Saturday, May 2, 2020

ढपोरशंखी व्यवस्था से उकताहट का दौर


राष्ट्रीय नज़रबंदी में कल के बाद हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को कुछ-न-कुछ राहत तो इसलिए देनी पडेगी कि बिना ठीक-ठाक तैयारी के उठाए गए इस क़दम ने देश को अजब-गज़ब हालात में फंसा दिया है। घर के सारे बल्ब एकबारग़ी बदल डालने की उनकी हसरत बीच-बीच में ऐसा ज़ोर पकड़ती है कि वे रात को आठ-नौ बजे छोटे परदे पर नमूदार होते हैं और एक बड़े फ़ैसले का ताबड़तोड़ ऐलान कर डालते हैं। पहले वे ज़्यादा सोचे-समझे एक चक्रव्यूह में पूरे मुल्क़ को घुसा देते हैं और फिर जब उन्हें लगता है कि मामला ज़रा ज़्यादा ही गड़बड़ हो गया है तो उस से निकलने की रंग-बिरंगी जुगत भिड़ाते हैं।
यही नरेंद्र भाई ने साढ़े तीन बरस पहले नोटबंदी कर के किया था। किसी ने समझा दिया कि पिछली सरकारों में भाग्यविधाता बने बैठे सियासी-मुस्टंडों ने नोटों के गोदाम बना रखे हैं। किसी ने बता दिया कि कइयों ने तो ट्रक भर-भर कर नोट पास-पड़ोस के देशों तक में भेज रखे हैं। बस, काले धन को बाहर निकालने का नारा बुलंद कर नरेंद्र भाई ने ऐसा हल्ला बोला कि भारतीय अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ गया। एक भी काली छदाम बैंकों में वापस नहीं आई। नकली नोटों से निज़ात नहीं मिली। लोग अपने ही पैसे की भिक्षा मांगते-मांगते क़तारों में मर गए। लेकिन सब की ज़ुबान पर देशभक्ति का ऐसा ताला जड़ दिया गया कि जो मुंह खोले, देशद्रोही बन जाए। सो, अपनी देशभक्ति कौन दांव पर लगाए?
अब यह विषाणु आ गया। कैसे आया, कौन लाया–इसे या तो रहस्यलोक के मालिक शी जिनपिंग जानते होंगे या इंद्रलोक के देवता डोनाल्ड ट्रंप। नरेंद्र भाई ने गुजरात बुला कर ट्रप को नमस्ते करने के बाद अखिल भारतीय तालाबंदी का फ़रमान ज़ारी कर दिया। यह बहुत बड़ा काम था। चूंकि हमारे प्रधानमंत्री छोटे-मोटे काम भी किसी और पर नहीं छोड़ते हैं तो यह घोषणा तो उन्हें ख़ुद परदे पर आ कर करनी ही थी। छह साल में जब-जब ज़रूरत पड़ी, देशवासियों ने अपने प्रधानमंत्री का साथ दिया है। इस बार तो देशभक्ति इसलिए भी गहरी हो गई कि हम सभी को अपने प्राणों की फ़िक्र भी लग गई। जब आपको यह बता दिया जाए कि घर से बाहर निकले नहीं कि मरे तो कौन ड्योढ़ी लांघेगा? अगर ऊपर से देश के दिमाग़ में यह भी भर दिया जाए कि जो बाहर घूम रहा है, वह ख़ुद मरे-न-मरे, अपने विषाणु से आपको ज़रूर मार देगा तो फिर सरकारी डंडे से ज्यादा मजबूत तो आपके पड़ोसी का लट्ठ हो ही जाएगा।
तो अपने प्राणों की चिंता को लेकर भीतर से बेतरह भयभीत देश ने मजबूर मुस्कान के साथ ताली बजाई, थाली बजाई, दीया जलाया, मोमबत्ती जलाई। यह सोच कर सब किया कि एक बार इस विषाणु की लाई मुसीबत से जान तो छूटे। अब सवा महीने बाद सवा अरब के देश में क़रीब 35 हज़ार लोगों के ज़िस्म में विषाणु होने की बात हमारी सरकार हमें बता रही है और यह भी कि क़रीब 1200 लोग अब तक इससे अपनी जान गंवा चुके हैं। सरकार ने ही हमें यह भी बताया है कि देश के 300 ज़िले पूरी तरह कोरोना-मुक्त हैं और क़रीब 200 ज़िलों में कोरोना का एक भी दागी-स्थल यानी हॉटस्पॉट नहीं है। देश में कुल तक़रीबन 750 ज़िले हैं। तो क्या हम यह मानें कि उनमें से सिर्फ़ 250 ही ऐसे हैं, जहां कोरोना-प्रकोप है। तो फिर पूरा मुल्क़ क्यों ठप्प पड़ा है?
चलिए, मैं यह मान लेता हूं कि नरेंद्र भाई न होते तो यह विषाणु सारे-के-सारे ज़िलों की गर्दन पर सवार होता। यह तो प्रधानमंत्री का ही पराक्रम था कि उन्होंने कोरोना का गला शुरू में ही पकड़ लिया। उसे ऐसे न दबोचते तो अब तक तो पता नहीं भारत की कितनी आबादी साफ हो गई होती। आख़िर पूरी दुनिया में ढाई लाख लोग इससे मर ही गए ना! अकेले अमेरिका में 65 हज़ार की जान गई है। एक अमेरिकी तो वैसे भी सवा क्या, ढाई लाख के बराबर होता है। अब इससे क्या होता है कि अमेरिका में हर साल क़रीब तीस लाख लोग मरते हैं; कि वहां मृत्यु-दर कम नहीं हो रही, हर साल बढ़ रही है; कि मरने वालों में एक चौथाई दिल की बीमारियों से मरते हैं; कि बीस फ़ीसदी केंसर की वजह से मरते हैं; और, डेढ़-पौने दो लाख लोग सांस संबंधी रोगों से प्राण गंवाते हैं। मगर 33 करोड़ की आबादी के सबसे सुविधा-संपन्न और शक्तिशाली देश अमेरिका के बारे में यह इस तरह के कुतर्कों का वक़्त नहीं है। वहां भी अगर दादा-ट्रंप न होते तो पता नहीं क्या हाल होता!
यह बात तो हमारे नरेंद्र भाई भी हमें बता चुके हैं कि चिकित्सा सुविधाओं के मामले में अमेरिका के सामने भला हमारी क्या हैसियत? जब घरों में बंद रहने के बावजूद वहां विषाणु ने इतनों को निपटा दिया तो हम अगर घर से बाहर निकले तो सोच लीजिए कि कैसी तबाही आ सकती है? कोरोना को जाने दीजिए भाड़ में, भारत से हर साल वैसे भी 97-98 लाख लोग बैकुंठ धाम जाते हैं। मौत जब आती है तो बहाना तो कुछ-न-कुछ बन ही जाता है। ख़स्ताहाल चिकित्सा सहूलियतों वाले भारत की आबादी अमेरिका से तो चार गुनी है। बावजूद इसके स्वर्गवासी होने वालों की सालाना तादाद तो अमेरिका से चार गुनी नहीं है। यानी कोकिलाबेन, मेदांता और अपोलो के लिए पैसे न होने के बावजूद और एम्स के लिए सिफ़ारिशी चिट्ठी को तरसते हम भारतीय, अपने बूते पर ज़िंदा रहने के मामले में, अमेरिकियों से तो लाख दर्ज़े बेहतर हैं। अमेरिका को वहां की सरकारों ने अगर लालटेनी अस्पतालों और झोला-डॉक्टरों के भरोसे छोड़ दिया होता तो उसे तो तैंतीस करोड़ तक पहुंचने में भी अभी तैंतीस साल और लग जाते।
इसलिए हमें सावधान रहने की ज़रूरत तो है, मगर अमेरिका और इटली की तरफ़ देख कर थर-थर कांपने की कोई ज़रूरत नहीं है। आधे हिंदुस्तान में जब एक-एक कमरे में पांच-पांच सात-सात लोग भरे पड़े हैं तो शारीरिक दूरी के किस गणित से आप कोरोना को हराने की बात कर रहे हैं? खुले में एक-दूसरे से पचास-पचास फुट दूर घूमने वालों के सिर पर ड्रोन लहरा कर उन्हें फिर अपनी कोठरी में अगल-बगल बैठने के लिए भेज देने से कोरोना कैसे भागेगा? कोरोना क्या बसें न चलने से भागेगा? रेलें थमने से भागेगा? हवाई जहाज खड़े कर देने से भागेगा? दुकानें-कारखाने बंद कर देने से भागेगा? पूरी धरती को ऐसे ठप्प कर कोरोना को भगा भी लिया तो उस धरती का आप करेंगे क्या?
सो, कोरोना से तो खेतों, कारखानों, दफ़्तरों और दुकानों में काम करते हुए लड़ना होगा। इस लड़ाई का कोई नक्शा हो तो बताइए, नरेंद्र भाई! आफ़त आती देख कर दरवाज़े बंद कर घरों में घुस जाना तो सब से आसान लगता है। लेकिन वह मुसीबत का समाधान नहीं है। घरों के दरवाज़े अनंत काल तक बंद नहीं रह सकते। मैं मानता हूं कि आप से तो कभी कोई ग़लती हो ही नहीं सकती और जानता हूं कि ग़लतियों की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति की हिम्मत बिरलों में ही होती है। ग़लतियों पर अड़े रहने वाले पराक्रमियों के किस्से भी हम ने बहुत सुने हैं। अब तो सब ने मान लिया है कि आप हैं तो देश बच गया। मगर अब इस नज़रबंदी की रस्सी खोलने का ठोस तरीका जल्दी खोजिए। ढपोरशंखी बातों के दिन अब गए!

Gangland of testing kit hijackers


GII
29 April 2020

PANKAJ SHARMA


Rahul Gandhi tweeted at 1.22 PM on Monday, 27 April 2020 an article published by Business Today exposing 145% profiteering in coronavirus rapid test kits sold to Indian Council of Medical Research (ICMR) and said “That any human being would try and profiteer from the immeasurable suffering of millions of his brothers and sisters, is beyond belief and comprehension. This scam is an insult to every Indian. I urge the PM to act swiftly to bring the corrupt to justice”.

          SARS CoV-2 Antibody test kits are being imported from China's Wondfo Biotech by India’s Matrix Labs. The original price of the kits is US $ 3 per test. Its landed price, including air freight of Rs 20 to importer is Rs 245 per test. Matrix Labs sold it to distributor Rare Metabolics Life Sciences at Rs 400 per test, charging a profit of Rs 155 per test. The distributor kept a profit of Rs 200 per test in its pocket and supplied the kits to ICMR for Rs 600 each. ICMR placed an order to buy 5 lakh kits on March 27 at Rs 600 plus GST per test.

Rare Metabolics delivered 2.76 lakh kits to ICMR; remaining 2.24 lakh are facing a payment dispute. Rare Metabolics intends to sell 1 million kits; order was placed with Matrix for 5 lakh kits. Matrix Labs has an order to supply 50,000 kits to Tamil Nadu also through dealer Shan Biotech and Diagnostics at Rs 600 per test. Of this, 24,000 have already been supplied; 26,000 more are yet to be delivered.

A legal dispute in Delhi High Court between the distributor and importer unearthed massive profiteering and over-pricing in kits sold to ICMR. Observing that 61 per cent mark-up on such test kits is on the "higher side" but "more than sufficient", the Delhi High Court single bench of Justice Najmi Waziri disallowed a 145% mark-up from landed price of Rs 245 to ICMR's purchase price of Rs 600 per test. Instead, Justice Waziri slashed price for every kit by 33 per cent from Rs 600 to Rs 400 per test. The order was against a petition by Rare Metabolics, the sole distributor of test kits imported by Matrix Labs.

The dispute was over release of the remaining 2.24 lakh kits--of the 5 lakh imported from China--to be sent to ICMR. Importer Matrix Labs had argued that it had only been paid Rs 12.25 crore of the Rs Rs 21 crore import. As per the agreement, the balance amount of Rs. 8.25 crores had to be first paid to the importer before any monies received from ICMR. Rare Metabolics filed a petition before the Delhi High Court seeking release of the remaining 2.24 lakh test kits so that they can be supplied to ICMR as per the agreement. The petitioner argued that under its bi-partite agreement with Matrix Labs, no other company can market them in India. The company also said that it has already paid Rs 12.75 crore, which cover the freight cost for 5 lakh test kits. Rare Metabolics assured that payment due to Matrix Labs will be remitted as soon as it is received.

Dispute arose after Matrix Labs demanded upfront payment, whereas the petitioner maintained that the payment could only be made after ICMR released the funds. The petitioner informed the court that the consignment of 2.76 lakh rapid antibody tests has already been supplied to ICMR for which payment is still awaited. This payment will be made after the tests meet ICMR's standards. ICMR has put the rapid tests on hold after detecting faulty results from the Wondo kits. The Chinese firm has denied that the kits are faulty.

The importing outfit Matrix Labs is located at Chennai’s Lakshmikanthammal Street, Mahalakshmi Nagar, Rajiv Nagar, Poonamallee. The firm was established in 2012 and claims to be a leading In-Vitro diagnostic company, offering Immunology, Microbiology services in India. It also asserts that it’s most lead generating products are Covid-19 detection test kit, Optical Coagulation Analyzer (OCG-102), H-8 Haemoglobin Analyzer, Finecare FIA Meter, i15 Blood Analyzer and fully automated feces analyzer. Matrix Labs currently employs only around 50 employees. One Suresh is the Chief Executive of this firm.

One Suresh is also the director of Chennai based Matrix Labs Private Limited which is owned with him by another 4 persons. They are Seyed Ahamed, Revannath Bhujangrao Patil, Kulandaivel Padmanathan and Benny Joseph. This company was incorporated about six and a half years back, nearly one and a half year after the Matrix firm, in January 2014 with an authorized share capital of only Rs. Five lac and an equal paid up capital of similar amount. The company is involved in Manufacture of medical appliances and instruments and appliances for measuring, checking, testing, navigating and other purposes except optical instruments. The office of Matrix Labs is at 7, Srinivas Nagar, Main Road, Bhaggiyathammal Nagar, Moggappair, Padi, Chennai.

The distributing outfit Rare Metabolics Life-sciences Private Limited is based at New Delhi. It is owned by one Kripa Shankar Gupta and Shobha Data. The company was formed in May 2015 with only Rs One Lac as its authorised capital and Rs One Lac as paid up share capital. Manufacture of basic chemicals is the primary job of this company. The office of the distributing company is at B-8, Bandhu Vihar Apartments, Plot 11 in Sector 10 of Dwarka.

It would be interesting to know that why Kripa Shankar Gupta’s company was appointed the sole distributor for Indian territory to supply the testing kits? Gupta is equipped with a degree of MD in Pharmacology. He claims to have over 15 years of experience with in-depth understanding of Indian pharmaceutical and healthcare System. He has been working for some multinationals for the access of their new drugs to India.

Gupta has ventured into dental field also by establishing rare dentistry to bring the CBCT machines. He also established the advanced CAD /CAM centre for dentistry in North India. Gupta loves to call himself ‘a passionate Medi-preneur with deep understanding of Indian health landscape and ability to innovate new health programs in public and private health’. He co-owns Pegasys Life Sciences Private Limited with one Akhilesh Raj Rastogi. This company has its office in the outskirts of National Capital Region’s (NCR) Indirapuram, which is technically in Ghaziabad, Uttar Pradesh. C-437, Gaur Green Avenue, Abhaykhand-2 is the headquarters of this company which is established with an authorised share capital of Rs One Lac and an equal paid up capital.

Now one very underlining fact about the Chinese company which is the primary source of the imports of these testing kits. Shares of this Guangzhou based company—Wondfo Biotech have gained more than 40% this year after corona pandemic began in Wuhan. Ms. Wang Jihua is the chairman of Wondfo. Her husband Li Wenmei is the president of the company. Wondfo was founded 28 years back, in 1992. Li only has an undergraduate degree from Jilin University. He has an important place on the board of China Narcotics Control Foundation. He is also associated with South China University of Technology.

Li and Wang both have attained the age of 58 and control the assets worth billions of dollars.  Their company Wondfo owns one overseas lab in San Diego with one branch in Chicago. It has another eleven overseas offices with sales network in more than 120 countries with around 2500 employees. There function 42 companies under the corporate umbrella of Wonfo Biotech Company Limited.

It is yet to be seen that what steps the government will take against the plunderers involved in the supply of testing kits.

§   

इतना छिछोरा तो प्रचंड भंडारी भी नहीं था


परसों-तरसों जब मैं ने शक़्ल-पुस्तिका की अपनी दीवार (फेसबुक वॉल) पर यह इबारत लिखी कि ‘‘इतना छिछोरा तो प्रचंड भंडारी भी नहीं था। तू तो पत्रकारिता का कलंक है एकदम।’’ तो मुझे मालूम था कि यह तो कोई नहीं पूछेगा कि यह कलंक कौन है, क्योंकि सब जानते हैं। मगर मैं सोच रहा था कि कोई तो यह पूछेगा कि यह प्रचंड भंडारी कौन था? लेकिन लगता है, जैसे पूरी दुनिया उसे जानती है। किसी ने पूछा ही नहीं। इसलिए ख़ुद ही बता रहा हूं।
उसका असली नाम बृजमोहन भंडारी जैसा कुछ रहा होगा, क्योंकि वह बी. एम. भंडारी के नाम से जाना जाता था। टेब्लॉइड यानी गुटका-अख़बारों का तब देश में प्रचलन ज़्यादा नहीं था। ‘ब्लिट्ज’ निकलता था और बाद में ‘करंट’ निकला। भंडारी ने तब इंदौर से ‘प्रचंड’ निकाला। वह ख़ुद ही संपादक था, ख़ुद ही प्रकाशक और ख़ुद ही मुद्रक। बाद में उसने दिल्ली के पहाड़गंज में अपने अख़बार का दफ़्तर खोल दिया। एक छत पर दो कमरे थे। एक में दफ़्तर था, दूसरे में भंडारी अपनी पत्नी के साथ रहता था।
भंडारी कहां तक पढ़ा था, किसी को पता नहीं। इतना ज़रूर सब जानते थे कि वह चार अक्षर भी ख़ुद नहीं लिख पाता था। लेकिन उसके दिमाग़ में ख़बरों का अंबार रहता था। वह ठीक-ठाक लिख लेने वालों को पकडता, ख़बरें उन्हें बयां करता, भैया-दादा करता, थोड़ा पारिश्रमिक भी देता और समाचार-कथाएं लिखवा लिया करता था। ‘प्रचंड’ इसलिए ‘प्रचंड’ था कि भंडारी कब, क्यों और कौन-सी ख़बर छाप देगा, किसी को दूर-दूर तक भी इसका अंदाज़ नहीं रहता था। ख़बरों की सौदागिरी में वह आहिस्ता-आहिस्ता माहिर हो गया था।
भंडारी के अख़बार में आमतौर पर ‘शाजापुर में डॉक्टर नर्स को लेकर भाग गया’ और ‘नागदा में भैंस कुएं में गिर गई’ जैसी ख़बरें छपा करती थीं। उसके हॉकर ऐसी ख़बरों के रसीले शीर्षक चिल्ला-चिल्ला कर कस्बे-कस्बे ‘प्रचंड’ बेचा करते थे। चालीस साल पहले मध्यप्रदेश का तो कोई ऐसा नेता-अफ़सर नहीं था, जो भंडारी को नहीं जानता था। पत्रकार बिरादरी में तो वह अपनी पीत-पत्रकारिता को लेकर तरह-तरह की चर्चाओं के केंद्र में रहता ही था। संसद की पत्रकार-दीर्घा में कोई और रोज़ आए-न-आए, भंडारी ज़रूर मौजूद रहता था।
फिर एक दिन ऐसा हुआ कि भंडारी रातों-रात ‘पत्रकारीय स्वतंत्रता’ और ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का, कुछ दिनों के लिए, प्रतीक-पुरुष बन गया। हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री के बारे में एक रसीली और चटखारेदार ख़बर कुछ तस्वीरों सहित भंडारी ने अपने ‘प्रचंड’ में छाप दी। इधर शाम को अखबार आया और उधर अगले दिन का सूरज उगने से पहले ही कुछ लोग भंडारी को उसके घर से लुगी-बनियान में ही उठा कर एक जीप में डाल कर ले गए। उसने लाख मिन्नतें कीं कि पैंट-कमीज़ तो पहन लेने दें, मगर कौन सुनता?
जैसे-जैसे सूरज चढ़ा, भंडारी के गायब होने की ख़बर पत्रकार-बिरादरी में पसरने लगी। जैसा भी था, था तो वह पत्रकार ही। ‘प्रचंड’ निकालता था तो क्या? सो, मन से, ना-मन से या अधूरे मन से सब इस पर एकमत थे कि बाकी सब बातें बाद में, अभी तो सबसे पहले ‘समाचार-जगत की आज़ादी’ की रक्षा करनी है। भंडारी को ले जाने वाले चूंकि सादे कपड़ों में थे तो पहले तो यही पता करना मुसीबत थी कि उसे ले कौन गया? उस जैसे बहुधंधी को कौन, कब, किस वज़ह से उठा ले जाए; कहना मुश्क़िल था।
शाम होते-होते मुख्यमंत्री वाली ख़बर से भंडारी की ग़ुमशुदगी का नाता जुड़ गया। मुख्यमंत्री की शोहरत में हर तरह के चांद जड़े थे। सो, बोरे में बंद कर के धुनाई तो बहुत ही मामूली आशंका थी। सो, पत्रकारीय स्वतंत्रता की हर कीमत पर रक्षा के लिए जन्मे हम सरीखे पत्रकार एक केंद्रीय मंत्री के घर की तरफ़ दौड़े। केंद्रीय मंत्री भी मध्यप्रदेश के थे। वे मामूली दिग्गज नहीं थे। उनके जलवों की शोहरत के सामने भंडारी को उठवा लेने वाले मुख्यमंत्री भी नन्हा-मुन्ना राही थे।
केंद्रीय मंत्री जी ने अपने सहायक से मुख्यमंत्री को फ़ोन लगाने को कहा। फिर हम सबकी तरफ़ मुख़ातिब हो कर बोले, ‘इतना ही वादा कर सकता हूं कि अगर अभी तक ज़िंदा होगा तो वापस बुलवा दूंगा’। सब हक्का-बक्का थे। मोबाइल तब होते नहीं थे। मुख्यमंत्री अपने दफ़्तर और घर पर थे नहीं। केंद्रीय मंत्री जी ने हम से कहा कि संदेश मिलते ही मुख्यमंत्री संपर्क कर लेंगे और उनसे बात होते ही वे हमें बता देंगे।
लौटते समय सब के कानों में ‘अभी तक ज़िंदा होगा तो…’ की सांय-सांय हो रही थी। सो, तय हुआ कि अगले दिन संसद में मसला उठाने के लिए कुछ सांसदों को राज़ी किया जाए। मध्यप्रदेश के सांसदों से बात की। किसी पत्रकार की आज़ादी पर इस तरह के हमले का उन्होंने भी पुरजोर विरोध करने की शपथ ली। देर रात केंद्रीय मंत्री जी का फ़ोन आ गया कि भंडारी ज़िंदा है और कल-वल आ जाएगा। लेकिन जब सुबह तक उसका कहीं अता-पता नहीं चला तो संसद में भी यह मसला गूंजा।
संसद में तब कोई बात उठ जाती थी तो आज की तरह नहीं था कि किसी के कानों पर जूं भी न रेंगे। शून्य काल में मुद्दा उठते ही बड़ो-बड़ों के दिमाग़ सुन्न पड़ जाते थे। वह तो ऐसा दौर था कि ‘पत्र संपादक के नाम’ स्तंभ में फोन खराब होने की शिक़ायत छपने भर से आपका फोन ठीक हो जाया करता था। सो, दोपहर में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के सेनानी बन चुके भंडारी का मसला संसद में उठा और शाम होते-होते वह हरियाणा के एक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मिल गया। कौन ले गया, क्या हुआ और अस्पताल कैसे पहुंचा–इसका सच्चा किस्सा अपने अख़बार में छापने की हिमाकत भंडारी ने कभी नहीं की।
अंत भला, सो, सब भला! हम सब भी इतने से ही बेहद ख़ुश थे कि समाचार पत्रों की आज़ादी हमने बचा ली थी और भंडारी साबुत लौट आया था। तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। भंडारी का पराक्रम संसद की कार्यवाही में दर्ज़ हो गया। वह चार-छह दिनों के लिए बाल गंगाधर तिलक हो गया। उसका ‘प्रचंड’ गोया ‘केसरी’ हो गया। पत्रकारिता के हम रणबांकुरों को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए था? कुछ दिनों तक ‘आज-कल पांव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे’ वाला माहौल रहा।
अब न भंडारी है और न ‘प्रचंड’। भंडारी पत्रकार था कि नहीं, मालूम नहीं। ‘प्रचंड’ अख़बार था कि नहीं, मालूम नहीं। लेकिन एक बात है कि भंडारी अपने ‘प्रचंड’ में पर्दाफ़ाश जैसा भी करता रहा हो, भाषा की पर्दादारी का उल्लंघन नहीं होने देता था। समाचार-कथाओं का मसाला मुहैया करते वक़्त अपने रसोइयों को वह यह ताईद पहले ही कर देता था कि ख़बर मज़ेदार और सनसनीखेज तो बने, मगर फूहड़ न हो। भंडारी की ख़बरों को आप ख़बर की श्रेणी में रखें-न-रखें, लेकिन उनमें निजी-छिछोरापन नहीं ढूंढ सकते थे। इसलिए भंडारी और जो भी था, पत्रकारिता के पेशे पर वैसा कलंक नहीं था, जैसा होने की होड़ में, आज स्वयं को एक व्यक्ति के बजाय समूचा भारत समझने वाले, भिड़े हुए हैं। ऐसे ही लोगों से पूछता है भारत कि भंडारी से भी गया-गुज़रा होने पर उन्हें लाज नहीं आती? 

Democracy post-corona


GII
21 April 2020

PANKAJ SHARMA


Amidst the coronavirus crisis, India’s leadership so far has shown itself to be up to the task. In a battle against the pandemic India can chart a new course in human history and show to the world that democracy is not a fanciful political system for only the rich nations. Despite certain instinctive dangers to the future democratic fabric, the so-called imperfect, rambunctious and seemingly unworkable democracy of India is acting as the bulwark against a rising tide of authoritarianism and retreat of democracy globally.

But the fact that pandemic is not only wreaking destruction on public health and the global economy but disrupting democracy and governance worldwide cannot be denied. Corona has hit at a time when democracy was already under threat in many places, and it risks exacerbating democratic backsliding and authoritarian consolidation. Therefore, Indian civil society is deeply obligated to be substantially vigilant to ensure that the basic democratic values remain unblemished in post-corona era. The deliberate use of the terms such as chaotic democracies, liberal democracies, responsible democracies, etc are indicative of the motives to reshape the egalitarian governance to suite the wish of the leaders.

Populist and autocratic world leaders were ill-prepared for the pandemic initially. A disdain for science and expertise, combined with nepotism and neglect of state institutions, including health care, made governments such as those of U.S. President Donald Trump, Mexican President Andrés Manuel López Obrador, and Brazilian President Jair Bolsonaro more vulnerable. Before the health crisis became impossible to deny, government propaganda outlets or supportive media in these countries systematically downplayed the dangers posed by the coronavirus. For instance, In the United States, Fox News blamed Democrats for playing up the threat. In Serbia and Turkey, pro-regime media gave voice to pundits and so-called experts who claimed that their populations were genetically protected from infection.

The severe public health emergency of course requires extraordinary measures. But the current pandemic situation also has the potential to impact the democratic governance—such as electoral processes, civilian control of uniformed forces, and civic mobilization—and potentially reset the terms of the global debate on the merits of authoritarianism versus democracy. The pandemic will almost certainly usher in broader effects on governance by overburdening countries’ basic governance functions, taxing their socio-political cohesion, unsettling relations between national and local governments and transforming the role of nonstate actors. Most countries have restricted public gatherings and citizens’ freedom of movement, and more than fifty countries in the world have declared states of emergency.

In India too, measures like closing businesses, enforcing physical distancing which they like to call social distancing, and keeping people off the street, including curfews and bans on gatherings, are needed to control the rapid spread of the coronavirus. But there is a serious risk that these efforts are leading to a new wave of authoritarianism as is evident from the experience in various countries. Some governments in the world are using the crisis to grant themselves more expansive powers than warranted by the health crisis, with insufficient oversight mechanisms, and using their expanded authority to tighten their grip on power. Thus, the pandemic may end up hardening repression in already closed political systems, accelerating democratic backsliding in flawed democracies, and further bolstering executive power in democratic countries.

Illiberal leaders are taking advantage of the crisis to further weaken checks and balances and erode mechanisms of accountability, thereby entrenching their positions of power. In Hungary, a new law allows Prime Minister Viktor Orbán to rule by decree. Furthermore, parliamentary oversight is suspended for the duration of the crisis, with only the prime minister permitted to determine when it will be lifted. The new law introduces draconian fines for spreading fake news and breaking quarantine and curfews, with penalties of up to five years’ imprisonment. In the Philippines, the parliament passed legislation granting President Rodrigo Duterte nearly limitless emergency powers. In Cambodia, a new law would give the government unlimited access to martial power while drastically curtailing citizens’ political rights. Numerous countries have already passed emergency laws or declared states of emergency—a tactic autocrats can use to consolidate power. In Israel, Prime Minister Benjamin Netanyahu has used the emergency to postpone his corruption trial, block parliament from sitting, and grant extraordinary domestic surveillance powers to the internal intelligence agency.

A clear trend of heightened control over free expression and the media, under the guise of fighting “misinformation” about the virus is being seen across the world. The crisis is also accelerating governments’ use of new surveillance technologies. In Israel and South Korea, governments are using smartphone location data to track down citizens who may have been exposed to the virus. In Hong Kong, new arrivals must wear electronic location-tracking wristbands; Singapore does extensive contact tracing and publishes detailed information about each known case. While enhanced surveillance is not per se antidemocratic, the risks for political abuse of these new measures are significant.

What if governments start using the current need to restrict public gatherings as a pretext to crack down on the wave of anti-government protests that have roiled global politics over the past several years? What if these bans stay in place indefinitely? What if they are enforced in discriminatory ways, meaning that opposition protests could be curtailed while progovernment rallies are tolerated or encouraged. Governments now also have a means to ban protests without officially saying so: a shelter-in-place order could be sufficient.

Almost across the globe, the right of freedom of assembly has been severely restricted. There is nothing like free movement in most of the countries. In a number of countries, elections are beginning to be delayed. Voting for the Democratic primary in the United States has been postponed in at least 12 states and territories. In Serbia and North Macedonia, national elections scheduled for April have been postponed. In Britain, local elections scheduled for May have also been postponed.

European countries—including Italy, North Macedonia, Serbia, Spain, and the United Kingdom—have postponed national or local elections. Ethiopia has as well. In the coming months, elections are slated in Burundi, the Dominican Republic, Ivory Coast, Malawi, Mongolia, and elsewhere. Many of these elections may also be postponed. In India also, election for the upper house of the parliament is postponed indefinitely and there are chances that the bye-elections due in few states might also be delayed. Holding elections in the current environment is certainly difficult and even dangerous, but what if depriving people of their right to choose their leaders become a tendency in post-corona world under the garbs of apprehensions of some epidemic of regional nature?

Governments’ emergency responses to the pandemic risk aggravating the already significant trend of shrinking space for civil society in many parts of the world. The pandemic will strain basic socio-political cohesion in many states. The differential effects of the health crisis along key axes—rich versus poor, urban versus rural, region versus region, and citizen versus migrant—may sharpen existing social divides. The pandemic may compound those strains by exacerbating political polarization where it already exists.

Don’t you think that all those who are concerned with democracy’s future must closely monitor the wide-ranging, fast-moving political effects of the pandemic, rapidly devise responses to lessen potential harm, and seize any positive opportunities the crisis may pose in the future? The unfolding global crisis will be coming soon perhaps as even bigger wave of political disruption. Potentially devastating increases in economic inequality, unemployment, debt, and poverty, as well as pressures on the stability of financial institutions, will put enormous strains on governance systems of all types. The probabilities for severe instability in the time to come are clear. This pandemic may lead to a serious decline in democracy around the world. It is crucial that liberal democracies such as India’s show devotion and diligence in upholding the fundamentals of the republic.

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Sunday, April 19, 2020

मुमुक्षु-भवन की खिडकी से दिखता चांद


बचपन से सुनते आ रहे थे कि भैया, मनुष्य बली नहीं होता है, बलवान तो समय होता है; वरना वही अर्जुन थे और वही उनका गांडीव धनुष था, लेकिन भील गापियों को लूट ले गए तो लूट ही ले गए। महाभारत जीतने वाले अर्जुन उसके बाद मुट्ठी भर लुटेरों का भी कुछ नहीं कर पाए। क्यों कि समय जो साथ नहीं था। मगर जब हम क़ायदे की बातें सुनते हैं, तब उन पर ध्यान कहां देते हैं? हमारे शास्त्र, हमारे ऋषि-मुनि, हमारे बुजु़र्ग हम से कहते-कहते थक गए कि तुम कुछ नहीं हो, जो है, समय है, लेकिन हम तो ख़ुद को ही पहलवान मानते रहे। कभी मानने को तैयार ही नहीं हुए कि ख़ुदा मेहरबान है तो गधा भी पहलवान है, कि अल्लाह की मेहरबानी के बिना किसी की क्या बिसात है?
सो, बीस सौ बीस की पहली तिमाही ख़त्म होते-होते ईश्वर की एक ख़ुर्दबीनी-रचना ने पूरी मनुष्य-जाति के छक्के छुड़ा दिए। अब हम हाय अम्मा-हाय अम्मा करते अपने-अपने दालानों में बेचैन-मन लिए टहल रहे हैं। जब मेरे जैसे कई नश्वर मनुष्य-शरीर पृथ्वी पर उगे-ही-उगे होंगे, तब से, आमतौर पर ग़ैर-संजीदा मानी जाने वाली बंबइया फ़िल्में हमें यह संजीदा संदेश देती फिर रही हैं कि ‘किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार’। लेकिन हमें तो हाड़तोड़ मेहनत करने वालों के बीच दस-बीस प्रतिशत के चक्रवृद्धि ब्याज पर अपना पैसा उधार चलाने से ही फ़ुर्सत नहीं थी।
मैं 28 दिनों में ग़ाहे-ब-ग़ाहे ही घर से बाहर गया हूं। हर रोज़ नियम से एकाध दर्जन लोगों को फोन कर उनकी ख़ैर-ख़बर ले लेता हूं। लेकिन इस बीच मेरी जान-पहचान के 28 लोगों ने भी मेरा हाल-चाल नहीं पूछा। जो दो-चार फोन आए, वे उन धंधेबाज़ों के थे, जो चीन और दक्षिण कोरिया वगैरह से आ रहे कोरोना टेस्टिंग किट के लिए बिलकुल उन्हीं प्रस्तावों के साथ बाज़ार खोज रहे हैं, जिन्हें ले कर वे इस महामारी के आगमन से पहले सरकारी सड़क निर्माण और आंगनवाड़ी के मध्याह्न भोजन आपूर्ति की बाज़ारू गलियों में घूमा करते थे। मुझे उन से यह कहते-कहते रुलाई छूटने लगी कि ज़्यादा तो नहीं, पचास-पच्चीस किट के निःशुल्क वितरण में अपनी भागीदारी तो मैं करने को तैयार हूं, लेकिन आपके इस नए धंधे में योगदान का पुण्य कमाना मेरे बस का नहीं है।
तो जिन्हें कोरोना की घूरती आंखें आज भी यह याद नहीं दिला रहीं कि ‘आदमी को चाहिए कि वक़्त से डर कर रहे’, वे कोरोना के पीठ फेरते ही फिर से क्या-क्या नहीं करेंगे? साहिर लुधियानवी की लिखी और मुहम्मद रफ़ी की गाई पंक्तियों पर पचपन साल से अपनी मुद्रा दार्शनिक बना कर बैठ जाने वाले दसरअसल आज भी यह कहां मानने को तैयार हैं कि ‘वक़्त की हर शै ग़ुलाम, वक़्त का हर शै पे नाम; वक़्त की ठोकर में है, क्या हुकूमत, क्या समाज; वक़्त की पाबंद हैं, आती-ताजी रौनकें…’। ये वे लोग हैं, जिन्हें श्मशान के दुःखों से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें तो लकड़ी की अपनी टाल का मुनाफ़ा देखना है। अंतिम संस्कार की लकड़ियों का वज़न बढ़ाने के लिए उन्हें गीला करने में भी जिन्हें पाप नहीं लगता।
मेरी पीढ़ी के जिन लोगों के भाग्य में अपने धर्म-ग्रंथों को पढ़ना नहीं लिखा था, वे भी अपने कानों से टकराते बंबइया गीतों की लहरियों को तो परे नहीं धकेल पाए होंगे! वेद-पुराण के श्लोकों से न सही, मानस की चौपाइयां से न सही, हमारे फ़िल्मी गीतों से तो उन्होंने इतना सीखा ही होगा कि ’इक दिन बिक जाएंगे माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल’। उन्हें इतना तो मालूम ही होगा कि ‘ज़िंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है’। वे इतना तो जानते ही हैं कि ‘यहां कल क्या हो, किसने जाना’। सो, मेरी पीढ़ी के लोगों को तो हमारे फ़िल्मी गीतकार तक बताते आ रहे हैं कि ‘चल अकेला’ क्यों कि ‘यहां पूरा खेल अभी जीवन का तू ने कहां है खेला’। अगर उन्हीं की सुन ली होती तो बिछौना धरती को कर के आकाश ओढ़ने की यह नौबत शायद न आती। इसलिए आज भी चाहें तो हम यह सोच कर तसल्ली कर सकते हैं कि ज़िंदगी की यही रीत है, हार के बाद ही जीत है।
मुझे लगता है कि जैसे प्राणी का प्रारब्ध होता है, वैसे ही देशों का भी प्रारब्ध होता होगा, वैसे ही आकाशगगा के ग्रहों का भी प्रारब्ध होता होगा। अगर ऐसा है तो आकाशगंगाओं का भी अपना प्रारब्ध होता होगा। प्रलय-निर्माण-प्रलय-निर्माण की यह अनवरत प्रक्रिया ब्रह्मांड में मौजूद है तो सब के भाग्य एक-दूसरे से नत्थी हैं। राजा का भाग्य प्रजा से और प्रजा का भाग्य भी राजा से ज़रूर जुड़ा है। ‘यथा राजा-तथा प्रजा’ अगर सही है तो ‘यथा प्रजा-तथा राजा’ का सिद्धांत भी तो कहीं अस्तित्व रखता होगा!
शांति पर्व में भीष्म ने कहा है कि ‘राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः’। राष्ट्र द्वारा किए पाप को राजा भोगता है। इसी शाति पर्व में ’कुराजराज्येन कृतः प्रजासुखं’ की बात भी कही गई है। यानी दुष्ट राजा के राज में प्रजा भला कैसे सुखी रह सकती है? ‘राज्ञि धर्मणि धर्मिष्ठाः’ के सिद्धांत को हमारे पूर्वजों ने कुछ सोच कर ही जन्म दिया होगा। वे जानते थे कि जगत में पुण्य और पाप का प्रवर्तक हमेशा राजा ही होगा। इसलिए उन्होंने यह भी हमें तभी बता दिया था कि ‘नित्योद्विग्नाःप्रजा यस्य करभारप्रपीड़िताः; अनर्थेर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम्’। जिस राजा की प्रजा सर्वदा पीड़ित हो कर उद्विग्न रहती है और तरह-तरह के अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभव को प्राप्त होता है।
इसलिए क्या वे दिन अब आ गए हैं कि प्रजा अपने को बदले? इसलिए क्या वे दिन अब आ गए हैं कि प्रजा अपने राजा को भी बदले? जैसे प्रजा जब अपनी आदतें नहीं बदलती तो राजा उसकी आदतें बदलने के लिए हरसंभव क़दम उठाता है, क्या वैसे ही जब राजा अपनी आदतें न बदले तो प्रजा को भी राजा की आदतें बदलने के लिए हरसंभव क़दम उठाने चाहिए? इस विषाणु-दौर ने हमें बहुत-कुछ सोचने पर मजबूर किया है। अमृत के पहले विष ही निकलता है। आज के मंथन-युग का विषाणु भी क्या इसलिए आया है कि हम अपनी जीवनी-शक्ति के असली अमृत तक पहुंच सकें?
आज जो हो रहा है, इसलिए हो रहा है कि प्रकृति हमें सर्वनाश से बचाना चाहती थी। हर तरह के सर्वनाश से। प्राणि-जगत के जितने भी आयाम हो सकते हैं, उन सभी के सर्वनाश से क़ुदरत अगर हमें न बचाना चाहती तो चेतावनी का यह बिगुल बजता ही क्यों? सृष्टि-रचयिता हमें सिर्फ़ अपना ज़िस्म और जिं़दगी बचाने का ही अवसर नहीं दे रहा है, उससे भी ज़्यादा उसने हमें यह मौक़ा इसलिए दिया है कि हम अपना सब सकारात्मक बचा ले जाएं और अपना सारा नकारात्मक तिरोहित कर डालें। यह समूची सोच, संस्कृति, नज़रिए और समझ के परिष्कार का समय है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सिर्फ़ शरीरों के बच जाने से भी क्या हो जाएगा? जो धरती हमने अपने लिए रच ली है, वह तो अब एक ऐसा महाकाय मुमुक्षु-भवन भर रह जाएगी, जिसमें प्रतीक्षा के बाद मोक्ष भी शायद ही मिले! लेकिन उसकी खिड़की से आमूल-चूल बदलाव का एक चांद क्या आपको दिखाई नहीं दे रहा? विषाणु-समाधि के बजाय क्या चांदनी आपको नहीं लुभा रही? (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

Arresting China in Africa



GII. 14 April 2020


PANKAJ SHARMA


A major diplomatic step by India to balance China’s aggressive outreach in Africa went unnoticed when in the third week of January this year, India inaugurated first ever convention made by it in Africa. Foreign Minister S Jaishankar inaugurated the Mahatma Gandhi International Convention Centre (MGICC) in Western African state of Niger. With a tiny presence of merely 150 Indians in a country of 2.25 people, Niger might sound as a very insignificant country on the world map for India’s diplomatic interests, but those equipped with some idea of its natural resources and strategic importance had realised long back that developing intimate relationship with Niger is in the long term interest for India.

Nearly 8 years ago, in June 2012, I visited Niger representing one-man delegation of Indian National Congress, which was then ruling the national government in India, to strengthen party-to-party relationship with Niger’s ruling party PNDS Tarayya—Party for Democracy and Socialism. Mahamadou Issoufou was heading the Government of Niger. Issoufou is still the President of his nation. Mohamed Bazoum was the chairman of PNDS. He was also the foreign minister. I had very relaxed and detailed meetings with Issoufou, Bazoum and with various of his ministers during my visit. They all had deep respects and liking for Mahatma Gandhi’s India. They all were intensely inclined for greater cooperation with India and indicated their uneasiness with expanding Chinese interests in the region.

I had developed an earnest rapport with Bazoum and Foumakoye Gado, who was the minister for oil, energy and mines at that time. Bazoum narrated to me his 17 years old story when he became the foreign minister for the first time in 1995 in the government of Prime Minister Hama Amadou and how he held the position after Ibrahim Baré Maïnassara seized power in a military coup a year after. He told me in details how PNDS opposed Maïnassara and he was removed from his position after few months. Issoufou was the president of PNDS and Bazoum was placed under house arrest along with him. They were released on the orders of a court.

Six months after my visit, a huge delegation from Niger comprising half a dozen senior ministers and PNDS Tarayya functionaries visited New Delhi in January 2013. The delegation was led by Gado. In addition to his ministerial responsibilities he was holding the position of the secretary-general of the ruling party also. He has been a very close confidant of president Issoufou for years. I was assigned the task of convening their meetings with union ministers, etc by Congress president Sonia Gandhi. The members of the delegation met with the then foreign minister Salman Khurshid, Chief Minister of Delhi Sheila Dikshit, Minister for Human Resource Development, Minister of State in Prime Minister’s office, Minister of Petroleum, Minister of Power, etc and senior office bearers of the Congress party including the Chairman of party’s Foreign Affairs Department Dr. Karan Singh. Each minister spent long hours with the delegation and a detailed report was prepared based on the deliberations.

In addition to coal, gold, iron ore, tin, phosphates, petroleum, molybdenum and gypsum, Niger has some of the largest uranium reserves in the world. It is the fourth largest producer of uranium on the globe. It is to be underlined that Russia is on 5th position, China is on 8th and USA is on 8th position. Niger is a ten times bigger producer of uranium than India. The discussions between the Niger delegation and Indian leaders covered many important areas but as it was an exercise in the direction of strengthening ‘party-to-party’ relationship, there was no scope for signing any formal agreement. The informal drill was for chalking out a preliminary roadmap.

By the time the relationship between the Congress party and PNDS Tarayya and their leaderships started taking conducive shape, India went into general election mode by the end of 2013 and in the summers of 2014, Congress faced the colossal electoral setback of its lifetime. My friends in Niger have been keeping in touch with me. When president Issoufou was in New Delhi in October 2015 only for a day to participate in Africa Conclave organised by prime minister Narendra Modi, he spared plentiful time for a meeting with me.

          Issoufou has emerged taller after winning elections for the second time. He has everything the West wants in an African leader. The approach ha adopted in tackling the problem of elevated flow of migrants from Africa to Europe and the insecurity in Africa’s Sahel region, Issoufou has established his international prominence.  He played as a key partner for European leaders who hoped to both block migration and prevent it through economic development. The northern Nigerien city of Agadez had become a hub for migrants coming from across West Africa, as it is a gateway to the Sahara, Libya, the Mediterranean and, ultimately, to Europe. The crackdown had reduced the flow of migrants through Agadez by 80 percent.

President Issoufou’s Niger is also an important member of the ‘G5 Sahel Joint Force’, which deployed battalions from Niger, Mauritania, Mali, Burkina Faso and Chad in an effort to improve security in the Sahel and especially in the Niger-Mali-Burkina Faso border regions. Niger has obvious attraction for USA and Europe due to its relative stability, which contrasts with the endemic violence in neighbouring Libya, northern Mali, northern Nigeria and Burkina Faso.

In contrast to various other counterterrorism partners in Africa, Issoufou has genuine democratic credentials. He was first elected in 2011 in a vote deemed free and fair by many observers. The election followed a crisis in Niger involving civilian overreach and a short-lived military junta. Additionally, Issoufou gladly shows solidarity with the West at moments of crisis, for example by marching in a rally in Paris following the Charlie Hebdo attack in 2015. Just two weeks after the recent Paris summit on migration, Issoufou was in Germany to speak at the ‘Paths of Peace’ conference on religious understanding.

          Modi has matured a personal and cozy relationship with Issoufou in the meantime. He has interacted with Issoufou on the side-lines of the UN General Assembly, UNGA session in September last year. They held deliberations on furthering economic and people-to-people cooperation between India and Niger. MGICC in Niger is an outcome of the personal connect between both these leaders. This is the time when Modi needs to utilise the goodwill of Issoufou in swiftly entering into the personal corridors of the future presidency in Niger, as Issoufou’s won’t be the president after this year.

Though, Issoufou has aggressively neutralised his political rivals, his role in the fight against Boko Haram has earned him enormous appreciation and he is the most popular West African leader today, but he will be completing his current term of presidency in March 2021. General elections in Niger are scheduled for the last week of December this year. Niger’s constitution does not allow a person to hold office of president for more than two terms of five years each. Therefore, Issoufou will not get third tenure. Then, who after Issoufou? I feel, with his experience, candidness, reliability and grasp, Interior Minister Bazoum could be the next president of Niger. Issoufou could be the Chairman of ruling PNDS.

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धरती को महज़ सैरग़ाह समझने का नतीजा


मैं बचूंगा तो विचार बचेगा, विचारधारा बचेगी। पहले ख़ुद तो बच जाऊं, तब जनतंत्र का सोचूं, वाम-दक्षिण का सोचूं। यह कोरोना ऐसी आफ़त ले कर आया है कि सब की सिट्टी-पिट्टी गुम है। वरना ज़रा-सा कुछ हुआ नहीं कि अपने-अपने जुमलों के लट्ठ ले कर सब नरेंद्र भाई मोदी के पीछे पड़ जाते थे। उनके हर क़दम की समाजशास़्त्रीय विवेचना शुरू हो जाती थी। अब सब का समाज-बोध गायब है। अब सब को सामाजिक दूरी बनाए रखने की पड़ी है। कोई नहीं पूछ रहा कि ‘शारीरिक दूरी’ को ‘सामाजिक दूरी’ कह-कह कर दिमाग़ों में क्या बैठाना चाहते हो?
कोरोना तो चला जाएगा। लेकिन सामाजिक दूरी बनाए रखने का यह भाव जब भीतर तक उतर जाएगा तो उसे कैसे विदा करेंगे? अब तक हम समाजों में बंटे हैं, समुदायों में बंटे हैं, संप्रदायों में बंटे हैं। पता नहीं कौन-से अज्ञात भय से हमारी भुजाएं नाहक ही फड़फड़ाती रहती हैं। अब हम कोरोना-युक्त और कोरोना-मुक्त में भी बंट गए हैं। एक-दूसरे की छींक पर नथुने फुला रहे हैं। एक-दूसरे के ठसके को तिरछी निगाहों से देख रहे हैं। और, यह तो तब है, जब, दुनिया के हालात काबू से बाहर नहीं हैं और भारत के तो पूरी तरह काबू में हैं।
बराए-मेहरबानी गलत न समझें। मगर इतने हो-हल्ले के बीच मैं आपको यह बताने की हिमाकत कर रहा हूं कि भारत में हर 21 हज़ार की आबादी पर कोरोना का एक ही मामला सामने आया है और हर 6 लाख 85 हज़ार की आबादी पर एक व्यक्ति की ही इससे जान गई है। दुनिया में हर 5 हज़ार की जनसंख्या पर कोरोना का एक मरीज़ है और प्रति 81 हजार की आबादी पर एक की मौत हुई है। दुनिया भर में सामने आए कोरोना-मामलों में से 6 प्रतिशत की मृत्यु हुई है। भारत में अभी तक 3 प्रतिशत को ही नहीं बचाया जा सका है।
सो, महामारी-काल में भी भारत पर कु़दरत के इस रहम के बावजूद अगर हम एक-दूसरे को इस क़दर घूर कर देख रहे हैं तो ईश्वर न करे कि हालात और बिगड़ें। वरना कोरोना तो जो करेगा, सो, करेगा, हम वैसे ही आपस में सिर फोड़ चल बसेंगे। जहां-जहां कोरोना थोड़ा बेकाबू हुआ, ढील-पोल के कारण हुआ। हम भी अगर भारत में वक़्त पर चेत जाते तो इतना न भुगतते। तब्लीगी-जमात और थाली-पीट जुलूसों के करतबों की मेहरबानी से घरों में नजरबंदी की मियाद बढ़ गई। वरना समूची व्यवस्था का पहिया थोड़ा पहले फिर घूमना शु्ररू कर देता। लेकिन अब तो जून में भी अगर भारत को पूरी तरह कोरोना-मुक्त घोषित कर दिया जाए तो अपने को भाग्यवान समझिए।
इससे ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है कि कोरोना के हमले से भारत उतना छिन्न-भिन्न नहीं हुआ है, जितना दुनिया के बाकी कुछ मुल्क़। दुनिया के साथ-साथ कोरोना ने भारत को भी कम-से-कम पांच साल पीछे धकेल दिया है। अब मेरी इस बात में सियासत मत तलाशिए कि पांच साल हमने ख़ुद को नोट-बंदी से ख़ुद पीछे धकेल ही लिया था। अब हम दुनिया से दस बरस पीछे चले गए हैं। और, ऐसा तो है नहीं कि कोरोना इस साल जाएगा तो अगले साल आएगा ही नहीं। जैसे हर साल सर्दी-जु़काम-फ़्लू का मौसम आता है, कोरोना-महाशय का भी आएगा। उसके आने का डर हमारे बदन की शिराओं में जिस तरह पिरो दिया गया है, वह हमारे घरों के दरवाजे ख़ुद-ब-ख़ुद बंद कर दिया करेगा। इसलिए बचे-खुचे दिनों में दुगनी-तिगुनी मेहनत के लिए तैयार रहिए। अलाली के दिन गए। खपने के दिन आने वाले हैं।
कोरोना न आता तो हमें तो यह पता ही नहीं चलता कि हम नाहक ही कितना डोलते-फिरते थे? अपनी अय्याशगाहों की रचना करते-करते हम ने यह सोचा ही कब कि हमारी बुनियादी व्यवस्थाएं कहां जा रही हैं? क्या इसीलिए हम कोरोना के लायक हो गए थे? घर में हमारे पांव टिकते ही कहां थे? घर का खाना देख कर हम नाक-भौंह सिकोड़ते थे। इधर-उधर हाहाहूहू में रात के दो बजाए बिना घर लौटने को हमारा मन नहीं करता था। क्या इसलिए हमें घरघुस्सू बनाने को कोरोना आया? हम ने अपने को किस तरह तामझाम के मकडजाल में फंसा लिया था, हमें मालूम ही कहां था?
जब हमारी शिक्षा व्यवस्था सौदागरों के कब्जे में जा रही थी तो हम दुनिया भर में बिखरे घुड़दौड़ के मैदानों में व्यस्त थे, कैसीनो की गैमिंग-मेज़ों को गुलज़ार कर रहे थे और खेल-कूद पर सट्टा लगा रहे थे। तब हम शेयर बाज़ार के नियंताओं के हाथों अपने हमजोलियों को लुटते ख़ामोशी से देख रहे थे। जब हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं का घनघोर व्यवसायीकरण हो रहा था तो हम गोआ से ले कर बैंकाक, मकाऊ और मॉरीशस के समंदर किनारे घूप सेक रहे थे। तब हम कैलेंडर-गर्ल के रचनाकारों को पूज रहे थे। अब आज क्लोरोक्वीन तक को मोहताज़ हो जाने का रोना-धोना क्यों? जब निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों की मिलीभगत हमारा सब-कुछ डकार रही थी, तब हम ने आवाज़ उठाई होती तो बात थी।
दुनिया भर में साढ़े पांच हज़ार विमान सेवाएं हैं। 48 हज़ार विमान हैं। इनमें से 4900 निजी विमान हैं। 54 हज़ार हैलीकॉप्टर हैं। 350 के क़रीब क्रूज़-शिप हैं। 10 हज़ार से ज़्यादा सुपर-याच हैं। एक अरब से ज़्यादा कारें हैं। 45 हज़ार आलीशान सात-पांच सितारा होटल तो सिर्फ़ एक दर्जन बड़ी ब्रांड कंपनियों के हैं। लाखों बार-रेस्तरां हैं। इनमें क्या भजन-मंडलियां घूमती-ठहरती हैं? क्या इनमें मैं और आप खाते-पीते हैं? वे कौन हैं, जिनके बूते ये फल-फूल रहे हैं? और, जिनके बूते सैरगाहें फल-फूल रही हैं, वे किन के बूते फल-फूल रहे हैं?
कौन हैं, जिनके लिए इसाबेला इस्ले व्हिस्की की 43 करोड़ रुपए वाली बोतल बनती है? कौन हैं, जिनकी शाम मैकलेन व्हिस्की की सवा चार करोड़ रुपए की बोतल गटके बिना अधूरी रह जाती है? कोई तो हैं, जिनके लिए दुनिया भर में ऐसे वेश्या-रिजॉर्ट मौजूद हैं, जहां अपने निजी विमान और हैलीकॉप्टर से उतरा जा सकता है। कौन हैं, जिन्हें लुई वितां का सात लाख रूपए का जूता भी सस्ता लगता है और जिनके तलवों को 40-50 लाख रुपयों के एयर जॉर्डन, नाइकी और टेस्टोनी के जूतों बिना आराम ही नहीं मिलता है? वे कौन हैं, जो डेसमंड मेरियन के 33 लाख रुपए के सूट को भी गया-बीता समझते हैं और सवा छह करोड़ रुपए का स्टुआर्ट हगेज का सूट पहने बिना अट्टालिका से नीचे नहीं आते? जिनका काम औरोरा, तिबाल्दी, मार्ते ओमास और विस्कोंटी की क़लम जेब में लगाए बिना चलता ही नहीं? जिनकी कलाई के सामने चोपार्ड, पाटेक फिलीपे, पॉल न्यूमेन रॉलेक्स, ब्रेगुएट और जैकब ऐंड कंपनी की घडियां भी पानी भरती हैं और अगर वे ग्रॉफ डायमंड की साढ़े तीन अरब रुपए वाली घड़ी न पहनें तो जिनकी कलाई सूनी रह जाती है?
सवा सौ करोड़ रुपए वाली डेबी की सैंडल पहनने वाली स्त्रियां कौन हैं? वे स्त्रियां कहीं तो होंगी, जिनके लिए सुसान रोज़ेन की सवा दो अरब रुपए की बिकनी बनती है। 15-20 लाख रुपए की लांजरी पहनने वालियों को हेय मानने वाला संसार किस ने बनाया? हम ने तो नहीं। मगर इस संसार को बनने तो हमीं ने दिया है। ईश्वर ने धरती को इसलिए नहीं बनाया था कि हम उस पर सिर्फ़ तफ़रीह करें। सो, भुगतो कोरोना को। अगर इस कोरोना ने अब भी हमारे संसार को नहीं बदला तो आने वाली प्रलय के लिए तैयार रहिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी हैं।)

EYE ON FURTIVE DIPLOMATS


GII. 9 April 2020

PANKAJ SHARMA


As India seeks greater influence in global policy-making at a different level after Narendra Modi has taken over as the Prime Minister of India, Indian Foreign Service is being reshaped. But the experts in the areas of international diplomacy feel that six years of Modi regime could deliver very little in strengthening the Indian diplomatic corps. Though a number of new missions have been opened in various countries during this period, especially in Africa, but the system seems inadequately equipped to meet the new challenges emerged with the new global equations India has with different power blocks.

Till about the early eighties, the Indian Foreign Service (IFS) was perceived to be the more desirable service than the Indian Administrative Service (IAS). Then the trend changed and IAS outshone IFS. Foreign Service has traditionally been a relationship-management field force, with limited lobbying or Brand India-building mandate. In the last few years, the focus on the IFS has been higher, with international branding of India as well as consumerisation of services.

          India currently has approximately 3,000 ‘diplomats’ working outside and within the country. They include around 950 A-Grade IFS officers, nearly 300 Grade-1 IFS (B) officers, 40 of the Interpreters Cadre, 30 of the Legal and Treaties Cadre, 635 attaches, 550 diplomatic officers from sectorial staff, and a little more than 300 diplomatic officers for other ministries.

          Managing this ‘specially powered’ contingent of diplomats that is so diversely posted across the world has its own challenges. Finding trustworthy officers for sensitive stations has always been a demanding exercise. Keeping an eye on the stealthy characters in the Foreign Service is not an easy business. The need to check the repeat of the stories of Madhuri Gupta, Sukhjinder Singh, Manmohan Sharma, Ravi Nair, Rabinder Singh, Ashok Sathe, K V Unnikrishnan and many more top Indian officials has also expanded with the changing times.

Diplomat Madhuri Gupta, arrested on charges of spying for Pakistan. Navy officer Commodore Sukhjinder Singh was probed for his alleged liaison with a Russian woman when he was posted in Russia as the head of Indian team overseeing the refit of aircraft carrier Admiral Gorshkov. A board of inquiry, set up against Singh after his objectionable photographs with the unidentified woman surfaced.

In May 2008, a senior Indian Embassy official in Beijing was called back to New Delhi for falling to the charms of a Chinese honey trap. Manmohan Sharma, a senior Research and Analysis Wing (RAW) officer, was alleged to be in a romantic affair with his Chinese language teacher. Indian authorities suspected the woman could be an informant of the Chinese government and gathered information about India's moves and counter-moves on the border talks.

In October 2007, a 1975 batch Research and Analysis Service (RAS) officer Ravi Nair was called back from Hong Kong for his 'friendship' with a girl believed to be working for a Chinese spy agency. However, within a brief time Nair was again given a foreign posting in Colombo where the woman also came and allegedly started staying with him, raising suspicion. The officials of other departments, posted at the Indian High Commission, sent reports about Nair to their respective departments paving way for his recall.

Like any other snooping agency, India's external Intelligence agency RAW has also a history of officials switching their loyalties to foreign agencies. The most infamous case which shook RAW out of reverie was that of Rabinder Singh who became a mole of American intelligence agency CIA and flew to the US despite being under RAW surveillance. Singh initially worked with the Indian Army and held a very senior position with RAW handling Southeast Asia. By the time the agency sensed his affiliations, Singh escaped to the US through Nepal in 2004. There are reports that he died in a road accident in USA sometime in 2016.

The second blow came in 2006 with the discovery of another alleged CIA mole in India's National Security Council Secretariat, which is part of the Prime Minister's Office. In the early 90s, an Indian Naval attaché posted in Islamabad reportedly fell in love with a Pakistani woman working in the Military Nursing Service in Karachi. The attaché was interrogated and then forced to resign. Reports said the official, who had initially claimed having recruited the woman as a spy, was being blackmailed by the ISI, which wanted his services after his return to the Naval Headquarters in Delhi.

Then a personal assistant to a very senior RAW official disappeared in London in the early 90s. Ashok Sathe, another official was also believed to have defected to the US after his mysterious disappearance. Sathe was said to be behind burning down of RAW office in Khurramshahr in Iran. In the early 1980s, a senior field officer disappeared in London. As attaché in Kathmandu, he was alleged to be liaising with foreign intelligence agencies.

In another case, a senior Intelligence Bureau (IB) official, who was due to take over as the chief of counter-intelligence, had an unauthorised relationship with a female US consular officer. His meetings with her were recorded on camera by the IB, and he was forced to retire following interrogation.

However, in the history of Indian intelligence, the most written about case was that of K V Unnikrishnan, a RAW officer dealing with the LTTE. He had developed a relationship with an air hostess believed to be an intelligence scion. He was arrested just ahead of a peace accord signed between India and Sri Lanka.

The oldest case of 'honey trapping', when an Indian diplomat in 1950s was trapped by a Russian girl in Moscow. When the Russian spy agency KGB presented him with the pictures of his activities with the girl, the diplomat informed his ambassador about his relationship and the KGB's attempts to blackmail him. The ambassador raised the issue with the topmost level. The young diplomat was warned to be more careful in future.

The mysterious world of intelligence and counter-intelligence has a different architecture in the times of advanced technology, artificial intelligence and other very sophisticated methods. On a multi-polar globe, India attracts a special intentness from the secret services of various influential countries. The presence of very emphatic non-state actors in the field of espionage is the real challenge with which India will have to deal to keep its Foreign Service protected.

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Will world be the same again?


GII. 1 April 2020

PANKAJ SHARMA

          The world will never be the same again. After a successful victory of the mankind against the Corona Virus the global economy might come back on the track again after few years, but, I am sure, the ugly war of blame game between United States of America and China will leave such permanent marks on the social fabric of the globe that it would be almost impossible to repair them for decades. More dangerous than the Corona Virus is the fast expending impulse to denounce China, Chinese and Chinese-looking people. We are witnessing some very grisly scenes in different parts of the world including in India.

          No one is sure of the origin of Corona Virus, but a perception has been created that it was a coldblooded handiwork of a biosafety research laboratory in China’s Wuhan. Social sites and digital communication groups are packed with hate videos and audios after that. Chinese are being abused in very harsh words with uncontrollable anger in the minds of those who have no method to check the facts about the birth of a virus which has practically locked-down the entire Earth, at least for the time being.

This is a make-or-break moment for the whole world. But, on Fox News and American social media, a dangerous conspiracy theory about the origin of the health crisis won’t die. There are two main versions of the rumour, and they have one common thread: that the coronavirus, SARS-CoV-2, originated in a level 4—the highest biosafety level—research laboratory in Wuhan. In one version of the rumour, the virus was engineered in the lab by humans as a bioweapon. In another version, the virus was being studied in the lab, after being isolated from animals, and then it “escaped” or “leaked” because of poor safety protocol.

The Wuhan Institute of Virology is a real place. It is China’s only level-4 biosafety lab. But there is no evidence that the mysterious virus originated there. Virologists who’ve parsed the genome and infectious disease experts who study coronaviruses say they have enough evidence the virus is brand new and came from nature. A large group of them, citing genome analyses from multiple countries, recently affirmed in The Lancet that the virus originated in wildlife.

          It is unfortunate that in these times of tragic crisis several prominent US conservative pundits and politicians have been politicizing the bioweapon rumour for weeks. Right-wing radio host and Presidential Medal of Freedom recipient Rush Limbaugh said on February 24 that “It probably is a ChiCom laboratory experiment that is in the process of being weaponized,” Senator Tom Cotton (R-AR) has repeatedly suggested before Congress and on Fox News that the virus could have come from the lab. The Arkansas senator furthered “infodemic” by pushing debunked claim that the novel coronavirus may have been created in a Wuhan laboratory.

Former White House strategist Steve Bannon also went on Fox News to defend Cotton and imply that the Chinese Communist Party was still hiding something about the origin of Covid-19. In the New York Post, Steven Mosher, a regular critic of China’s population control measures, has stoked the leakage rumour, using an array of circumstantial clues that Chinese labs’ handling of deadly pathogens can’t be trusted.

Similar rumours have also been running rampant in online forums in China. The South China Morning Post on February 20 debunked yet another rumour of the virus escaping from the lab in China. More rumours swirled online which say that Wuhan Institute of Virology researcher Chen Quanjiao had reported the head of the institute, Wang Yanyi, claiming she had “sold experimental animals” to the live animal and seafood market and “leaked the virus” from the lab. Chen was angry that her name had been used to fabricate information and denied it.

Conspiracy theories about manmade viruses are not new. We saw this with HIV — the rumour that the US made it and introduced it into Africa. But it had no basis. Soon after the Chinese government acknowledged there was an outbreak of a mysterious new virus in late December in Wuhan, scientists raced to sequence its genome. By mid-January, they had it and shared it with the World Health Organization. Scientists saw that the virus closely resembled viruses that circulate in bats. “If you look at the genetic sequence of the virus, it’s closely related to a bat virus, about 96 percent the same,” Jim LeDuc, head of the Galveston National Laboratory, a level 4 biosafety lab in Texas, told Vox. “There’s been talk about a pangolin intermediate host; that’s probably not true.”

Chinese officials also reported that several of the first cluster of cases had ties to a live animal market where both seafood and other wildlife were sold as food. (The market has since been closed.) The market soon became the leading hypothesis for how the virus made the leap into humans, where it’s been able to spread efficiently ever since.

The genetic evidence and epidemiological information, according to three esteemed infectious disease researchers writing in the New England Journal of Medicine, “implicates a bat-origin virus infecting unidentified animal species sold in China’s live-animal markets.” There’s a long history of these “spillover” events, where an emerging disease jumps from wildlife to humans, turning into a pandemic. And scientists say we should expect them with more travel, trade, connectivity, urbanization, climate change, and ecological destruction, if we don’t stop the drivers.

What researchers have to figure out now is how exactly the coronavirus jumped to humans: perhaps through a human eating an infected animal, or through humans being exposed to infected feces or urine. Vincent Racaniello, a professor of microbiology and immunology at Columbia and host of the This Week in Virology podcast said, “All we know is its likely distant source was bats, but we don’t know who was between bats and people. It could be a direct infection between bats and humans as well.”

A preliminary scientific paper shows this is a genuinely new virus, and there’s no way it could have been engineered by humans. In a recent podcast episode, Racaniello discussed with two other researchers a fascinating preprint paper (that’s currently under peer review, according to the authors) about the virus origin. The key finding: that SARS-CoV-2 is “not a laboratory construct nor a purposefully manipulated virus.” The paper, which was uploaded onto Virological.org in February, is written by several leading microbiologists who closely examined the SARS-CoV-2 genome.

Racaniello put it on his podcast: “Humans could never have dreamed this up.” He said, “No known lab anywhere in the world was working on a coronavirus like this one, and its closest relative is a bat virus found in a cave in 2013 in Yunnan, China, 1,000 miles from Wuhan. Presumably there’s a common ancestor, most likely from a bat or an intermediary animal that was contaminated by that bat.”

Fact remains that the origin of Corona Virus is in China. But fact also remains that it was not engineered. Because if you wanted to release a bioweapon to kill a lot of people, there are much deadlier pathogens you could use. Ebola and the West African Lassa virus are deadly threats that can only be studied in biosafety level 4 labs, like Wuhan. Crimean-Congo haemorrhagic fever is a tick-borne disease that has a death rate of 30 to 50 percent. The global death rate for Covid-19, meanwhile, is around 3 percent at the moment.

          This is the time when the whole humanity must fight against the pandemic. By ridiculing China or its President Xi Jinping, US President Donald Trump is not doing any service to the mankind. Xi also must come forward in much more transparent manner. Knowingly divide the global society into Non-Chinese and Chinese will ensure the extinction of basic human values. Social distancing should not convert into an everlasting social divide.


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