Wednesday, May 1, 2019

सूखे आंसुओं से जन्मे पत्थर की मार



Pankaj Sharma] 
27 April, 2019

नरेंद्र भाई मोदी की पुनर्वापसी के भजन गाते न अघा रहे रणबांकुरों के नथुने मेरी इस बात से गुस्से में फड़कने लगेंगे कि लोकसभा के तीसरे चरण में जिन 116 क्षेत्रों में मतदान हुआ है, उनमें से भारतीय जनता पार्टी मुश्क़िल से 36 जगह ही जीत रही है। कांग्रेस को इस चरण में कम-से-कम 54 सीटें मिल रही हैं। पांच बरस पहले के उफ़ान में भाजपा को इनमें से 63 और कांग्रेस को सिर्फ़ 16 सीटें मिली थीं। उससे भी पहले 2009 के चुनाव में इन 116 में से भाजपा ने 43 और कांग्रेस ने 38 सीटें हासिल की थीं।
पहले दो चरणों में 186 लोकसभा क्षेत्रों में हुए चुनाव के बारे में मैं ने अपना आकलन आपको पिछले शनिवार को बताया था कि भाजपा को 27 और कांग्रेस को 57 सीटें मिलेंगी। यानी अब तक हुए 302 सीटों के चुनाव में भाजपा को अकेले 63 और कांग्रेस को अकेले 111 सीटें मिल रही हैं। मैं जानता हूं कि जब तक नतीजे सामने नहीं आ जाते, मुझे मुंगेरीलाल बताने वालों की कमी नहीं रहेगी। लेकिन 23 मई को जब हम-आप एक-एक सीट का परिणाम अपनी उंगलियों पर गिनेंगे तो आपको आज कही मेरी बात याद आएगी।
तीसरे चरण में गुजरात की सभी 26 और केरल की सभी 20 सीटों पर मतदान हो चुका है। इस चरण में कर्नाटक की बाकी बची 14 सीटों पर भी मतदान पूरा हो गया। पिछली बार गुजरात में भाजपा ने सारी सीटें हथिया ली थीं। इस बार अगर उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन भी किया तो वह 14-15 के आसपास ही रहेगी। केरल में तो वह पिछली बार भी शून्य पर थी। इस बार उसकी चरम-उम्मीद महज़ यह है कि वह एक सीट के साथ वहां अपना खाता खोल ले। कर्नाटक का बीजगणित भी दस साल बाद पूरी तरह बदला हुआ है।
241 लोकसभा क्षेत्रों में मतदान अभी बाकी है। छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, तैलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, गोआ, अरुणाचल, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, अंडमान-निकोबार, दादरा-नगर हेवली, दमन-दीव और पुदुचेरी में सभी सीटों पर मतदान हो चुका है। बिहार की 40 में से 26, हरियाणा की सभी 10, हिमाचल प्रदेश की सभी 4, जम्मू-कश्मीर की 6 में से 3, झारखंड की सभी 14, मध्यप्रदेश की सभी 29, महाराष्ट्र की 48 में से 17, ओडिशा की 21 में से 6, पंजाब की सभी 13, राजस्थान की सभी 25, उत्तर प्रदेश की 80 में से 54, पश्चिम बंगाल की 42 में से 32, दिल्ली की सभी 7 और चंडीगढ़ की एक सीट पर मतदान अभी होना है। 29 अप्रैल को चुनाव के चौथे चरण में 9 राज्यों की 71 सीटों पर मतदान होगा।
चौथे चरण में बिहार की 5 सीटें शामिल हैं। उनमें भाजपा कहीं नहीं है। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र में मतदान तीन चरण में होगा। एक चरण का मतदान वहां हो चुका है। चौथे चरण में वहां के कुछ इलाक़ों में फिर मतदान होना है। यह सीट भाजपा को मिलने से रही। झारखंड की जिन 3 सीटों पर चौथे चरण में मतदान होगा, उसमें कोई एक भाजपा को मिल जाए तो मिल जाए। चौथे चरण में मध्यप्रदेश की 6 सीटें हैं। इनमें से ज़्यादा-से-ज़्यादा 3 भाजपा को मिल सकती हैं। महाराष्ट्र की बची 17 सीटों में से भी वह अधिकतम 2 पर जीत पाएगी। ओडिशा की बाकी बची 6 सीटों में एक भी उसे मिल जाए तो गनीमत है। चौथे चरण के चुनाव में जा रही राजस्थान की 13 सीटों में से भाजपा, बहुत हुआ तो, 5 पर अपना जलवा दिखा सकती है। उत्तर प्रदेश की 13 सीटों में से भाजपा 4 ले आए तो बड़ी बात है। पश्चिम बंगाल की 8 में से कोई एक अगर उसे मिल जाए तो हैरत ही होगी। 
सो, चौथे चरण के 71 लोकसभा क्षेत्रों में से सिर्फ़ 17 में भाजपा की जीत के आसार हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब से दो दिन बाद जब पूरे देश में 373 लोकसभा सीटों पर मतदान हो चुका होगा, तब भाजपा सब मिला कर 80-90 के आंकड़े के आसपास बिलबिला रही होगी। आने वाले बाकी चरणों में भी अगर हवा का बहाव ऐसा ही बना रहा तो मुझे तो नरेंद्र भाई इस चुनाव में 160-165 पर सिकुड़ते नज़र आ रहे हैं। राजग के अपने सहयोगियों के साथ भी उनके छक्के कहीं 200 सीटों के इर्दगिर्द ही न छूट जाएं!
ऐसा इसलिए हो रहा है कि 2019 की चुनाव-सप्तपदी में भारतमाता की आंखों से पांच साल की यादों का पानी बह रहा है। अब तक सुबक रहे भारतवासी अपने आंसुओं को पोंछ कर यह चुनाव आते-आते पत्थर हो गए हैं। दो-तीन बरस से भीतर खदक रही उनकी बद्दुआओं ने अंततः जनतंत्र की राह में अपनी दुआओं के दीप जलाने शुरू कर दिए हैं। नरेंद्र भाई की आंधी का डंडा तो पिछले पांच साल से बज रहा था। मतदाताओं का डंडा पिछले पांच हफ़ते से बजना शुरू हुआ है। 
देशवासी अपने प्रधानमंत्री को, अपनी कातर निग़ाहों से, ऐंठा-ऐंठा घूमता देख रहे थे। हेकड़ी की ईंट नरेंद्र भाई ने पहले उठाई थी। अवाम ने इतने लंबे इंतज़ार के बाद अब जा कर पत्थर अपने हाथ में लिए हैं। सो, जैसे-को-तैसा जवाब देने की ताब लिए मतदान केंद्रों पर पहुंच रहे लोग जिन्हें अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं, उन्हें 23 मई को असलियत समझ में आएगी। मतदाता के होठों के चौराहे पर चुप्पी देख कर अंदाज़ मत लगाइए। उनके मन के भीतर का कोलाहल इस बार इतना घनेरा है कि नरेंद्र भाई का गाया जा रहा कोई आल्हा काम नहीं आने वाला! नरेंद्र भाई की सरकार की गठरी उठाते-उठाते देश अब उकता गया है।
इसलिए आपको मानना हो तो आज मानें, न मानना हो तो मई के चौथे बृहस्पतिवार तक इंतज़ार कर लें और उस दिन मानें। चुनावी मिट्टी की महक तो साफ़ बता रही है कि इस बार उससे कौन-से अंकुर फूट रहे हैं! विशाल जयकारा उत्सवों के बीच नरेंद्र भाई को इसका अहसास ही नहीं हो रहा है कि उनकी राह भीतर से कितनी पोली हो गई है! अपनी महिमा सुना-सुना कर उन्होंने खेल तो लोगों को विस्मित करने का खेला था, लेकिन अब वे ख़ुद ही ख़ुद से विस्मित हुए बैठे हैं। अब तक उनके गौरव-बखान से उनके अनुचर गौरवान्वित थे। अब स्वयं नरेंद्र भाई गौरवान्वित हो कर झूम रहे हैं। 
लेकिन इस चराचर जगत की महिमा भी अपरंपार है। यह महिमा ऐसी है कि चुनावधर्मी राजनीतिकों को आज तक कभी समझ में नहीं आई। इसीलिए वे ऐन वक़्त पर गच्चा खा जाते हैं। हमारे प्रधानमंत्री अगर अपने अमेरिकी ‘दोस्त बराक’ की अच्छी नींद लेने की तू-तड़ाक सलाह मान जाते तो अब उनका यह हाल न हो रहा होता। रोज़ सिर्फ़ तीन घंटे से सो कर वे मुल्क़ को जहां से जहां ले आए, उसी का ख़ामियाज़ा तो वे इस चुनाव में भुगत रहे हैं। देश दुरुस्त करने की ऐसी हड़बड़ी दिखाने के बजाय अगर वे शालीनता, संयम और समझदारी से काम लेते तो शायद 2019 भी उनका ही होता। लेकिन मौक़ा तो मौक़ा, नरेंद्र भाई ने तो लोगों की निग़ाह में ख़ुद को भी खो दिया। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

भस्मासुरी कलियुग से सनातनी सतयुग की ओर



Pankaj Sharma
20 April, 2019

आम चुनाव के दूसरे चरण में 95 लोकसभा क्षेत्रों में हुए मतदान के बाद केंद्र से भारतीय जनता पार्टी की विदाई के हर्फ़ सियासी आसमान में और सुर्ख़ हो गए हैं। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्तासीन करने की कोई जबरदस्त हुलक मतदाताओं के मन में होती तो इस चरण में 12 राज्यों में से 9 में, पिछली बार से भी कम लोग, मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंचे होते। सिर्फ़ मणिपुर, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मतदान का प्रतिशत 2014 से ज़रा-सा ज़्यादा रहा। ओडिशा में तो पिछले चुनाव की तुलना में सवा 14 प्रतिशत कम मतदान हुआ। सो, यह सन्नाटा मुझे तो सुनार की सौ के जवाब में लुहार की एक घन्नाहट के आसार दिखाता दीख रहा है।दोनों चरणों में मिला कर 186 सीटों पर मतदान हो चुका है। 2014 में भाजपा ने इनमें से 59 जीती थीं। कांग्रेस को तब सिर्फ़ 19 मिली थीं। मेरा आकलन है कि इस बार भाजपा इन 186 लोकसभा क्षेत्रों में से अपने 27 से ज़्यादा सांसद जिता कर नहीं ला पाएगी। दूसरी तरफ़ कांग्रेस के 57 सांसद इन दोनों चरणों में हुए चुनाव में जीत कर आ रहे हैं। पहले चरण की 91 सीटों में से भाजपा 8 और कांग्रेस 31 जीत रही है। दूसरे चरण में भाजपा को 19 और कांग्रेस को 26 सीटें मिलेंगी। 2009 के चुनाव में इन 186 सीटों में से कांग्रेस ने 80 और भाजपा ने 27 जीती थीं। कांग्रेस एक दशक पहले के गुलाबी-युग में भले ही नहीं लौट रही है, मगर भाजपा को चुनावी सांप-सीढ़ी दस बरस पहले की बावड़ी में ले जा रही है।
दूसरे चरण में जिन 95 सीटों पर मतदान हुआ है, उनके 2009 और 2014 में आए नतीजों के गणित पर ग़ौर कीजिए। भाजपा को 2009 में 20 सीटें मिली थीं। 2014 में नरेंद्र भाई की लाई आंधी में भी वे सिर्फ़ 7 ही बढ़ पाईं थीं। कांग्रेस को 2009 में 24 सीटें मिली थीं, लेकिन जब नरेंद्र भाई के अंधड़ ने 2014 में उसे कुल मिला कर एक बटा पांच पर पटक दिया था, तब भी दूसरे चरण के इन लोकसभा क्षेत्रों में वह अपना आधा बदन सलामत रखने में क़ामयाब रही और 12 सीटें जीत गई थी।
दूसरे चरण की इन सीटों पर बाकी राजनीतिक दलों की 2009 और 2014 की स्थिति के पेंच समझना भी 2019 के लिए ज़रूरी है। तमिलनाडु में सियासत का पेंडुलम द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच झूलता रहता है। 2009 के चुनाव में द्रमुक को 18 और अन्नाद्रमुक को 9 सीटें मिली थीं। 2014 के चुनाव में द्रमुक पूरी तरह साफ़ हो गई और अन्नाद्रमुक राज्य की 39 में 36 सीटें जीत गई। अब अन्नाद्रमुक का दिल टुकड़े-टुकड़े हो कर ‘एक यहां गिरा, एक वहां गिरा’ हो गया है। दूसरे चरण में तमिलनाडु की एक को छोड़ कर बाकी सभी सीटों पर मतदान हो गया है। दक्षिण की हवा इस बार बहुत अलग है। मुझे नहीं लगता कि अन्नाद्रमुक के दिल के सभी टुकड़े चार-छह से ज़्यादा सीट जीतने की हालत में हैं। 
इस चरण की 95 सीटों में से बीजू जनता दल के पास 2009 में 3 और 2014 में 4 थीं। शिवसेना के पास दोनों बार चार-चार सीटें थीं। जनता दल सेकुलर के पास पिछले चुनाव में 2 और उससे भी पिछले में 3 सीटें थीं। लालू प्रसाद यादव के राजद ने 2009 में 3 सीटें हासिल की थीं और 2014 में भी वह 2 पर जीती थी। पिछले चुनाव की मोदी-लहर में इन 95 लोकसभा क्षेत्रों में से 56 भाजपा और कांग्रेस से इतर दलों ने जीती थीं। इससे अंदाज़ लगा लीजिए कि इस बार की उलट-लहर कैसे नतीजे ले कर सामने आएगी।
चरण में जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में भी मतदान हुआ है। वहां सिर्फ़ 14 प्रतिशत वोट पड़े हैं। पिछले चुनाव में वहां 26 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस चरण का सब से कम मतदान जम्मू-कश्मीर में ही हुआ है। सिर्फ़ साढ़े 45 प्रतिशत। लेकिन अगर ऊधमपुर में तो 2014 की तरह ही 70 प्रतिशत मतदान हो और श्रीनगर में महज़ 14 फ़ीसदी तो भारतीय लोकतंत्र के लिए हम इसमें कौन-सा संदेश ढूंढें?  
11 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान में भी 2014 के मुकाबले 6 प्रतिशत वोट कम पड़े हैं। पांच साल पहले जब नरेंद्र भाई दनदनाते हुए दिल्ली की तरफ़ बढ़ रहे थे तो 2009 की तुलना में 4 प्रतिशत ज़्यादा मतदान हुआ था। अब अगर पहले चरण में वह 6 प्रतिशत घट गया और दूसरे में ना के बराबर बढ़ा है तो क्या इससे हमें यह समझना चाहिए कि इस बार नरेंद्र भाई भनभनाते हुए ड्योढ़ी के बाहर जा रहे हैं? भाजपा कहती तो यही रही है कि जब मतदान ज़्यादा होता है तो उसे फ़ायदा होता है। हमने दो-एक बार से ऐसा ही होते देखा भी है। जब 2014 में 4 प्रतिशत ज़्यादा मतदान हुआ था तो 10 राज्यों में भाजपा को 9 सीटों का फ़ायदा हुआ था और कांग्रेस को 37 का नुक़सान। सो, इस बार का कम मत-प्रतिशत क्या भाजपा के लिए शोक-पत्र ले कर आ रहा है?
समर के पांच चरण अभी शेष हैं। इस बार का सियासी-समर जनतंत्र की पाठ-पट्टी को नए सिरे से पोतने-चमकाने का यज्ञ है। यह ठोस पक्षधरता के आग्रह का समय है। इसलिए जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध! जिनकी आंखों में लुंज-पुंज गठबंधन की तरफ़ जाते देश को देख कर आंसू आ रहे हैं, उन्हें रोने दीजिए। आपकी सहानुभूति का रूमाल उनके लिए नहीं है। आपके रूमाल को तो उन माथों के पसीने की बूंदें पोंछनी हैं, जिनकी अनवरत दृढ़ता के चलते भारत एकाधिकार के श्राप से मुक्त होने की दिशा में चल पड़ा है। लोकतंत्र के चेहरे को लहूलुहान करती मुट्ठी से तो उसकी पीठ सहलाती अलग-अलग उंगलियां ही बेहतर!
जनतंत्र की वापसी का दिन महीने भर बाद आ रहा है। तब तक उसके रास्ते में बिछाने को इस कड़कती धूप में हमें साये इकट्ठे करने हैं। पांच बरस से हम-आप जहां एड़ियां रगड़ रहे हैं, अगले महीने की गर्मियों में मीठे पानी का झरना वहीं से निकलेगा। इसलिए अब एक-एक दिन पहरेदारी का है। इस दौर में नफ़रत का जितना तेज़ बहाव हम ने देखा, हमारी पीढ़ी ने कभी नहीं देखा था। इस अंधेरे को अब तक रोके खड़े हम क्या किनारे पर पहुंचते-पहुंचते लड़खड़ाने का ख़तरा मोल ले सकते हैं? 
रिआया साहिबे-तख़्त बदल रही है। इसका घर्घर नाद जिन्हें मतदान के दो चरणों में सुनाई नहीं दिया, वे अगले पांच चरणों में भी अपने कानों में उंगलियां ठूंसे रहेंगे। उन्हें ऐसा ही करने दीजिए। मगर हम-आप अपने आंख-कान खुले रखें। यह हस्तिनापुर में सम्यक् दर्षन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र की पुनर्स्थापना का पर्व है। इस पर्व के दो प्रक्षाल संपन्न हो गए हैं। बाकी के पांच प्रक्षालों के कलश हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अगर हमने जनतंत्र की प्रतिमा को पूरे मन से स्नान कराने में कोताही नहीं की तो इस बार जेठ के महीने में, कृष्ण-पक्ष की पंचमी को, एक ऐसे शुक्ल-पक्ष का आरंभ होगा कि भारतीय राजनीति के पंचांग का पूरा अर्थ ही बदल जाएगा। तब हम सब एक भस्मासुरी कलियुग  को पीछे छोड़ सनातनी सतयुग में प्रवेश कर रहे होंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

Sri Lanka: No election gimmick


Modi’s mention of Sri Lankan carnage stresses less on terrorism and more on his image as a competent fighter against it 


Pankaj Sharma
28 April 2019

Never before has any Indian Prime Minister tried taking political advantage of terror blasts in any other country the way Narendra Modi is busy doing during his electioneering for the Lok Sabha elections. In the garb of condemning terror attacks on Sri Lanka, Modi is asking people to vote for his Bhartiya Janata Party to eradicate terrorism. As people say 'yes' upon being asked by him if they think that terrorism should be completely wiped off, keeping aside all the decency of public life, he asks if there can be anyone other than Modi who can fight terrorism? Modi tells people in his election rallies that a vote for BJP is a vote to destroy terrorism of the sort Sri Lanka has suffered. Also Read - Nursing grievances His mention of Sri Lanka blasts is a part of his ongoing efforts to exploit high-octane nationalism by adding more fuel to an already ugly politics of patriotism and national security. To turn the national conversation away from its spotty economic record, BJP has made every effort to exploit issues related to Pakistan and China too in the past few months. Also Read - A defeated purpose After terror attacks in Sri Lanka, there are pertinent questions floating in the skies across the world. The first and foremost question is who is really behind the attacks carried out by National Thowheed Jamath (NTJ), an Islamist terror group? According to Sri Lankan authorities, NTJ has multiple links to foreign countries. Sri Lanka's Muslim population is less than 8 per cent of the country's entire population. Therefore, it is not easy for any local Islamist group to stage such massive attacks. An attack of this magnitude is not possible without the active involvement of a foreign state or state intelligence agency. Which could be that country? Which could be that state intelligence agency? There are reports that the Indian government had sent at least 10 very serious advisories to Sri Lankans based on intelligence inputs about the plans of terror attacks during the past several weeks. India has been actively assisting Sri Lanka in countering terror outfits since the days Rajiv Gandhi was Prime Minister. I recall the days of 1987 when I covered the operations of Indian Peace Keeping Force (IPKF) against Liberation Tigers of Tamil Elam (LTTE) in the forests of Jaffna. I spent days and nights with the soldiers and interviewed Maj. Gen. Amarjit Singh Kalkat who was heading the IPKF in Sri Lanka and retired as a Lt. General. Vested international interests are busy throwing various mischievous theories and raising questions about the timing of attacks in Sri Lanka. They argue that as Sri Lanka defeated LTTE years ago, the atmosphere of peace that had prevailed may well have created a false sense of security that was ripe for exploitation. They are trying to connect the dots that suit them. Sri Lankan episode needs an answer for several questions. Why Easter bombings that killed more than 350 people in Sri Lanka including foreign nationals received far less foreign media coverage than Christ Church terrorist attack? Why was the intelligence warning which came on April 4 ignored and even withheld according to Sri Lankan minister Lakshman Kiriella? Why ISIS claimed the responsibility after three days of the terrorist attacks? How ISIS, which is decimated in the Middle East, managed to carry out such massive coordinated attacks in Sri Lanka? These are the questions circulating at different forums of media — print, tv and social digital handles. It is still not clear if the Sri Lankan suicide bombers planned and executed the attacks since the Christchurch killings or if they were planning such bombings for a longer period and then linked it to Christchurch. It is also not clear why Sri Lanka has been chosen when it doesn't have anything to do with the Christchurch shootings. Nor has it played any role in the West's wars in the Muslim world, a common excuse the IS gives for its attacks on western countries and civilians. Sri Lanka also doesn't have a history of Islamist terror. Though IS does not actually represent the victims in New Zealand, they perceive the Christchurch killings as an attack on Islam. So, for a self-proclaimed defender of the faith, they are 'duty-bound' to retaliate. IS believes in the philosophy that an act against Islam by Christians is not an act of just one terrorist but a crime committed by 'crusaders' and 'Romans'. Therefore, IS, as the 'true believer' of Islam has to punish them. This mindset gives IS a free hand to take action against Christians anywhere in the world. IS operated through a centre-periphery model. Its 'centre' was the seized territories of Syria and Iraq — the proto-state from where 'Caliphate' functions. Rest of the world is the 'periphery' where recruits could be found. The IS' centre has now been decimated. The Kurdish militia in Syria, and the army and the Shia militia in Iraq have destroyed IS bases from where Abu Bakr al-Baghdadi ruled. But despite the destruction of its organisational structure, its ideological apparatus is intact. Sri Lanka carnage compels us to develop a deeper understanding of terrorism itself. We have to ask serious questions about ISIS because it has claimed the responsibility for the carnage. How did ISIS emerge? Who is helping to sustain ISIS? Who created Daesh? Who sired Al-Qaeda? It is not a hidden fact that many of the terror outfits we know today are linked to geopolitics and the pursuit of global dominance and power. So, could there be any China hand, even remotely, behind the attacks on Sri Lanka because it has been seeking to manipulate the power balance in Sri Lanka for a long time now? A section of Sri Lankan leaders has been resisting these attempts because they are in favour of an independent foreign policy that aims at securing win-win situation with India, China, and Pakistan. Or, could there be a Pakistan hand, through its 'non-state actors'? Pakistan these days is playing the same games for China that it has been playing for the USA until a few years back. Indian and Sri Lankan security apparatus are probing links between Pak-based terror groups and Lankan extremist groups. No one can say that this is a lone wolf attack. Unless experienced hands are involved, it is impossible to acquire the quantum of explosives used in the attack. The precision with which attacks were made also indicate the role of experienced hands. This type of attack requires extensive training. In this context, there is a need to probe the links between Lankan extremist groups and extremist elements in South East Asia and Maldives. Terrorism has once again shown it is prepared to stop at nothing in creating human victims. An end must be put to this. It cannot be done by making it an election issue to fetch votes in favour of a particular political party. Prime Minister Modi must focus on solving the Sri Lankan puzzle with required seriousness so that India could be saved from such attacks. Even during electioneering, he needs to behave as the Prime Minister of India and not as a 'swayamsewak' or merely a BJP leader. (The author is Editor & CEO of News Views India and a national office bearer of the Congress party. The views expressed are strictly personal)

http://www.millenniumpost.in/opinion/sri-lanka-no-election-gimmick-350869?fbclid=IwAR2cbaiBWXyFTcOLyLp2i0_MTiBjjRY-_KcVP7Wtyq3Xasjay7mw5R91pPU

China on the lookout

Beijing’s concern over India’s new government is futile unless it diligently stresses on improving bilateral relations with New Delhi 


Pankaj Sharma
21 April 2019 

The ongoing elections in India are being closely watched around the world, but Beijing is the keenest watcher of them all. The foremost concern for China is of what policy any new government in New Delhi will adopt towards Beijing. China is worried about the image it carries among the Indian people and trying very hard to improve its overall perception before Chinese president Xi Jinping visits India at the end of this year after the political sky is clear. Also Read - Nursing grievances In the last few years, India-China relations have gone through a tumultuous phase. A series of disputes between the two countries have been instrumental in provoking anti-China sentiments among the Indian masses. China's fervent opposition to India's potential membership in the Nuclear Suppliers Group (NSG); Beijing's shielding of Pakistan and blocking Indian efforts within the UN to designate the Pakistan-based terrorist, Masood Azhar, head of Jaish-e-Mohammed (JeM), as a global terrorist; the Doklam crisis that went on for more than two months; and India's open opposition to China's Belt and Road Initiative (BRI) have created a strong feeling of trust deficit in common Indian minds. Also Read - A defeated purpose These incidents have cast a long shadow on bilateral relations. Following the Doklam conflict and the BRICS Summit thereafter, both New Delhi and Beijing took some steps to stabilise the relationship. But with the bitterness in ties and the continuing competition between China and India, there was no significant effect in improving the relations. Both countries still need to make herculean efforts to lay a strong foundation for improving meaningful relations that are sustainable for the future. In the backdrop of the bumpy road on which China and India drove their diplomatic vehicles in the past few years, it is natural that China is deeply concerned about its future interests in India. Prime Minister Narendra Modi's foreign policy has been largely about managing China's rise. Very few of the many expectations that were raised by Modi's taking over in the economic sphere have been met. As chief minister of Gujarat, Modi had an image of a business-oriented leader who had actively sought and received large-scale investments from China. However, Modi as prime minister could not attract many Chinese investments. The Chinese president made several economic promises during his first state visit to India after Modi took over, but none of them materialised over a period of five years. Setting up of two industrial parks in Gujarat and Maharashtra and USD 20 billion investment in five years have yet to see the light of the day. 'Make in India' also received only lip service from the Chinese. Therefore, the results of the Indian general elections are consequential from the Chinese perspective. In my opinion, no matter who comes to power, Beijing should expect a continuation of difficult relations with India, unless Chinese leadership decided to address the real issues. New Delhi will always be capable of maintaining a sustained focus on foreign policy, including its dealings with China. During my last visit to Beijing, I could observe a shadow of pretention among Chinese scholars and researchers that regardless of the election results, relations between the two countries will keep developing in the future. They spared no opportunity to indicate that no matter which party is at the helm of affairs after the general elections in India, China will be able to ensure its share of dividends in the region. Initially, the discourse during election campaigns was dominated by Pakistan and China both and we would be witnessing its glimpses in coming days too. More than Modi it is because of the structural realities surrounding India. But yes, Modi has been sparing no stone unturned, in positive as well as negative direction, to take political advantage of it since he became the prime minister. He made efforts to give hype of all his positive and negative moves vis-à-vis relationships with Pakistan and China. Whoever comes to power would be forced to deal with the consequences of China's rise. Managing the China conundrum would be any Indian government's first priority. Modi, in his election campaign, is defining India's relations with China and Pakistan in such a way that even after a change of government it would not be easy for any prime minister to immediately adopt a softer line for improving relations with these two neighbours. Those who dislike Modi are in the open in full force and those who idolise him are rallying strongly. Irrespective of the fact that Modi is liked or disliked and whether he again holds the reins or sits in the opposition, his imprint on the (failed) foreign policy will not disappear easily. In his zeal to project India on the global stage, to give the nation a new voice on international forums, to make the world listen to India's aspirations and to show strongly that his foreign policy is distinct from the past, Modi has set such benchmarks that any other government will have to initially follow the similar diffidence with much more confident assertion in the name of Indian interests. Therefore, as India assesses its strategic environment, its political leadership, irrespective of party affiliations, it will have to contend with the China factor more and more. New Delhi's outreach both towards the East and the West will be heavily circumscribed by the growing Chinese footprint. India's engagement with Washington has been shaped by the conviction that India and the United States have overcome "the hesitations of history". To reach this level of diplomatic understanding between China and India, Beijing and New Delhi will have to walk hundreds of extra miles. The recent indications from Chinese leadership have risen some hope in this direction but consistency factor remains to be gauged. China needs to review its opinion on India's Indo-Pacific vision. It also has to address the concerns of the Association of Southeast Asian Nations (ASEAN). It must realise the need to emphasise on the cultural connection to reach out to its neighbours. China has to be positive when India reimagines its strategic geography towards the Bay of Bengal. It is not only China's prerogative to have a central role in the region. India equally has a right to stretch from the shores of Africa to those of America. India's growing footprint and diplomatic engagement in the Middle East and its attempts to deliver connectivity from Southeast Asia to Africa underscore this. The Communist Party of China's (CPC's) mouthpieces now regularly carry reports of elections being held in India. The criticism both overt and subtle that is found in Chinese analyses of Indian elections reflects the CPC's insecurities. Let's hope, China will walk on the path of mutual understanding between our two countries with more maturity and sincerity in times to come. (The author is Editor & CEO of News Views India and a national office bearer of the Congress party. The views expressed are strictly personal)

http://www.millenniumpost.in/opinion/china-on-the-lookout-349890?fbclid=IwAR0vjVv0wn-5EjhgxzOwxtbszYRH9rvgBi-FlFw8_sV1u9NQkZgAyF8trZY

A pattern from Kargil to Balakot

BJP’s determination to extract political mileage by politicising military ventures is detrimental to the roots of our democratic polity 

Pankaj Sharma14 April 2019 

http://www.millenniumpost.in/opinion/a-pattern-from-kargil-to-balakot-348914

A pattern from Kargil to Balakot BJP’s determination to extract political mileage by politicising military 
ventures is detrimental to the roots of our democratic polity Pankaj Sharma14 April 2019 11:01 PM Nothing could be more serious than the fact that for the very first time in the history of Independent India, eight former service chiefs, including another around 150 veterans, had to write a letter to the President and Supreme Commander of the Armed Forces Ram Nath Kovind, urging him to intervene against politicisation of the military in the Lok Sabha elections. Though the letter endorsed by 156 prominent army-men requests the President to take all necessary steps to 'urgently direct all political parties' that they must forthwith desist from using the military, military uniforms or symbols and any action by military formations or personnel for political purposes or to further their political agenda, the timing of the letter clearly shows that the army veterans are deeply upset with Prime Minister Narendra Modi's appeal to first time voters to dedicate their vote to the memory of Balakot and Pulwama. Modi had even gone to the extent of telling the young voters that if they will push the lotus symbol in EVMs, their vote will directly reach him. Also Read - Nursing grievances Election Commission has also expressed serious displeasure on Modi's speech in an election rally at Latur in Maharashtra in which he made every effort to take political advantage of the unfortunate incident in Pulwama and a fitting reply by Indian army in Balakot. Prime Minister Modi shows no sign of any hesitation in tearing apart the election code of conduct whenever he gets an opportunity to attract voters. At different times during assembly elections held in the past five years, he never bothered to respect the basic spirit of elections in a democracy. Also Read - A defeated purpose Modi has within him strong defiance for any democratic norm. He always tried to take political advantage of the achievements of Indian Forces after taking over as the Prime Minister. I recall the last day of January 2017, when the then President Pranab Mukherjee mentioned about the surgical strikes in his address to the joint session of Parliament. Modi thumped his desk the loudest and his body language was giving all the credits to this achievement to himself. After September 2017 surgical strikes by the army across the Line of Control, Modi has spared no stone unturned in making such actions the central theme of his government's stellar achievements. Prime Minister Modi never bothered to consider the negative consequences of using military operations to garner votes for his Bhartiya Janta Party. Even his lieutenants such as Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Aditya Nath have gone to the extent calling the forces as "Modi ki Sena" without giving a thought that it will impinge adversely on the moral and fighting efficiency of those who selflessly serve the nation in uniform. On this, Union Minister (Retd.) Gen. VK Singh also had to criticise his party fellow UP Chief Minister. Modi government had also turned a deaf ear to 21 opposition parties who condemned the blatant politicisation of the armed forces and criticised Modi for not convening an all-party meeting amid the rising Indo-Pak tensions. Modi does not believe in the principle that national security must transcend narrow political considerations. BJP president Amit Shah had announced at the time of the elections in five poll-bound states that two key planks of his party's electoral campaign would be demonetisation and surgical strike. But then he chose to sideline the demonetisation issue as it was heavily counter-productive and BJP focused on singing the song of surgical strikes. Similar is the situation in ongoing general elections. BJP is busy snatching the credit of various important security operations from the armed forces and scientists and adding it to its political kitty. The real issues of ruined economy, worst job market, inflation, social disharmony and rise of crony capitalism have deliberately been washed away from the national discourse. Some may argue that when Manohar Parrikar is no more amongst us, it is unfair to make any comments on him, but let us not forget how he has been credited with planning and conducting the surgical strikes of 2017, which he also had attributed to his 'RSS training'. The fact is that Parrikar those days was spending more time in Goa for the preparations of Assembly elections than in strengthening the country's defence. I have no idea what is there in Modi's mind for the warriors of Balakot? But you may like to recall that how one-and-a-half year back he could make the surgical strikes the most highly decorated single operation in the history of Indian army by giving 32 awards to personnel who carried out the plan. Soon after that when Parrikar attended a BJP rally at Lucknow, the banners and posters carrying the pictures of director-general of military operations Lieutenant General Ranbir Singh, who was the public face of the surgical strikes, surrounded by the photographs of Modi, Shah and Parrikar were seen at the rally venue and all over Lucknow streets. That was a trailer of BJP's keenness for the politicisation of army. The current general election is watching a full feature film of this mindset. It is not accidental that Modi has demanded the votes from first-time voters as a return gift to him for what he has done in Balakot. He wants them to believe that only he can ensure India's safety and security. There is a particular pattern from Kargil to Balakot through which BJP tries to fetch votes in its favour. By creating a political hype of army operations, the issues of colossal intelligence failures at strategic and tactical levels are brushed aside. BJP's determination to extract maximum political mileage from military achievements is dangerous. We sleep safely at night because tough men stand ready all the time, but we spent sleepless nights when we see people weakening the very roots of our democratic polity by misusing army ventures to harvest their political aims. Enlightened leadership is always spiritual—spirituality not as some kind of religious dogma or ideology but as a domain of awareness. Our political system is fast losing the values of goodness and compassion. Unless we have insight and focused attention to change the scenario during this general election, the Indian dream will shatter for decades to come. Therefore, the electorate, especially our first-time voters have much more responsibility this time. Let's hope for the best! (The author is Editor & CEO of News Views India and a national office bearer of the Congress party. Views expressed are strictly personal)


Sunday, March 31, 2019

गंगा मैया, प्रियंका गांधी और नया व्याकरण


पंकज शर्मा

पंकज शर्मा

    पांच साल पहले नरेंद्र भाई मोदी को गंगा ने बुलाया था या वे मान न मान, मैं तेरा मेहमान बन बैठे थे, कोई नहीं जानता; मगर कहीं इस बार प्रियंका गांधी को गंगा मैया ने बनारस बुला लिया तो सचमुच कोई नहीं जानता है कि नरेंद्र भाई का क्या होगा? अगर ऐसा हो गया तो वे अपनी छप्पन इंच की छाती पीटते-पीटते अट्ठावन साल पहले आई फिल्म ‘काबुलीवाला’ का गीत ‘गंगा आए कहां से, गंगा जाए कहां रे’ गा रहे होंगे। गंगा की लहरों से उठ रही प्रियंका के नाम की गूंज से नरेंद्र भाई के चेहरे पर उठ रही हवाइयां अब दूर से नज़र आ रही हैं।
    नरेंद्र भाई तो नरेंद्र भाई, प्रियंका के मैदान में आने की ख़बर से मैं ने अटल बिहारी वाजपेयी तक को बेतरह चिंतित होते देखा है। यह बीस बरस पुरानी बात है। तब मैं नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता था। 1999 के सितंबर-अक्टूबर में लोकसभा के चुनाव होने वाले थे। सोनिया गांधी इसके डेढ़ साल पहले ही कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं। वे चुनावी दौरे कर रही थीं। इसी बीच उनके एक बेहद नज़दीकी नेता ने एक शाम मुझे बुलाया और चुपचाप मेरे कान में कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के ख़िलाफ़ लखनऊ से प्रियंका को मैदान में उतारा जा रहा है। प्रियंका तब 27 साल की थीं, लोग तब भी उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखते थे और सभी को लगता था कि वे राजनीति में आएंगी तो कांग्रेस के पक्ष में एक आंधी उठेगी।
    मुझे यह जानकारी देने वाले सज्जन आज भी मौजूद हैं और वे नेहरू-गांधी परिवार के इतने नज़दीक थे कि इस सूचना को नवभारत टाइम्स के पहले पन्ने की पहली सुर्खी बनाने के लालच से कौन संवाददाता या संपादक बच सकता था? सो, अगली सुबह अख़बार के सभी संस्करणों में यह ख़बर छपते ही हंगामा हो गया। अटल जी से मेरा मिलना-जुलना होता रहता था। उन्होंने मुझे फ़ोन कर के ख़बर का स्रोत्र जानने की बड़ी कोशिश की। उनकी आवाज़ में फ़िक्र का साया था। मैं ने उन्हे बताया कि मुझे जिसने बताया है, उसके बाद इतना ही बचता है कि ख़ुद सोनिया जी मुझे यह बतातीं। अटल जी की चिंता कुछ और बढ़ गई। हालांकि बाद में प्रियंका के बजाय डॉ. कर्ण सिंह से उनका मुकाबला हुआ और अटल जी क़रीब सवा लाख वोट से जीत गए।
    दो दशक बाद आज भी प्रियंका किसी भी नरेंद्र भाई की नींद उड़ा देने का माद्दा रखती हैं। इसलिए बनारस में सुनाई दे रही उनकी पदचाप से भारतीय जनता पार्टी की टांगें कांप रही हैं। मत भूलिए कि पांच साल पहले बनारस के घाटों ने जब नरेंद्र भाई को पौने चार लाख मतों के अंतर से जिता कर भेजा था, तब भी अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को मिला कर क़रीब साढ़े तीन लाख वोट मिल गए थे। वह नरेंद्र भाई के उफ़ान का चरम-काल था। उनकी वजह से वह भारतीय जनता पार्टी के चमचमाने का भी स्वर्ण-युग था। आज नरेंद्र भाई की वजह से नरेंद्र भाई की चुंबकीय शक्ति भी अपने सबसे निचले पायदान पर पड़ी छटपटा रही है और भाजपा भी चर्रमर्र-चर्रमर्र कर रही है। ऐसे में बनारस इस बार नरेंद्र भाई की झोली पिछली बार की तरह सवा छप्पन प्रतिशत मतों से भरने से तो वैसे ही रहा! और, कहीं अगर प्रियंका ने बनारस के घाट पर अड्डा जमा लिया तो भागीरथी की लहरें भी ऐसे धर्म-संकट में पड़ जाएंगी कि क्या कहूं!
    उत्तर प्रदेश में दो साल पहले हुए विधानसभा के चुनावों के दौरान बनारस में रहा भाजपा का अंकगणित भी ठीक से समझ लीजिए। बनारस लोकसभा की पांच विधानसभा सीटों में से चार पर भाजपा जीती थी और एक पर अपना दल। चूंकि अपना दल भाजपा के ही साथ था, इसलिए पांचों पर भाजपा को ही जीता मानें। लेकिन क्या अब अपना दल भाजपा के साथ है? सेवापुरी विधानसभा क्षेत्र में अपना दल के उम्मीदवार को क़रीब एक लाख वोट मिले थे। वहां समाजवादी पार्टी और बसपा के उम्मीदवारों को तब 90 हजार वोट मिले थे।
    बाकी चार विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा जीती थी। रोहानिया में भाजपा प्रत्याशी को 1 लाख 20 हजार वोट मिले थे और सपा-बसपा के उम्मीदवारों को 93 हजार। बनारस-छावनी में भाजपा को 1 लाख 32 हजार वोट मिले थे। वहां कांग्रेस और बसपा के प्रत्याशी 86 हजार वोट ले गए थे। बनारस-दक्षिण से भाजपा को 92 हजार वोट मिले थे और कांग्रेस-बसपा को 81 हजार। बनारस-उत्तर से भाजपा को 1 लाख 16 हजार वोट मिले थे और कांग्रेस-बसपा को 1 लाख 3 हजार।
    यानी 2017 में पांचों विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा और उसके समर्थक अपना दल को 5 लाख 60 हजार मत मिले और उसके विरोधियों को 4 लाख 53 हजार। सो, नरेंद्र भाई भले ही 2014 में बनारस से पौने चार लाख वोट से जीत गए हों, दो साल पहले तो उनके लोकसभा क्षेत्र में भाजपा सिर्फ़ 1 लाख 7 हजार वोट से ही आगे थी। प्रधानमंत्री के सिंहासन की तरफ़ नरेंद्र भाई को कूच करता देख बनारस ने उन्हें 5 लाख 81 हजार वोट दे डाले थे, लेकिन दो साल पहले उनकी लोकसभा सीट पर भाजपा-अपना दल के उम्मीदवारों को 5 लाख 60 हजार वोट ही मिले। ऐसे में, अब रायसीना पहाड़ी से नीचे लुढ़कते नरेंद्र भाई को बनारस कितने वोट दे देगा? और, अगर सामने बनारसी साड़ी पहने प्रियंका खड़ी मिल गईं तो बनारस क्या करेगा?
    पांच बरस में नरेंद्र भाई ने भारत को जो नाच नचाया है, उसे इस चुनाव में मतदाता कैसे भूलेंगे? आख़िर तो हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। गंगा के बुलावे पर बनारस आए नरेंद्र भाई से अब तो, मुझे लगता है कि, गंगा भी आजिज़ आ गई होगी। गंगा मैया इस बार नरेंद्र भाई को कैसे पार लगाएगी? गंगा मैया में पानी रहने तक भाजपा की सियासी ज़िंदगानी रहने का ख़्वाब देखने के दिन मुझे तो अब लदते दिखाई दे रहे हैं। 
    बनारस लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवारी के लिए नामांकन दाख़िल करने का अंतिम दिन 29 अप्रैल को होगा। तब तक एक-एक दिन कइयों पर भारी है। जिन्हें प्रियंका का क़द नरेंद्र भाई से कम लगता है, उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि प्रियंका की सोच, नरेंद्र भाई की सोच से बहुत बड़ी है। पांच साल में हमने जैसा सियासी छिछोरापन देखा, क्या पहले कभी देखा था? सार्वजनिक तहज़ीब में ऐसे छिछलेपन का दौर क्या पहले कभी था? गरिमाहीन शूरवीरता से लबरेज़ कोई प्रतिनायक क्या हमारे जीवन में पहले कभी आया था? दूसरों की प्रतिभा और परिश्रम से मिले परिणामों को हो-हल्ला मचा कर अपने नाम लिख लेने की ऐसी हवस से क्या पहले कभी आपका साबक़ा पड़ा था? शत्रुतावादी सामाजिक विभाजन के ऐसे समय से क्या आप पहले कभी गुज़रे थे? बदलाख़ोरी के परपीड़क आनंद की शैया पर इस तरह लोटता क्या आपको पहले कोई मिला था? इस बेहाल-से मंज़र को बनारस के गंगा घाट अगर इस बार नहीं बदलेंगे तो कब बदलेंगे? इसलिए आपको दिखे-न-दिखे, मुझे तो गंगा की लहरों में एक नई रवानी दिखाई दे रही है। ऐसी रवानी, जो बनारस के ज़रिए पूरे मुल्क़ का सियासी-व्याकरण नए सिरे से लिखने वाली है। नरेंद्र भाई ने 50 दिन मांगे थे। अब सिर्फ़ 54 दिन शेष हैं। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    सियासी अवसाद के कुहासे में नरेंद्र भाई



    पंकज शर्मा

      अब से 61वें दिन नरेंद्र भाई मोदी रायसीना पहाड़ी स्थित अपने प्रधानमंत्री कार्यालय की सीढ़ियां उतर रहे होंगे। पुलवामा की घटना के बाद देश में लाए गए राष्ट्रभक्ति के प्रायोजित ज्वार के बावजूद, मुझे नहीं लगता कि, जुगल-जोड़ी की भारतीय जनता पार्टी ख़ुद-ब-ख़ुद 200 का आंकड़ा छू पाएगी। ऐसे में अपने सहयोगियों के बूते तक़रीबन 80 सांसदों का इंतज़ाम कर पाना पराक्रमी नरेंद्र भाई और बलशाली अमित भाई शाह के लिए भी नामुमकिन होगा। 
      ज़मीन पर तो यही लिखा है कि कांग्रेस की हालत कुछ भी सही, वह 135 का आंकड़ा छूने जा रही है। विपक्ष की भरभराहट कैसी ही सही, उसकी झोली में डेढ़ सौ से कम सांसद नहीं होंगे। सो, मई के चौथे गुरुवार को जब चुनाव नतीजे आएंगे तो नवग्रहों की समीकरण भाजपा के ध्वज की जगह विपक्ष के ध्वज-युग्म को सत्तासीन कर रहा होगा। नरेंद्र भाई तो नरेंद्र भाई, मैं ने भी सवा दो साल पहले तक कभी यह नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी ऐसे बेआबरू हो कर उन्हें हुकूमत के कूचे से बाहर जाना पड़ेगा। 
      मुझे लगता है कि चुनाव नतीजों के बाद नरेंद्र भाई ख़ुद ही सरकार बनाने का दावा पेश करने से इनकार कर देंगे। वे यह दांव दो कारणों से खेलेंगे। पौने दो सौ के आसपास लटकी भाजपा की सरकार किसी और की अगुआई में बने, यह नरेंद्र भाई को कैसे रास आएगा? वे जानते हैं कि उनके सहयोगी दल उनके बजाय किसी और को गद्दीनशीन करने की जुगत लगाएंगे। वे यह भी जानते हैं कि भाजपा के भीतर भी कुनमुनाहट होगी। इसकी काट उस मट्ठे से ही हो सकती है, जो सिहासन की जड़ ही सुखा दे।
      तो नरेंद्र भाई और उनकी हर बात पर हुंकारा भरने वाले भाजपा-अध्यक्ष करेंगे यह कि देश को याद दिलाएंगे कि भाजपा औरों से अलग है; उसके राजनीतिक मूल्य नैतिकता की चाशनी में पगे हैं; ठीक है कि भाजपा सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर उभर कर आई है और सरकार बनाने का दावा करने का पहला हक़ उसका है, मगर यह जनादेश मूलतः विपक्षी गठबंधन की सरकार के लिए है; हम चूंकि सत्तालोलुप नहीं हैं, सो, अपने को इस दौड़ से अलग करते हैं।
      तो न रहेगा बांस और न बजेगी किसी और की बांसुरी। जब तक नरेंद्र भाई हैं, किसी नितिन गड़करी, किसी राजनाथ सिंह या किसी क ख ग के होंठ बांसुरी को क्यों चूमें? अपना यह धोबियापाट आजमाने के लिए नरेंद्र भाई को यह उम्मीद भी प्रेरित करेगी कि विपक्षी गठबंधन की सरकार को अपनी हर तरह की विशेषज्ञता से वे डेढ़-दो साल में गिरा डालेंगे और फिर अकेले ही तीन सौ सीटों के साथ साउथ ब्लॉक पर चढ़ाई कर देंगे। 
      यह परिकल्पना जिन्हें अभी दूर की कौड़ी लग रही है, वे दो महीने बाद इसका हू-ब-हू मंचन देख रहे होंगे। भाजपा के अपने आप स्पष्ट बहुमत पाने की बात तो अब उसके घनघोर अंध-समर्थक भी नहीं कर रहे हैं। पितृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक का आकलन है कि भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ सवा दो सौ सीटों के आसपास पहुंचेगी। बाकी के 40-50 सांसद जुटाने की जुगत में अपनी फ़जीहत कराने के बजाय ख़ुद को ऊंचे नैतिक मूल्यों की खूंटी पर टांग लेना भाजपा को ज़्यादा सुहाएगा। डेढ़-दो साल का इतज़ार अभी की कूद-फांद से उसे बेहतर लगेगा। 
      इतना तो तय हो गया है कि इस बार के चुनाव नतीजों के रथ के पहिए डगमग-डगमग कर रहे हैं। देश को इस बार हिचकोली-सरकार मिलने जा रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी की सवारी से परेशान देश की पीठ का बोझ इन गर्मियों में हलका होने भर से ही क्या विपक्ष को चैन से सोने का अधिकार मिल जाना चाहिए? विपक्षी गठबंधन की सरकार चाहे कांग्रेस की अगुआई में बने या किसी क्षेत्रीय दल के नेतृत्व में, असली चुनौती तो सचमुच उसे बनाने और चलाने की ही होगी। हमारी आज की राजनीति में ऐसे कितने नीलकंठ हैं, जो निर्लिप्त भाव से ऐसे किसी भी यज्ञ में अपनी समिधा अर्पित करने की ललक लिए हों?
      आदर्श स्थिति तो यही होती कि विपक्ष का चुनाव-पूर्व महागठबंधन बन जाता। नरेंद्र भाई से भारत को मुक्त कराने की प्रतिज्ञा से बंधे तमाम दिग्गज जब पहले ही छिटके-छिटके फिर रहे हैं तो पता नहीं बाद में वे क्या करेंगे? जब सिर पर लटकी तलवार के ख़ौफ़ से भी उनके पल्लू साथ नहीं बंधे तो मतदान के जनवासे में जा रहे बाराती आगे की सप्तपदी संपन्न होने का भरोसा कैसे करें? पांच साल पहले सत्ता के सेहरे के पीछे से झांकते नरेंद्र भाई के चेहरे पर लट्टू भारत में 69 प्रतिशत मतदाता उन्हें नकार कर चले आए थे। इस बार तो तीन चौथाई से ज़्यादा मतदाता नरेंद्र भाई द्वारा देश को दिखाए ठेंगे के जवाब में उन्हें अपना ठेंगा दिखाने को तैयार बैठे हैं। ईश्वर करे कि विपक्षी एकजुटता की कमी का साया उनके क़दमों की चाल सुस्त न करे!
      मैं ने दो साल पहले लिखा था कि आज जिस भाजपा को सियासी लड़ाई के आयाम नरेंद्र मोदी-बनाम-राहुल गांधी करने में मज़ा आ रहा है, 2019 आते-आते वह इस विचार से भी थरथराने लगेगी। तब पूरी कोशिश होगी कि यह लड़ाई मोदी-राहुल के बीच न हो। वही हुआ है। पिछले डेढ़ साल में राहुल गांधी की त्वरा, उनके तेवर और उनकी तैयारी ने भारत का सियासी भूगोल बदल दिया है। इसलिए भाजपा ने पिछले कुछ महीनों में चुनावी युद्ध को ‘मोदी-बनाम-बाकी सब’ के कुहासे में लपेट दिया है। अगर सीधे राहुल सामने होते तो लोगों के मन में स्पष्टता ज़्यादा होती। ‘बाकी सब’ के गड्डमड्डपन का बिंदु भाजपा को अधिक फ़ायदेमंद लग रहा है।
      इसलिए समूचे विपक्ष की रणनीति इन दो महीनों में चुनावी दृश्य को लगातार और ज़्यादा स्पष्ट बनाने की होनी चाहिए। जितना ही यह होगा, उतना ही नरेंद्र भाई हांफेंगे। उनका मुलम्मा उतर चुका है। वे राजनीतिक अवसाद के दौर से गुज़र रहे हैं। उनके मन में सियासी क्षोभ के बादल घुमड़ रहे हैं। वे राजनीतिक किनाराकशी के हमले से जूझ रहे हैं। उनके भीतर का भय और असुरक्षा पूरी तरह सतह पर दिखाई देने लगे हैं। अगर इतने झंझावातों से घिरे नरेंद्र भाई के सामने भी आज का विपक्ष ताल नहीं ठोक पाया तो अब से पांच साल बाद ही उसके मरघिल्लेपन को किसका सहारा मिल जाएगा? नरेंद्र मोदी इससे कमज़ोर अब कभी नहीं होने वाले।
      इस वक़्त जनमानस मोदी के साथ नहीं है। वह मोदी से दो-दो हाथ करने पर उतारू है। लेकिन अगर विपक्ष अपने को इतने खानों में बांट कर रखेगा तो लोकतंत्र की दुर्दशा के पाप का भागी क्या कोई और होगा? इसलिए सयानापन अपनी-अपनी ढपली बजाने में नहीं, एक संयुक्त पक्का राग गाने में है। कितनी ही आलीशान दीवारें उठ जाएं, अगर उनके नीचे नींव का पत्थर नहीं होगा तो वे कितनी देर खड़ी रहेंगी? इसलिए यह समय अतिशय व्यक्तिवादिता के तालाब में डूब मरने का नहीं, सामूहिकता की उफनती नदी में बहने का है। वरना पतनाले के फिर वहीं गिरने का इंतज़ार कीजिए और अपने कर्म-फल पर बाद में विलाप मत कीजिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

      बीजिंग की दूरबीन से दिखती रायसीना पहाड़ी

       
      पंकज शर्मा
      पंकज शर्मा

        पिछले पूरे हफ़्ते मैं चीन की राजधानी बीजिंग में था। चीन की संसद--नेशनल पीपुल्स कांग्रेस--का सत्र चल रहा था। चीन की सर्वोच्च राजनीतिक सलाहकार समिति की बैठक भी इसी बीच बीजिंग में हो रही थी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग से लेकर तमाम बड़ी हस्तियों की यहां-वहां आवाजाही के चलते मुख्य सड़कें यातायात-जाम से कराह रही थीं। इसी आपाधापी के बीच मैं ने बीजिंग के 108 साल पुराने शिंघुआ विश्वविद्यालय के नेशनल स्ट्रेटजी इंस्टीट्यूट की एक संगोष्ठी में प्रमुख वक्तव्य दिया, चाइना इंस्टीटृयूट ऑफ कंटेपररी इंटरनेशनल रिलेशन्स की गोल-मेज चर्चा में शिरकत की और चीन में भारतीय मसलों की विशेषज्ञता रखने वाले आधा दर्जन अध्येताओं से अलग-अलग बातचीत की। 
        शिंघुआ विश्वविद्यालय ने अपने राष्ट्रीय रणनीति संस्थान का गठन छह साल पहले ही किया है। इसका काम एक वैश्विक संचालन मंडल की देखरेख में चलता है। अपनी शुरुआत के चंद बरस के भीतर ही इस संस्थान ने मशहूर थिक टैंक की विश्व-सूची में अपनी जगह बना ली है। मेरे लिए गोल-मेज चर्चा आयोजित करने वाला समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंध संस्थान तो दुनिया के इनेगिने थिंक टैंक में से एक है ही। इसमें 400 शोध-अध्येता और उनके सहकर्मी काम करते हैं। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच एक बड़े परिसर से संचालित होने वाले इस संस्थान में 11 अलग-अलग विभाग हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के मसलों पर गहन शोध के लिए एक अहम विभाग भी इनमें शामिल है। हालांकि इस संस्थान से जुड़ा कोई भी व्यक्ति आपको यह नहीं बताएगा, लेकिन असलियत यह है कि वह चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय से संबद्ध है और उसके पूरे कामकाज की देखरेख सीधे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति करती है।
        शिंघुआ विश्वविद्यालय की संगोष्ठी का विषय यह था कि चीन और भारत के बीच मीडिया के क्षेत्र में सहयोग की कितनी गुंज़ाइश है और इस दिशा में दोनों देश क्या कर सकते हैं? मैं ने अपने वक्तव्य में भारतीय मीडिया जगत के बारे में विस्तार से जानकारी दी। मुद्रित समाचार माध्यमों, टेलिविजन, रेडियो, ऑनलाइन मीडिया, सोशल मीडिया, वगैरह की प्रभावशाली उपस्थिति के बारे में बताया। पत्रकार संगठनों और मीडिया मालिकों के संगठनों के कामकाज पर अपनी बात कही। मीडिया संचालन से संबंधित नियम-क़ानूनों का ज़िक्र किया। भारत-चीन के बीच मीडिया-सहयोग की असीम संभावनाओं की बात करते हुए चीनी अध्येताओं को खुल कर बता दिया कि मेरे हिसाब से मीडिया के क्षेत्र में सहयोग सीधे तौर चीन और भारत के बीच बाकी संबंधों की सौहार्द्रता से जुड़ा है।
        संगोष्ठी के बाद मुझ से पूछे गए सवालों और मेरे जवाबों की एक बानगी देखिएः
        सवालः भारत का मीडिया चीन के ख़िलाफ़ एक मुहिम-सी क्यों चलाए रहता है?
        जवाबः ऐसी कोई मुहिम तो कभी हमारे मीडिया ने नहीं चलाई। लेकिन क्या हम अपने देश को यह नहीं बताएं कि चीन मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में अड़ंगे लगा रहा है? अगर आप डोकलाम में गड़बड़ करेंगे तो भारतीय मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि वह देश को असलियत बताए।
        सवालः लेकिन यह एकतरफ़ा नज़रिया है। ऐसे मसलों पर चीन की सोच कुछ और है।
        जवाबः तो आप भी अपनी सोच को अपने मीडिया में ज़ोरशोर से प्रचारित करते ही हैं। मेरा मानना है कि आतंकवाद जैसे मसलों पर अलग-अलग सोच होनी ही नहीं चाहिए। अगर भारतीय मानस में यह भावना पनपेगी कि चीन आतंकवाद के मामले में भारत के साथ नहीं है तो दूरियां बढ़ेंगी। इसीलिए मैं ने कहा कि जब तक बाकी क्षेत्रों में दूरियां दूर नहीं होतीं, मीडिया-क्षेत्र में सहयोग कहां से होगा?
        सवालः भारतीय मीडिया को दुराग्रही होने के बजाय सकारात्मक होना चाहिए।
        जवाबः भारत का मीडिया दुराग्रही नहीं है। मीडिया का काम तथ्यों को सामने लाना है। वही हम करते हैं। सकारात्मकता को नकारात्मकता में तब्दील करने का काम हमने कब किया? जब हमारे प्रधानमंत्री और आपके राष्ट्रपति की वुहान में अनौपचारिक बातचीत हुई तो भारत का मीडिया कई दिनों तक दोनों नेताओं की बलैयां लेता रहा। मैं ने देखा कि तब चीन के मीडिया ने उतना गर्माहट भरा रुख नहीं दिखाया था। वुहान भारत और चीन के संबंधों में सुधार का एक बड़ा क़दम था। चीन का मैं नहीं जानता, लेकिन इससे भारत के आम लोगों में आपके लिए अच्छे भाव उपजे। आपकी मजबूरियां होंगी, मगर ताज़ा आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान के साथ खड़े हो कर चीन ने भारतीय भावनाओं को फिर आहत कर दिया। ये हालात बदलने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत है।
        समकालीन अंतररराष्ट्रीय संस्थान की गोल-मेज चर्चा के केंद्र में राजनीतिक मुद्दे ज़्यादा थे। शोध-अध्येताओं के सवालों पर भारत में होने वाले आम चुनावों का घना साया था। वे मुझ से मेरा आकलन जानने की जुगत लगा रहे थे और मैं उनसे उनका आकलन जानने की कोशिशों में लगा था। इस चर्चा के दौरान चीनी अध्येताओं की कही बातों से मेरे सामने उनके आकलन के कुछ बिंदु स्पष्ट हुए। 
        एक, भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता काफी नीचे चली गई है, लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक दल वही होगी और जोड़-तोड़ के ज़रिए उसी के सरकार में आने की संभावनाएं ज़्यादा हैं।
        दो, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी भाजपा के किसी और नेता के लिए खाली करनी पड़ सकती है और इस दौड़ में नितिन गड़करी सबसे आगे हैं। हालांकि मोदी आसानी से यह नहीं होने देंगे।
        तीन, कांग्रेस पहले से काफी बेहतर नतीजे लेकर तो आएगी, मगर भाजपा से टक्कर में वह अभी काफी पीछे ही है।
        चार, राहुल गांधी पहले की तुलना में बहुत परिपक्व हो गए हैं, मेहनत भी बहुत कर रहे हैं, मगर उनकी पार्टी का संगठन इस मेहनत की फ़सल काटने में सक्षम नहीं है।
        पांच, भाजपा-विरोधी विपक्ष एकजुटता के मामले में पूरी तरह नाकाम साबित हो गया है, इसलिए भाजपा की अगुआई में फिर सरकार बनने की राह आसान हो गई है।
        छह, किसी भी राजनीतिक विचारधारा की हो, मगर भारत में किसी ढुलमुल गठबंधन की कमज़ोर सरकार के बजाय मज़बूत गठबंधन की सरकार बननी चाहिए ताकि पारस्परिक संबंधों से जुड़े मसलों पर त्वरित फ़ैसले लिए जा सकें। चीन की सोच है कि आख़िर तो पांच साल का समय बहुत लंबा समय होता है, जिसे अनिर्णय के झूले पर बैठ कर ज़ाया करना दोनों देशों में से किसी के लिए भी बुद्धिमानी नहीं होगी।
        हालांकि भारतीय मीडिया पिछले पूरे सप्ताह चीन से आ रहे इन संकेतों पर ख़ुशी बिखेर रहा था कि मसूद अज़हर के मसले पर 13 मार्च को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन तटस्थता दिखा सकता है, लेकिन भारतीय मसलों के कई चीनी विशेषज्ञों से मेरी अलग-अलग मुलाक़ातों में हुई बातचीत के बाद मेरे सामने यह साफ हो गया था कि चीन इस बार भी अपने पुराने रुख पर ही क़ायम रहेगा। वही हुआ।
        दिल्ली की सिंहासन-बत्तीसी का एक-एक अक्षर, बाकी दुनिया के साथ, बीजिंग की दूरबीनें भी बेहद संजीदगी से पढ़ रही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके सहयोगी संगठनों, भाजपा, कांग्रेस, ममता बनर्जी, मायावती और दक्षिण भारत के राजनीतिकों की हर क़दमताल को चीन के शोधार्थी इतनी गहरी नज़र से परख रहे हैं कि उनकी बातें सुन कर मैं ने कई बार अपनी ठोड़ी खुजाई। यह अलग बात है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे, बेल्ट रोड इनीशिएटिव और हिंद महासागर से लेकर श्रीलंका, मालदीव और नेपाल तक पर मेरी टिप्पणियों ने उन्हें भी बार-बार अपना सिर खुजलाने पर मजबूर किया। सो, चलते-चलते मैं ने उनसे कहा कि कहा-सुना माफ़। भूल-चूक लेनी-देनी। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

        देशभक्ति के अभिभावक बनिए, द्वारपाल नहीं


        पंकज शर्मा

          युद्ध-उन्माद के काले माहौल में अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को झूम-झूम कर विज्ञापन-कवि प्रसून जोशी की लिखी ‘मैं देश नहीं मिटने दूंगा’ गाते देख मेरे रोम-रोम में उठी तरंगें ऐसी अमिट होती जा रही हैं कि लगता है, पांवों में किसी ने अनवरत बजते रहने वाले घुघरू बांध दिए हैं। महायोगी कृष्ण की स्मृति में पग घुघंरू बांध जब मीरा ने नाचना शुरू किया तो आज तक नाच ही रही है। युगों बाद युद्ध-योगी नरेंद्र भाई के दिए घुंघरू बांध लेने के बाद हमारे पांव भी थकने का नाम नहीं ले रहे हैं। ईश्वर करे कि इसी नृत्य-मुद्रा में हमें मोक्ष-प्राप्त हो जाए।
          नरेंद्र भाई से पहले 13 लोग भारत के प्रधानमंत्री रहे, लेकिन क्या किसी ने इस तरह हमें खुलेआम मिट्टी की सौगंध खा कर यह ऐलान करने का पराक्रम दिखाया कि वह देश को नहीं मिटने देगा, देश को नहीं झुकने देगा? आज़ादी मिलते ही पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठ कर दी, मगर तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इतना तक नहीं किया कि अपने देशवासियों से कहते कि देश सुरक्षित हाथों में है। 1962 में जब चीन भारत पर चढ़ बैठा तो भी नेहरू ने सौगंध नहीं खाई। 1965 में पाकिस्तान से युद्ध हुआ तो लालबहादुर शास्त्री ने भी मिट्टी की सौगंध खा कर ताल नहीं ठोकी कि वे देश को नहीं मिटने देंगे। 1971 में फिर पाकिस्तान से लड़ाई हुई तो इंदिरा गांधी ने सबसे बड़ी ग़लती ही यह की कि बिना सौगंध खाए बांग्ला देश बना दिया। 1999 में करगिल की पहाड़ी को पाकिस्तान से मुक्त कराते वक़्त अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी माटी की सौगंध खाना भूल गए। आखिर हमारे नरेंद्र भाई को बार-बार मिट्टी की शपथ ले कर देश को इतना आश्वस्त क्यों करना पड़ रहा है?
          नरेंद्र भाई के सत्तानशीन होने के बाद, पांच बरस में, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में कम-से-कम दस ऐसे आतंकवादी हमले हुए हैं, जिनमें पाकिस्तान स्थित गुटों का हाथ रहा है। बुडगाम से ले कर जम्मू, गुरुदासपुर, पठानकोट, उरी, बारामूला, अमरनाथ यात्रा और अब पुलवामा तक इन हमलों के निशान अब भी बिखरे हुए हैं। ज़रा सोचिए तो सही कि अगर इस दौर में हमारे पास अपने पराक्रम के हाथी पर सवार एक प्रधानमंत्री न होता तो हमारा क्या होता? भारत का सिर न झुकने देने के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया? प्रधानमंत्री पद के अपने शपथ समारोह में तमाम गुज़ारिशें कर पाकिस्तानी हुक्मरान को लाए। बांहें फैला कर उनसे मिलने बिन बुलाए ख़ुद पाकिस्तान गए। जितने पापड़ बेल सकते थे, बेले।
          फिर नरेंद्र भाई को लगा कि भय बिन प्रीत नहीं होती है, सो, सर्ज़िकल स्ट्राइक के तमगे अपने सीने पर ज़ोर-शोर से टांगने का दौर आया। और, जैसा कि पांच साल से हो रहा है कि जो हो रहा है, पहले कभी नहीं हुआ था, तो पूरा मुल्क़ हकबका कर ये क़िस्से भी सुनता-सुनाता रहा। तब किसे पता था कि जिस राह पर हम चल पड़े हैं, वह अंततः तो उस युद्ध की तरफ़ मुड़ेगी, जिसकी शुरुआत भले ही किसी के भी हाथ में हो, उसका अंत किसी के भी हाथ में नहीं होगा। आख़िर हम वह युद्ध किस हवन कुंड से आहूत करेंगे, जो सभी युद्धों का अंत कर दे? तब युद्धोन्माद की आंच पर धधकती दो मुल्क़ों की देगचियों को फूटने से बचाने का कौन-सा नुस्ख़ा सियासी लुक़मानों के पास होगा?
          तो भले ही आज प्रसून जोशी की तुकबंदियों का ताबीज़ हम अपने गले में लटका लें, अपने गले उतार लें और दूसरों के गले भी डाल दें। इसलिए कि प्रसून की विज्ञापनी-पंक्तियों को हमारे प्रधानमंत्री के गले का स्वर मिला है, हम उनका मान रख लेंगे। ईंट-रोड़ी प्रतिभा की उपज ये पंक्तियां लिखी तो गई थीं नरेंद्र भाई के 2014 के आम-चुनाव के लिए। मगर किसे पता था कि पांच साल बाद हमसे इनका परचम माथे पर बांध कर घूमने की उम्मीद एकदम अलग संदर्भों में की जाएगी? मत-मैदान में दौड़ते हुए दूसरों से आगे निकलने की बिसात बिछाने के लिए की गई शाब्दिक पच्चीकारी को एक नए राष्ट्रगान में तब्दील करने की इस हिमाक़त पर भी जिन्हें खींसे निपोरने हों, निपोरें। मुझे तो इसकी ओट से दांत पीसता देश दिखाई दे रहा है।
          कौन कहता है कि भारत पर हमला करने वाले आतंकवादियों को नेस्तनाबूत करने में एक लमहे की भी देरी करनी चाहिए? कौन कहता है कि इस तरह की गतिविधियों के लिए अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने देने वाले पाकिस्तान से दो टूक बात नहीं होनी चाहिए? जब सब याद दिला रहे थे कि पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनय के गलियारों में बहुत रूमानी होने की ज़रूरत नहीं है, तब तो नरेंद्र भाई ’तुझको पुकारें मेरे गीत’ गाते झूम रहे थे। जब सब इशारे कर रहे थे कि भारत-पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास सुगम संगीत नहीं, पक्का राग है, इसलिए लंबे आलापों को सुनने-समझने की ज़रूरत है, तब तो नरेंद्र भाई ’मुझे रोके ना कोई’ की ताल पर थिरकने से नहीं अघा रहे थे। अब जब गोखरू के असली कांटे उनके बिछाए गलीचे की सतह फाड़ बाहर आ गए हैं तो वे किसे जतला रहे हैं कि देश नहीं झुकने देंगे?
          देश को तो देशवासी नहीं मिटने देंगे। अब तक देशवासियों ने ही देश को नहीं मिटने दिया है। हस्ती हमारी इसलिए नहीं मिटती है कि देशवासी कभी उनींदे नहीं होते। वे आज भी झपकी नहीं ले रहे हैं। वे खुली आंखों से सब देख रहे हैं। सब-कुछ। इसलिए देशवासियों के रहते देश कभी नहीं झुकेगा। देश, देशवासियों के हाथों में सुरक्षित है। नरेंद्र भाई, आप हैं, अच्छा है; कोई और भी होता तो देश सुरक्षित ही था; कोई और भी होता तो भी हम देश नहीं मिटने देते। और इसके लिए हमें किसी विज्ञापन-कवि के बिगुल-वादन से आत्म-बल हासिल करने की ज़रूरत नहीं थी। देशप्रेम की इतनी घुट्टी तो हर भारतवासी को हर मां अपने गर्भ में ही दे देती है कि बाकी पूरी ज़िंदगी उसे किसी सियासी च्यवनप्राश के सहारे की ज़रूरत न पड़े।
          नरेंद्र भाई, मैं पूरी शिद्दत से आपके साथ खड़ा हूं। भारत के उस प्रधानमंत्री के साथ, जिसने लालकिले से पहले भाषण में अपना यह दर्द बयां किया था कि ‘देश विभाजन तक हम पहुंच गए... ये पापाचार कब तक चलेगा? किसका भला होता है? बहुत लड़ लिया... बहुत लोगों को काट लिया... बहुत लोगों को मार दिया। एक बार पीछे मुड़ कर देखिए, किसी ने कुछ नहीं पाया है। ...पड़ौसी देशों के पास भी तो ग़रीबी जैसी ही समस्याएं हैं... क्यों न हम सभी सार्क देशों के साथ मिल कर ग़रीबी के खि़लाफ़ लड़ाई लड़ने की योजनाएं बनाएं... एक बार देखें तो सही कि मरने-मारने की दुनिया को छोड़ कर जीवित रहने का आनंद क्या होता है? ...मारने वाले से बचाने वाले की ताक़त हमेशा ज़्यादा होती है...।’
          लेकिन आप कहां भटक गए, नरेंद्र भाई? भारतवासी इस विचलन को भांप रहे हैं। पांच बरस में भारतीय लोकतंत्र ने अपने प्रधानमंत्री के बहकते क़दमों पर कई बार गौर किया है। बेसुरे क़दमताल पर देश ने अपने मौजूदा प्रधानमंत्री को कई बार आग़ाह किया है। लेकिन इस बार का विचलन भारत को बहुत नाज़ुक मोड़ पर ले जा रहा है। सो, देशभक्ति के द्वारपाल मत बनिए, हुजू़र; बनना है तो देशभक्ति के अभिभावक बनिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)