Saturday, January 2, 2021

लौट गया घर सांस-फ़क़ीरा


पंकज शर्मा

December 26, 2020

 

मुझे लगता है कि मोतीलाल वोरा जी को भी 48 बरस की अपनी कांग्रेसी सियासत में कई बार आत्मरक्षात्मक चतुराई से ज़रूर काम लेना पड़ा होगा, मगर उन्होंने जो कुछ हासिल किया, कुल मिला कर अपनी भलमनसाहत के चलते किया। मैं उन्हें सब मिला कर चार दशक तक दूर-पास से देखने के बाद इतना तो ज़रूर कहूंगा कि वे प्रपंची नहीं थे, वे छली नहीं थे और राजनीति के बीहड़-वन में उन्होंने अपने लिए एक पवनार-कुटिया बना रखी थी।

 

इसीलिए जिस सियासी भड़भड़ में अच्छे-अच्छे भी चूं बोल जाते हैं, वोरा जी तिरानबे पूरे करने तक भी पूरी तरह टिके रहे। पिछले तीन-चार साल में उनके शरीर ने थकान के संकेत देना ज़रूर शुरू कर दिया था, मगर उनके सभी मस्तिष्क-तंतु एकदम सिलसिलेवार थे, सटीक थे और वे स्मृतियों का अद्भुत संग्रहालय थे। उनकी अलविदाई का दर्द तो स्वाभाविक है, मगर इस बात का सुख भी है कि ईश्वर ऐसी रुख़सत बिरलों को ही देता है।

 

उनका जाना कांग्रेस ही नहीं, भारतीय राजनीति की, अभिभावक परंपरा की, अब इक्का-दुक्का बची, अंतिम मीनारों में से एक और का ढह जाना है। आजकल जो जितने भव्य कमरे में क़ैद हो कर बाहर जितने ज़्यादा पहरेदार खड़े कर लेता है, वह उतना ही कद्दावार लगने लगता है। इस हिसाब से वोरा जी का तो कोई कद था ही नहीं। मगर जिन्होंने भारतीय राजनीति की असली चौपालें देखी हैं, वे समझ सकते हैं कि बौनों के वर्तमान देश में वोरा जी सरीखे गुलीवरों की अहमियत क्या होती है। उनकी अनुपस्थिति से उपजी विपन्नता का अहसास हमारी सियासत के क्षितिज पर हमेशा अमिट रहेगा।

 

राजनीतिक होड़ की दौड़ के चलते कई अतिमहत्वाकांक्षी कांग्रेसियों को मैं ने वोरा जी की बेहद साधारण और संघर्ष भरी आरंभिक पृष्ठभूमि का मखौल बनाते कई बार सुना। अपने अंगने में आम-जन के प्रवेश पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले कुलीनों से लबालब भरी सियासत का पतनाला खुद के कपड़े गंदे किए बगै़र पार कर जाना आसान नहीं होता है। वोरा जी ने यह मुश्क़िल काम कर के दिखलाया। आपने भी बड़े-बड़े दलिद्दरों को छोटे-मोटे सिंहासन मिलते ही अभिजात्य होते देखा होगा। मगर वोरा जी ऐसों का ठोस-विलोम थे।

 

वोरा जी 52 बरस पहले दुर्ग की नगरपालिका के पार्षद बने थे। फिर मंत्री बने, मुख्यमंत्री बने, केंद्रीय मंत्री बने, राज्यपाल बने और 18 साल तक कांग्रेस जैसी पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे, मगर अपना काम उसी पार्षद-भाव से करते रहे। निष्ठावान थे, मगर चापलूस नहीं। विनम्र थे, मगर कायर नहीं। सहज थे, मगर चूं-चूं का मुरब्बा नहीं। बुद्ध थे, मगर बुद्धू नहीं। उनके पास समस्याओं के समाधान की काफी लंबी डोर हुआ करती थी। मगर समय आने पर वे जब दृढ़ हो जाते थे तो कोई उन्हें अपनी आन से डिगा नहीं सकता था।

 

ऐसे बहुत-से मौक़े आए, जब कइयों की हद से बाहर जाने वाली हरकतें वे ख़ामोशी से महीनों नहीं, बरसों झेलते रहते थे और जब-जब मैं कहता कि फ़ैसला लेने में हिचक क्यों रहे हैं तो कहते कि पंडित जी, कच्चे फोड़े का ऑपरेशन नहीं किया जाता। पूरा पकने दो पहले। और, मैं ने बहुत बार देखा कि वक़्त आने पर अच्छे-ख़ासे तुर्रमखानों का उन्होंने कैसे इलाज़ किया। वोरा जी से संपर्क-संबंधों का कैनवस अनंत-सा लगता है। इस पर पता नहीं कितने चटख, धूसर और म्लांत रंग बिखरे हुए हैं। वे परंपरावादी थे, लेकिन दकियानूसी नहीं। अपने को परिस्थितियों के मुताबिक़ और परिस्थितियों को अपने मुताबिक़ ढाल लेने की गोपनीय विद्या जानते थे।

 

पिछले कुछ बरस से देश की राजनीति के ज़िक्र होने पर उनके चेहरे पर असहाय मुस्कान जाया करती थी। कांग्रेस की भीतरी स्थितियों पर फ़िक्र की लकीरें उनकी पेशानी पर मैं ने कई बार देखीं, मगर उम्मीदों का झरना भी उनके अंदर समान गति से बहता रहता था। संस्मरण सुनाते रहते थे, लेकिन आत्मकथा लिखने को कभी तैयार नहीं हुए। अपने को अकिंचन बता कर यह बात टाल देते थे। कहते थे, छोड़ो, कौन पढ़ेगा? मैं हूं ही क्या? सोचता हूं, वोरा जी की तरह मन को मीरा और तन को कबीर बना लेने वाले कितने लोग आज के सियासी संसार में होंगे?

 

इस साल जून के महीने का दूसरा सोमवार था। मैं दोपहर सवा दो-ढाई बजे कांग्रेस मुख्यालय पहुंचा तो देखा वोरा जी अपने कमरे में अकेले बैठे हैं। कोरोना से सारी सड़कें और मैदान खाली थे। मगर वोरा जी हफ़्ते में दो-तीन दिन एआईसीसी आए बिना नहीं रहते थे। उस दिन की बातचीत में लगा कि वोरा जी ऊपर से ठहराव दिखा रहे हैं, मगर भीतर कुछ बेचैनी है। राज्यसभा का उनका कार्यकाल ख़त्म हो चुका था। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त हो गए थे। प्रशासन के प्रभारी महासचिव भर थे। बहुत देर की बातचीत के बाद मैं ने कहा कि आज आप कुछ परेशान से लग रहे हैं। बोले, अरे नहीं। अपने को क्या परेशानी? लोदी एस्टेट का घर खाली करना है, सामान पैक कराने में लगा हूं, तो थोड़ी थकान-सी हो गई है।

 

फिर बताने लगे कि जब मुख्यमंत्री था तो सब ने कहा कि भोपाल में एक मकान तो बनवा लो। मगर मैं ने कहा कि क्या करना है? दिल्ली रहा तो सब ने कहा कि यहां मकान ले लो। मैं ने कहा कि क्या करना है? रायपुर तक में अपना मकान नहीं बनवाया। अब दिल्ली में तो कोई काम मेरे लिए है नहीं। कुछ मुकदमों में फंसा हुआ हूं, बस। अब रायपुर चला जाऊंगा। वहां पूर्व मुख्यमंत्री के नाते सरकारी मकान मिल जाएगा। बचा-खुचा जीवन गुज़र जाएगा। नहीं तो दुर्ग जा कर रह लूंगा।

 

मेरा मन थोड़ा भारी हो गया। चार-छह दिनों बाद मैं अहमद पटेल जी के पास गया। उन्हें वोरा जी की चिंता बताई। कहा कि वे शायद अपने मुंह से नहीं कहेंगे, लेकिन उन्हें फ़िक्र है कि अब कहां रहेंगे। बाद में अहमद भाई वोरा जी से मिलने गए। अपने नाम से अतिथि-आवास आवंटित करा कर वोरा जी को दिया। लहीम-शहीम बंगले से निकल कर वोरा जी 7-साउथ एवेन्यू के छोटे-से भूतल फ्लैट में गए। अगस्त के पहले शनिवार की शाम मैं अहमद भाई से मिलने गया तो आधा वक़्त वे वोरा जी के परिश्रम और समर्पण की ही कहानियां सुनाते रहे।

 

अगस्त के ही अंतिम बुधवार को वोरा जी से मेरी अंतिम निजी मुलाक़ात हुई। सुबह साढ़े ग्यारह बजे मैं साउथ एवेन्यू गया। चाय पीने के बाद तम्बाकू वाला अपना पान खाया और मुझे बिना तम्बाकू वाला खिलाया। इधर-उधर की पता नहीं कितनी बातें कीं। हंसते रहे और बोले कि पंडित जी, जीवन ने सारे रंग दिखाए हैं। बताया कि किस तरह जो लोग आगे-पीछे घूमते थे अब मिलने तक नहीं आते हैं। कुछेक बड़े नामों के ताजा व्यवहार का ज़िक्र किया।

 

सालासार बालाजी से 51 किलोमीटर दूर निंबी जोधा गांव से चल कर वोरा जी कहां-कहां से गुज़रते हुए हमारे बीच से चले गए। कोई दस साल पहले बिग बाज़ार और फ्यूचर ग्रुप के मालिक किशोर बियानी ने अपने आलीशान दफ़्तर में शीशे के गिलास में चाय में बिस्कुट डुबा कर पीते-पिलाते मुझे बताया था कि उनका परिवार राजस्थान में लांडनू के पास उसी निंबा जोधा से बंबई आया था, जहांआपके वोरा जीजन्मे हैं। तब बियानी जी ने उस गांव का इतिहास बताया था कि कैसे 16वीं सदी में सबसे पहले जोधा राजपूत और निंबोजी बोहरा समुदाय के लोग वहां कर बसे थे।

 

उस मिलीजुली तहज़ीब से निकला एक सांस-फ़कीरा यह फ़ानी दुनिया छोड़ कर अंततः अपने घर लौट गया। ओम शांतिः!

एकल-संप्रभुता के पीछे से झांकता फूस-महल


पंकज शर्मा

December 19, 2020

 

सा खड़ूस होना भी किस काम का कि किसी की सुनूंगा ही नहीं। बड़ों की, बच्चों की। बस, अपने मन की करूंगा। बेर-केर का ऐसा संग आख़िर कब तक निभ सकता है? सो, तय मानिए कि सर्वसमावेशी, उदारमना, जनतंत्रप्रेमी और लिहाज़दार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को नरेंद्र भाई मोदी के रूप में मिलेअ्रंग्रेज़ों के ज़माने के जेलरनुमाप्रधानमंत्री के बीच की गलबहियां दस साल पूरे होते-होते तो आर-पार की हाथापाई में तब्दील हो जाएगी।

 

कोई माने--माने, नरेंद्र भाई और भारतवासियों के बीच खटपट की झलकियां तो 2017 के आरंभ से ही दिखनी शुरू हो गई थीं। ढोल-मजीरों की जिस शानदार प्रस्तुति के साथ, अब भूल साबित हो रहे, कमल के फूल 2014 में रायसीना पर्वत पर खिले थे, किसने सोचा था कि तीन साल बीतते-बीतते वे कुम्हलाने लगेंगे? मगर अपने ही बागबान की ऐंठन भरी तेज़ धूप ने उन्हें इतनी जल्दी झुलसाना शुरू कर दिया कि मार्गदर्शक-मंडली भी सिर्फ़ आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर पाई। इससे 2019 में नरेंद्र भाई के भावी आसार दरअसल इतने धूसर हो गए कि उन्हें अपनी वापसी के लिए तरह-तरह के तिलिस्म रचने पड़े। जो यह गाते ठुमक रहे हैं कि नरेंद्र भाई तो पहले से भी ज़्यादा सीटें ले कर लोकसभा में लौटे हैं, वे जिस अंकगणित पर फ़िदा हैं, उसका बीजगणित समझेंगे तो छाती पीटने लगेंगे।

 

चूंकि बीच की इबारत पढ़ने वाली ख़ुर्दबीन सब के पास होती नहीं और नगाड़ों का शोर अच्छे-अच्छों की आंखों पर परदा डाल देता है, इसलिए देखने में लगता है कि साढ़े छह बरस में भारतीय जनता पार्टी लगातार पसर रही है। मगर हक़ीकत यह है कि इस बीच वह सिमट-सिमट कर एक मुट्ठी में क़ैद हो गई है। भाजपा तो भाजपा, उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक स्वायत्तता खो बैठा है। एक ज़माने में अपनी मर्ज़ी से अपने स्वयंसेवकों को यहां-वहां भाजपा की मदद के लिए भेजने वाला संघ अब नरेंद्र भाई के सामनेजो हुकुम मेरे आकाकी मुद्रा में है। नरेंद्र भाई के पहले प्रधानमंत्री-काल में, उनके समेत सारे मंत्रियों को, सरकार के कामकाज का बहीखाता लेकर तलब करने की हैसियत रखने वाले मोहन भागवत अब बिना चूं-चपड़ किए बैठे रहने पर मजबूर हैं। उनके पास तो अब फ़रमान जाता है कि किस राज्य के चुनाव में भाजपा की हम्माली करने के लिए कितने हज़ार स्वयंसेवक भेजने हैं। इसके बाद भागवत के पास सिर्फ़ उनकी तैनाती भर का ज़िम्मा रह जाता है।

 

जब तक अमित शाह थे, तो वे तो फिर भी थोड़े-बहुत भाजपा-अध्यक्ष थे। मगर आपको क्या लगता है कि अब जगत प्रकाश नड्डा कमल-दल पर विराजे हुए हैं? अमित भाई के गुब्बारे को ज़रा पिलपिला करने के लिए नरेंद्र भाई के लच्छे से निकलेनड्डा जी आगे बढ़ो, हम आपके साथ हैंकी हवा से उनका गुब्बारा भले ही फूल गया हो, मगर असली सदरे-अजुमन कौन है, वे भी खूब जानते हैं। तो, भाजपा और संघ की शक्तियों का जिस तरह का केंद्रीयकरण नरेंद्र भाई ने स्वयं की एकल-संप्रभुता में कर लिया है, उस से अंततः होगा क्या? कोई मूढ़मति भी यह आसानी से समझ सकता है कि यह रास्ता सीधे उस खाई की तरफ़ जाता है, जिसमें समाने के बाद बाहर आना तक़रीबन असंभव हो जाता है। नरेंद्र भाई की लोकप्रियता का फुगावा जितना धुंधला होता जाएगा, भाजपा की चमक उतनी ही फीकी पड़ती जाएगी।

 

इन नौ महीनों में नरेंद्र भाई की आन-बान-शान में नौ गुनी कमी गई है। उनके अनुचरों का एक बड़ा तबका मन-ही-मन यह बात समझ कर उनसे छिटक भी गया है। अपने आराध्य के बचाव में सोशल मीडिया पर भाले ले कर घूम रहे लोगों की तादाद में सचमुच भारी कमी आई है। उनकी धार ऐसे ही कुंद नहीं हुई है। वे अचानक विनम्र यूं ही नहीं हो गए हैं। वे दरअसल सच समझ गए हैं। अति-उत्साह में अपने छले जाने का उन्हें अहसास हो गया है। जिसे उन्होंने नायक समझा था, वह प्रतिनायक निकला। वे एक नया ख़्वाब लेकर  जिस नायक के पीछे कूच करते हुए अपने घरों से निकले थे, उसकी रची भूलभुलैया से गुज़र लेने के बाद अब वे पश्चात्ताप-यात्रा पर हैं।

 

मैं जानता हूं, मेरी ये बातें अपनी स्थूल आंखों से अभी बहुतों को दिखाई इसलिए नहीं देंगी कि वे अपनी सूक्ष्म दृष्टि का इस्तेमाल करने से जानबूझ कर बचना चाहते हैं। आंखें बंद कर बघर्रे की उपस्थिति के भय को जितनी देर नकारा जा सके, वे नकारे रखना चाहते हैं। वे चुनाव नतीजों के आंकड़ों की स्वांतःसुखाय विवेचना कर उसकी मखमली रजाई में लिपटे रहना चाहते हैं। वे इस सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते हैं कि हर रोज़ हो रहा हिमपात जिस तरह के दक्षिणी धु्रव का निर्माण उनके लिए कर रहा है, वहां यह नश्वर लिहाफ़ ओढ़ कर वे चार लमहे भी नहीं बिता पाएंगे।

 

आख़िर तो सारे संसार को चलाने वाला तत्व भाव-प्रवाह ही होता है। भाव बिना भक्ति नहीं होती। भाव बिना प्रेम नहीं होता। भाव बिना काम नहीं होता। भाव बिना समाज नहीं होता। भाव बिना रिश्ते नहीं होते। भाव बिना युद्ध नहीं होते। भाव बिना तो शेयर बाज़ार तक नहीं चलता तो भाव बिना सियासत भला कहां से चल जाएगी? छल-कपट के उपादानों के चलते से ही सही, अगर एक भाव-प्रवाह ने जन्म ले लिया होता तो क्या नरेंद्र भाई गंगा-पुत्र बने इस तरह हस्तिनापुर पहुंच जाते? इस भाव-प्रवाह के झरने ने अब मुरझाना शुरू कर दिया है। नरेंद्र भाई सोचते हैं कि उनके सियासती आकर्षण पर पड़ चुकी झुर्रियों को वे लीप-पोत कर छिपाए रहेंगे। मगर ये लकीरें उनके चेहरे पर अब इतनी तेज़ी से गहरी होती जा रही हैं कि चेहरा दरकता साफ़ दिखने लगा है।

 

साढ़े छह साल में हर तरह की आंच का प्रबंधन करने में मिली सफलता ने नरेंद्र भाई के भीतर जैसा भरम भर दिया था, उसे किसानों के एक आंदोलन की शुरुआती लपटों ने ही गंगाघाट दिखा दिया। अपनी ज़िद के चलते वे भले ही किसानों को अपने ठेंगे पर रखे रहें, मगर इस ज़रा-सी चिनगारी ने साबित कर दिया कि नरेंद्र भाई का फुस-महल कितना भुरभुरा है। ज़रा सोचिए, अगर देशवासी सपनीले झक्कू में आते और कहीं 2016 की आठ नवंबर को रात आठ बजे के बाद उठ कर खड़े हो जाते तो क्या होता? ज़रा सोचिए, अगर छोटे कारोबारी 2017 की 30 जून की आधी रात के बाद सड़कों पर उतर आते तो क्या होता? ज़रा सोचिए, लॉकडाउन के कुप्रबंधन से त्रस्त एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूर रोते-कलपते पांव-पांव अपने-अपने घरों की तरफ़ जाने के बजाय दिल्ली की ओर चल देते तो क्या होता? नरेंद्र भाई के पराक्रम का ताशमहल तो इन छह सालों में कब का कई बार बिखर चुका होता। सो, अब तक की शांति-व्यवस्था का श्रेय देश की उस छाती के धैर्य को दीजिए, जिस पर मूंग दलने में एक अधीर शासक ने कोई कसर बाकी नहीं रखी।

 

किसी के सब्र का कहिए, चाहे किसी के पाप का मानिए, यह घड़ा अब भरने को गया है। जिन्हें उनकी सुल्तानी सनक यह अहसास नहीं होने दे रही है कि पानी अब गले-गले तक गया है, उनकी सलामती के लिए, आइए, दुआ करें! मेरा ये लेख सहेज कर अपने पास इसलिए रख लीजिए कि 2023 की पहली तिमाही में मैं आपसे इसे दोबारा पढ़ने का अनुरोध करूंगा। आज नहीं, मगर तब आपको महसूस होगा कि मैं ग़लत नहीं था।