराल रूप भी हमारी खुली आंखों ने देखा।

2020 सत्तासीनों की बहुआयामी वासना के प्रेतों के अतिशय पागलपन का साल था। यह सत्ता की चौसर के खानों में चक्कर लगा रहे मोहरों की मूक विवशता का साल था। यह हमारी खुद्दार जवानी की आंखों में मरते आंसुओं का साल था। यह आदमज़ाद के समग्र अस्तित्व की महत्ता को गौण कर देने वाला साल था। यह ज़िंदगी के बुनियादी ख़यालातों को चकनाचूर कर देने वाला साल था।

सो, और कुछ नहीं तो इसी का उत्सव हम नए साल में मनाएं कि हर आहट पर मायूसियों के जगाने वाला पिछला साल अब बीत गया। बहुत कुछ ले कर गया है। लेकिन चला तो गया। नया साल कुछ ले कर आया है कि नहीं, मालूम नहीं, मगर आया तो है। मन बहलाने को यह भी कोई कम नहीं है। इस साल मन जब थोड़ा बहल जाए और कुदरत जब थोड़ी और कृपावंत हो जाए तो मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ ज़रूर कीजिए कि मुसीबतों में मुंह फेर लेने वाले हुक़्मरानों को कुछ सबक मिले।

2021 का सूरज दिल्ली की सीमा पर डटे भूमिपुत्रों की मौजूदगी में उगा है। सूर्य की इस निष्ठा का, आइए, पुरज़ोर अभिवादन करें। उस निष्ठा में अपने एक-एक दीप की निष्ठा पिरोएं। तब जा कर पिछले साल के झंझावात की कालिख हम पोंछ पाएंगे। ‘अच्छे दिन’ से अगर आप अब भी नहीं धापे हैं तो 2021 में अपने दुर्भाग्य पर बुक्का फाड़ कर मत रोना। हांफते-हांफते आप जिस तरह नए साल की दहलीज़ पर पहुंचे हैं, उसके बाद साल-मुबारक कहने से पहले ज़रा सुस्ता लीजिए। फिर तय कीजिए कि इस साल कुछ ऐसा करना है या नहीं कि साल-मुबारक कहने के बजाय ख़ुद को अपना पहले जैसा हाल मुबारक कहना पड़ जाए? साल तो अपने आप आएंगे, वे तो अपने आप जाएंगे, मगर उनके जाने-आने में आप भी कुछ अपने हाथ-पांव हिलाएंगे या ऐसे ही अनुचर-मुद्रा में खड़े रहेंगे?

Saturday, January 2, 2021

लौट गया घर सांस-फ़क़ीरा


पंकज शर्मा

December 26, 2020

 

मुझे लगता है कि मोतीलाल वोरा जी को भी 48 बरस की अपनी कांग्रेसी सियासत में कई बार आत्मरक्षात्मक चतुराई से ज़रूर काम लेना पड़ा होगा, मगर उन्होंने जो कुछ हासिल किया, कुल मिला कर अपनी भलमनसाहत के चलते किया। मैं उन्हें सब मिला कर चार दशक तक दूर-पास से देखने के बाद इतना तो ज़रूर कहूंगा कि वे प्रपंची नहीं थे, वे छली नहीं थे और राजनीति के बीहड़-वन में उन्होंने अपने लिए एक पवनार-कुटिया बना रखी थी।

 

इसीलिए जिस सियासी भड़भड़ में अच्छे-अच्छे भी चूं बोल जाते हैं, वोरा जी तिरानबे पूरे करने तक भी पूरी तरह टिके रहे। पिछले तीन-चार साल में उनके शरीर ने थकान के संकेत देना ज़रूर शुरू कर दिया था, मगर उनके सभी मस्तिष्क-तंतु एकदम सिलसिलेवार थे, सटीक थे और वे स्मृतियों का अद्भुत संग्रहालय थे। उनकी अलविदाई का दर्द तो स्वाभाविक है, मगर इस बात का सुख भी है कि ईश्वर ऐसी रुख़सत बिरलों को ही देता है।

 

उनका जाना कांग्रेस ही नहीं, भारतीय राजनीति की, अभिभावक परंपरा की, अब इक्का-दुक्का बची, अंतिम मीनारों में से एक और का ढह जाना है। आजकल जो जितने भव्य कमरे में क़ैद हो कर बाहर जितने ज़्यादा पहरेदार खड़े कर लेता है, वह उतना ही कद्दावार लगने लगता है। इस हिसाब से वोरा जी का तो कोई कद था ही नहीं। मगर जिन्होंने भारतीय राजनीति की असली चौपालें देखी हैं, वे समझ सकते हैं कि बौनों के वर्तमान देश में वोरा जी सरीखे गुलीवरों की अहमियत क्या होती है। उनकी अनुपस्थिति से उपजी विपन्नता का अहसास हमारी सियासत के क्षितिज पर हमेशा अमिट रहेगा।

 

राजनीतिक होड़ की दौड़ के चलते कई अतिमहत्वाकांक्षी कांग्रेसियों को मैं ने वोरा जी की बेहद साधारण और संघर्ष भरी आरंभिक पृष्ठभूमि का मखौल बनाते कई बार सुना। अपने अंगने में आम-जन के प्रवेश पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले कुलीनों से लबालब भरी सियासत का पतनाला खुद के कपड़े गंदे किए बगै़र पार कर जाना आसान नहीं होता है। वोरा जी ने यह मुश्क़िल काम कर के दिखलाया। आपने भी बड़े-बड़े दलिद्दरों को छोटे-मोटे सिंहासन मिलते ही अभिजात्य होते देखा होगा। मगर वोरा जी ऐसों का ठोस-विलोम थे।

 

वोरा जी 52 बरस पहले दुर्ग की नगरपालिका के पार्षद बने थे। फिर मंत्री बने, मुख्यमंत्री बने, केंद्रीय मंत्री बने, राज्यपाल बने और 18 साल तक कांग्रेस जैसी पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे, मगर अपना काम उसी पार्षद-भाव से करते रहे। निष्ठावान थे, मगर चापलूस नहीं। विनम्र थे, मगर कायर नहीं। सहज थे, मगर चूं-चूं का मुरब्बा नहीं। बुद्ध थे, मगर बुद्धू नहीं। उनके पास समस्याओं के समाधान की काफी लंबी डोर हुआ करती थी। मगर समय आने पर वे जब दृढ़ हो जाते थे तो कोई उन्हें अपनी आन से डिगा नहीं सकता था।

 

ऐसे बहुत-से मौक़े आए, जब कइयों की हद से बाहर जाने वाली हरकतें वे ख़ामोशी से महीनों नहीं, बरसों झेलते रहते थे और जब-जब मैं कहता कि फ़ैसला लेने में हिचक क्यों रहे हैं तो कहते कि पंडित जी, कच्चे फोड़े का ऑपरेशन नहीं किया जाता। पूरा पकने दो पहले। और, मैं ने बहुत बार देखा कि वक़्त आने पर अच्छे-ख़ासे तुर्रमखानों का उन्होंने कैसे इलाज़ किया। वोरा जी से संपर्क-संबंधों का कैनवस अनंत-सा लगता है। इस पर पता नहीं कितने चटख, धूसर और म्लांत रंग बिखरे हुए हैं। वे परंपरावादी थे, लेकिन दकियानूसी नहीं। अपने को परिस्थितियों के मुताबिक़ और परिस्थितियों को अपने मुताबिक़ ढाल लेने की गोपनीय विद्या जानते थे।

 

पिछले कुछ बरस से देश की राजनीति के ज़िक्र होने पर उनके चेहरे पर असहाय मुस्कान जाया करती थी। कांग्रेस की भीतरी स्थितियों पर फ़िक्र की लकीरें उनकी पेशानी पर मैं ने कई बार देखीं, मगर उम्मीदों का झरना भी उनके अंदर समान गति से बहता रहता था। संस्मरण सुनाते रहते थे, लेकिन आत्मकथा लिखने को कभी तैयार नहीं हुए। अपने को अकिंचन बता कर यह बात टाल देते थे। कहते थे, छोड़ो, कौन पढ़ेगा? मैं हूं ही क्या? सोचता हूं, वोरा जी की तरह मन को मीरा और तन को कबीर बना लेने वाले कितने लोग आज के सियासी संसार में होंगे?

 

इस साल जून के महीने का दूसरा सोमवार था। मैं दोपहर सवा दो-ढाई बजे कांग्रेस मुख्यालय पहुंचा तो देखा वोरा जी अपने कमरे में अकेले बैठे हैं। कोरोना से सारी सड़कें और मैदान खाली थे। मगर वोरा जी हफ़्ते में दो-तीन दिन एआईसीसी आए बिना नहीं रहते थे। उस दिन की बातचीत में लगा कि वोरा जी ऊपर से ठहराव दिखा रहे हैं, मगर भीतर कुछ बेचैनी है। राज्यसभा का उनका कार्यकाल ख़त्म हो चुका था। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त हो गए थे। प्रशासन के प्रभारी महासचिव भर थे। बहुत देर की बातचीत के बाद मैं ने कहा कि आज आप कुछ परेशान से लग रहे हैं। बोले, अरे नहीं। अपने को क्या परेशानी? लोदी एस्टेट का घर खाली करना है, सामान पैक कराने में लगा हूं, तो थोड़ी थकान-सी हो गई है।

 

फिर बताने लगे कि जब मुख्यमंत्री था तो सब ने कहा कि भोपाल में एक मकान तो बनवा लो। मगर मैं ने कहा कि क्या करना है? दिल्ली रहा तो सब ने कहा कि यहां मकान ले लो। मैं ने कहा कि क्या करना है? रायपुर तक में अपना मकान नहीं बनवाया। अब दिल्ली में तो कोई काम मेरे लिए है नहीं। कुछ मुकदमों में फंसा हुआ हूं, बस। अब रायपुर चला जाऊंगा। वहां पूर्व मुख्यमंत्री के नाते सरकारी मकान मिल जाएगा। बचा-खुचा जीवन गुज़र जाएगा। नहीं तो दुर्ग जा कर रह लूंगा।

 

मेरा मन थोड़ा भारी हो गया। चार-छह दिनों बाद मैं अहमद पटेल जी के पास गया। उन्हें वोरा जी की चिंता बताई। कहा कि वे शायद अपने मुंह से नहीं कहेंगे, लेकिन उन्हें फ़िक्र है कि अब कहां रहेंगे। बाद में अहमद भाई वोरा जी से मिलने गए। अपने नाम से अतिथि-आवास आवंटित करा कर वोरा जी को दिया। लहीम-शहीम बंगले से निकल कर वोरा जी 7-साउथ एवेन्यू के छोटे-से भूतल फ्लैट में गए। अगस्त के पहले शनिवार की शाम मैं अहमद भाई से मिलने गया तो आधा वक़्त वे वोरा जी के परिश्रम और समर्पण की ही कहानियां सुनाते रहे।

 

अगस्त के ही अंतिम बुधवार को वोरा जी से मेरी अंतिम निजी मुलाक़ात हुई। सुबह साढ़े ग्यारह बजे मैं साउथ एवेन्यू गया। चाय पीने के बाद तम्बाकू वाला अपना पान खाया और मुझे बिना तम्बाकू वाला खिलाया। इधर-उधर की पता नहीं कितनी बातें कीं। हंसते रहे और बोले कि पंडित जी, जीवन ने सारे रंग दिखाए हैं। बताया कि किस तरह जो लोग आगे-पीछे घूमते थे अब मिलने तक नहीं आते हैं। कुछेक बड़े नामों के ताजा व्यवहार का ज़िक्र किया।

 

सालासार बालाजी से 51 किलोमीटर दूर निंबी जोधा गांव से चल कर वोरा जी कहां-कहां से गुज़रते हुए हमारे बीच से चले गए। कोई दस साल पहले बिग बाज़ार और फ्यूचर ग्रुप के मालिक किशोर बियानी ने अपने आलीशान दफ़्तर में शीशे के गिलास में चाय में बिस्कुट डुबा कर पीते-पिलाते मुझे बताया था कि उनका परिवार राजस्थान में लांडनू के पास उसी निंबा जोधा से बंबई आया था, जहांआपके वोरा जीजन्मे हैं। तब बियानी जी ने उस गांव का इतिहास बताया था कि कैसे 16वीं सदी में सबसे पहले जोधा राजपूत और निंबोजी बोहरा समुदाय के लोग वहां कर बसे थे।

 

उस मिलीजुली तहज़ीब से निकला एक सांस-फ़कीरा यह फ़ानी दुनिया छोड़ कर अंततः अपने घर लौट गया। ओम शांतिः!