Saturday, December 8, 2018

सामाजिक बोध के सूर्योदय का समय



पंकज शर्मा

    नरेंद्र भाई मोदी ने केंद्र की सरकार संभालने के बाद अपने प्रचार पर सरकारी ख़जाने से 50 अरब रुपए खर्च कर डाले हैं। इतना पैसा हमारे देश में ग़रीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों की एक हफ़्ते की ज़रूरतें पूरी करने को काफी था। भारत में 28 करोड़ लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे अपना जीवन गुज़ार रहे हैं। 32 रुपए रोज़ पर ज़िंदगी बसर करने वालों को ग़रीबी-रेखा से भी नीचे माना गया है। कुछ को लगता होगा कि इन अति-ग़रीबों को पांच बरस में पांच-सात दिन भी चैन के मिल जाते तो उनकी आत्मा प्रसन्न होती। लेकिन फिर जंगल में नाच रहे उपलब्धियों के मोर को आप कैसे देख पाते? 
    कइयों को ऐतराज़ है कि अपने किए-कराए के महिमा-मंडन पर नरेंद्र भई ने खर्च के सभी पुराने कीर्तिमान भंग कर दिए हैं। सो भी मामूली फ़र्क़ से नहीं, पूरी दुगनी छलांग लगा कर। ऐसा प्रचार-प्रिय प्रधानमंत्री भारत की प्रजा ने पहले कभी नहीं देखा था। सरकार ने तो नरेंद्र भाई के ढोल-तमाशे पर जो खर्च किया, सो किया ही; उनकी भारतीय जनता पार्टी ने भी उनका नगाड़ा बजाने में सब को दसियों कोस पीछे छोड़ दिया। आंकड़े कहते हैं कि नवंबर के महीने में तमाम प्रचार माध्यमों पर सब से ज़्यादा विज्ञापन भाजपा के थे। इतने कि अगली दस सीढ़ियों तक कोई और राजनीतिक दल खड़ा दिखाई नहीं दिया। और-तो-और, देश-दुनिया का कोई व्यवसायिक-उत्पाद भी भाजपा से होड़ नहीं ले पाया। हिंदुस्तान लीवर, सैमसंग, अमेजन और रामदेव का पतंजलि तक विज्ञापन देने के मुकाबले में भजपा से मीलों पीछे रह गए। पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में भाजपा ने टेलीविजन के बड़े-छोटे परदों पर, अख़बारों के पन्नों पर, राजमार्गों के होर्डिंग पर और डिजिटल-संसार की आभासी वैतरिणी पर सिक्के बरसाने में अपनी फ़राखदिली का चरम प्रदर्शन किया।
    जब ख़ुदा मेहरबान हो तो किसी को भी पहलवानी करने से कौन रोक सकता है? केंद्र की सरकार संभालने के बाद से भाजपा के ख़जाने की तरफ़ बह रही दान की रक़म ने भी बाकी सभी राजनीतिक दलों को बहुत पीछे खदेड़ रखा है। दूसरों को एक रुपए का दान मिलता है तो भाजपा को दस रुपए का। पुण्याई भले ही कमज़ोर को दान देने में मानी जाती हो, सियासत में दान उन्हें नहीं मिलता, जो कटोरा ले कर खड़े हों; ताल ठोकने वालों को मिलता है। अब आप भले ही कहते रहें कि ताल ठोक कर तो उगाही की जाती है, भिक्षा तो कटोरा ले कर ही मांगी जाती है। लेकिन जब दानवीर ऐसे हों, जिनकी अंटी दया और करुणा से भीग कर ढीली होने के बजाय लाल-लाल आंखें देख कर गांठहीन होती हो तो आप-हम कर भी क्या लेंगे?
    नोटबंदी से बिलबिला रहे देश में, गिरती जीडीपी से कराह रहे देश में, बढ़ती बेरोज़गारी से माथा पीट रहे देश में और चौपट होते उद्योग-धंधों से कंपकंपा रहे देश में एक राजनीतिक दल के गालों का गुलाबीपन देख कर मेरे तो होश उड़े हुए हैं। मेरी समझ में ही नहीं आ रहा कि आखि़र वह कौन चित्रकार है, जो अपनी रचना में ऐसा चमत्कार भर सकता है कि एक घर के बाकी कमरे तो सीलन भरे हों और उनमें पड़े लोग दम तोड़ रहे हों और एक कमरा ऐसा हो, जिसकी दीवारों से इतना ऐश्वर्य टपक रहा हो कि उसके रहवासी गले-गले तक गच्च हों! नरेंद्र भाई के भीतर मौजूद इस चित्रकार के इस चमत्कार को देखने के बाद मेरे हाथ तो अब अपने-अपनों के लिए कोई दुआ मांगने के लिए उठने से भी इनकार कर चुके हैं।
    हमारी सेना को तोपखाने के साज-सामान की ख़रीदी के लिए सौ अरब रुपए चाहिए। लेकिन सेना प्रतीक्षालय में बैठी है और नरेंद्र भाई के गुणगान पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। सेना को हैलीकाप्टर ख़रीदने के लिए साठ अरब रुपए चाहिए। वह प्रतीक्षालय में बैठी है और नरेंद्र भाई की जलवा-बखानी पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। एंटी-टैंक मिसाइलों की ख़रीद के लिए सेना तीस अरब रुपए मांगती रही और नरेंद्र भाई की मुंह-दिखाई पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। राइफलें ख़रीदने के लिए सेना तरस रही है और नरेंद्र भाई की रंगाई-पुताई पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। सरकारी प्राथमिकताओं का ऐसा नज़ारा आप ने पहले कभी देखा था?
    अपने सवा सौ करोड़ देशवासियों पर गर्व करते प्रधानमंत्री को देख कर मुझे भी गर्व होता है। वे मुझ पर गर्व करते हैं, मैं उन पर गर्व करता हूं। हम दोनों मिल कर उस भारत पर गर्व करते हैं, जो 70 बरस की भटकन के बाद अब जा कर संभला है। पांच साल में अगर नरेंद्र भाई ने इस देश के लालन-पालन में रातों की नींद न गंवाई होती तो क्या आज हम यहां होते? सो, अगर उन्होंने अपने कर्म-गृह की दीवारों पर लिखी इबारत को रोशनी से नहलाने में पचास अरब रुपए बहा दिए तो कौन-सा गुनाह कर डाला? आप तो उनकी पीठ थपथपाएंगे नहीं और उन्हें भी खुद की पीठ नहीं थपथपाने देंगे! यह क्या बात हुई? मैं तो मानता हूं कि लोकतंत्र में एक निर्वाचित प्रधानमंत्री का मूल कर्तव्य ही यह है कि जब लोगों को कुछ दिखाई न दे रहा हो तो वह उनकी आंखों में अपनी सारी उंगलियां डाल कर यह दिखाए कि उसके चलते देश चल कर कहां आ गया है।
    ‘श्रद्धा भाव लभते ज्ञानम’। गीता ने हमें बताया है कि जिसके अंतःकरण में श्रद्धा है, उसे आत्मज्ञान सहजता से हो जाता है। लेकिन कलियुग में लोग किसी के भी प्रति श्रद्धा कहां रखते हैं? फिर चाहे वह नरेंद्र भाई जैसा परोपकारी और पराक्रमी प्रधानमंत्री ही क्यों न हो! जब हमें ऐसे प्रधानमंत्री देखने की आदत ही नहीं है तो हुकूमत तो श्रद्धालुओं के निर्माण का अपना फ़र्ज़ पूरा करेगी ही। जनहित के ऐस कार्यों पर पचास अरब रुपए जैसी तुच्छ रकम खर्च करने पर जिन्हें दीदे बहाने हों, बहाएं। वैसे भी साथ तो कुछ जाता नहीं, सब यही धरा रह जाने वाला है।
    यह सियासी-हवस के अभूतपूर्व पोषण का समय है। यह भारतीय राज्य-व्यवस्था के रूपांतरण का संक्रमण-काल है। यह जनतंत्र के घंटाघर की सुइयों को अपने-अपने इशारे पर टिक-टिक करने को मजबूर करने का दौर है। इस समय-चक्र से फूटने वाला लावा क्या-क्या जलाएगा, पता नहीं। इससे उड़ने वाली राख की परतें क्या-क्या धूसर करेंगी, कौन जाने! सिर्फ़ इतना मालूम है कि हमें सपना देखते हुए नहीं मरना है। हमें नींद में नहीं मरना है। हमें डर कर नहीं मरना है। हमें रोज़-रोज़ नहीं मरना है। अगर यह समय मुनादी और नगाड़ेबाज़ी का है तो हम ही बिना मुनादी के क्यों मर जाएं? हम ही बिना अपना नगाड़ा बजाए रुख़सत क्यों हों? जन-मुक्ति के योद्धा क्या आसमान से उतरेंगे? उन्हें तो इन्हीं गली-मुहल्लों से निकलना होगा। इसलिए मैं तो मानता हूं कि यह समय जैसा भी है, सब के लिए है। सामाजिक-बोध का सूरज भी इसी दौर से निकलेगा। आपको दे रही है कि नहीं, मालूम नहीं, मुझे तो इसकी आहट सुनाई दे रही है। ( लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    सूंड में चींटी के प्रवेश का जीवंत नज़ारा



    पंकज शर्मा

      छह महीने में हुआ राहुल गांधी का रूपांतरण कुछ लोगों के लिए कल्पनातीत है। लेकिन पिछले कम-से-कम आठ साल से, और ख़ासकर पिछले साढ़े चार साल में, मैं ने बार-बार लिखा कि एक दिन आएगा कि राहुल गांधी सब को आंखें फाड़ कर उनकी तरफ़ देखने को मज़बूर कर देंगे। आज उन्हें देख कर सब अपनी आंखें मसल रहे हैं। उनके सियासी-विरोधी हक्काबक्का हैं। हर रोज़ फ़तवा जारी करने वाले मीडिया-पंडे चारों खाने चित्त हैं। कांग्रेस का वह तबका सुट्ट बैठा है, जिसने राहुल-राज की आंगनवाड़ी शुरू होते ही लोकसभा में 44 पर पहुंच गए आंकड़े के बाद अपनी पार्टी के पिंडदान का ऐलान कर दिया था।
      एक-एक डग भर कर राहुल आखिर अपनी संभावनाओं के उस मानसरोवर तक पहुंच ही गए, जिसके अभिमंत्रित जल के छिड़काव ने उनके बारे में तो देश की राय बदल ही दी है, हमारे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी की चालीसा के छंद भी नए सिरे से लिख दिए हैं। सब को च्यूंटी में मसल देने का पराक्रम दिखा रहे हाथी की सूंड में अंततः चींटी के घुस जाने का यह दृश्य भारतीय जनतंत्र के अब तक के इतिहास का सब से जीवंत नज़ारा है। 
      पांच प्रदेशों के लिए हो रहे विधानसभा चुनावों में दिखे राहुल के जज़्बे ने कांग्रेस की शिराओं में नई घुट्टी घोल दी है। नरेंद्र भाई की कनखियों के इशारे पर अमित भाई शाह के हस्ताक्षरों से चल रही भारतीय जनता पार्टी की नसें ढीली पड़ गई हैं। हथेली पर हथेली मार कर दूसरों की खिल्ली उड़ाने वाली जुगल-जोड़ी अपनी फ़ज़ीहत का अट्टहास दिनों-दिन नज़दीक आता देख रही है। पूरे दस दिन बाद ईवीएम से पांच राज्यों में जो घर्घर नाद सुनाई देगा, वह अगर अगले साल अप्रैल-मई का क़ौमी-तराना बन गया तो नरेंद्र भाई झोला ले कर अपने घर जा रहे होंगे।
      सियासत के ये बांस उलटे लदने ऐसे ही शुरू नहीं हो गए हैं। मैं जानता हूं कि मेरा यह कहना कइयों को नागवार गुज़रेगा कि अगर राहुल गांधी न होते तो चार बरस बीतते-बीतते नरेंद्र भाई का वापसी-सफ़र शुरू नहीं हो पाता। राहुल का सब से बड़ा योगदान यह है कि वे डटे रहे। वे डिगे नहीं। न परायों के मखौल की उन्होंने परवाह की और न अपनों की अवहेलना से वे विचलित हुए। इसलिए आज कांग्रेस की प्राण-प्रतिष्ठा का श्रेय अगर सोनिया गांधी के बाद किसी को है तो राहुल गांधी को। उनकी इस कुव्वत पर ज़्यादातर को भरोसा नहीं था। मगर अपनी बेलौसी और बेबाकी से राहुल ने यह कर दिखाया। 
      मैं यह मान कर चल रहा हूं कि विधानसभाओं के आने वाले नतीजे कांग्रेस को पुनर्स्थापित करेंगे। मैं यह भी मान कर चल रहा हूं कि लोकसभा के चुनावों में केंद्र में कांग्रेस-समर्थित सरकार बनने जा रही है। राहुल अभी प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं, इससे बड़ा सवाल दूसरा है। सवाल यह है कि कांग्रेस की जड़ों को सींचने का काम वे आगे कैसे करेंगे! मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भाजपा की विदाई हो रही है या वहां कांग्रेस की वापसी हो रही है? तैलंगाना में भाजपा के सहयोगी दल के दिन पूरे हो रहे हैं या कांग्रेस के दिन वापस आ रहे हैं? कांग्रेस आ रही है, लेकिन उससे ज़्यादा तेज़ी से भाजपा दिलों से उतरती जा रही है। आने वाले दिनों में राहुल को कांग्रेसी खेत में हल उससे भी ज़्यादा शिद्दत से चलाना होगा, जितनी निष्ठा से उन्होंने इन दिनों ‘चौकीदार’ का नक़ाब नोच कर उसे लाइन-हाज़िर करने की मुहिम चला रखी है।
      सांगठनिक सियासत की शुरुआती भूलों के अहसास ने राहुल की परिपक्वता में आमूल-चूल बदलाव ला दिया है। विधानसभाओं के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया में इस बार जिसके पास लाठी थी, भैंस उसी की नहीं हो पाई। उम्मीदवारी की एक चौथाई रेवड़ियां जिस पार्टी में आंखें बंद कर अपने-अपनों में बांट देने का बिचौलिया-दस्तूर था, उसमें अगर इस बार चंद मामलों को छोड़ कर टिकट ठीक लोगों को मिल गए तो इसका सेहरा राहुल के सिर पर बांधने में कंजूसी मत बरतिए। उन्होंने दृढ़ता से काम न लिया होता तो सेंधमार तो हमेशा की तरह अपनी बिसात बिछाने में लगे ही हुए थे। 
      बावजूद इसके, मैं यह कहने का जोख़िम लेने को तैयार हूं कि राहुल को अपने बगलगीरों की उठाईगीरी पर काबू पाने की ज़रूरत आने वाले दिनों में और भी ज़्यादा पड़ेगी। चुनावी कुरुक्षेत्र में तो कांग्रेस का रथ अब रफ़्तार पकड़ चुका है। मगर चुनावी कामयाबी और सांगठनिक मज़बूती दो अलग-अलग चीज़ें हैं। केंद्र में अपनी सरकार के दस बरस अगर हाथ मल-मल कर कुर्सी ताप रहे ‘साहबों’ ने कांग्रेस की जड़ें जमाने में भी लगाए होते तो मोदी-लहर के छद्म ने उनके ऐसे चिथड़े न उड़ाए होते। सो, अब, जब कांग्रेस सिंहासन पर वापसी की दिशा में चल पड़ी है, राहुल को कांग्रेसी पेड़ की फुनगियों पर बैठ कुहू-कुहू करती फ़ाख़्ताओं से ज़्यादा भरोसा उन पर करना होगा, जो ईंट-ईंट पर ईमान उकेरे बैठे हैं। 
      अंधियारे इसलिए टलने लगे हैं कि लोग कांग्रेस की राह में अपनी दुआओं के दीप जला रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो जनतंत्र के प्रतिमान देखने की हसरत लिए ज़िंदा हैं। ये वे लोग हैं, जिनका तन मीरा और मन कबीर है। इसलिए उनका कभी कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया। ये वे लोग हैं, जो क्षेत्र, जाति और मज़हब के लम्बरदारों पर बिफ़रे बिना रह ही नहीं सकते। ये वे लोग हैं, जिनका जन्म सिर्फ़ फूल बरसाने के लिए खड़े रहने को हुआ ही नहीं है। ये वे लोग हैं, जो अपने सपनों को बुनने जितनी डोर कहीं से भी ले ही आते हैं। कांग्रेस का भाग्य है कि इन लोगों का साथ उसे मिल रहा है। लेकिन कांग्रेस का सौभाग्य तब होगा, जब वह इस साथ की चिरंतनता बनाए रखने की तरीक़े पर अमल करेगी।
      राजा के कर्तव्यों और अमात्यों के गुणों को महाभारत में बहुत विस्तार से समझाया गया है। रामायण में भी राज्य-व्यवस्था के लिए ज़रूरी संस्कारों की अनगिनत गठरियां हैं। हमारे पुरातन-ग्रंथों ने हमें समझाया है कि किसी भी शासन व्यवस्था का मुख्य घटक मनुष्य है। सिर्फ़ वही राजकाज का प्राणवान संसाधन है। उस पर ही बाकी सब केंद्रित है। इसलिए प्राणवान मानव संसाधन का कुशल प्रबंधन ही किसी भी शासन व्यवस्था की सफलता का मूल-मंत्र है। सरकारें हो, राजनीतिक संगठन हों, कारोबारी-समूह हों, परिवार हो--मनुष्य प्रबंधन के बिखरते ही सब बिखर जाता है। 
      नरेंद्र भाई ने महाभारत और रामायण पढ़ी होतीं तो उनके हाथ से साढ़े चार साल में दिल्ली नहीं फिसलती। यह सही समय है कि राहुल गांधी इन दोनों पौराणिक ग्रंथों पर निगाह डालें। उनकी सरकारें तो लोग बना ही देंगे, लेकिन अपनी पार्टी तो उन्हें ख़ुद ही बनानी होगी। वैसे ही, जैसे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने बनाई थी। अपनी पार्टी तो राहुल को ही सहेजनी होगी। वैसे ही, जैसे राजीव गांधी और सोनिया ने सहेजी। तीर खाने का वक़्त जब-जब आता है, अपने मतलब का मशवरा देते रहने वाले खंडाला चले जाते हैं। इसलिए राहुल को अपना समूचा चिंतन ख़ुद के पसीने की एक-एक पाई पर पहरा देने पर केंद्रित करना होगा। कोई बुरा न माने, अभी तक तो कांग्रेस में ‘मेहनत उनकी, मौज हमारी’ का आलम ही चलता-फिरता दिखता है। यह नहीं बदला तो सरकारें बदलने से भी क्या हो जाएगा! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

      Wednesday, November 28, 2018

      पांच प्रदेशों के चुनावी नतीजों का पवन-सुत



      पंकज शर्मा

        मैं इस बीच, पूरे एक पखवाड़े, मध्यप्रदेश के घनघोर आदिवासी इलाक़ों में भी था और कारोबारी महानगरीय इलाक़ों में भी। पांच विधानसभाओं के लिए हो रहे इन चुनावों को अगले बरस के आम चुनावों की परछाईं माना जा रहा है और वे हैं भी। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी और उनके कठपुतले भाजपा-अध्यक्ष अमित भाई अनिलचंद्र शाह की नींद ग़ायब है। मैं मध्यप्रदेश के 18 विधानसभा क्षेत्रों में गांव-गांव, जंगल-जंगल और मॉल-मॉल घूमा। हवा में जो सनसनी है, वह भारतीय जनता पार्टी के परखच्चे बिखेर देने वाली है। अगर हर चुनाव का अंतिम अध्याय, सारे दंद-फंद अपना कर, अपने हिसाब से लिखने की महारत रखने वाले गुरू-चेले के हथकंडों से कांग्रेस निबट सकी तो कुम्हला गए कमल के फूलों से परेशान भोपाल के तालाब का पानी पंद्रह बरस बाद इस दिसंबर के दूसरे हफ़्ते में पूरी तरह बदल जाएगा।
        मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में लोकसभा की 83 और विधानसभा की कुल 679 सीटें हैं। मेरा आकलन है कि पांचों राज्यों में इस बार भाजपा और उसके सहयोगी दलों की जीत का आंकड़ा महज़ 200 सीटों के आसपास रहने वाला है। सो, विधानसभाओं के इन चुनावों में यह संकेत गहराई से छिपा है कि अगले साल की गर्मियों में भाजपा इन पांच राज्यों में लोकसभा की 20 सीटें भी हासिल करने के लिए अपनी ऐड़ियां रगड़ रही होगी। अभी सहयोगी दलों के साथ इन प्रदेशों में वह लोकसभा की 72 सीटों पर काबिज़ है। सो, 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र भाई के 50 सांसद तो इन पांच प्रदेशों में ही हाथ से चले जाएंगे। ज़ाहिर है कि इस अहसास ने उनके हाथ-पांव फुला दिए हैं और चुनावी जनसभाओं में उनकी ज़ुबानी भाषा और शारीरिक भंगिमा सुन-देख कर उनके अपने लोग भी ज़ोरों से माथा पीट रहे हैं।
        मुझे चिंता इस बात की है कि नरेंद्र भाई की छटपटाहट का अगर अभी से ही यह आलम है कि वे पूरी तरह भूल गए हैं कि वे भारत के प्रधानमंत्री भी हैं तो जब लोकसभा चुनाव की लू चलेगी तब वे क्या करेंगे? मुट्ठी से फिसलती सियासी रेत अगर उन्हें अभी इतना बेचैन कर रही है तो चार-पांच महीने बाद तो उनका छाती पीटना देख देश अपना सिर पीटने लगेगा। सरकारें तो बहुत आई-गईं, मगर उनके आते-जाते वक़्त एक प्रधानमंत्री को पहले ऐसा मस्त-मस्त और फिर ऐसा पस्त-पस्त क्या आपने कभी देखा था? इसीलिए बुज़ुर्ग कहा करते हैं कि वे बिरले ही होते हैं, जो सत्ता के अंतःपुर में बौराते नहीं हैं और सिंहासन जाते देख पगलाते नहीं हैं।
        नरेंद्र भाई और उनकी आंख के एक इशारे पर काम करने वाले अमित भाई अगर जानबूझ कर यह  नहीं भूलते कि भाजपा का विस्तार किसी राजनीतिक लठैत की तुर्रेदार मूंछों की वजह से नहीं, एक कवि-हृदय की थोड़ी उदारवादी छवि के कारण हुआ था तो साढ़े चार साल के भीतर-भीतर भाजपा इतनी बेतरह तहस-नहस नहीं होती। आंखों पर पड़ा परदा उठा कर चूंकि कोई कुछ देखना नहीं चाहता, इसलिए मोदी-शाह मंडली को मध्यप्रदेश के जंगल-जंगल चल रही इस बात का पता ही नहीं है कि चड्डी पहन कर जो फूल खिला था, वह कभी का मुरझा चुका है। आदिवासियों के, किसानों के, कारोबारियों के, नौजवानों के और सरकारी कर्मचारियों के नथुने जिस तरह फड़कते मैंने मध्यप्रदेश के अपने दौरे में देखे हैं, उसके बाद मुझे तो नहीं लगता कि कोई भी जादू-टोना भोपाल को फिर ‘शव-राज’ की गोद में डाल सकता है।
        राजस्थान में वसुंधरा राजे के दिन लदने के संकेत तो बहुत पहले से आने लगे थे। लेकिन जिस तरह मध्यप्रदेश ने शिवराज सिंह चौहान के और छत्तीसगढ़ ने रमन सिंह के ख़िलाफ़ करवट ली है, उससे भारतीय लोकतंत्र की अंतर्निहित सकारात्मकता पर आपका विश्वास भी और मजबूत ही हुआ होगा। रही-सही कसर तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव के उखड़ते पैरों ने पूरी कर दी है। क्या आप यह देख कर गदगद नहीं हैं कि हमारे जनतंत्र के पास उस हर टोटके की काट मौजूद है, जो उसे बांधने के लिए किया जाता है? जब-जब लगता है कि सब के हाथ बंधे हैं और अब पांवों की ज़ंजीरें कौन खोलेगा, मतदाताओं के मन से एक अदृश्य बगूला उठता है और सारी ज़ंजीरें टूट कर बिखर जाती हैं। पांच प्रदेशेम के चुनावों में जिन्हें खुली आंखों से भी यह बगूला दिखाई नहीं दे रहा है, उन्हें दिसंबर के दूसरे मंगलवार को नतीजों के पवन-सुत बंद आंखों से भी दिखाई देंगे।
        उत्तर, दक्षिण और पूर्व दिशाओं से उठ रही ये चिनगारियां इसलिए सुखद हैं कि उन्होंने न्यूनतम बीस साल के लिए टस-से-मस न होने का ऐलान करने वालों के छक्के अभी से छुड़ा दिए हैं। हमारी अवामी-दिलरुबा की यही बात तो बार-बार देखने वाली है कि जिस-जिसने उसे अपनी जागीर समझने की भूल की, उस-उस को उसने ऐसी लात जमाई कि सारे जाले साफ कर डाले। लगता किसी को कुछ भी हो, मगर हमारी जम्हूरियत न जयकारों से प्रभावित होती है, न जुमलों से। वह न वंदन की मोहताज है, न अभिनंदन की। उसे नेकनीयती और फ़रेब में फ़र्क़ करना भी ख़ूब आता है। जब हम कहते हैं कि हमारा देश भगवान भरोसे चलता है तो इसीलिए कहते हैं कि जब हमारे सारे भरोसे ढहने लगते हैं तो पता नहीं कैसे ऐसा कुछ होता है कि हम अपने संकटों से बाहर की तरफ़ ख़ुद-ब-ख़ुद बहने लगते हैं। यह वही मौक़ा है।
        मैं मतदाताओं की जैसी भावनात्मक जागरूकता इन चुनावों में देख रहा हूं, कम में देखी है। जिस एकाग्रता से वे अपनी खुरपी ले कर भाजपा की गाजर-घास छील रहे हैं, वैसा कम होता है। जिस तल्लीनता से वे नई फ़सल रोपने के लिए गुड़ाई कर रहे हैं, वह अद्भुत है। जितने मग्न वे इस बार हैं, उतने कभी-कभार ही होते हैं। चालाकी भरे तर्कों को मतदाता नकार रहे हैं। राजनीति के लिए धर्म को विकृत करने के प्रयासों को वे नकार रहे हैं। सच के साथ होते छल से वे नाराज़ हैं। 
        लोग तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में कांग्रेस के पीछे खड़े होने को बहुत पहले से तैयार थे, लेकिन वे इंतज़ार कर रहे थे कि कांग्रेस तो उनके आगे खड़ी हो। राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में कांग्रेस की मुट्ठियां जिस तरह तान दी हैं, मैं आश्वस्त हूं कि पांच प्रदेशों में हो रहा क़लम-दवात पूजन आने वाले दिनों में पूरे देश में होने वाली पट्टी-पूजा का आगाज़ है। जो इस हवा को पढ़ना चाहते हैं, पढ़ें। जिन्हें इतना अक्षर-ज्ञान नहीं है कि इस इबारत की अहमियत समझें, वे जो चाहें, करें। असलियत यही है कि तीन दिशाओं में बसे पांच राज्यों में एक नया सियासी सूरज आकार ले चुका है। लेकिन जो आंखें खोलने को ही तैयार न हों, उजाला उनका क्या करे! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

        धू-धू लपटों के बीच नए ऋग्वेद की रचना



        पंकज शर्मा

          अपने को बड़े-बड़़े अर्थशास्त्रियों से ज़्यादा अक़्लमंद समझने के गुरूर में अगर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने नोटबंदी की गुलाबी फसल काटने के ऐवज में हम से पचास दिन मांगे थे तो अब उन्हें अपना झोला उठा कर चुपचाप घर चले जाना चाहिए। अगर उन्होंने ऐसा साज़िशन किया था तो हमें उन्हें चौराहे पर बुला कर सचमुच उनसे जवाब तलब कर घर भेज देना चाहिए। भारत गौतम और गांधी का देश है तो क्या हुआ? उन्होंने हमें ऐसा कब सिखाया कि अन्याय और अत्याचार को अपने पीठ पर सवारी करने दें?
          नोटबंदी के बाद के दो बरस ने देश की कमर तोड़ दी है। बावजूद इसके भारतवासी कभी इतने रीढ़हीन नहीं हो सकते कि आतताइयों को अपने कंधों पर बिठाए नाचते रहें। भले ही नरेंद्र भई को लगता हो कि मां गंगा ने उन्हें बुलाया है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ईश्वर ने उन्हें किसी सकारात्मक कर्म के लिए धरती पर भेजा है। ऐसा होता तो कोलकाता के बेल्लूर मठ, अल्मोड़ा के अद्वैत आश्रम और राजकोट के रामकृष्ण मिशन में से किसी ने तो उन्हें दीक्षा देने की हामी भरी होती। 
          संतई के संसार में अवांछित तत्वों के प्रवेश को समय रहते रोक देने की दिव्य दृष्टि रखने वाले महापुरुष हर समय मौजूद रहे हैं। मगर राजनीति की दुनिया के संचालकों के पास भी ऐसी दूरदृष्टि होने के दिन अब लद गए। सो, साढ़े चार साल पहले मतदान केंद्रों तक पहुंचे लोगों में से दो तिहाई से ज़्यादा की ना के बावजूद नरेंद्र भाई भारत-महान के शिखर-सिंहासन पर विराजे अर्रा रहे हैं।
          जिन्हें नरेंद्र भाई का घट पुण्यों से लबालब लगता है, वे भी अब इतना तो मानने ही लगे हैं कि नोटबंदी का पाप उनके सारे पुण्यों पर भारी है। बैंकों के सामने लगी कतारों में ऐड़िया रगड़ते-रगड़ते जो खुद चल बसे और जिनके परिवारजन ने इलाज़ के पैसे खाते से न निकल पाने की वजह से जान दे दी, उनकी हाय से नरेंद्र भाई कैसे बचेंगे? होते-सोते भी जो अपनी बहन-बेटियों के हाथ पीले नहीं कर पाए, उनके आसुओं का तेज़ाब नरेंद्र भाई के चेहरे पर धब्बे कैसे नहीं छोड़ेगा? जिन लाखों लोगों के हाथों से नोटबंदी के बाद काम छिन गया, उनके परिवारों के भूखे पेट नरेंद्र भाई की सलामती का कौन-सा भजन गा रहे होंगे? बोहनी के इंतज़ार में सारा-सारा दिन गुज़ार देने वाले दुकानदारों की बद्दुआओं से नरेंद्र भाई को मुंबई के बांद्रा में पाली हिल्स की पचास अरब रुपए वाली इमारत बचाएगी या अहमदाबाद के एसजी रोड का शांतिवन हाउस?
          मुझे नहीं लगता, लेकिन अगर नरेंद्र भाई अपनी आत्मा को अब भी अपने हाथों से धोना चाहें तो उन्हें नोटबंदी की अपनी ग़लती मान लेनी चाहिए। उन्हें हाथ जोड़ कर देश से माफ़ी मांग लेनी चाहिए। मगर अगर उनकी जन्म-कुंडली में ऐसा कोई भाव जनम से होता तो उन्हें हमने कई बार क्षमा मांगते देखा होता। आख़िरकार उन्होंने यह कोई पहला काम तो किया नहीं है, जिसके लिए उन्हें क्षमा मांगनी चाहिए। हम ग़लतियों के लिए क्षमा मांगने का अनुरोध उनसे ही तो करते हैं, जो इतने समर्थ हैं कि उनके दोषों के लिए हम उन्हें सज़ा देने की हैसियत ही नहीं रखते हैं। वरना तो नरेंद्र भाई क्षमा के अधिकारी नहीं, दंड के भागी हैं। पर चूंकि हम बुद्ध, महावीर और गांधी का जाप करते-करते बड़े हुए हैं, इसलिए मैं तो नरेंद्र भाई से यही गुज़ारिश कर सकता हूं कि वे अपनी आत्मा को थोड़ी देर भिगो कर रखें ताकि ज़िद्दी दाग़ दूर हो जाएं। फिर वे इस देश को रगड़ने के बजाय अपनी आत्मा को रगड़ें, इस देश को निचोड़ने के बजाय अपनी आत्मा को निचोड़ें और फिर उसे सूखने के लिए कुछ देर इस देश के जन-मानस की धूप में टांग दें। ईश्वर ने चाहा तो इसके बाद नरेंद्र भाई को भी शांति मिलेगी और इस देश को भी गहरा सुकून मिलेगा।
          मैं खूब जानता हूं कि मेरा यह सपना पूरा होने वाला नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है कि अभी तो भारतवासियों को और भी बहुत कुछ झेलना है। यह पहली बार है कि भारत में चील-दृष्टि वाली एक ऐसी सरकार बनी है, जिसकी निगाह से कोई नहीं बच सकता। जब करवा चौथ और होली-दीवाली की दशकों से जमा मां-बहनों की पूंजी इस निगा़ह से नहीं बच सकी तो रिज़र्व बैंक की जमा-पूंजी को ही कौन-सा नज़रबट्टू इस निग़ाह से बचा लेगा? पोटली भींच कर बगल में दबाए घूम रहे रिज़र्व बैंक के गवर्नर को या तो अपनी गठरी अंततः सेंधमारों के हवाले करनी पड़ेगी या देर-सबेर ‘चल खुसरो घर आपने’ गुनगुनाना पड़ेगा। जिन्हें देश की नहीं, अपने कबीले की अर्थव्यवस्था से लेना-देना होता है, वे ऐसे ही बेमुरव्वत होते हैं कि पसीने से अर्जित दूसरों की संदूकची ज़ोर-जबरदस्ती से हड़पने में एक क्षण भी न गंवाएं।
          यह तो गनीमत है कि सभ्यताओं का इतिहास बहुत लंबा होता है। तमाम उत्थान-पतन के बावजूद उसमें अपने आधारभूत मूल्यों को सुरक्षित रखने की क्षमता होती है। एक नरेंद्र भाई के किए-धरे से यह बुनियाद बर्बाद होने वाली होती तो कभी की हो गई होती। लेकिन मुद्दे की बात यह है कि हम एक ऐसे प्रधानमंत्री के राज में, पता नहीं कितने दिन और बिताने को अभिशप्त हैं, जिसने हमारी परंपराओं की सदियों से पली-बढ़ी हर जड़ में मट्ठा डालने में कोई कसर बाकी नहीं रखने की ठान रखी है। नरेंद्र भाई आश्वस्त हैं कि वे सृजन कर रहे हैं, मगर उन्हें यह भान ही नहीं है कि विचार और संवेदना की गहराई को मापे बिना सृजन का बीड़ा उठाना मुमकिन ही नहीं है। बाकी सबको नीचा दिखाने की भावना से, बाकी सबको अपना मातहत समझने के अहंकार से और बाकी सबको अपने ठेंगे पर रखने की ऐंठ से सृजन नहीं, विनाश होता है। पिछले साढे चार साल से इसीलिए भारत विनाश-मार्ग पर लुढ़क रहा है। इस ढलान पर रपटते-रपटते हम कहां पहुंचेंगे, कौन जाने!
          भारत का मुक्ति-मार्ग अब सिर्फ़ एक है। यह व्यक्ति से नहीं, प्रवृत्ति से मुक्ति का मार्ग है। भारतीय जनतंत्र में पनपी एकाधिकार की ताजा प्रवृत्ति से मुक्ति के मार्ग पर अगर हम खुद नहीं बढ़ेंगे तो कोई शक्ति हमारा उद्धार नहीं कर पाएगी। नरेंद्र भाई ने तो हमें अच्छे दिनों के आने की उम्मीद दिखा कर हमारे सुखों को वहां टांग दिया है, जहां तक हमारे हाथ पहुंचते ही नहीं हैं। इसलिए अपना उजाला तो अपने नन्हे हाथों से हमें खुद ही हासिल करना होगा। बिना आंखें खोले हम इस उजाले को कैसे देखेंगे? और, अगर इतना सब हो 
          जाने पर भी हमारी आंखें नहीं खुलेंगी तो फिर कब खुलेंगी? 
          तकिए के नीचे ख़्वाब सजाए रखने का वक़्त अब गया। रुक कर इंतज़ार करने का वक़्त अब गया। अब तो ऐड़ लगाने का समय है। इन सर्दियों के आते-आते शुरू हुआ यह समय अगले साल की गर्मियां आते-आते चला जाएगा। जो इस समय का सदुपयोग करेंगे, भारतीय लोकतंत्र का नया ऋग्वेद लिखेंगे। जो नहीं करेंगे, बाद में अपनी छाती पीटेंगे। सवाल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का नहीं है। सवाल नरेंद्र भाई और राहुल गांधी का नहीं है। सवाल इस-उस की तरफ़दारी और मुख़ालिफ़त का नहीं है। सवाल तो इस बात का है कि जब लपटें धू-धू कर रही हों तो हम अपने-अपने फव्वारे ले कर बाहर निकलेंगे कि नहीं निकलेंगे! 
          (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

          खो-खो खेलते राजा की दी सौगात पर थिरकती प्रजा



          पंकज शर्मा

            इससे क्या कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ऐसे तमाम बुनियादी मोर्चों पर नाकाम हो गए, जिनसे किसी भी राष्ट्र का निर्माण होता है; उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा तो ‘मां नर्मदा की पावन पवित्र धरा के किनारे’ स्थापित कर के दिखा ही दी। साढ़े चार साल में कोई प्रधानमंत्री और कितना कर के दिखाए? सो, भी ऐसे देश में जहां उनके पहले किसी ने कुछ किया ही न हो! इस एक काम से, एक सपाटे में, नरेंद्र भाई ने चीन को पीछे छोड़ दिया और अमेरिका से तो दुगना आगे निकल गए। वरना अब तक चीन दुनिया के सबसे ऊंचे स्प्रिंग टेंपल पर इतरा रहा था। अमेरिका का स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी तो हमारे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से अब आधी ऊंचाई का ही रह गया है। 
            जो मूढ़ अब भी सोचते हैं कि देशों की ऊंचाई इस बात से तय होती है कि वहां का आम जन-जीवन कितना ख़ुशहाल है, कि वहां की अर्थ-क्यारियां कितनी हरी-भरी हैं, कि वहां की नारियां अपने को कितना महफूज़ महसूस करती हैं, कि वहां के किसानों के गाल कितने गुलाबी हैं, कि वहां के नौजवानों के हाथ कितने कमेरे हैं, कि वहां खुल कर सही बात कहने की कितनी आज़ादी है, कि वहां के केंद्रीय बैंक जैसी नियामक संस्थाएं अपना काम बिना दबाव के कर पाती है या नहीं, कि वहां की न्यायपालिका के खेवनहार कोई घुटन तो महसूस नहीं करते, कि कुल मिला कर वहां जनतंत्र की जड़ों को किसी कतर-ब्यौंत से तो दो-चार नहीं होना पड़ता है; वे अपने को जितनी जल्दी नई परिभाषाओं में ढाल लें, उन्हीं के लिए बेहतर है।
            सरदार वल्लभ भाई पटेल का योगदान किस भारतवासी को नहीं मालूम? उनकी एक नहीं, असंख्य प्रतिमाएं लगें तो किसी को क्या एतराज़ हो सकता है? लेकिन नरेंद्र भाई को लगता है कि उनके आने के पहले देश सरदार पटेल को जानता ही नहीं था और जब तक वे आकाश में सूराख करने वाली उनकी एक प्रतिमा स्थापित नहीं करेंगे, भारत मानेगा ही नहीं कि सरदार पटेल भी कुछ थे! सो, तीन साल नौ महीने में क़रीब तीन अरब रुपए खर्च कर के उन्होंने हमें यह सौगात दे डाली। नरेंद्र भाई पिछले साढ़े चार बरस से हमारे देश को अपने मन की बातें मनवाने में ही तो लगे हुए हैं। इसलिए जब तक एक-एक देशवासी यह मान नहीं जाएगा कि नरेंद्र भाई हैं तो सब-कुछ है, वरना भारत ठन-ठन गोपाल है, तब तक नरेंद्र भाई चैन से नहीं बैठने वाले।
            पटेल की मूर्ति का अनावरण करने गए अपने प्रधानमंत्री के चेहरे पर चस्पा उपलब्धि-पुंज को देख कर मेरी आत्मा गदगद थी। कहां सरदार पटेल की प्रतिमा-परिसर में नरेंद्र भाई की पराक्रमी परिक्रमा और कहां उस प्रतिमा के वहीं मौजूद शिल्पकार राम सुतार की गरिमामयी विनम्र देहभाषा? सुतार पिता-पुत्र के चेहरों पर मूर्तिकला के यज्ञ में अपनी तरफ से एक और आहुति अर्पित करने का संतोष तैर रहा था और हमारे प्रधानमंत्री के चेहरे से ‘कर के दिखा देने’ का दर्प टपक रहा था। उन्होंने कहा: ‘‘यह हमारे राष्ट्र के इतिहास में पूर्णता का अहसास कराने वाला पल है। एक विराट व्यक्तित्व को उचित स्थान देने का पल है। एक अधूरा पल ले कर आज़ादी के बाद से अब तक हम चल रहे थे।...’’ अगर आप चाहते हैं कि भारत जैसे महान देश के अधूरेपन को भर देने के बाद भी एक प्रधानमंत्री इठलाता न घूमे तो, आप भले करें, मैं तो यह ज़्यादती नरेंद्र भाई के साथ नहीं कर सकता। वे उस दौर के नहीं हैं, जब हमारे पुरखे ख़ामोशी से नेकी दरिया में डाल आते थे। वे उस दौर के हैं जब नेकी करो, मत करो, चीख-चीख कर अपनी नेकी के किस्से सुनाने का दस्तूर है। 
            अपने भाषण में नरेंद्र भाई ने हमें बताया कि किस तरह पूरे आठ साल पहले उन्होंने सरदार पटेल की इस विराट मूर्ति की परिकल्पना की थी। उन्होंने कहाः ‘‘लेकिन तब मुझे अहसास नहीं था कि मुख्यमंत्री के तौर पर मैं जो परिकल्पना कर रहा हूं, एक दिन मुझे ही प्रधानमंत्री के तौर पर उसका लोकार्पण करने का मौक़ा मिलेगा।’’ तो इस बुधवार जब ‘‘धरती से ले कर आसमान तक सरदार साहब का अभिषेक’’ हो रहा था तो ज़ाहिर है कि नरेंद्र भाई ‘‘खुद को धन्य’’ मान रहे थे। मुझे नहीं मालूम कि और कौन-कौन अपने को धन्य मान रहा था? मुझे तो लगता है कि पूरा भारत अपने को तब से धन्य मान रहा है, जब सरदार पटेल ने 582 रियासतों का विलय करा कर एक मजबूत गणराज्य हमारी गोद में डाला था।
            उस सुबह अगर ‘‘जी भर कर बहुत कुछ कहने का मन कर रहा’’ था तो इसमें नरेंद्र भाई की क्या ग़लती? सो, उन्होंने हमें इस बात का श्रेय दिया कि ‘‘आपकी भारत-भक्ति के बल पर ही हज़ारों साल से हमारी सभ्यता फल-फूल रही है।’’ अपने प्रधानमंत्री की इस उदारता ने उन्हें मेरे रोम-रोम में बसा दिया है। वरना पिछले साढ़े चार साल में हम सब के कान तो नरेंद्र भाई ने यह कह-कह कर पका रखे थे कि उनके आगमन से पहले तो सब अंधी गुफा में छाल लपेटे पड़े थे।
            अपने भाषण में प्रधानमंत्री बोले कि देश का विश्वास और सामर्थ्य आज शिखर पर पहुंच गया है, कि दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा हमारे साहस और संकल्प की याद दिलाती रहेगी, कि यह प्रतिमा नए भारत के नए आत्मविश्वास का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने बताया कि किस तरह पिछले चार साल से उन्होंने देश के नायकों को याद करने का ‘एक नया अभियान’ शुरू कर रखा है। उन्होंने चेतावनी-मुद्रा में कहा कि लेकिन देश में ही कुछ लोग हमारी इस मुहीम को राजनीतिक चश्मे से देखने का ‘दुस्साहस’ करते हैं। उन्होंने अपने जाने-पहचाने अंदाज़ में लोगों से पूछा भी कि ‘‘क्या सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित कर मैं ने कोई अपराध किया है क्या?’’
            नरेंद्र भाई ने एक अद्भुत बात और कही। अपनी रियासतों का विलय कर देने वाले राजे-रजवाड़ों का महिमा-गान करते हुए उन्होंने हमें बताया कि आज जब लोकतंत्र में निर्वाचित एक सरपंच तक अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं होता है, ऐसे में बरसों-बरस का अपना राजपाट छोड़ देना कितना बड़ा त्याग रहा होगा! राजा-महाराजाओं के इस फ़कीराना मिजाज़ पर तो सचमुच अब तक हम में से किसी का भी ध्यान नहीं गया था। वे अगर अपनी रियासतों के विलय को तैयार नहीं होते तो सरदार पटेल भी उनका क्या कर लेते? फिर हम कच्छ से कोहिमा तक और करगिल से कन्याकुमारी तक बिना वीज़ा कैसे घूमते?
            प्रधानमंत्री निराशावादियों पर अपने प्रहारों का पसंदीदा हथौड़ा चलाने से भी नहीं चूके। भला आशाओं से भरे-पूरे देश में निराशा का क्या काम? इन्हीं आशाओं को जगा कर तो नरेंद्र भाई साढ़े चार साल पहले लालकिला पहुंचे हैं। 2014 में उनके दिखाए चने के झाड़ पर अगर हम सब न चढ़ गए होते तो कमल कहां से लहलहाता? अब लोकसभा चुनावों के छह महीने पहले अगर आप आशाओं की चीर-फाड़ का निराशावादी काम करेंगे तो क्या नरेंद्र भाई करने देंगे? तबाही कर के भी अपने ढोल-ताशे बजाते रहने की ढीठता बिरलों में ही होती है। इसलिए भले ही राजा अपनी प्रजा से खो-खो खेलता रहे, प्रजा का कर्तव्य है कि राजा के बिरलेपन को अपना धन्य-भाग्य समझे। जो न समझे, वह निराशावादी! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

            Sunday, October 28, 2018

            खंडहर-देश में नरेंद्र भाई की गोधूलि बेला



            पंकज शर्मा

              सीबीआई में मची धमाचैकड़ी के बाद भी जिन्हें नरेंद्र भाई मोदी की राजकाज-क्षमता पर नाज़ है, मुझे उन सबकी बेअक्ली पर नाज़ है। सीबीआई प्रधानमंत्री का थाना है या नहीं और अब तक के प्रधानमंत्रियों में से किस ने अपने इस थाने का कैसा इस्तेमाल किया, इस पर बहस हो सकती है। मगर इस पर कोई विवाद नहीं है कि नरेंद्र भाई के साढ़े चार साल में इस थाने की थानेदारी करने में जैसा फूहड़पन देश ने देखा, उसने अब तक की सबसे गहन पतन-गाथा लिख डाली है।
              जांच, प्रवर्तन और गुप्तचर संस्थाओं का बिना आगा-पीछा देखे बेजा इस्तेमाल करने की हवस ने भारत की शासन-व्यवस्था का जैसा गलीज़ रूप हमें नरेंद्र भाई के ज़माने में दिखाया है, उसने जनतांत्रिक विश्वास और मर्यादा के परखच्चे उड़ा कर रख दिए हैं। मुद्दा यह नहीं है कि सीबीआई का नंबर एक सही-ग़लत है या नंबर दो सही-ग़लत। मुद्दा यह है कि सीबीआई में यह सब होने दिया गया। हालांकि मुश्किल है, लेकिन मान लेते हैं कि यह नरेंद्र भाई की वजह से नहीं हुआ, मगर उनकी नाक के नीचे तो हुआ और इससे नरेंद्र भाई की हुई या नहीं, वे जानें, देश की नाक तो नीची ज़रूर हुई। कोई भी दलील इस नाक को अब फिर ऊंचा नहीं उठा सकती।
              जब आप राजकाज का नरेंद्रीकरण और प्रशासनिक व्यवस्था का डोवालीकरण करने पर आमादा हो जाते हैं तो यही होता है। जांच-पड़ताल की सर्वोच्च संस्था की भीतरी सड़न सड़कों पर आ जाने के बाद अब कौन-सा राज्य यह हिम्मत जुटाएगा कि कोई मामला स्थानीय पुलिस से ले कर सीबीआई के हवाले करे? क्या हमारे सर्वोच्च न्यायालय में बैठे किसी न्यायाधीष का मन अब कोई जांच सीबीआई के हवाले करने को मानेगा? जिस सीबीआई के बारे में यह आम राय बन गई हो कि वह जांच के बहाने लूटखसोट करने का अड्डा बनी हुई है, उसे कौन किसी रेड-लाइट एरिया के थाने से बेहतर दर्ज़ा देगा?
              स्थापित संस्थानों से खिलवाड़ के इन्हीं नतीजों से तो तमाम अर्थवान लोग नरेंद्र भाई को साढ़े चार साल से आगाह कर रहे थे। लेकिन उन्हें सुनने की आदत होती तो बात ही क्या थी? अपनी पराक्रमी भुजाओं के साथ अगर उनके पास दूसरों के मन की बात सुनने वाला विवेक, दूसरों का दर्द समझने वाला दिल और सचमुच सबको साथ ले कर चलने वाला दिमाग होता तो साढ़े चार साल में हम भी कहीं और होते और वे भी कहीं और। यह उन्हीं की मेहरबानी है कि आज देश भी कुशासन की गटर में पड़ा बिलबिला रहा है और वे भी अपने कर्मों की कड़ाही में पड़े छटपटा रहे हैं।
              आते ही नरेंद्र भाई हर स्थापित प्रतिमान के पीछे अपना लट्ठ ले कर पड़ गए। उन्हें अपने नए प्रतिमान रचने थे। वे यह काम पलक झपकती तेज़ी से पूरा कर लेना चाहते थे। सो, आव देखा न ताव, बुलडोजर पर बैठ गए। सब-कुछ गिरा देने की उनकी ज़िद तो पूरी हो गई, मगर बिना किसी नक्शे के नव-निर्माण कैसे होता? इसलिए भारतीय जनतंत्र के सभी विश्वासों, परंपराओं, मान्यताओं और सिद्धांतों के खंडहर तो हमारे सामने हैं; भावी-रचना के अंकुर दूर-दूर तक कहीं नहीं। देश अपने भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देख रहा है।
              रातों-रात नोटबंदी कर के नरेंद्र भाई ने अर्थव्यवस्था तबाह कर दी। रात-दिन गाय-गाय जप कर नरेंद्र भाई ने सामाजिक सद्भाव तबाह कर दिया। हर हफ़्ते आंखें दिखा-दिखा कर नरेंद्र भाई ने सारे पड़ौसी मुल्क़ों को भारत से दूर कर दिया। हर महीने विश्व-भ्रमण कर नरेंद्र भाई ने राग अलापा कि उनके आने से पहले भारतीय अपने को कोसते थे कि कहां जन्म ले लिया। राज्यों में सरकारें बनाने के लिए नरेंद्र भाई ने ऐसी-ऐसी तिकड़में अपनाईं कि लोकतंत्र की घिग्घी बंध गई। साढ़े चार बरस में नरेंद्र भाई ने अपने पराक्रम का तेजाब देश की जड़ों में इतनी बेसब्री से उंडेला कि वे सूख गईं। उन्हें फिर हरा-भरा करने का पवित्र जल कौन लाएगा, कैसे लाएगा और कहां से लाएगा, कोई नहीं जानता।
              लालकिले से अपने पहले भाषण में नरेंद्र भाई ने हम से कहा था कि वे राजनीति के नहीं, राष्ट्रनीति के राही हैं। हमें क्या मालूम था कि उनकी नीति एक ऐसा राष्ट्र बनाने की है, जिसमें हम खंडहरों पर बैठे अपने आंसू पोंछते रहेंगे? नरेंद्र भाई ने हम से कहा था कि वे एक लक्ष्य, एक मन, एक मति, एक दिशा का मंत्रोच्चार करेंगे। हमें क्या मालूम था कि उनका मन, मति और लक्ष्य हमें इस दिशा में ले जाने के लिए थी? लालकिले से उन्होंने तब बार-बार कहा था कि मैं कर के रहूंगा, यह हो कर रहेगा। हमें क्या मालूम था कि वे यह सब करके रहेंगे?
              फिर अमेरिका में मेडिसन स्क्वायर पर नरेंद्र भाई ने वचन दिया कि मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा कि भारतवासियों को नीचा देखना पड़े। अब हम अपने प्रधानमंत्री के इन सब वादों की शिकायत करने किस विश्व-अदालत में जाएं? साढ़े चार बरस में दुनिया के सबसे भूखे देशों की कतार में हम और नीचे गिर गए। साढ़े चार बरस में देश की आधी से ज़्यादा दौलत एक प्रतिशत धन्ना-सेठों की मुट्ठी में चली गई। भारतीय अमीरों को मगरम़च्छ बताने वाले स्वामी विवेकानंद के अनुयायी हमारे नरेंद्र भाई ने अपने बचपन में पता नहीं किस मगरमच्छ को परास्त किया था!
              डमरू बजा कर मजमा इकट्ठा कर लेने की महारत सबके पास नहीं होती। नरेंद्र भाई को यह हस्त-कौशल, लगता है, घुट्टी में मिला है। लेकिन मजमे की मुश्किलों को दूर करने का विज्ञान उन्होंने कभी पढ़ा ही नहीं। इसलिए साढ़े चार साल पहले इकट्ठा किए अपने मजमे की बदौलत नरेंद्र भाई रायसीना-पहाड़ी पर चढ़ तो गए, मगर अपने कामकाज की कोई गंगा देश के मैदानों में नहीं बहा पाए। डमरू बजता रहा, मगर लोग इस डमरू पर कब तक मोहित रहते? सो, आज पूरा भारत ठगा-ठगा सा, आंखों में कई सवाल लिए, नरेंद्र भाई के सामने खड़ा है। नरेंद्र भाई के पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं है।
              सीबीअीई-हादसे ने नरेंद्र भाई के महल का तहख़ाना नंगा कर दिया। इस प्रतीक-प्रसंग ने हमारे जनतंत्र की चूलें हिला दी हैं। साढ़े चार साल में एक-एक कर हिलीं नीवों का यह चरम था। अब तक जो सपनों के सहारे ज़िंदा थे, वे धम्म से नीचे आ गिरे हैं। कोई देश अपने प्रधानमंत्री से यह उम्मीद नहीं करता कि वह अपने ही घर पर तबाही लाने वाली बमबारी करे। नरेंद्र भाई ने चूंकि अपने साढ़े चार साल में यही किया है, इसलिए उनका सूरज तेज़ी से ढल गया है। उनकी गोधूलि बेला आ गई है। अब वे आसमान पर कोई भी नकली चांद दिखा कर अपनी रात को उजाले से नहीं भर पाएंगे। जब लोगों का विश्वास हिल जाता है तो सारे डमरू, बिगुल और नगाड़े नाकारा हो जाते हैं। इसलिए 2014 में नरेंद्र भाई की ताल पर थिरक रहा देश आज उलटी क़दमताल कर रहा है। साढ़े चार बरस के तूफ़ानी क़हर में हम ने क्या-क्या नहीं सहा! अफ़सोस यह है कि नरेंद्र भाई को अब भी यह अहसास नहीं है कि उनके प्रिय देशवासियों की सहनशक्ति जवाब दे चुकी है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

              Monday, October 22, 2018

              ऊंट के पीछे नाचता बावरा गांव



              पंकज शर्मा

                किसे पता था कि 67 साल की उम्र होते-होते जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, एस. एन. सिन्हा, कर्पूरी ठाकुर और विश्वनाथ प्रताप सिंह के चेले नीतीश कुमार की हालत यह हो जाएगी कि उन्हें अपने जनता दल यूनाइटेड में दूसरे क्रम की कुर्सी चुनाव प्रबंधन के एक अधकचरे विशेषज्ञ के हवाले करनी पड़ेगी? वह भी तब, जब जदयू में पवन के. वर्मा, हरिवंश सिंह, के.सी. त्यागी, विजय कुमार चौधरी, रामचंद्र प्रसाद सिंह, वशिष्ठनारायण सिंह और राजीव रंजन सिंह जैसे अनुभवी चेहरे मौजूद हों। अगर अपनी बौनी सियासत के लिए मज़बूत खूंटे उखाड़ फेंकने की गंदी आदत नीतीश को भी न लग गई होती तो जदयू में शरद यादव, जीतनराम मांझी और शिवानंद तिवारी जैसे पके-पकाए लोग अब भी उनके पास होते। मगर नीतीश की समझ-बूझ अब उतनी कद्दावर नही रह गई है कि राज-सभा में अपने आसपास विदुरों को बैठने दें।
                इसलिए जब नीतीश ने जदयू की भारी-भरकम शक़्लों को दरकिनार कर यहां-वहां से टप्पे खाते हुए उनकी दहलीज़ पर पहुंचे एक स्वघोषित चुनाव विशेषज्ञ को अपने बगल वाली गद्दी पर बैठाया तो मुझे कोई हैरत नहीं हुई। नीतिश की सोच-समझ का मौजूदा स्तर इससे बेहतर फ़ैसला लेने लायक़ रह ही नहीं गया है। हैरत तो मुझे यह देख कर हुई कि जदयू के चंद बचे-खुचे जमीनी दिग्गजों के आज़ाद लबों पर ताले कैसे लटक गए? समाजवादी संस्कार छलकाते घूमने वाले, नीतिश की पसंद के चारों तरफ घूम-घूम कर तालियां कैसे बजाने लगे हैं? जयप्रकाश के ‘ज’, लोहिया के ‘ल’ और कर्पूरी के ‘क’ का भी जिसे अता-पता न हो, वह एक पूरे-के-पूरे राजनीतिक दल को लील जाए और नींव के तमाम पत्थर करवट तक न लें तो इसे हम क्या समझें?
                क्या हमने कभी सोचा है कि विदेशों में रह कर अपने पल्लू में शिक्षा की कम, दीक्षा की ज़्यादा गांठ बांध कर पिछले एक दशक के दौरान भारत लौटे हमारे नौनिहालों में राजनीतिक दलों के सचिवालयों को चंगुल में लेने की इतनी ललक क्यों है? सचिवालय में काम करते हुए राजनीतिक नीति-निर्णयों को अपने सांचे में ढालने की उनकी सफल कोशिशे क्या आपको दिखाई नहीं देतीं? मौक़ा मिलते ही अपना सचिवालयीन गणवेष उतार कर बाक़ायदा सियासी वेषभूषा ओढ़ कर क़दमताल का अगला चरण शुरू कर देने की उनकी चालबाज़ियां क्या किसी से छिपी हैं? क्या राजनीति-विज्ञानियों के लिए यह ऐसा मुद्दा नहीं होना चाहिए, जिसके तहखाने में वे उतरें और हमें बताएं कि आन गांव के ये सिद्ध अगले दस-बीस बरस में भारतीय राजनीति को कहां ले कर जाने का इरादा रखते हैं?
                कोई कहीं से आता है और हमें बताता है कि उसने फलां अंतरराष्ट्रीय संस्था में इतने साल ऐसा-ऐसा काम किया है और हम इतने ढब्बू हैं कि मान लेते हैं। बावरों का गांव ऊंट के आगमन का ज़श्न मनाने लगता है। वैश्विक शब्दावली के तीखे गिटार के शोर में हमारे सितार का संगीत गुम हो जाता है। भारतीय जनमानस की नब्ज़ समझने वाले बरसों पुराने वैद्य अफ्रीका के सबसे पिछड़े देशों की सड़क नाप कर आए किसी ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य विषेषज्ञ’ से इलाज़ के गुर सीखने लगते हैं। भारत जैसे महान जनतंत्र को यह नीम-हकीमाई कहां ले जाकर छोड़ेगी, कौन जाने! पिछले एकाध दशक में विचारधारा के अंत का मिथक ऐसे ही नहीं गढ़ा गया है। इस धारणा को तेज़ी से फैलाने का काम बेबात नहीं हो रहा है कि राजनीति में विचारधारा का अब कोई स्थान नहीं है। चुनावों को विचार-प्रकटन का माध्यम मानने के बजाय उत्सव-प्रबंधन काम समझने का चलन बढ़ता जा रहा है। 
                सियासत में देशज संस्कृति के तत्वों को किनारे कर उसे अमेरिकी, यूरोपीय और सिंगापुरी आकलनों के तरणताल में धकेला जा रहा है। हमारा नया मीडिया उसका संवाहक है। इस वाहक को सिर्फ़ अपने वाहन का भाड़ा चाहिए। उसे इससे कोई मतलब नहीं है कि वाहन में किसका माल लद रहा है और कैसा माल लद रहा है। उसे तो माल पहुंचाने का शुल्क मिल गया। बस, माल मंज़िल पर पहुंच जाएगा।
                अपनी अस्मिता की श्रेष्ठता का आग्रह करना हमारी राजनीति का स्वभाव जब रहा होगा, रहा होगा। अब तो उसमें पिछलग्गूपन का पुट हावी होता जा रहा है। अपने को अलग-अलग सियासी-पहलुओं के काले जादू का तांत्रिक बताने वालों के पीछे जब हमारे राजनीतिक-पुरोधा दौड़ लगाने लगे हों तो लोकतंत्र का क़ब्रिस्तान क्या आपको ज़्यादा दूर लगता है? नागरिक-नज़रिए के गढ़न की स्वाभिवक प्रक्रिया को लात मार कर जब उसे अपने रंग में रंगने की ज़िम्मेदारी ‘गिली-गिली गप्पा’ गाने वालों को सौंप दी जाए तो क्या आपको नहीं लगता कि हमें जिस राह पर ले जाया जा रहा है, उस पर चलने के लिए तो हम घर से नहीं निकले थे?
                मैं एक स्वयंभू चुनाव रणनीतिकार को नीतिश-छुअन के बाद एक राजनीतिक का स्वांग भरते देख रहा हूं। मैं अपने समय की सबसे प्रखर एक महिला पत्रकार को दक्षिण भारत से निकलने वाली एक अंग्रेज़ी पत्रिका में इंटरव्यू के ज़रिए उसे महामना की तरह पेश करते देख रहा हूं। मैं देख रहा हूं कि साहस और पराक्रम को राजनीति का पहला गुण बताने वाले इस नौसिखिए-राजनीतिक को इसका अंदाज ही नहीं है कि समावेशिता और हमदर्दी का अहसास राजनीति को राजनीति बनाता है। पराक्रम और साहस से युद्ध भले ही जीते जाते हों, हृदय तो अपनेपन से ही जीते जा सकते हैं। बड़ा-से-बड़ा जोख़िम लेने की अपार क्षमता के लिए नरेंद्र भाई मोदी से गदगद और राहुल गांधी को यथास्थितिवादी बताने वाले इस नवोदित को कौन समझाए कि सियासत परंपराओं के शीलहरण का नहीं, अर्वाचीन संस्कारों की रक्षा का विज्ञान है! लोकतंत्र की राजीति भले ही सत्ता की राजनीति है, लेकिन जो इसे मेला-ठेला मानते हैं, वे हमारे लिए खतरा हैं। नैतिकता और शुचिता का रास्ता जिन्हें झंझट भरा लगता है और जो उसे छोड़ कर राजनीतिक दलों को कूदते-फांदते जल्दी-से-जल्दी मंज़िल हासिल करने के गुर सिखा रहे हैं, वे हमारे लिए खतरा हैं। विदेशी परखनलियों से हमारे आंगन में उतरे ये कलंदर हमारी मिट्टी की सोंधी सुगंध बर्बाद कर देने की साज़िश का हिस्सा हैं। उनके हथकंडों की गोद में जा बैठने वाले नीतिश कुमारों पर मुझे रहम आता है। इन नीतिश कुमारों की विद्वत-परिषद के युधिष्ठिरों की लाचारी पर मुझे तरस आता है। 
                मैं इसलिए हैरान हूं कि हमारी राजनीति के बरामदे में दबे पांव घटी इस घटना की गंभीरता पर कोई हैरान नहीं है। सबसे बड़ा अपशकुन यह है कि जदयू के धाकड़ों ने हाथ बांधे सब स्वीकार कर लिया है। जो अपनी लुटिया आप डुबोने में लगे हों, ईश्वर भी उन्हें कैसे बचाए! उनकी सलामती के लिए हम कौन-सी प्रार्थना करें? व्यक्तिवादी मानसिकता को पुष्ट करती आज की राजनीति से सामाजिक सरोकारों के निर्वाह की उम्मीद जिन्हें नहीं रह गई है, वे अपनी जानें; मेरी उम्मीद की यह दुनिया तो अभी क़ायम है कि सियासत पर मंडरा रहे इन खतरों को समय रहते समझ लेने वाले घर से ज़रूर निकलेंगे। नहीं निकलेंगे तो जनतंत्र के किले को खंडहर तो होना ही है। ये दूर की बात हम आज नहीं समझेंगे तो देर करेंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी है।)

                Monday, October 15, 2018

                मूर्ति-भंजन युग की बिगुलवादिकाओं को नमन!




                  पिछले बरस अक्टूबर में जब अमेरिकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने ‘मी टू’ को एक अभियान की शक़्ल दे डाली थी तो किसे पता था कि एक साल बीतते-बीतते ही हमारे चेतन भगत, मोबाशर जावद अकबर, नाना पाटेकर और आलोक नाथ जैसों की मूर्तियां यूं भरभरा कर गिर पड़ेंगी? परदे जब उठते हैं तो यही होता है। असली व्यक्ति जब अपने कपड़ों से बाहर आता है तो कई बार उसके घिनौनेपन की मवाद पूरे संसार को सडांध से भर देती है। ‘मी टू’ अमेरिका से निकल कर अगर भारत तक पहुंच गया है तो यह साफ है कि उसमें धरती के हर कोने में ऐसा हड़कंप मचाने की ताक़त है कि बड़े-बड़ों के रुख से नक़ाब उतरती जाए।
                  विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर, युवाओं के चहेते लेखक चेतन भगत, धारावाहिकों के बाबूजी आलोक नाथ, फिल्मी परदे के क्रंातिवीर नाना पाटेकर, तीसरे पन्ने के जुगाड़ू सुहैल सेठ, गायक कैलाश खेर, फिल्मी दुनिया की बड़ी-छोटी हस्तियां--वरुण ग्रोवर, गुरंग दोषी, विवेक अग्निहोत्री, विकास बहल, उत्सव चक्रवर्ती, रजत कपूर, पत्रकार--सिद्धार्थ भाटिया, गौतम अधिकारी, प्रशांत झा, के. आर. श्रीनिवास, मयंक जैन और न जाने कौन-कौन ‘मी टू’ के जंजाल में फंसे छटपटा रहे हैं। ऐसा भले ही नहीं है कि ये सब सामाजिक आचरण की हमारी पवित्रता के सर्वोच्च प्रतिमान माने जाते रहे हों, मगर ऐसा ज़रूर है कि इनमें से कई हमारे समय के ख़ासे प्रखर और प्रतिभावान चेहरे रहे हैं। 
                  इनमें से कइयों के बारे में आज कही जा रही बातें सुन कर बहुतों को आश्चर्य नहीं हुआ है। मुझे भी नहीं हुआ। अपनी ललित-कलाओं के लिए इनमें से कइयों की कुख्याति के क़िस्से बरसों से मशहूर रहे हैं। लेकिन जब तक कोई सामने न आए, आसाराम बापुओं और राम-रहीमों का पूजन कैसे रुके? सो, ‘मी टू’ ने सबसे बड़ा काम यह किया है कि प्रभावित-वर्ग को मुखौटे नोचने की हिम्मत से भर दिया है। इसलिए अब यह तय है कि ‘मी टू’ बिगुल फिल्मी दुनिया और पत्रकारिता की गलियों से निकल कर राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी दुनिया के राजमार्गों पर भी एक न एक दिन गूंजेगा।
                  जिस दिन यह शुरू होगा, हम मूर्ति-भंजन से हक्काबक्का एक ऐसे युग में प्रवेश करेंगे, जिसकी आयु सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की तरह किसी सीमा से बंधी नहीं होगी। वह एक अनंत युग होगा। अब से बारह बरस पहले समाजसेवी तराना बू्रक ने जब पहले-पहल ‘मी टू’ मुहावरा गढ़ा था तो उन्हें यह थोड़े ही पता था कि वे कलियुग में एक ऐसे उप-युग का नामकरण कर रही हैं, जिसमें लिखी इबारत पुरुषवादी समाज को अपनी औकात में रहने का चिरंतन पाठ पढ़ाएगी। अच्छा हुआ कि वह दिन जल्दी आ गया।
                  मैं मानता हूं कि ‘मी टू’ के छींटे जिन पर भी पड़े हैं या पड़ेंगे, ऐसा नहीं है कि वे सब सचमुच ही मानव-काया ओढ़े पिशाच हैं। उनमें से कुछ पर उठाई जाने वाली उंगलियां बेबात भी हो सकती हैं। मैं यह भी मानता हूं कि ‘मी टू’ कहने का हक़ स्त्रियों को ही नहीं, पुरुषों को भी होना चाहिए। यह सही है कि पुरुषों द्वारा स्त्रियों के शोषण की संभावनाएं बहुत ज़्यादा होती हैं। मगर ऐसा भी नहीं है कि स्त्री द्वारा किसी पुरुष के शोषण की पृथ्वी पर कहीं कोई घटना घटती ही नहीं होगी। फिर एक क़दम आगे बढ़ कर हमें पुरुष द्वारा पुरुष के और स्त्री द्वारा स़्त्री के शोषण की संभावनाओं पर भी तो ध्यान देना होगा। ‘मी टू’ के इन तमाम आयामों का सोच आपको भीतर तक नहीं कंपा रहा?
                  तो अब जो हो, सो हो। जब अग्निबाण कमान से निकल ही गया है तो उससे होने वाली अग्निवर्षा से संसार के झुलस जाने का डर दिमाग़ से निकाल दीजिए। इसलिए कि यह आग हमें जलाने के लिए नहीं, तपाने के लिए शुरू हुई है। इस आग में इस्पाती दिखने वाले कई लौह-पुरुष आने वाले दिनों में पिघल कर लौंदे बन जाएंगे। लेकिन पांच-दस बरस बीतते-बीतते हम देखेंगे कि हमारे समाज को सुहैल सेठों की विदाई ने पहले से कितना ज़्यादा परिष्कृत बना दिया है!
                  हमारी सामाजिक व्यवस्था मुलम्मा उतरने से इसलिए घबराती है कि असली चेहरे बहुत बार इतने कुरूप होते हैं कि हम उन्हें देख कर अवसाद में जाने के बजाय लिपे-पुते नकलीपन के कृत्रिम नृत्य में मग्न रहना बेहतर समझते हैं। किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ती किसी स्त्री के बारे में यह दावा करने वालों की कोई कमी नहीं दीखती है कि वे जानते हैं कि वह कैसे वहां तक पहुंची है। लेकिन बहुत-से पुरुष जहां पहुंचे हैं, वे किस बिचौलिया-भूमिका की बदौलत वहां हैं, यह कौन किसे बतलाए? सियासत और कारोबार की दुनिया में हर कोई अपनी प्रतिभा, योग्यता और परिश्रम के बूते ही शिखर-यात्रा नहीं कर रहा है। इनमें बहुत-से कमाठीपुर के मदारी भी हैं। उनकी डमरू-प्रतिभा के अभिनंदन का भी एक अभियान शुरू क्यों न हो?
                  मुझे लगता है कि ‘मी टू’ से इसलिए एक युगांतकारी शुरुआत हुई है कि पहली बार इस बात का सार्वजनिक उद्घोष हो रहा है कि भद्र वर्ग ने जो मानदंड तय कर दिए हैं, वे ही अंतिम सत्य नहीं हैं। इसलिए हम देख रहे हैं कि ‘मी टू’ की आवाज़ स्पर्धी-संसार के मध्य-वर्ग ने उठाना शुरू किया है। कुलीन और उच्च-वर्ग के शब्दकोष में ‘मी टू’ अहसास की कोई अवधारणा ही नहीं है। जिन नामी-गिरामी हस्तियों के खि़लाफ़ मुट्ठियां तन रही हैं, क्या उनके जाल में रोहू मछलियां नहीं तड़पी होंगी? मगर बोलता तो हमेशा नीचे का व्यक्ति है। अट्टालिकाओं से तो चीख नहीं, हंसी सुनाई देती है। इसलिए बावजूद इसके कि आप भी ऐसे कई प्रसंगों को जानते होंगे, जिसकी भुक्तभोगी आज की कई कद्दावर स्त्रियां रही हैं, वे न बोली हैं, न बोलेंगी।
                  आज के हमारे ‘युग-पुरुषों’ में से कई किस कीमत पर इतने बड़े बने हैं, वे ही जानते हैं। आज की हमारी ‘युग-स्त्रियों’ में से कई किस कीमत पर इतनी बड़ी बनी हैं, यह भी वे ही जानती हैं। किस-किस ने कहां-कहां पहुंचने के लिए किस-किस भूमिका का निर्वाह किया, कोई और जाने-न-जाने, वे खुद तो खूब जानते ही हैं। उन्हें खुद पर घिन आती हो, न आती हो, बाकियों को तो उन पर आती ही है। घिन से घिरी इन मूर्तियों के दरकने का आगाज़ हुआ, अच्छा हुआ। इन मूर्तियों की आरती हम कब तक उतारते? इसलिए वे सब, जो ‘मी टू’ कहने की हिम्मत कर रही हैं, प्रणम्य हैं। बावजूद इसके कि कुछ के द्वारा ‘मी टू’ की गंगा में अपना हाथ धोने की ग़लत संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता, आइए, इस अभियान की क़ामयाबी के लिए दुआ करें! इसलिए कि व्यक्तिगत आचरण शास्त्र और सामाजिक आचार संहिता की मज़बूती के लिए अब तक हुए सभी आंदोलनों में ‘मी टू’ सबसे मारक है। यह जितना तेज़ होगा, इसके जितने ज्यादा आयाम होंगे, पृथ्वी पर आपसी संबंधों में छीना-झपटी का कुत्सित खेल उतना ही किनारे होता जाएगा। ऐसा हो जाए तो फिर और क्या चाहिए! ( लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

                  जनतंत्र के पहरुए से कर-बद्ध निवेदन


                  अगर अभी कोई माने तो ठीक और न माने तो ठीक, मगर मेरा मानना है कि हमारे प्रधानमंत्री अगले बरस की गर्मियां आते-आते घरेलू सियासत की लपटों से इतने झुलस चुके होंगे कि उनके बचे-खुचे आभा-मंडल की परतें पूरी तरह दरक जाएंगी। उनके आलीशान किले में दरारें पड़ने की रफ़्तार इतनी तेज़ हो गई है कि संभाले नहीं संभल रही है। ऐसा न होता तो नरेंद्र भाई को विपक्ष के महागठबंधन के पीछे परदेसी साए नज़र नहीं आ रहे होते। अब तक अपने पराक्रम से पूरी दुनिया में परचम लहराने की आत्म-मुग्धता से लबरेज़ भारत के प्रधानमंत्री को 2019 के चुनाव में देसी विपक्ष की विदेशी शक्तियों से सांठगांठ का भूत सताने लगे तो इसका साफ़ मतलब है कि उनके पैरों के नीचे की ज़मीन पोली हो गई है।
                  परदेसी जिन्न के सपने इन दिनों दुनिया के सिर्फ़ दो दिग्गजों को आ रहे हैं। एक हैं, जर्मन पितृ-पुरुषों के वंशज अमेरिका के ‘रंगीले रतन’ राष्ट्रपति डोनाल्ड जॉन फ्रेडरिक क्राइस्ट ट्रंप, और दूसरे हैं, गुजरात के मेहसाणा ज़िले से रायसीना पहाड़ी पहुंचे नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी। ट्रंप को अमेरिका के पिछले चुनाव में रूस के दखल का दर्द तो साल ही रहा था और अब अगले चुनाव में चीन की चिनगारी भी उन्हें अभी से चिकौटी काटने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री और चार क़दम आगे हैं। वे राहुग्रस्त-मुद्रा में ऐलान कर रहे हैं कि भारत की विपक्षी ताक़तें उन्हें हटाने के लिए रूस, चीन, पाकिस्तान--सब से आंखें चार कर रही हैं।
                  अगर यह सच है तो मैं ऐसे विपक्षी-महागठबंधन को सियासी-सूली पर लटका देने का हिमायती हूं, जो भारत के प्रधानमंत्री को गद्दी से उतारने के लिए विदेशी शक्तियों का मोहरा बनने को तैयार हो जाए। और, ऐसे विपक्षी धड़े, जो अपनी मज़बूती के लिए परदेसी गांठ में बंधने को बेताब घूम रहे हों, उन्हें तो कोई एक क्षण भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। ट्रंप को आ रहे बुरे सपनों का हिसाब-क़िताब अमेरिकी करें। लेकिन नरेंद्र भाई जिन भयावह ख़्वाबों को देख कर इन दिनों पसीना पोंछते हुए बीच-बीच में उठ जाते हैं, उनकी चिंता तो हमें ही करनी है। इसलिए मैं भी आजकल नींद से कई बार यह सोच-सोच कर जाग जाता हूं कि क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि हमारे विपक्षी नेता सत्ता पाने के लिए इतने लार-टपकाऊ हो गए हैं कि ‘हिंदू हृदय सम्राट’ को तख़्त से उतारने के लिए चीन-पाकिस्तान तक से नैन-मटक्के पर उतर जाएं?
                  बावजूद इसके कि पिछले साढ़े चार साल से देश में हुए तमाम चुनावों के बारे में ईवीएम से लेकर धन-पशुओं तक के व्यवहार पर और सामाजिक संगठनों से लेकर मीडिया के एक बड़े हिस्से की भूमिका तक पर तरह-तरह के गहरे छींटे दीवारों पर दिखाई देते रहे हैं,  मुझे नरेंद्र भाई की राष्ट्र-भक्ति पर कोई संदेह नहीं है। मुझे भारतीय जनता पार्टी की भारतीयता पर भी कोई संदेह नहीं है। ऐसे में मैं राहुल गांधी की राष्ट्र-भक्ति पर और कांग्रेस की भारतीयता पर कैसे शक़ करूं? शरद पवार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती, लालू प्रसाद, चंद्राबाबू नायडू, फ़ारूख अब्दुल्ला, सीताराम येचुरी, उद्धव ठाकरे--सबको एकाएक कैसे परदेसियों की गोद में जाने को आतुर मान लूं? ये सब इतने बच्चे तो नहीं हैं कि कोई चांद-खिलौना लेने के लिए ऐसे मचल उठेंगे कि किसी की भी गोद में जा कर बैठ जाएं! जब बरसों विपक्ष में रहने के दौरान जनसंघ-भाजपा के शिखर-पुरुष नहीं बहके, तो इक्कीसवीं सदी के बेहद पारदर्शी संसार में, आज के विपक्षी, परदेसियों की कमर में हाथ डाले नाचने को, अपनी कमर कसे बैठे होंगे, ऐसा आप मान लेंगे?
                  किसी भी प्रधानमंत्री के पास सूचनाओं का ढेर होता है। नरेंद्र भाई के पहले जितने प्रधानमंत्री हुए, वे भी कोई ढब्बू तो थे नहीं। उनके पास भी सूचनाएं खुद चल कर आती रही होंगी। उन्होंने भी अपने तंत्र के ज़रिए सूचनाएं हासिल करने में कोई कसर नहीं रखी होगी। इसमें कौन-सा रहस्य है कि विदेशी शक्तियां अपने-अपने मतलब के मुल्क़ों की सियासत, समाज, संस्कृति और बाज़ार को प्रभावित करने की हर-संभव कोशिशें करती हैं। लेकिन क्या किसी भी देश के लिए, किसी दूसरे देश के सियासी-रहनुमाओं को, गप्प से लील लेना इतना आसान होता होगा, जैसा हमें समझाने की कोशिश आज हो रही है?
                  जयप्रकाश नारायण 45 साल पहले हुए उस आंदोलन के महानायक थे, जो इंदिरा गांधी को हटाने के लिए शुरू हुआ था। जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस अंदोलन का मेरुदंड थे। तब मैं स्कूल-कॉलेज में पढ़ा करता था। आज भी मेरा मन उन दिनों ज़ोर-शोर से कही जाने वाली इन बातों को मानने को नहीं करता कि भारत से समाजवादी संस्कारों वाली सत्ता की विदाई के लिए अमेरिका ने सीआईए को मुक्त-हस्त दे दिया था और जयप्रकाश उस हाथ के इशारे पर नाच रहे थे; कि जयप्रकाश तो बीस के दशक से ही जवाहरलाल नेहरू से ख़फ़ा रहने लगे थे; कि जयप्रकाश उस ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के भारतीय चेप्टर के अध्यक्ष रहे थे, जिसके बारे में माना जाता था कि उस पर सीआईए की छाया है; कि जयप्रकाश भले ही आठ साल अमेरिका में पढ़ाई करने के बाद मार्क्सवादी बन कर भारत लौटे थे, मगर इस बीच सीआईए ने उनके विचारों में वे बीज भी बो दिए थे, जो साढ़े चार दशक बाद जब उगे तो अमेरिकी सियासत के काम आए।
                  हमारे स्वाधीनता संग्राम के चुनींदा सेनानियों में से एक, महात्मा गांधी के नज़दीकियों में से एक और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दिनों में भारत रत्न से अलंकृत किए गए जयप्रकाश नारायण के बारे में कही गई इन बातों में से कितनी आपके गले उतरती हैं? प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की अमेरिका-परस्ती के बारे में, पता नहीं क्या-क्या, कहा गया। 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हार के महज पांच महीने बाद अगस्त में जब इज़राइल के विदेश मंत्री मोशे दायां गुपचुप भारत आए तो मोरारजी भाई प्रधानमंत्री थे। इज़राइल को अमेरिकी सीआईए का दत्तक पुत्र-देश कहा जाता था और भारत के तो उससे राजनयिक संबंध तक नहीं थे। लेकिन क्या इतने भर से हम रोम-रोम में गांधीवाद गूंथ कर जीवन बिताने वाले मोरारजी देसाई की राष्ट्र-भक्ति पर संदेह करने लगें?
                  इसलिए, जो आप कहते हैं नरेंद्र भाई, वही मैं कहता हूं कि चुनाव तो आते-जाते हैं। जीत-हार भी होती रहती है। लेकिन इस होड़ में दौड़ते-दौड़ते किसी को भी इतनी रपटीली राह पर जाने से बचना चाहिए कि वह हमें प्रलय के छोर पर पहुंचा दे। भारत का प्रधानमंत्री भारत के जनतंत्र का पहरुआ है। उसे और कुछ भी अधिकार हों, जनतंत्र से खेलने का अधिकार नहीं है। चुनाव जनतंत्र का पहिया हैं। जनतंत्र की मज़बूती के लिए साधना करनी होती है। यह साधना अब तक के हर प्रधानमंत्री ने की है, हर राजनीतिक दल ने की है और उनमें काम करने वाले हर बड़े-छोटे ने की है। किसी भी तरह के विदेशी आक्रमण से देश को बचाने की ज़िम्मेदारी किसी एक की नहीं, सब की है। अगर कोई कहता है कि वह तो रक्षक है और बाक़ी सब परदेसी दुश्मनों के संगी-साथी तो इससे बड़ी गाली कोई किसी को क्या दे सकता है? ऐसी गालियों से जनतंत्र की गलियां मैली होंगी। उस मैले से लिथड़े सिंहासन पर बैठ कर भी कोई क्या लेगा? इसलिए जितनी जल्दी हम इससे बाज़ आएं, अच्छा। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

                  भागवत-कथा से झांकता भविष्य का भारत



                  पंकज शर्मा— 
                  मोहन भागवत ने अपनी तरफ़ से यह बताने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है कि ‘भविष्य का भारत’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नज़रिए से कैसा होना चाहिए। उन्हें सुनने के लिए ख़ासतौर पर आमंत्रित किए गए लोगों का जमावड़ा तीन दिनों तक राजधानी के विज्ञान भवन में लगा रहा। पाकिस्तान को बुलाया नहीं, मगर भागवत को सुनने के लिए चीन जैसे देशों के राजदूत मौजूद थे। समान विचारों वाले राजनीतिक दलों के नामी चेहरे तो नदारद रहे, मगर जया जेटली जैसों ने अपनी हाजि़री दर्ज़ कराई। अब तक संघ-भाजपा को रह-रह कर कोसते रहने वाले अमर सिंह भी अपना बदला हुआ लबादा ओढ़े भागवत को मंत्र-मुग्ध मुद्रा में सुन रहे थे। 
                  दलबीर सिंह जैसे सेवानिवृत्त सेनाधिकारी ललचाई ललक लिए हिंदुत्व का असली अर्थ समझने में जुटे हुए थे। मनीषा कोइराला, अन्नू कपूर, और रवि किशन जैसे चौथी पायदान के अदाकारों को भी संघ से हुआ मौसमी प्यार भागवत की शाखा में खींच लाया था। मधुर भंडारकर जैसे फिल्म निर्माता-निदेशक और हंसराज हंस जैसे सुर-जीवी भी उबासियां लेते हुए हिंदू होने का अर्थ समझ रहे थे। शोवना नारायण और प्रतिभा प्रहलाद अगर किसी कुलीन-समूह में निमंत्रित-अनिमंत्रित न पहुंचें तो फिर उनका होना-न-होना ही बराबर है, सो, वे भी श्रोता कम, दर्शक ज़्यादा की भूमिका में विराजमान थीं।
                  विज्ञान भवन की भागवत-कथा के श्रोता-समूह और दर्शक-मंडली की गुणवत्ता पर जिन्हें उंगली उठानी हो, उठाएं, मगर मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि मोहन भागवत ने भविष्य का जो भारत हमें दिखाया है, उस पर कोई खुल कर उंगली नहीं उठा सकता। इसलिए नहीं कि भागवत ने जो कहा, उससे संघ की छत पर अब तक तनी दिख रहीं सारी बर्छियां पिघल कर मोम बन गई हैं। बल्कि इसलिए कि असली मंशा पर शब्द-जाल का वह मुलम्मा चढ़ाना भागवत को आता है, जो कुछ देर के लिए आपको सोच में डाल दे और आपको लगे कि अरे, उनकी बातों में ग़लत क्या 
                  है?
                  पहले दिन ही भागवत ने यह साफ़ कर दिया था कि संघ के नज़रिए से आपको कायल कर देना उनका मक़सद नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ का दृष्टिकोण आप मानें-न-मानें, आपकी मर्ज़ी। मैं तो अपनी बात बता रहा हूं। फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार कौन थे और उन्होंने संघ की स्थापना क्यों की? भागवत का कहना था कि हेडगेवार को जाने बिना संघ को जाना ही नहीं जा सकता। इसलिए हेडगेवार की सुभाषचंद्र बोस से ले कर विनायक दामोदर सावरकर तक से मुलाक़ात का ज़िक्र उन्होंने किया।
                  यह बात सुन कर बहुत-से कांग्रेसियों के मन भागवत की निष्पक्षता पर फुदक रहे हैं कि आज़ादी के पहले राजनीतिक जागृति के लिए देश भर में बड़ा आंदोलन कांग्रेस ने षुरू किया और उसमें भी ऐसे कई सर्वस्व त्यागी महापुरुष थे, जिनकी प्रेरणा आज भी हमारे जीवन में काम करती है। लेकिन भागवत की इस मासूमियत पर इतना फि़दा होने की ज़रूरत नहीं है। अगर हेडगेवार ने खुद अपने सामाजिक-राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से नहीं की होती तो भागवत कांग्रेस को इत्ता-सा भी श्रेय नहीं देते। भागवत ने आज़ादी के आंदोलन के बारे में कहा कि ‘कांग्रेस में भी’ सर्वस्व त्यागने वाले लोग थे। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति में ‘एक बड़ा योगदान’ कांग्रेस की धारा का भी है। इसके बाद भागवत ने कांग्रेस पर छींटाकसी की। बोले कि आज कई राजनीतिक धाराएं हैं और उनमें कांग्रेस की स्थिति क्या है, उस पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। वह आप खुद जानते हैं।
                  भागवत ने हमें बताया कि संघ और कुछ नहीं है, वह तो एक प्रणाली-विज्ञान है। एक मैथोडोलॉजी है। वाह! संघ की इस अद्भुत परिभाषा ने मुझे भागवत के समक्ष नतमस्तक कर दिया है। इसलिए कि अगर सामाजिक बंटवारे के इस प्रणाली-विज्ञान पर भी मेरा सिर नीचा न हो तो मुझे धिक्कार है। मैं तो भागवत को यह बोलते देख हक्काबक्का था कि संघ का उद्देश्य भेदमुक्त, समतायुक्त और शोषणमुक्त समाज की रचना करना है। अगर ऐसा ही है तो हमारे स्वयंसेवक प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी से संघ-प्रमुख यह जवाब-तलब क्यों नहीं करते कि पिछले सवा चार साल में इस दिशा में वे कितने क़दम आगे बढ़े हैं? मगर जवाब तो भागवत की बातों में ही छिपा है। वे बोले कि विविधताओं का उत्सव मनाओ, मगर वे यह भी बोले कि अपनी विविधता पर पक्के रहो, अपनी विशिष्टता पर अडिग रहो। उन्होंने कहा कि ‘भारत के बाहर से जो लोग आए हैं’ और उनके आज जो अनुयायी हैं, वे आज भारतीय हैं। हमारे यहां इस्लाम है, ईसाइयत है। ‘अगर’ वे भारतीय है तो उनके घरों में भी भारतीय संस्कारों का प्रचलन दिखाई देता है।
                  आप भागवत के उर्वरा मस्तिष्क की दाद दें-न-दें, मैं तो दूंगा। उन्होंने मानवेंद्र नाथ रॉय के सुधारवादी मानवतावाद से ले कर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम और अमूल-प्रसिद्ध वर्गीज कुरियन द्वारा लोकशक्ति जागरण की अवधारणाओं तक को संघ के विचारों में गूंथ लिया। मगर साथ-ही-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि संघ का गुरु तो उसका भगवा-ध्वज भी है। थोड़ी मुरव्वत की और अहसान-मुद्रा में कहा कि ‘लेकिन तिरंगे का भी पूर्ण सम्मान हम रखते ही हैं’। बहुत मेहरबानी आपकी। भारतमाता धन्य हुईं।
                  भागवत-कथा के दूसरे दिन का प्रवचन सुन कर हमें मालूम हुआ कि संघ ने हमें यह आज़ादी दे रखी है कि भारत पर कौन राज करेगा, यह हम तय कर सकते हैं। लेकिन फिर आगाह किया कि लेकिन राष्ट्र कैसे चलेगा, इस पर संघ का भी मत है। भागवत ने ज़ोर दे कर कहा कि संघ राजनीति से परे रहेगा, इसका मतलब यह नहीं है कि घुसपैठियों जैसे मसलों पर हम अपनी बात नहीं कहेंगे। बड़े भोलेपन से भागवत ने हमें बताया कि संघ के स्वयंसेवक ‘किसी भी’ राजनीतिक दल में जा कर काम कर सकते हैं। वह स्वयंसेवक-भूमिका के बाद अपने बाकी राजनीतिक जीवन में क्या करता है, उससे संघ को कोई मतलब नहीं। वह किस राजनीतिक दल में जाता है, वह उसका काम है। वह किसी दूसरे राजनीतिक दल में क्यों नहीं जाता, यह विचार करना भी उसी का काम है। 
                   ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम बेहतरी’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ से सराबोर भागवत के मन से जब जब ‘एतद देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः; स्वं स्वं चरित्रां शिक्षरेन पृथिव्यां सर्वमानवाः’ का झरना बहा तो मैं उसमें डूबते-डूबते बचा। अगर राजधर्म का पालन करने जैसी सलाहों की यादों की नुकीली चट्टानों ने मुझे थाम न लिया होता तो भागवत-सरोवर के भंवर ने तो मेरे प्राण ही हर लिए होते। 
                  तीसरे दिन सवालों के जवाब देने के बहाने भागवत ने जो किया, वह सबके वश का नहीं है। हिंदूवाद के वाद पर बात की। कहा कि वाद तो बंद होता है, हिंदुत्व तो सतत प्रक्रिया है। लेकिन जब समूचे हिंदू समाज में रोटी-बेटी के व्यवहार पर बात आई तो रोटी के कौर तो भागवत आसानी से निगल गए, मगर बेटी-व्यवहार के प्रश्न पर उनकी हिचक झलके बिना नहीं रही। भागवत ने जाति व्यवस्था, शिक्षा, भाषा, स्त्री, जनसंख्या, आरक्षण, गौरक्षा, धर्म-परिवर्तन, अल्पसंख्यक, धारा 370, समान नागरिक संहिता, संविधान, राम मंदिर, आर्थिक परिस्थिति और समलैंगिकता जैसे मसलों पर विस्तार से सवालों के जवाब दिए। भागवत की बातों में कितने ही पेंच क्यों न हों, तीन दिन इस चक्रव्यूह में अपनी नटबाज़ी दिखाने का माद्दा तो उनसे किसी को भी सीखना चाहिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी है।)