Saturday, February 17, 2018

चेतन भगत की अचेतनता के जवाब में


पंकज शर्मा
    दो महीने बाद 44 के होने वाले चेतन भगत भारतीय इतिहास के सबसे ज़्यादा बिकने वाले अंग्रेज़ी उपन्यासकार भले ही हों और शहरी मध्यमवर्गीय युवाओं के बारे में लिखी उनकी क़िताबों पर रीझने वाली बेपैंदी के लोगों की कतार भले कितनी ही लंबी हो, मैं ने उन्हें कभी बुद्धिवतार नहीं माना। राजनीति पर लिखे उनके लेखों से तो मुझे उनकी बुद्धि पर संदेह-सा ही होने लगा था। अभी दो दिन पहले छपे उनके एक लेख ने तो मेरा यह संदेह भी पूरी तरह गायब कर दिया और मैं अंतिम तौर पर इस नतीजे पर पहुंच गया कि चेतन भारतीय राजनीति की समझ के मामले में मूर्खता की हद तक अ-चेतन हैं। 
    बाज़ारवाद की तिकड़मों से तात्कालिक ख्याति हासिल कर लेने वालों को समूचा ज्ञान-पुंज मान लेने वाली अपनी नौजवान पीढ़ी के भोलेपन पर तरस खाते हुए मैं विनम्रतापूर्वक चेतन से यह निवेदन करना चाहता हूं कि भविष्य में उन्हें अपने उपन्यासों के कथानकों में जो उड़ानें भरनी हों, भरें, मगर देश की राजनीति पर रहम खाएं। इसलिए कि राजनीति उन्हें ऐसा हलका-फुलका विषय लगती होगी कि वे भी अपने को रायबहादुर समझने लगें, मगर ऐसा है नहीं। भारतीय राजनीति की गलियों की समझ इसी जनम में विकसित करने के लिए चेतन जैसी गई-बीती बुद्धि रखने वालों को अभी कम-से-कम 44 साल अध्ययन करना होगा। अपने ताजा लेख में चेतन ने हमें बताया है कि कांग्रेस 2019 का आम चुनाव कैसे जीत सकती है। आगे चल कर इस लेख के ज़रिए स्थापित की जाने वाली अवधारणाओं को लेकर उनके मन में इतना भय है कि वे लेख की शुरुआत ही यह सफाई देने से करते हैं कि उनके इस लेख का मतलब भारतीय जनता पार्टी को कम आंकना नहीं है। वे दूर बैठे निगा़हबानों से यह चिरौरी भी कर लेते हैं कि उनके लेख का मक़सद कांग्रेस का समर्थन करना नहीं है और वे तो सिर्फ़ यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या वाकई कांग्रेस 2019 में जीत सकती है?
    चेतन खुद को महज एक विश्लेषक बताते हुए आगे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के हारने के मौक़े कम हैं, लेकिन अगर कांग्रेस कुछ बदलाव करे तो वह अगला चुनाव जीत सकती है। आप सोचेंगे कि जब चेतन इतनी अच्छी बात कह रहे हैं तो मुझे वे मूर्खता की हद तक अ-चेतन क्यों लग रहे हैं? इसलिए कि मैं ने उनके पूरे लेख में ‘नियम एवं शर्तें लागू’ के महीन अक्षरों को बेहद ध्यान से पढ़ा है। चुनाव जीतने के लिए ज़रूरी बदलावों की पेंचदार दलीलों के पीछे से झांकती चेतन की अवधारणा हमें सिर्फ़ यह बताना चाहती है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लोकसभा का अगला चुनाव नहीं जीत सकती। वाह रे चेतन भगत!
    और, सुनिए। चेतन भगत हमें बता रहे हैं कि अगर कांग्रेस सचिन पायलट को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दे तो 2019 का चुनाव जीत जाएगी। मुझ से न हंसा जा रहा है और न रोया। सचिन हममें से बहुतों के मित्र रहे राजेश पायलट के बेटे हैं, उन्हीं की तरह ऊर्जावान हैं, समझदार हैं और उनका भविष्य सचमुच उज्जवल है। लेकिन कांग्रेस उन्हें अपना प्रधानमंत्री-चेहरा बना कर चुनाव जीत जाएगी, यह कहना वैसा ही है, जैसे कोई कहे कि चेतन भगत को भारतीय साहित्य का प्रतिनिधि-चेहरा बना लेने से विश्व-साहित्य भारत के चरणों में गिर पड़ेगा। 
    चेतन अपने को साहित्य की दुनिया में प्रेमचंद से बड़ा समझते होंगे, लेकिन राजनीति का पायदान जिस ईंट-गारे से बनता है, उसकी थोड़ी भी समझ अगर चेतन को होती तो वे राहुल गांधी की जगह सचिन पायलट को प्रधानमंत्री-चेहरा बनाने के चंडूखाने में आराम फ़रमाने कभी नहीं जाते। और-तो-और, सचिन को भी लग रहा होगा कि वे किस भंगेड़ी की छलकती बुद्धि का विषय बन गए?
    बेवकूफियां किससे नहीं होतीं? लेकिन बावजूद इसके मैं यह लेख लिखने के लिए चेतन भगत का आभार व्यक्त करता हूं। इसलिए कि उनके मन में यह बात आई कि कांग्रेस 2019 का चुनाव जीत सकती है। अभी कुछ महीने पहले तक तो वे कांग्रेस-मुक्त भारत की झांजर बजाने में मशगूल थे। नरेंद्र भाई मोदी के बीस साल राज करने की धुन पर मटकते वे थक नहीं रहे थे। लेकिन, दस-बीस तो छोड़िए, पौने चार साल में ही उनका यह हाल हो गया कि कांग्रेस की याद सताने लगी। अकेले रह जाने की कसक दूर के मुसाफ़िर को पास बुलाने लगी। इसलिए महत्वपूर्ण यह है कि हम पिछले तीन-चार महीने में देश में आए इस बदलाव पर गौर करें कि कांग्रेस का शोक-पत्र लिख रहे लोग अब उसमें संभावनाएं देखने से कतरा नहीं पा रहे हैं।
    मैं चेतन भगत का इस लेख में कही गई कुछ और बातों के लिए भी आभार व्यक्त करना चाहता हूं। उनका वश चलता तो शायद वे ये बातें नहीं लिखते। उन्होंने अपने लेख में, घुमा-फिरा कर ही सही, इशारा किया है कि नरेंद्र मोदी ने खुद के लिए ऊंची अपेक्षाएं निर्मित कर लीं और कुछ कर के नहीं दिखा पाए; कि समाज को बांटने वाली आवाज़ों को वे बंद नहीं कर पाए; कि देश को उन्होंने असुरक्षित बनाए रखा; कि अर्थव्यवस्था का उन्होंने दम घोंट दिया; कि वे पर्याप्त रोज़गार पैदा नहीं कर पाए; कि वे करदाताओं पर लगातार टैक्स थोपते रहे। मगर इतने पर भी चेतन का मन भाजपा की हार नहीं चाहता। सो, वे अपने लेख के अंत में फिर याद दिलाते हैं कि उनकी कही बातों का अर्थ यह संकेत देना नहीं है कि भाजपा हारनी चाहिए या उसके हारने की संभावना है। फिर वे एक दर्शनशास्त्री की तरह हमें बताते हैं कि महान लोकतंत्र वही होता है, जिसमें विपक्ष के लिए भी अच्छे मौक़े हों। सबसे अंत में वे कामना करते हैं कि श्रेष्ठतम दल की जीत हो! बेचारे चेतन भगत। न उनसे निगलते बन रहा है, न उगलते। 
    चेतन भगत जी, सियासत की संजीदगी ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’ की पटकथा नहीं है। हांगकांग में गोल्डमेन का इनवेस्टमेंट बैंकर होना अलग बात है और भारतीय पगडंडियों पर दबे पांव चल रही राजनीति के निवेश-पहलुओं को समझना एकदम अलग बात। अगर अहमदाबाद के आईआईएम से निकले लुकमान हकीम ही सारे मर्ज़ों की दवा होते तो फिर बात ही क्या थी? ‘मेकिंग इंडिया ऑसम’ कागज़ पर लिखने वाली स्याही में और मुल्क़ बनाने के लिए बहने वाले पसीने में बहुत फ़र्क़ होता है। चार अक्षर लिख कर अपने को हरफ़नमौला समझने वालों को चार क़िताबें पढ़ने की ज़हमत भी उठानी चाहिए। घर के जोगी अब इतने भी जोगने नहीं रहे कि आन गांव के सिद्धों को सिर पर उठाए नाचते रहें। जितनी जल्दी यह बात समझ में आ जाए, अच्छा है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्टीªय पदाधिकारी हैं।)

    Sunday, February 11, 2018

    देखें क़रीब से भी तो अच्छे दिखाई दें



    पंकज शर्मा
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      राष्ट्रपति के बजट-अभिभाषण पर संसद में हुई चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी ने बुधवार को दोनों सदनों में अपनी सरकार के पौने चार साल के कामों की फ़ेहरिस्त सुनाते-सुनाते कई ऐसी बातें कहीं, जिनसे मौजूदा व्यवस्था के पीछे काम कर रही बदरंगी मानसिकता खुल कर झांक रही थी। हमारे प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहा कि छोटे मन से बड़े काम नहीं होते और फिर राज्यसभा में भी इसे दोहराया। मगर उनकी बातें सुन कर मेरी तरह बहुतों को समझ नहीं आया कि खुद उनका मन कितना बड़ा है?
      नरेंद्र भाई की कही कुछ बातों पर गौर करिए। उन्होंने कांग्रेस के चरित्र पर उंगली उठाई। कहा कि बांटना तो आपके चरित्र में है। आपने भारत का विभाजन किया। देश के टुकड़े किए। आज आज़ादी के 70 साल बाद भी एक दिन ऐसा नहीं जाता है कि आपके उस पाप की सज़ा सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी न भुगतते हों। प्रधानमंत्री की इस मासूमियत पर जान छिड़कने को मन करता है। 
      भारत के विभाजन की त्रासदी के इतिहास की अगर यह समझ नरेंद्र भाई के अंतरमन में है तो यह समझना एकदम आसान है कि हमारी सामाजिक समरसता की राह में बहा पसीना नफ़रत की किन भट्टियों में जा कर स्वाहा होता रहा है और इन अलावों की आग किन शक्तियों के बारूद से लपलपा रही है।
      प्रधानमंत्री की यादों की गहराई में बसी यह बात भी बाहर आई कि आज़ादी के बाद तीन-चार दशक तक देश में राजनीतिक विपक्ष नही के बराबर था, रेडियो कांग्रेस के गीत गाता था, टेलीविजन आया तो वह भी कांग्रेस को समर्पित हो गया, न्यापालिका की शिखर-नियुक्तियां कांग्रेस करती थी, न तो आज की तरह एनजीओ थे और न पीआईएल थीं यानी विरोध का नामो-निशान नहीं था। 
      नरेंद्र भाई को कसक है कि या हुसैन, तब हम न हुए, सो, अब एक ऐसी व्यवस्था बनानी है कि सरकारी तो छोड़िए, निजी प्रचार माध्यम भी हमारे गीत गाएं; न्यायपालिका की नियुक्तियां कैसे हम कर पाएं; समाज की बुनियादी चिंताओं को सामने लाने वाले स्वयंसेवी संगठनों का गला कैसे घोंटें और किसी की भी मनमानी रोकने के लिए दायर होने वाली जनहित याचिकाओं पर पाबंदी कैसे लगें?
      अगर नरेंद्र भाई को कचोट रही स्मृतियां सही हैं तो वे कौन थे, जिन्होंने ऐसे घनघोर विपक्ष-विहीन और एकतरफ़ा दौर में भी उन बीजों का खाद-पानी कभी नहीं रोका, जिनकी फ़सल की लहलहाट ने आज़ादी के महज तीस साल बाद विपक्ष को पहली बार सत्ता सौंप दी थी? मैं तो इतना जानता हूं कि अगर आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बजाय गुरु गोलवलकर के शिष्यों में से कोई होता तो वह कांग्रेस को तो कभी 2 से 282 पर नहीं पहुंचने देता। 
      पौने चार साल में प्रचार माध्यमों से ले कर न्यायपालिका और स्वयंसेवी संगठनों पर मंडरा रहे बादलों का अध्ययन करने वाले भी बशीर बद्र की वही पंक्तियां प्रधानमंत्री को अर्पित करना चाहते हैं, जिनके ज़रिए लोकसभा में उन्होंने बशीर बद्र की पंक्तियों का जवाब दिया--जी बहुत चाहता है, सच बोलें; क्या करें, हौसला नहीं होता।
      यह कहने को कि नेहरू ने देश को लोकतंत्र दिया, जो अहंकार या नासमझी समझते हैं, उन्हें अपने इस अहंकार से जितनी जल्दी हो, बाहर आ जाना चाहिए। लिच्छवी के ज़माने के लोकतंत्र की मुंडेर पर अगर नेहरू दीये न जलाए रखते, अगर बौद्ध साम्राज्य की परंपरा को नेहरू न सींचते और अगर जगदगुरु बसेस्वर के बारहवीं सदी में शुरू किए अनुभव मंडपम की मशाल नेहरू मज़बूती से न थामे रखते तो स्वतंत्र भारत सत्तर साल में संसार का सिरमौर न बनता। 
      ढाई हज़ार साल से लोकतंत्र अगर हमारी रगों में है और अगर अगले ढाई हज़ार बरस भी रहेगा तो इसलिए कि आज़ादी के बाद सबसे संकटपूर्ण ढाई दशक में नेहरू ने जनतंत्र की बुनियाद को दरकने नहीं दिया। बावजूद इसके वे इकलखुरे नहीं हुए कि पूरे मुल्क़ में पंचायत से संसद तक उनका ही राज था। आज की सल्तनत संभाले बैठे लोगों को नेहरू से यही तो सीखना है।
      सुल्तानी जाने के बाद भी कांग्रेस सुल्तान की तरह व्यवहार कर रही है या नहीं, इसे कांग्रेस पर छोड़िए। सुल्तान बन जाने के बाद से आपकी सुल्तानी के किस्से तो, नरेंद्र भाई, हम लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे उन द्रोणाचार्यों से सुन चुके हैं, जिनके दिए धनुर्विद्या ज्ञान ने आपको यहां पहुंचाया। आपके बाणों से घायल यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे आपके कई रणबांकुरों की ताज़ा कराह सिर्फ़ आपको ही तो सुनाई नहीं दे रही है। अपने गृह मंत्री को आप गृह मंत्रालय नहीं चलाने देते, अपनी विदेश मंत्री को विदेश मंत्रालय नहीं चलाने देते, अपनी रक्षा मंत्री को रक्षा मंत्रालय नहीं चलाने देते और फ़िक्र आपको है कांग्रेस  की। 
      आपको तो गांधी जी का भारत भी सिर्फ़ इसलिए चाहिए कि उन्होंने कहा था कि आज़ादी मिल गई है, अब कांग्रेस की ज़रूरत समाप्त हो गई है, इसलिए उसे भंग कर देना चाहिए। हम तो समझते थे कि गांधी का व्यापक दर्शन आपकी समझ में आ गया हैं, इसलिए गांधी-गांधी करते हैं। संसद में आप अगर अपनी असली नीयत नहीं बताते तो हम तो अंधेरे में ही रह जाते! साबरमती के संत को लेकर भी अगर मन का दायरा इतना सिमटा हुआ है तो छोटे मन से बड़े काम नहंी होते जैसे ज़ुमलों का मोल ही क्या है?
      परदेस जा कर पिछले पौने चार साल से 66 साल में भारत में कुछ भी न होने का लगातार आलाप लगा रहे हमारे प्रधानमंत्री का कहना है कि कांग्रेस भाजपा की बुराई करते-करते यह भूल जाती है कि वह भारत की बुराई करने लगी है और नरेंद्र मोदी पर हमला करते-करते भूल जाती है कि उसने हिंदुस्तान पर हमला बोल दिया है। संसद में उन्होंने कहा कि मेहरबानी कर के ऐसा मत कीजिए कि देश की बदनामी हो। नरेंद्र भाई, कांग्रेस भी तो इतने दिनों से आपसे इसी मेहरबानी की भीख मांग रही थी। 
      चलिए, अब भी सही, बिस्मिल्लाह कीजिए। किसी की हंसी में रामायण धारावाहिक के पात्र देखने का आपको हक़ है। कोशिश कीजिए कि आपकी मद-मस्ती में इसी धारावाहिक के पात्र देश न देखे। कोई और शायद ही आपसे यह कहेगा कि आप भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं, जो सब-कुछ अपने ठेंगे पर रखे घूम रहे हैं। भारतीय राजनीति में लगातार कम हो रही शालीनता को थामिए। कौन चाकू, कौन पसलियां, यह फ़ैसला देश पर छोड़िए, मैं तो इतनी भर गुज़ारिश करता हूं कि कुछ ऐसा कीजिए कि आपको क़रीब से भी देखें तो आप अच्छे दिखाई दें।

      Saturday, February 3, 2018

      General Election in May 2018, not in 2019


                One and a half year back, in one of my weekly columns published on 16 May 2016, I had written that Prime Minister Narendra Modi has prepared a road map for simultaneous elections of Parliament, State Assemblies, urban local bodies and Panchayats. I had also mentioned that Modi-government hopes to come up with a constitutional amendment in mid-2018 for this purpose.

      Rashtriya Swayam Sewak Sangh (RSS) backed think-tanks worked overtime during this period to create a favorable political climate for merging the elections. But the debate failed to create the desired impact on the public mind. Political parties, especially the regional outfits, including the allies of Bhartiya Janta Party (BJP), are averse to Modi’s idea. In absence of consensus among political parties any constitutional amendment is now seem impossible.

      But Modi seems adamant to his idea and I have strong reasons to believe that he is preparing for parliamentary elections in summers this year with elections for five assemblies. He is not going to wait till April-May 2019. Immediately after the completion of election process in three north-eastern states—Tripura, Nagaland and Meghalaya—by early March, Modi might announce the dissolution of Lok Sabha and go for elections in May 2018 itself. In this case, the bye-election for Delhi’s 20 disqualified MLAs will also be held that time only.

      The term of Congress ruled Karnataka assembly will be over on 28 May this year. The state, in any case, has to go for election in early May. Three BJP ruled states in Hindi heartland are also completing their terms in January next year—Chhatisgarh on 5th, Madhya Pradesh on 7th and Rajasthan on 20th January 2019. They have to go to polls in December this year. Congress ruled Mizoram assembly will also complete its term on 15 December this year and election there can be held in November end.

      There are strong chances that the chief ministers of BJP ruled states will recommend early dissolution of their assemblies and would like to go for polls with Lok Sabha to gain the advantage of direct Modi-effect to counter anti-incumbency against them. Vasundhara Raje, though in rule for only five years in Rajasthan, is facing a strong unpopularity wave against her and is in no position to hold the fort next time. Shivraj Singh Chouhan of Madhya Pradesh and Raman Singh of Chhatisgarh will be completing their thirds terms as chief ministers and fatigue factor is quite visible in both the states.

      BJP, therefore, will prefer polls in these states under the umbrella of parliamentary election campaign. To have general election at its due time after 15 months from now has its own disadvantages for BJP. Modi will have to go to polls in April-May 2019 after getting a vote on account without presenting a full-fledged budget. The positive impact of the current budget will be washed away by that time. The state of economy is in a bad shape and, rather than improving, it is going to take worst shape by each passing month now with the rise in international crude prices. The negative effects of grave economic slow-down in last three and a half years are becoming visible. BJP feels that it will be impossible to handle the situation after 6 months from now when ill effects of government’s economic decisions will surface and could be seen with naked eyes.

      RSS leadership also feels that a positive budget in next few days will be able to camouflage the current economic situation. This will have a scope to inspire hope in the minds of electorate for few months and it would be a wise decision to have parliamentary election during this period. Merging the elections for five states will also be seen as a step further in the direction to return to an era of simultaneous elections across the country mooted by the prime Minister. Modi will have an argument while delivering his election speeches that despite the unwillingness of the opposition parties he is doing his bit. To further strengthen this argument BJP will ask its Maharashtra chief minister to dissolve the assembly five months in advance and go for polls in May 2019 with Andhra Pradesh, Telangana, Odisha, Sikkim and Arunachal Pradesh.

      Modi knows that opposition parties are not that prepared for the parliamentary election if they are advanced to May this year. It will be difficult for Opposition to take a proper shape in haste. Most of the regional parties are struggling for resources. BJP, being the ruling party, has clear advantage to attract election funding. All these factors indicate for an electoral upheaval in the coming months. It is not without a reason that major media has begun showing survey results predicting the possible scenario in case elections are held today. All these survey reports are not innocent in giving more seats than 2014 to BJP and NDA. They have also predicted marginally better chances for the Congress by reducing the seat projection for outfits such as Aam Admi Party and few UPA allies. But the message written in between the lines is clear.

      Prime Minister Modi has recently advocated in detail the theory of simultaneous elections in his tailor-made interviews to TV channels and print media again. His sudden liberal approach in giving access to friendly-media at this juncture is something which must be seen as having deep political design behind it. After hypes for his performance at World Economic Forum at Davos and in lining-up 10 important ASEAN leaders behind him on Indian Republic Day, there is nothing wrong if Modi and his party see the events as achievements in the field of global economics and international diplomacy that also can influence the elite vote bank in months to come. The gathering of ASEAN political chiefs at New Delhi has been projected as a befitting answer to China, which in the days of nationalism can garner due dividend to BJP.

      Bulls of the share market, nationally and internationally, want Modi to get at least one more term as prime minister as they find his policies favorable for rising index. They hope the Bombay Stock Exchange to cross 50000-mark in next four to five years provided the sentiments of the ruling dispensation match with the sentiments of the market. Therefore, those who think that current economic crisis has disinclined the corporate world from Modi regime will find themselves ditched. Whatever is the ground reality in manufacturing sector, whatever is the truth of industrial growth and whatever GDP figures tell us; Dalal Street is booming and players know how to keep it booming despite the actual report of economic health of the nation.

      So, be prepared and do not be taken by surprise when you listen to our Prime Minister’s address to the nation at 8 pm after Holi some time when he announces the immediate dissolution of Lok Sabha and asks you to sacrifice your fifty days only to give birth to a new government which will write a new chapter of ‘Achchhe Din’. The political signals my antenna receiving have tremendous potential to fill the summer sky with general election clouds.


      Rajiv Gandhi had the master-key of Indo-China treasure


      Amidst the news stories about the satellite imagery suggesting China has established military establishments in Doklam near Indian borders posing serious threat to India’s security and strategic interests, certain pertinent questions come to mind. One, why China unnecessarily indulging in creating tension with India when there are other important areas that need attention? Two, why India sees China as an enemy? And, three, who in international arena are trying to widen the gap of understanding between India and China?  

      Satellite pictures taken three-and-a-half months after India and China agreed to end their stand-off showed new helipads, trenches and construction work at the Doklam plateau. Common people in China, as well as in India, must realise that any aggression by Chinese army on Indian borders provides required fuel to the fanatic groups present in both the countries that misuse the very concept of nationalism for their own political gains. Therefore the political leaderships of China and India are duty-bound to ensure an atmosphere of mutual understanding and cooperation in the larger interest of the more than 2.6 billion population living in our two countries, which despite the economic growth, shining cities and armed capabilities have its own struggle against poverty.

      India and China are both nuclear powers and have the world’s largest border dispute on their hands. We have over 100,000 square kilometers of borders between us. China tussles over sea routes in the Indian Ocean. It wants to have more and more influence in India’s neighbouring countries and has practically adopted Pakistan. But isn’t there more need to know each other better than indulging in uncalled for situations?

      This is the time when China and India must give the fact a serious thought that why we did not engage satisfactorily in normal people-to-people interaction? Only little less than 200,000 Chinese tourists visit India in a year whereas 2.4 million Chinese go to its arch-rival Japan. China’s investments in India are only around US$ 4 billion, even less than its investments in countries such as Poland. India’s investments in China are even smaller. Diplomatic exchange also has much scope of improvement. India’s embassy in China has little more than two dozen diplomats. The number of India students studying in China is around 10,000 with even fewer Chinese students in India.

      In seminars India and China miss no opportunity to boast about their greatest civilisations and centuries’ old relations. But the unsatisfactory state of affairs between the two countries speaks about the reality. Unless China and India release the vitality of improving people to people relations, developing stronger ties in governmental levels would be a far reaching dream.

      The 1962 armed conflict between India and China lasted only a month, but it has a strong after effect till now. Territorial claims and contentions, a trust deficit and broader geopolitical concerns have provided enough fuel to radical nationalism on both sides that is contrary to the idea of normalising bilateral relations. There is certainly a need to establish cordial and friendly relations. It is unfortunate that the two countries cannot think beyond the constraints and selfish yearnings of nation states. Only ornate official declarations after every state level visit are not going to solve basic problems. If China and India will have ultra-control on their visa regimes, will have strong restrictions on the circulation of information and will not refrain from the tendency to manipulate academic and cultural collaborations, the road to reach the destination will be unending. To create an environment of understanding and awareness between the peoples of the two countries is the only solution.

      I recall the visit of the then Indian Prime Minister Rajiv Gandhi to China when I was working as a Special Correspondent with Navbharat Times, the Hindi Daily form The Times of India Group. The plan agreed on during this landmark visit in 1988 is the still the key to Indo-China relations. Rajiv wanted to concentrate on promoting commercial exchanges while making incremental progress on border negotiations. In fact, the nation-state interventions and counter-productive policies from both sides the commercial exchanges have created their own complications. It is thus now time to think beyond the nation-state framework to allow connections, exchanges, and understanding to grow at the grassroots level.

      West Heavens events on Indian classical music in Shanghai drew enormous crowed recently. Innovative mix of Chinese and Indian traditions was so fascinating that Chinese people were full of admiration for Indian culture and society. There is a need to promote similar niche groups among Chinese lay Buddhists, academics, artists, tourists and reporters. I can tell you with my experience that the general perception and understanding of India among common Chinese is dramatically different from those who troll on social media and those who are projected in Pew Research surveys.

      The fondness for India among Chinese youth does not waver with each border flare-up. The publication of caustic Global Times op-eds does not matter to them. We have to think in the direction of a visa regime that recognises these niche groups and individuals who could be important proponents of Indian society and ideas in China.

      The Chinese government is one step ahead in placing barriers on the potential contribution by such niche groups. Restrictions on civil society organisations and the control of publication channels by China prevent interactions among Indians and Chinese who want to have dialogue and discourse beyond territorial and geopolitical obsessions of nation-states.

      More and more seasoned people as well as emerging scholars need to involve themselves in doing research on China and India with regard to the environment, urban sustainability and media cooperation. The connections established through these exercises would be more productive, far-reaching, secure and committed. The nation-state sponsored think tanks also can play a significant role to achieve the goals. The role of dialogues, the exchange of youth delegations and joint publications can also play positive roles. Both India and China must recognise that the crises between the two countries are not limited to the border dispute or the predicament with Tibet. They are, in fact, much deeper.  What existed 55 years ago was perhaps not that deeper. Today, mutual perceptions, domestic concerns and the patriotic feelings of the people have made the whole thing more complicated.

      It is time for China and India to ease restrictions on interactions and exchanges at the grassroots level. Both the countries must learn to withdraw from managing and overseeing people-to-people exchanges. This is where the niche groups and organisations, even those based outside the two countries, can play a crucial role. There is a need to create platforms for establishing a much broader, stronger and lasting relationship between the two countries which can only be achieved through people to people contact. Nations must not become the greatest evil for the nations.

      Merging Elections Unhealthy For Democracy

                After Prime Minister Narendra Modi’s rigorous push for simultaneous elections to parliament and state assemblies now President Ramnath Kovind has also pitched for the idea. Modi has been preparing a plan for the merger of elections for a long time and Rashtriya Swayam Sewak Sangh (RSS) backed think tanks have been working overtime to create an atmosphere to support Prime Minister’s proposal.

      Modi calls it ‘electoral cycle reforms’ which he argues will limit the amount of time and money spent in electioneering. He wants politicians to have more time for people-oriented programs rather than wasting most of their time in the elections for different political institutions. But the real intention behind it is to consolidate the position of Bhartiya Janta Party (BJP) across the country.

      At an all-party meeting two years back, Modi pushed his idea of merging forthcoming elections. The proposal was raised again at a meeting of the BJP’s national executive. This was a plan in motion even before the last general election. BJP’s manifesto for 2014 election had underlined: “Evolve method of holding Assembly and Lok Sabha elections simultaneously.”

      Modi went another step further when in December 2015 the Standing Committee on Personnel, Public Grievances, Law, and Justice tabled a report in Parliament on the “Feasibility of Holding Simultaneous Elections to the House of People (Lok Sabha) and State Legislative Assemblies”. The report said, “This is important for India if it is to compete with other nations in developmental agenda on real time basis as a robust, democratic country.” The standing committee stated the reasons in detail for exploring simultaneous elections.

      Modi’s proposal is motivated more by political considerations than the reasons he wants us to believe.. It is no secret that when simultaneous elections are held, voters tend to vote for the same party. An analysis of Election Commission data from 1999 onward confirms that there is a 77 percent chance the Indian voter would vote for the same party at the state and Centre if elections are held simultaneously. The proposal also ignores fundamental Constitutional questions.

      Constitutional provisions are very clear on the matter. Article 83(2) provides for a term of five years for the House of People (Lok Sabha), from the date of its first sitting, unless dissolved earlier. Similar provisions under Article 172 (1) provides for a five-year tenure for state Legislative Assemblies from the date of its first sitting. The mandatory term has to be completed first. It is the prerogative of the Assembly to decide when to call an election. But in doing it for the conduct of simultaneous elections would be misusing the Constitution.

      The President of India has the power to extend the period of Assemblies by up to one year to bring about uniformity in holding the elections at the same time. It will be interesting to see that how far our new president would like to stretch his powers to fulfill the desire of a particular political party as it is bound to raise the questions of ethics.

      To conduct elections across the country on the same day, about 4,000 companies of paramilitary forces will be required. The country is able to make available only around one thousand at the moment. Purchasing Electronic Voting Machines (EVMs) and Voter Verifiable Paper Audit Trail (VVPAT) machines would cost approximately Rs 10,000 crore if elections are to be held together.

      State and national elections are often fought on different sets of issues. In simultaneous elections, voters may end up privileging one set of issues over the other. National issues could be left ignored. Local issues could be swept away by a national “wave”. In a multi-party democracy like ours Modi’s proposal is entirely against the basic principles of a federal system.




      सायोनारा, सायोनारा की धुन पर नाचता देश


      इस झमेले में जिसे पड़ना हो, पड़े, कि आम-बजट कैसा था और इससे आम लोगों को कुछ मिला या नहीं? जब नरेंद्र मोदी सरकार के पिछले तीन बजट ही देश को निहाल नहीं कर पाए तो चैथे से जिन्हें कोई उम्मीद पालनी हो, पालें। मैं निराशावादी ही भला! अपनी दुकान पर फलों का रूप दे कर छिलके सजाने की कारीगरी हमारे प्रधानमंत्री जिस सफाई से करते हैं, मैं उसका कायल हूं। कायल हूं, गर्वीला नहीं। शर्मीला हूं। शर्मीला, यानी संकोची नहीं, शर्मसार हूं।
      मैं ने 38 साल संसदीय कार्यवाही दस फुट की दूरी से देखी है। प्रेस-गैलरी में बैठ कर। पहले कभी किसी प्रधानमंत्री को अपनी सरकार के आम-बजट पर, पंक्ति-दर-पंक्ति, ऐसी पहलवानी अदा में मेज़ पर थाप लगाते देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला। यह अहोभाग्य भी कभी नहीं मिला था कि वित्त मंत्री के अंग्रेज़ी में दिए बजट-भाषण का हिंदी तर्ज़ुमा सीधे प्रधानमंत्री के मुखारविंद से, और वह भी विस्तृत टीका सहित, क़रीब-क़रीब फ़ौरन बाद दूरदर्शन पर सुना हो। इस नाते, मेरा यह पत्रकारीय-जनम तो इस बहस्पतिवार को पूर्णतः सफल हो गया।
      इसलिए मैं आपको यह बता कर निराश नहीं करना चाहता कि बजट के ख़ुशनुमा मलबूस के भीतर जो ज़िस्म है, वह कितना खोखला है। जो जानते हैं, उन्हें बताने की ज़रूरत नहीं है और जो नहीं जानते, उन्हें अभी बताने का कोई मतलब नहीं है। वक़्त बेहद निर्मम होता है, सो, आगे-पीछे इस बजट की असलियत भी सब के सामने आनी ही है। नरेंद्र भाई का असली इम्तहान अब इतना भर रह गया है कि वे अपनी सरकार की आंकड़ेबाज़ी के घोड़े पर सवार हो कर और कितनी दूरी तय पाते हैं।
      अपने मन की यह बात हमारे प्रधानमंत्री हमें बताएं, न बताएं, मुझे लगता है कि मन-ही-मन वे समझ गए हैं कि इस घोड़े की सवारी जितनी होनी थी, हो ली है। इसलिए, मैं तो पूरी तरह आश्वस्त हूं कि चौथे आम-बजट की लहर को ज़्यादा-से-ज़्यादा उछाल दे कर वे इसी साल आम-चुनाव कराने वाले हैं। आपको यह अजीब लगेगा, लेकिन मेरा सियासी-इलहाम कहता है कि ये चुनाव इसी मई में हो जाएंगे। अगर टले तो पांच महीने से ज़्यादा नहीं टलेंगे और इस साल की दीवाली मनते ही लोकसभा के चुनावी पटाखे ज़ोरों से फूटने लगेंगे।
      नरेंद्र भाई की मुसीबतें बेतरह बढ़ने लगी हैं। ज़ाहिर है कि इसका खामियाज़ा भारतीय जनता पार्टी को भुगतना है। अपने बलपूर्वक हरण के बाद भाजपा ने सिर झुका कर जिस दिन नरेंद्र भाई के साथ फेरे ले कर उन्हें अपना सर्वस्व सौंप दिया था, उसी दिन ‘डोली आई है, अब अर्थी ही जाएगी’ के प्रारब्ध से वह छप्पन इंच के सीने से बंध गई थी। मिलन की इस वेला ने नरेंद्र भाई को भाजपा का बनाया, नही बनाया; भाजपा को तो नरेंद्र भाई का पर्याय बना ही दिया। रही-सही कसर अमित भाई शाह की खड़ाऊं-व्यवस्था की मुक्केबाज़ी ने पूरी कर दी।
      इसलिए अब जुगलबंदी के बेसुरेपन से थक गए साजिदों की ताल बे-ताल हो रही है। 
      अर्थव्यवस्था की बेहाली हर लीपापोती के बावजूद सतह पर आ गई है। पचास करोड़ लोगों को बीमार होने पर इलाज़ की आस दिलाने वाली सरकार से लोग पूछ रहे हैं कि उनकी बुनियादी जीवनी-शक्ति पिछले तीन बरस में आखि़र चूस किसने ली? अपनी डिग्रियां गले में लटकाए रोज़गार पाने की क़तार में खड़े लोग सवाल उठा रहे हैं कि आख़िर वे अपने भूखे पेट के साथ कितने वादों पर, कब तक यक़ीन करें? किसानों, देहातों, वंचितों और शोषितों का दम भरने वाले हमारे प्रधानमंत्री को यह जवाब देना भारी पड़ रहा है कि आखि़र वे कब तक लोगों को अपने सब्ज़बाग में टहलाते रहना चाहते हैं? हमारी सदियों पुरानी सामाजिक संरचना को भेद रही बर्छियों से लगे ज़ख़्मों की रिसन असह्य होती जा रही है। 
      ऐसे में किसी को दिखे, न दिखे, सच्चाई यह है कि नरेंद्र भाई, अमित भाई और उनके चंद बग़लगीरों को छोड़ कर बाकी पूरी भाजपा भीतर से सनसना रही है। भाजपा के सहयोगी दल भी अपने पल्लू समेटने लगे हैं। शिवसेना तो शयन-कक्ष से बाहर आ कर खुल कर ताल ठोक रही है। तेलुगु देशम ने ‘बहुत हो चुका’ की मुनादी कर दी है। लोक जनशक्ति पार्टी डूबते जहाज से समय रहते खिसक लेने की अपनी चिरंतन परंपरा के निर्वाह में लग गई है। अंग-भंग के बाद बचे-खुचे एकीकृत जनता दल की कसमसाहट भी सतह की तरफ़ बढ़ रही है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के संतरे का छिलका अब बस उतरने ही वाला है। उसमें शामिल ज़्यादातर राजनीतिक दल जल्दी ही एक मंथन-बैठक करने वाले हैं, जिसमें भाजपा को शिरकत के लिए आमंत्रित तक नहीं किया जाएगा।
      यह सब नरेंद्र मोदी को समय-पूर्व लोकसभा चुनाव की दहलीज़ तक खींच लाया है। वे जानते हैं कि 2019 का मई आते-आते तो वे इतने हांफ़ जाएंगे कि कोई सियासी अनुलोम-विलोम उनके काम नहीं आएगा। सो, उन्हें लग रहा है कि 2018 के मई से ले कर नवंबर तक ही वे अपनी लाज थोड़ी-बहुत बचा सकते हैं। इस दौरान वे अधिकतम संभव प्रदेशों की विधानसभाओं को ले कर लोकसभा के मत-कुरुक्षेत्र में डुबकी लगाने की तैयारियां इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें लगता है कि लहरें उन्हें उछाल कर किनारे पर ले आएंगी।
      लेकिन मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि तमाम सूचना-संकलन तकनीकों के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद वे अंधेरे में हैं। इसलिए कि जिस उफ़ान ने उन्हें दिल्ली की राजगद्दी तोहफ़े में दी है, उसने ही उनकी आंखों को वह पर्दा भी सौंपा है, जो ज़मीनी सच्चाई की भ्रूण-हत्या की प्रतिज्ञा से बंधा है। आज की असलियत यह है कि आम-चुनाव इस मई में हों, नवंबर में हों या अगले बरस मई में--अपने को राजनीतिक सृष्टि का रचयिता मानने वाला कोई भी ब्रह्मा भाजपा की झोली में जाने वाली सीटों के आंकड़े को, दो सौ पार नहीं करा सकता।
      छोटे पर्दें के प्रायोजित चुनाव-विश्लेषकों के इस दौर में मेरा भी एक आकलन कहीं लिख कर रख लीजिए। आम-चुनाव अगर इसी मई में हो गए तो हर तरह से तैयारी-विहीन विपक्ष का लाभ भी भाजपा को दो सौ सीटों के आसपास ही थाम देगा। चुनाव अगर नवंबर-दिसंबर में हुए तो भाजपा दो सौ सीटें कतई पार नहीं कर पाएगी। और, चुनाव अगर अपने तय वक़्त पर ही हुए तो भाजपा को आज की तुलना में लोकसभा की अपनी कम-से-कम सौ सीटें भारी मन से विदा करनी पड़ेंगी और मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की विधानसभाएं भी भाजपा को सायोनारा कह चुकी होंगी। 
      गठबंधन की राजनीति का अनुभव बताता है कि भाजपा खुद 240 सीटें पाए बिना मिली-जुली सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आ सकती, जबकि कांग्रेस अगर खुद की 140 सीटें भी ले आएगी तो उसकी चैपाल पर सहयोगी हुक्का गुड़गुड़ाने में परहेज़ नहीं करेंगे। इसलिए नरेंद्र भाई की आंखों में बसा कांग्रेस-मुक्त भारत का ख़्वाब उनके जिस जनम में पूरा होगा, होगा; अगली पारी तो अब देश में भाजपा-मुक्त सरकार की है। यह भाजपा से ज़्यादा नरेंद्र भाई की जुमलेबाज़ी और उससे भी ज़्यादा अमित भाई की घूंसेबाज़ी की हार होगी। 

      थोथे आशावाद की डावोस-नृत्यशाला


                  ठी है कि डावोस का विश्व आर्थिक मंच संसार भर के अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों को एक चबूतरे पर इकट्ठा करने का करतब दिखा कर नीति-निर्धारक राजनीतिकों को झक्कू देने का काम 47 साल से कर रहा है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी को इस फोरम पर 2018 का बिस्मिल्लाही भाषण दे कर फूला समाने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसलिए कि स्विट्जरलैंड के एक मुहल्ले में तेजाजी महाराज की कथा की तरह शुरू हुआ वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम अन्यान्य कारणों से दुनिया के चुनींदा कुलीन कारोबारियों का क्लब ज़रूर बन गया है, मगर विश्व-कल्याण से उसका कोई लेना-देना नहीं है। परदे के पीछे से उसकी तमाम अंगुलियां उन डोरियों का संचालन करती हैं, जिन पर रेंग कर संसार की सारी दौलत तेजी से चंद मुट्ठियों में बंद हो रही है।

                  यही वह डोर है, जिसने भारत की 73 फ़ीसदी दौलत एक प्रतिशत लोगों के हवाले कर दी है। यह बेवजह नहीं है कि डावोस में क्लॉज श्वाब के इस अकादमिक-डिस्को में थिरकने, पूरे 11 महीने भी प्रधानमंत्री नहीं रहे हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा को छोड़ कर, 44 साल में अब तक भारत का कोई दूसरा प्रधानमंत्री खुद नहीं गया था। 1971 में यूरोपीय देशों को मद्देनज़र रख कर शुरू किए गए अपने सालाना जलसे में राजनीतिकों को घेर कर लाने का काम श्वाब ने 1974 में शुरू किया था। देवेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय तो दूर, राष्ट्रीय राजनीति के अक्षरज्ञान से भी अपरिचत थे। देसी-अर्थशास्त्र की गलियां ही वे ज़्यादा नहीं समझते थे तो वैश्विक अर्थशास्त्र के राजपथ तो उनके लिए अजूबा ही थे। ऐसे में वे मुंबई-दिल्ली के बीच उड़ रहे उन कारोबारी-राजनीतिकों की चकाचौंध से घिर गए, जिन्हें स्विस-बैंकों के बहीखातों की अच्छी समझ हो चुकी थी। सो, देवेगौड़ा को तो समझ ही नहीं आया होगा कि वे कब, कैसे और क्यों डावोस घूम आए।

      मगर इसके दो दशक बाद नरेंद्र भाई ने अब अस्सी के हो गए श्वाब की बगल में बैठ कर पता नहीं किसे कृतार्थ किया है? अगर खुद को किया है तो मुझे उन पर दया रही है। अगर दुनिया भर के मुख्य-कार्यकारियों को किया है तो भी मुझे उन्हीं पर दया रही है।  इसलिए कि अगर नरेंद्र भाई को यह लग रहा है कि 52 मिनट तक उनके मन की बात सुनने के बाद अब दुनिया भर के काइयां-कारोबारी अपने संसाधन दोनों हाथों से भारत की तरफ़ उलीचने लगेंगे तो इस भूलभुलैया से निकलने का दरवाज़ा हमारे प्रधानमंत्री जितनी जल्दी खोज लें, बेहतर होगा। भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण के बाद कतार में खड़े हो कर वे सब इसलिए तालियां नहीं बजा रहे थे कि उन्होंने पहली बार कुछ ऐसा सुना, जो भूतो--भविष्यति था। डावोस में दो दशक बाद पड़ी इतनी बर्फ़ के बीच वे इसलिए अपनी हथेलियां गर्म कर रहे थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था की ताज़ा स्थिति को ले कर उनके अंतःचक्षु पिछले एक साल में पूरी तरह खुल गए हैं।

      1987 में अपने यूरोपीय प्रबंधन मंच को विश्व आर्थिक मंच का जामा पहनाने के बाद से क्लॉज श्वाब का जालबट्टा लगातार इतना लुभावना होता गया कि ज़्यादातर देश अपने वित्त या वाणिज्य मंत्रियों को डावोस जलसे में शिरकत के लिए भेजना शान समझने लगे। इससे श्वाब की मुनाफ़ा-विहीन संस्था की शान भी बढ़ती गई। उनके मुनाफ़े का ऊपरी अंकगणित तकनीकी तौर पर सपाट रहा, मगर भीतरी बीजगणित ने स्विस-बैकों के तहखानों की दीवारें गुलाबी कर दीं। दुनिया भर की एक हज़ार बड़ी कंपनियों के कर्ताधर्ता हर साल डावोस की नृत्यशाला में अपनी कारोबारी-कमर मटकाने यूं ही नहीं आते रहे। संसार भर के सियासी-कर्ताधर्ताओं की कमर में हाथ डालने का ऐसा मौक़ा वे क्यों हाथ से जाने देते? सियासतदां भी ऐसे में कब तक विश्वामित्र बने रह सकते थे, सो, आख़िरकार वे भी विश्वामित्र की गति को प्राप्त हो गए।

      श्वाब के क्लब को खुद की मौजूदगी से नवाजने की ललक पर काबू नहीं रख पाने से नरेंद्र भाई का पुण्य स्खलित हुआ है। प्रधानमंत्री के नाते इंदिरा गांधी नौ बार डावोस जा सकती थीं। वे खुद क्यों नहीं गईं? मोरारजी देसाई दो बार जा सकते थे। वे तक नहीं गए। चौधरी चरणसिंह भी एक बार जा सकते थे, लेकिन नहीं गए। राजीव गांधी के ज़माने में तो भारत ने आर्थिक उदारीकरण की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा दिए थे और उन्हें पांच बार श्वाब ने अपने अंतःपुर में आमंत्रित किया, लेकिन एक बार भी वे खुद नहीं गए। विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर भी चाहते तो एक-एक बार श्वाब के (कारो)बार-काउंटर पर गिलास टकरा आते, मगर उन्होंने लार नहीं टपकाई। पामुलपर्ति वेंकट नरसिंहराव पांच बार डावोस में अपना प्रवचन दे सकते थे, मगर वे दूसरों को भेजते रहे। इंद्रकुमार गुजराल एक बार चले जाते तो कौन-सा ग़जब हो जाता, मगर वे भी नहीं डिगे। नरेंद्र भाई को राजधर्म की याद दिलाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने डावोस खुद जाने का धर्म छह बार निभाया। वैश्विक अर्थशास्त्र के सबसे बड़े मर्मज्ञ मनमोहन सिंह ने भी प्रधानमंत्री रहते दस मौक़ों पर दूसरों को ही देश की नुमाइंदगी करने भेजा।

      जो यह सोच रहे हैं कि संसार भर की तिकड़मी खोपड़ियों को नरेंद्र भाई के बताने पर ही यह मालूम हुआ कि दुनिया के सामने सबसे बड़े तीन खतरे कौन-से हैं, मैं उनके भक्ति-भाव से छेड़खानी नहीं करना चाहता। जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद को लेकर अपनी गंभीरतम चिंताएं भारत ने कोई पहली बार विश्व-समुदाय के सामने ज़ाहिर नहीं की हैं। एकतरफ़ा वैश्वीकरण को लेकर अपना एतराज़ हम पहले भी दर्ज़ कराते रहे हैं। दरारों से दरकती दुनिया में साझे भविष्य की रचना करने के हम सिर्फ़ गीत नहीं गाते हैं, हमेशा से इस काम में अपने हाड़ गलाते रहे हैं। गए ही थे तो थोथे आशावाद के इस सबसे बड़े मंच पर अगर नरेंद्र भाई ढोल की पोल खोलते तो कोई बात होती। तब मैं भी खड़े हो कर उनके लिए तालियां बजाता। मगर वे तो बुनियादी सवाल उठाने ही भूल गए।

      बुनियादी सवाल यह है कि श्वाब-क्लब के वे कौन-से सदस्य हैं, जिन्होंने भारत को सेवा-क्षेत्र पर ज़ोर देने के लिए फंसाया? वे कौन हैं, जो हमें निर्माण और उत्पादन-उद्योग से विमुख कर सेवा-उद्योग के छींके में अपना सारा घी रख देने को प्रेरित कर रहे हैं? अमीर मुल्क़ लाख विश्व-ग्राम के सपने दिखाएं, असलियत तो यही है कि एक दिन -वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू होनी है। असली मुद्दा यह है कि यह उलटी गिनती जब आरंभ होगी, तब क्या होगा? डावोस जैसी धांधलियों ने असमानता को संस्थागत शक़्ल देने का काम किया है। एक हज़ार किलो मसालों से पांच-सितारा खानसामे डावोस-क्लब की ज़ुबानों पर तो चटखारे ला सकते हैं, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया से ले कर अफ्रीका तक पसरी भूख मिटाने को रसोइए हम कहां से लाएंगे? कैसे भूलें कि विश्व-भुखमरी सूचकांक में भारत पिछले तीन साल में 55वें से गिर कर 100वें क्रम पर गया है? शब्दों के सालाना उत्सव मनाने से अगर विकासशील देशों की दिक़्कतें दूर हो रही होतीं तो श्वाब के आश्रम की स्थापना के 47 साल बाद मानवता के नक्शे पर पिचके गालों की ऐसी भरमार नहीं होती। गुलाबी गालों पर रीझते वक़्त एक नज़र इधर भी, नरेंद्र भाई!