Wednesday, November 20, 2019

सियासत में नए वसंतागमन की आहट


53 साल पहले बाला साहब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना करते वक़्त भले ही यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन आएगा कि ठाकरे-परिवार का सदस्य चुनावी राजनीति में उतर कर महाराष्ट्र की विधानसभा में पहुंचेगा और राज्य में शिवसेना की सरकार कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की मदद से बनेगी, मगर अगर आज बाल ठाकरे होते तो वे भी इन दोनों क़दमों की ताईद कर रहे होते। वे होते तो, मुझे लगता है कि, भारतीय जनता पार्टी से शिवसेना ने अपना नाता और भी बहुत पहले तोड़ लिया होता। इसलिए आज जो भी हो रहा है, उसमें देश के लिए भी अच्छे संकेत छिपे हैं, महाराष्ट्र के लिए भी सुखद दिनों की दस्तक सुनाई दे रही है और शिवसेना की डालियों पर भी नई और सकारात्मक राजनीतिक कोपलें फूटने के आसार साफ़ हैं।
शिवसेना की अगुआई में पहले ढाई साल और राकांपा के नेतृत्व में अगले ढाई साल अगर महाराष्ट्र की सरकार ने पार कर लिए तो आप यक़ीन जानिए कि भारत के सियासी नक्शे का रंग लोकसभा के अगले चुनाव आते-आते इस क़दर बदल चुका होगा कि अपनी आंखें ज़ोर-ज़ोर से मसलने के बावजूद नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह को विश्वास ही नहीं होगा कि यह हो क्या गया है? न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर अमल में अगर ढाई बरस के दूसरे चरण के दौरान कोई विध्न-बाधाएं नहीं आईं तो, बावजूद अपनी पुरानी मान्यताओं और परिपाटियों के, शिवसेना सर्वसमावेशी राजनीति की मुख्य-धारा का पूरी तरह हिस्सा बन चुकी होगी। उसके हिंदू चेहरे को बदसूरत बनाने वाले मुहांसे और फुंसियां गायब हो चुकी होंगी और कट्टरता के विलयन का लेप उसकी शक़्ल इतनी ख़ूबसूरत तो बना ही चुका होगा कि तालियां बटोरने के लिए उसे किसी संकुचित दड़बे की ज़रूरत न रहे।
बाल ठाकरे से चल कर उद्धव ठाकरे तक पहुंची शिवसेना को अब दरअसल आदित्य ठाकरे के लिए तैयार होना है। इसके लिए उसका रूपांतरण ज़रूरी है। परिस्थितियों ने शिवसेना को सही समय पर यह मौक़ा दे दिया है। अगर वह भाजपा से अलग नहीं होती तो उसका स्वायत्त भविष्य कुहासे से घिरता जाता। ऐसे में एक दिन आता कि भाजपा उसके ज़मीनी संगठन को अपने में समाहित कर चुकी होती और आदित्य अपने पिता उद्धव के साथ अपने राजनीतिक दल का नाम-पट्ट भर लिए खड़े रह जाते। शिवसेना को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के हश्र से बचाने के इस ईश्वर-प्रदत्त अवसर को लपक कर ठाकरे-परिवार ने बुद्धिमानी का काम किया है। अब अगर वह चाहे तो अपनी बावड़ी से निकल कर अरब सागर की लहरों पर भी चप्पू आज़मा सकती है।
जिन्हें डर है कि शिवसेना की संगत में कांग्रेस का पुण्य क्षरित हो जाएगा, मैं उन्हें ‘चंदन विष व्यापत नहीं’ कंठस्थ करने की सलाह दूंगा। कांग्रेस और राकांपा की गरमाहट से जितना पिघलना है, शिवसेना को ही पिघलना है। न्यूनतम साझा कार्यक्रम की आंच से शिवसेना के घनघोर हिंदुत्व-वाद की ही भाप उड़ेगी। उसकी सोहबत से कांग्रेस और राकांपा के चेहरों पर कोई झांईं नहीं पड़ने वाली। कांग्रेस ने 134 साल जिन सियासी उसूलों की घुड़सवारी की है, उन पर शिवसेना के अस्तबल की धूल जमने लगे, मुमक़िन नहीं है। राकांपा को भी अब अजित पवार और उनसे भी ज़्यादा सुप्रिया सुले के लिए तैयार होना है। इसलिए उसका पानी भी ‘जिसमें मिला दो, लगे उस जैसा’ नहीं होने वाला। शरद पवार के हाथों तैयार घुट्टी जिन्होंने पी है, उनकी बुनियाद इतनी भी ढुलमुल नहीं हो सकती।
महाराष्ट्र-प्रसंग में भाजपा की भीतरी खदबदाहट को ले कर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। अगर उनमें रत्ती भर भी सच्चाई है तो समझ लीजिए कि वह तेज़ी से अपने उपसंहार की तरफ़ बढ़ रही है। विधानसभा के चुनाव नतीजे आने के बाद चौकन्ना करने वाल तीन बातें सामने आई हैं। एक, अमित शाह काफी वक़्त से देवेंद्र फडनवीस की नरेंद्र मोदी से सीधी नज़दीकी को लेकर असहज थे। इस चक्कर में देश का एकमात्र ब्राह्मण मुख्यमंत्री लपेटे में आ गया। केंद्र की भाजपा-सरकार में बैठे दूसरे ब्राह्मण नेता नितिन गड़करी को पहले ही किनारे लगा जा चुका है। दो, शिवसेना के साथ ढाई-ढाई साल सत्ता के बंटवारे का वादा नरेंद्र मोदी से छिपाया गया। तीन, अपने सहयोगी दलों को एक-एक कर 2024 तक पूरी तरह लील जाने के संघ-कुनबे की योजना पर अमल हो रहा है।
भाजपा के आधा दर्जन सहयोगी दल पिछले दिनों उससे अलग हो चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र भाई की ईवीएम-फाड़ू जीत के बाद ऐसा होना मामूली बात नहीं है। जब अच्छे-अच्छे मोषा-लट्ठ के सामने औंधे पड़े हों, तब सहयोगी दल इस तरह ऐंठने लगें तो इसका मतलब है कि मौसम बदल रहा है। पांच साल जिनकी ज़ुबानों पर पहरा था, ऐसा नहीं है कि छठे साल वह पहरा हट गया है। पहरा तो अब भी वैसा ही है, मगर ज़ुबानें बत्तीस दांतों की कू्ररता के बावजूद बोलने की हिम्मत कर रही हैं। इसी दिन का तो भारतीय जनतंत्र इंतज़ार कर रहा था। वसंत जब आने को होता है तो पेड़-पौधे नए पत्ते धारण करने लगते हैं। खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं। पुराना सब झड़ने लगता है। क्या आपको नहीं लगता कि महाराष्ट्र-प्रसंग लोकतंत्र के नए श्रंगार का संकेत है?
आदिकवि का आदिश्लोक क्रोंच वध से जन्मा था। व्याध की क्रूरता से जन्मे करुणा मंत्र की शक्ति का ताप क्या कभी साधारण हो सकता है? राजा शिवि क्या अपने शरीर के अंग काट कर बाज़ को यूं ही देने लगे थे? कालिदास के रघंवुशम में राजा दिलीप ने नंदिनी गाय को बचाने के लिए ख़ुद को समर्पित क्यों कर दिया था? समाज है तो राजनीति है। राजनीति समाज के लिए है। समाज राजनीति के लिए नहीं। इसलिए जब-जब दूषित राजनीति समाज की संरचना को ठेल कर उस दीवार तक ले जाती है, जहां से और पीछे नहीं जाया जा सकता तो समाज के दृश्य-अदृश्य दबाव राजनीति को ख़ुद-ब-ख़ुद समायोजित करने लगते हैं। विश्व-राजनीति में भी हमने ऐसी मिसालें देखी हैं और भारतीय राजनीति में भी। अभी आपको सुनने में यह अजीब लगेगा, लेकिन महाराष्ट्र का प्रयोग इसी सियासी बदलाव की शुरुआत है।
इसलिए हम प्रार्थना करें कि यह प्रयोग सफल हो। शिवसेना को आगे की सकारात्मक राजनीति के लिहाज़ से ख़ुद को ढालने का मौक़ा देने में किसी को कंजूसी नहीं करनी चाहिए। अगर उसका हृदय-परिवर्तन हो रहा है तो उसे घनघोर हिंदुत्व के अपने नुकीले हथियार समावेशी जनतंत्र के चरणों में समर्पित करने का मौक़ा ज़रूर मिलना चाहिए। मुझे लगता है कि भाजपा से अपने तीन दशक पुराने ताल्लुक़ की डोर शिवसेना ने सिर्फ़ इसलिए नहीं तोड़ी है कि सत्ता की घोड़ी पर बैठने के लिए उसकी लार टपक रही है। इससे भी ज़्यादा यह आहिस्ता-आहिस्ता भीतर इकट्ठे हो गए दर्द का प्रतिकार है। अगर ऐसा न होता तो शिवसेना कभी भी कांग्रेस का साथ लेने को राज़ी नहीं होती। आख़िर कांग्रेस से ज़्यादा यह उसके वैचारिक जीवन-मरण का सवाल है। सो, बिना दूर की सोचे, महज़ आज की हुकूमत में हिस्सेदारी के लिए शिवसेना ने यह नहीं किया है। इसीलिए तो भाजपा के भीतर हवाइयां उड़ रही हैं। रास्ता जो बन गया है, उस पर कौन कब चल पड़ेगा, क्या मालूम! 

नगलागढ़ू के रामेश्वर ताऊ


आधी सदी बीतने को है, जब हमारे नगलागढ़ू में एक रामेश्वर ताऊ अपने पूरे जलवे-जलाल पर हुआ करते थे। अब नहीं हैं। उन्हें गुज़रे पच्चीस-तीस साल तो हो गए होंगे। रामेश्वर ताऊ गॉव की, अगल-बगल के गॉवों की, तहसील और ज़िले की, राज्य और देश की राजधानी की, ख़बरों से लबरेज़ रहा करते थे। विचारों से भी प्रखर थे और ज़ुबान से भी। चिलम का सुट्टा लगाते ही उनका मन-मस्तिष्क और भी प्रखर हो जाता था।
उस ज़माने में चंद्रभानु गुप्ता से ले कर चरण सिंह तक और कमलापति त्रिपाठी से ले कर हेमवतीनंदन बहुगुणा तक उत्तर प्रदेश के सारे मुख्यमंत्रियों को वे अपने तर्क-कुतर्कों से ना-लायक़ साबित करते रहते थे। यह नहीं किया, वह नहीं किया, ऐसा करते तो बेहतर होता, वैसा करते तो बेहतर होता। करने के पीछे और न करने के पीछे ऐसे-ऐसे सियासी और सामाजिक कोण रामेश्वर ताऊ उलीच कर लाते थे कि, मेरी तो उम्र ही क्या थी, छब्बेदार मूंछों वाले हरप्रसाद पंडित भी घिन्नाटी खा जाते थे।
इंदिरा गांधी उन दिनों प्रधानमंत्री थीं और रामेश्वर ताऊ तो क्या गॉव-का-गॉव उनका ऐसा मुरीद था कि वे कुछ ग़लत कर ही नहीं सकती थीं। जवाहरलाल की बेटी पर ऐसी आस्था तब हर खलिहान में थी। रामेश्वर ताऊ अपनी धोती का छोर कमर में खोंस कर हर शाम चौपाल पर ताल ठोकते थे कि चंद्रभानु, चरण सिंह, कमलापति, बहुगुणा–जिसमें भी दम हो वह नगलागढ़ू आ कर उनसे शास्त्रार्थ कर ले। या फिर बस का टिकट कटाए और उन्हें ‘नखलऊ’ बुला ले। क्यों कि रामेश्वर ताऊ लखनऊ जाकर ‘इन मूर्खों को अपना ज्ञान भी दें और ख़ुद का पैसा भी खर्च करें’, यह उन्हें मंजूर नहीं था।
अपना पैसा लगा कर रामेश्वर ताऊ हर पूर्णिमा को गंगा जी जाने का काम भर करते थे। इसमें भी कोशिश यही होती थी कि कोई मुफ़्त की सवारी मिल जाए। गॉव में तो पक्की सड़क तब थी नहीं, सो, रामेश्वर ताऊ कोई दो कोस पैदल चल कर बगल के कस्बे में पहुंच जाते थे और ट्रक ड्राइवरों की मेहरबानी से गंगा जी नहा आते थे। सिर्फ़ पूनम का दिन ही होता था, जब वे चिलम नहीं खींचते थे। और-तो-और उस दिन-रात हुक्का भी नहीं गुड़गुड़ाते थे। पौ फटने के बहुत पहले ही गंगा जी के लिए निकल पड़ते थे और सांझ ढलने के कुछ देर बाद तक लौट आते थे।
मुझे इसलिए मालूम है कि उछाह भरे बचपन के दिनों में वे मुझे भी पकड़ कर दो-चार बार गंगा जी नहलवा लाए। ख़ुद पर खर्च करने में भले ही कंजूस थे, लेकिन मुझे जब भी ले गए, दिन भर में दसियों बार ‘लल्लू ये खा ले, लल्लू वो खा ले’ कहते रहते थे। बातों-बातों में ज़िंदगी का मर्म ऐसे समझा देते थे कि अब सोचता हूं तो लगता है कि रामेश्वर ताऊ कोई फक्कड़ संत थे। मुझे याद नहीं कि उनके कोई भाई-बंधु, बीवी-बच्चे या नाते-रिश्तेदार भी थे। यह भी नहीं पता कि हमारे परिवार की तरह उनकी भी कोई छोटी-मोटी खेती-बाड़ी थी या नहीं? मुझे नहीं मालूम कि उनका भोजन-पानी कैसे चलता था? मुझे लगता है कि गॉव की ज़िंदगी में तब सब का भोजन-पानी बिना अपनी गरिमा खोए चल ही जाता था।
रामेश्वर ताऊ की आमदनी का ज़रिया क्या है, यह सोचने की न मेरी उम्र थी, न समझ। रामेश्वर ताऊ से किसी की भी सहमति-असमहति अपनी जगह थी, मगर उनकी बातें सुनना सब चाहते थे। सात-सात कोस तक उनकी नारदीय प्रतिष्ठा थी और सई-सांझ अगर कोई उनसे मुंह फुला भी ले तो अगले दिन की चौपाल जुड़ने तक सब अपने आप ही फिर पहले जैसा हो जाता था।
आज मुझे रामेश्वर ताऊ की याद ऐसे ही नहीं आई है। मुझे यह याद इसलिए आई है कि मैं आश्वस्त हूं कि अगर वे आज होते, और हमारे नगलागढ़ू की चौपाल भी वैसी-की-वैसी ही होती, तो रामेश्वर ताऊ नरेंद्र भाई मोदी और अमित शाह के किए-कराए में अपने तर्कों की भुस भर देते और राहुल गांधी समेत समूचे विपक्ष को भी चुल्लू भर पानी में डुबो देते। वे राहुल से पूछते कि अगर इंदिरा जी हर हाल में इसलिए डटी रहीं कि वे जवाहरलाल की बेटी हैं तो तुम होते कौन हो कि इंदिरा जी का नाती होते हुए भी इस तरह विचलित हो जाओ? वे होते तो कम-से-कम हमारे गॉव की चौपाल पर तो आज का सत्ता-पक्ष, अपनी तमाम ताल-ठोकू शैली के बावजूद, उनसे शास्त्रार्थ करने के पहले दस बार सोचता और आज के विपक्ष की तो हैसियत ही नहीं होती कि रामेश्वर ताऊ की आंख-से-आंख मिला ले।
योगी आदित्यनाथ का तो वे ऐसा अजयसिंह बिष्टीकरण कर चुके होते कि स्वयं योगी अपनी यौगिक कलाएं भूल जाते। नरेंद्र भाई और अमित भाई भले ही बस का टिकट कटवा कर उन्हें दिल्ली न बुलाते और ‘बिष्ट-मुनि’ भी चाहे उन्हें ‘नखलऊ’ आमंत्रित न करते, रामेश्वर ताऊ नगलागढ़ू में हमारे वैद्य जी, शंभू जी, बापू जी और श्री चाचा की चौपाल पर तो मोहन भागवत और उनके गुरु-भाइयों के घुटन्ने ट्रंप, नेतन्याहू, पुतिन और शी जिनपिंग के साथ घुटन्ने में उतार ही डालते।
रामेश्वर ताऊ होते तो नगलागढ़ुओं की हवा में एक अलग ही ख़ुशबू तैर रही होती। वहां की नहरों में कुछ अलग ही पानी बह रहा होता। खेतों में कुछ दूसरा ही हरा-भरा पन होता। चूंकि यह सब नहीं है, इसलिए मुझे रामेश्वर ताऊ की याद आई। वे उनमें नहीं थे, जिनके नाम पर ‘वाद’ चला करते हैं। इसलिए रामेश्वर-वाद तो आप-हम कभी सुनेंगे नहीं। लेकिन एक बात मैं आप को बताता हूं। रामेश्वर ताऊ ने कभी किसी से नहीं कहा कि ‘जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ’। उन्होंने किसी से कहा ही नहीं कि चलो मेरे साथ। वे अकेले ही चले, अकेले ही रहे। अकेले ही आए, अकेले ही गए। कहा भी तो गंगा जी नहाने के लिए साथ चलने को कहा। कोई गया तो ठीक, नहीं गया तो ठीक। रामेश्वर ताऊ को हर पूर्णिमा का स्नान करना है तो उन्होंने किया। कभी नागा नहीं की। सब के साथ रहे, पर सब को अपने साथ रखने का कोई आयोजन-प्रयोजन नहीं किया। बस, जस-की-तस रख दीन्हीं चदरिया।
आज जब नरेंद्र भाई धरती का कोना-कोना खंगाल रहे हैं, आज जब विपक्ष के एक-से-एक धुआंधार रुस्तम कोने में दुबके बैठे हैं या दुबका दिए गए हैं, रामेश्वर ताऊ की याद में मेरी आंखों के कोने नम हैं। वे नगलागढ़ू के ताऊ थे। डेढ़-दो सौ की आबादी वाले एक गॉव के ताऊ थे। आसपास के दस-बीस गॉवों के ताऊ थे। आज जब जगत-ताउओं की ज़रूरत है तो दो-पांच गॉवों तक के रामेश्वर ताऊ हमें खोजे नहीं मिल रहे। अगर यह चिंता भी हमें नहीं सालती तो हमारा भगवान ही मालिक है। रामेश्वर ताऊ होते तो, मैं जानता हूं कि, वे ट्रैक्टर-ट्रक चालकों के सहारे ही हमारे जनतंत्र को गंगा नहलवा आते। वे होते तो संसदीय-अयोध्या पर ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’ की गंगाजली छिड़क रहे होते। वे होते तो जो हो रहा है, वह भले हो रहा होता, मगर रामेश्वर ताऊ के चिलम की लौ भी सबसे ऊंची लपक रही होती। मैं ने बचपन में देखा ज़रूर, लेकिन बच्चा था, सो, हुक्का और चिलम भरने का किसी ने मौक़ा नहीं दिया। आज रामेश्वर ताऊ हों तो मैं जीवन भर उनका हुक्का और चिलम भरने में अपना सौभाग्य समझूं।

मस्तमौला राजा और उदास प्रजा का देश


पंकज शर्मा
पिछले पांच साल में हम एक अजीबोग़रीब विरोधाभास के बीच से गुज़रे हैं। एक तरफ़ हमारे पास घनघोर ऊर्जा से लबालब ऐसा प्रधानमंत्री है, जिसने अपने देश का चप्पा-चप्पा नापने के साथ पूरी धरती का कोना-कोना भी छान मारा है। जो बस्ती-बस्ती, जंगल-जंगल, अपनी ही धुन में, पता नहीं क्या गाता, चला जा रहा है। जिसे लगता है कि उसने अपने मुल्क़ में एक ऐसा सतयुग स्थापित कर दिया है कि जहां अब न कोई ग़म है, न कोई आंसू और बस प्यार-ही-प्यार फल-फूल रहा है।
लेकिन दूसरी तरफ़ भारत एक ऐसा देश बनता जा रहा है, जिसने अपनी स्वाभाविक तरंग खो दी है, जिसके भीतर की प्राकृतिक ऊष्मा फ़ना होती जा रही है और जिसके बाशिंदे रह-रह कर सिसकियां ले रहे हैं। भारत के लोग ख़ुद को मनुष्य से मशीन में तब्दील होते देख रहे हैं। वे किसी शासन-व्यवस्था को चलाने वाला पुर्ज़ा भर बनते जा रहे हैं। उनकी ख़्वाहिशों का, उनकी भावनाओं का और उनकी उमंगों का, उनके ही जीवन में, स्थान सिमटता जा रहा है।
ऐसा क्यों हो रहा है? अगर भारत का राजा अर्थवान है, अगर उसके राज-काज की दिशा जनोन्मुखी है, अगर उसके भीतर की ताब सकारात्मक है तो मुल्क़ की टहनियों पर टेसू के फूल क्यों नहीं खिल रहे? टहनियां सूख क्यों रही हैं? अगर हमारा शहंशाह अपने हाथों से ख़ुद हमारे छप्परों की फूस सहेज रहा है तो हमारी छतें बेतरह ऐसे क्यों टपक रही हैं? हमारे आंगन में सन्नाटा-सा क्यों पसरता जा रहा है?
यह मानने को मेरा मन नहीं करता कि कोई राजा अपने ही राज्य को बर्बाद करने का काम करता होगा। आख़िर क्यों कोई ऐसा करेगा? राज्य है तो राजा है। राज्य ही नहीं होगा तो राजा कहां से होगा? क्या कोई राजा इतना मूढ़ हो सकता है कि इस राज़ को न जानता हो? यह मानने को भी मेरा मन नहीं करता कि किसी राज्य की प्रजा बेबात अपने राजा से अप्रसन्न रहने लगती होगी। अगर सब-कुछ ठीक-ठाक चल रहा हो और तमाम घोड़े राजा के रथ को सही दिशा में ले जा रहे हों तो क्यों कहीं की भी प्रजा अपने राजा से उदास रहेगी?
सो, इन पांच वर्षों ने राजा-प्रजा समीकरण की सारी स्थापित मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। राजा तो आया ही अच्छे दिन लाने के सपनीले घोड़े पर सवार हो कर था। उसका दावा है कि अच्छे दिन बहुत-कुछ तो आ ही गए हैं और बचे-खुचे भी कुछ ही दिन दूर हैं। राजा की दैनंदिनी में भाग-दौड़ ही भाग-दौड़ है। इस डाल से उस डाल तक, उस डाल से उस डाल तक–वह दिन-रात एक किए हुए है। उसने भीतर तक क़रीब-क़रीब सब बदल डाला है। हमें सोच-विचार के नए विकल्प दिए हैं। हमें रहन-सहन और खान-पान के नए विकल्प सुझाए हैं। हमें खर्चा-पानी करने के नए तौर-तरीक़ों में ढाला है। हमें मोह-माया से विलग होने को प्रेरित किया है। और-तो-और, हमें अपने अतीत को देखने के लिए भी एक नई दृष्टि प्रदान करने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है।
तो एक राजा और क्या करे? पांच साल में इतना तो अपने राज्य के लिए पांच हज़ार साल में किसी राजा ने नहीं किया। इसलिए मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि प्रजा फिर भी भुनभुना क्यों रही है? अब सदियों से जो देश नहाया-धोया नहीं था, सदियों से जिसने दातुन नहीं की थी, सदियों से जिसके कपड़े नहीं धुले थे, उसे आज की वैश्विक दुनिया के लायक़ बनने में कुछ तो कष्ट प्रजा को भी उठाने पड़ेंगे। बेढब पत्थरों को सुंदर प्रतिमाओं में बदलने का काम करने के लिए राजा ने छैनी-हथौड़ी अपने हाथ में ली है तो इतना भी क्या रोना-पीटना?
आपको इससे कोई फ़र्क़ पड़े या न पड़ें कि आपका वंश-वृक्ष आर्य है या अनार्य, द्रविड़ है या अ-द्रविड़, मूल-वासी है या अ-निवासी; आपके राजा को इससे बहुत फ़र्क़ पड़ता है। इसलिए कि जो आप हैं, वही वह है। उसे इस धरती पर गर्व है। उसे इसी धरती का होने पर गर्व है। राजा के साथ मुझे भी इस धरती पर गर्व है। मुझे भी इसी धरती का होने पर गर्व है। आपको नहीं है तो आप जानें। मैं तो अपने राजा के साथ यह भूलने को तैयार हूं कि मेरे पूर्वज कहां से आए थे। अब जब मैं मनुष्य से अर्द्ध-मनुष्य हो ही गया हूं और पूर्ण-मशीन बनने के गरमा-गरम प्रक्रिया-कुंड में खदबदा रहा हूं तो अपनी वंश-जड़ों को कब तक चाटता रहूंगा? मशीन कहां से आई है, इससे क्या? मशीन जिस काम के लिए बनाई गई है, उसे वह काम करना है।
सो, मैं एक संवेदनहीन रोबोट बनने को तैयार हूं। अपने राजा की छत्र-छाया में अपनी संवेदनाओं को मारने का अभ्यास कर रहा हूं। लेकिन चूंकि अभी मेरी संवेदनाएं पूरी तरह मरी नहीं हैं, इसलिए मुझे अहसास है कि प्रजा अपने राजा से इतनी अनमनी क्यों होती जा रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि भारत को सवा अरब पुतलों का मुल्क़ बना देने के राजकीय-अभियान पर प्रजा को आपत्ति नहीं, घोर आपत्ति है। वह नहीं चाहती कि भारत भी ऐसा देश बने, जहां राजा कहे सावधान तो सावधान और विश्राम तो विश्राम। भारत की तो पहचान ही उसकी आज़ादख़्याली से है। जो भी राजा जब-जब यह स्वतंत्रता छीनता दिखा, प्रजा ने उसका अश्वमेध अपने खूंटे पर बांध डाला। भारतीय मानस आज इसी देहरी पर बैठा दिखाई दे रहा है।
ज़ाहिर है कि राजा को यह दिखाई नहीं दे रहा है। राजाओं को आदत हो जाती है कि न तो उन्हें दूर का दिखाई देता है और न पास का। राजमहल में बैठने से ही कोई राजा नहीं हो जाता है। राजा एक वृत्ति है। राजा एक प्रवृत्ति है। बहुत-से हुए, जो राजमहल में रहे, मगर राजा नहीं हुए। बहुत-से हैं, जो राजमहल छूट जाने के बाद भी राजा ही बने रहे। जब राजा की प्रवत्ति से भरा-पूरा कोई व्यक्ति राजमहल भी हासिल कर लेता है तो करेला नीम पर चढ़ जाता है। इतिहास ने हमें बताया है कि राजा और राजमहल के ऐसे गठजोड़ों ने बड़े-बड़े राज्य तबाह कर डाले। भरत-भूमि की अंतः-तपस्या उसे कब तक बचा कर रख पाएगी, देखना अभी शेष है।
ऐसा तो अभी नहीं है कि प्रजा घरों से निकल पड़ी है। लेकिन ऐसा ज़रूर है कि प्रजा अपने घरों से आहिस्ता-आहिस्ता बाहर निकलने लगी है। इतना भी क्या कम है? साल भर पहले तक तो लोग अपनी खिड़कियों से बाहर झांकने को भी तैयार नहीं थे। बाहर कभी धार्मिकता का, कभी राष्ट्रवाद का और कभी अपने भक्तिवाद का सायरन बजाते सनसनाते घूम रहे दस्तों से भयभीत समाज ने अब दीवारों की ईंटें हिलाना शुरू कर दी हैं। प्रजा ने इतना तो साफ कर दिया है कि उसे कोड़े फटकारता राजा नहीं चाहिए। सो, या तो राजा अपने को बदले। नहीं तो प्रजा अंततः राजा को बदलेगी। देर-सबेर यही होना है। आप देखेंगे कि जनतंत्र की रेल अब अगले जिन-जिन स्टेशन पर रुकेगी, अपने सपनों की गठरियां ले कर उसमें इतनी नई सवारियां चढेंगी कि 2024 की गर्मियां आते-आते वह भीतर से छत तक ठसाठस भर चुकी होगी। चार साल हैं, लेकिन चार साल कौन-से ज़्यादा होते हैं?

आसमान की सुल्तानी से असहमति का संकेत


पंकज शर्मा
हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव नतीजों से नरेंद्र भाई मोदी शैली की ढोल-ढमाकाई और घुड़कीबाज़ सियासत के ख़िलाफ़ असहमति में उठे हाथ का औपचारिक ऐलान हो गया है। यह विपक्ष की वजह से नहीं, मतदाताओं की वजह से मुमकिन हुआ है। अगर मतदाता घरों से निकल कर विपक्ष के पैरों की बेड़ियां नहीं तोड़ते तो वह अब भी अपनी लूली घिसटन लिए बिलबिला रहा होता। सो, जब लोगों को लगा कि यह तो हद ही हो गई कि ‘मोशा-दौर’ पर लगाम लगाने में सब की हिम्मत जवाब देती जा रही है तो वे ख़ुद अपने-अपने गांवों से यह संदेश देने निकले कि किसी को यह ग़लतफ़हमी न रहे कि देश एक रंग में रंग गया है और जनता में अभी बहुत जान बाकी है।
हरियाणा और महाराष्ट्र से आए नतीजे पूरे मुल्क़ की बानगी हैं। अब तय विपक्ष को करना है कि इसके बाद भी वह उठ कर खड़ा होना चाहता है या नहीं, अपने को एकजुट करना चाहता है या नहीं और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहता है या नहीं? 2014 में नरेंद्र भाई के आगे-पीछे गरबा करते उन्हें दिल्ली तक लाने वाली बारात के बारातियों का बड़े हिस्से को 2016 की सर्दियों में ही ठिठुरन ने अपनी लपेट में ले लिया था। नोट-बंदी ने उन्हें बुरी तरह सहमा दिया। लेकिन वे राष्ट्रवाद के अलाव के सामने अपनी हथेलियां आपस में रगड़ कर किसी तरह ख़ुद को गर्म रखने की कोशिशों में लगे रहे। फिर 2017 में 30 जून की आधी रात, जब तारीख़ 1 जुलाई हो रही थी, तो संसद के केंद्रीय कक्ष में नरेंद्र भाई के जीएसटी-घंटनाद ने फिर एक ऐसा थपेड़ा दिया कि मुल्क़ का जबड़ा हिल गया। मगर सर्जिकल स्ट्राइक की आतिशबाज़ी से कुछ वक़्त फिर लोगों ने अपने दिल बहला लिए।
2019 की गर्मियां आते-आते हालांकि देशवासियों का मन राजकाज की मोशा-शैली से भीतर-ही-भीतर भिनभिनाने लगा था, मगर खुल कर ‘राजद्रोही’ बनने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ रही थी। सो भी ऐसे माहौल में, जब सरकार पर सवाल उठाने का मतलब देश पर सवाल उठाना बना दिया गया हो। बोलते ही आपके माथे पर देशद्रोही होने का कलंक लगाने के लिए आस्तीन में कालिख लिए घूम रहे दस्तों से निपटना आम-जन के लिए लंका-विजय जैसा दुरूह था। ऐसे में परत-दर-परत अहसास भीतर तो गहरा होता गया, मगर बाहर आने की दुविधा से भी घिरा रहा। नतीजा हुआ कि नरेंद्र भाई आम-चुनाव में ‘थ्री-नॉट-थ्री’ जीत लहरा कर दोबारा दुगने जोश से लोकसभा में घुस गए।
विपक्ष को कुचलने में वैसे भी ‘मोशा’ कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे, बाकी का स्व-नाश करने में विपक्ष ख़ुद जुटा हुआ था। दूसरी बड़ी हार के बावजूद, राहुल गांधी ने 2019 के आम-चुनाव में नरेंद्र भाई की नींद जिस तरह उड़ा दी थी, उसकी सब तारीफ़ कर रहे थे। वे ‘पराक्रमी’ नरेंद्र भाई का ‘सतत सनातनी’ विकल्प बनने की दहलीज़ पर आ कर पूरी दृढ़ता से खड़े हो गए थे। मगर बीहड़ संघर्ष के दिनों में अपनों के रवैए की चुभन राहुल को इतनी साल रही थी कि वे कांग्रेसी-यशोधरा को रातों-रात छोड़ गए। इससे नरेंद्र भाई के मन की पूरी हो गई। कांग्रेस में आए शून्य से पूरे विपक्ष पर एक अजीबो-ग़रीब कुहासे के बादल घिर आए। क्षत-विक्षत विपक्ष ने नरेंद्र भाई को बिना किसी से पूछेताछे धारा 370 हटाने जैसे कामों के दुस्साहस से भर दिया। उन्हें लगा कि देस-परदेस में इसे ले कर उनके जयकारे लग रहे हैं। मगर वे समझ नहीं पाए कि दीवाने-ख़ास में बज रहे नगाड़ों के शोर में दीवाने-आम के घंुघरुओं की आवाज़ अभी सुनाई नहीं दे रही है। सो, वे 370 हटाने का श्रेय स्वयं को देते हुए हरियाणा और महाराष्ट्र में पिल पड़े। सोचा कि इस खाद से तो मतों की फ़सल ऐसी लहलहाएगी कि लोग चकित रह जाएंगे।
लेकिन भारत के लोग नरेंद्र मोदी से ज़्यादा बुद्धिमान हों, न हों; वे उनसे ज्यादा विवेकवान तो निश्चित ही हैं। भारत के लोग किसी साकार-विपक्ष के मोहताज़ भी नहीं हैं। वे अपना राजा भी ख़ुद ही गढ़ते हैं और समय आने पर उसका प्रतिलोम भी ख़ुद ही रचते हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र से आई चिट्ठी में लिखा है कि शहंशाह की मनमानी हम अब नहीं चलने देंगे। मैं जानता हूं कि नरेंद्र भाई ने तो इस चिट्ठी को तार समझ कर ग्रहण किया है। मगर विपक्ष अगर अब भी निराकार ही रहना चाहे तो इसका मतलब है कि उसकी क़िस्मत ही फूटी है। अगर किसी को लग रहा है कि महाराष्ट्र में एनसीपी के शरद पवार और कांग्रेस के बालासाहब थोराट के नायकत्च को वोट मिले हैं तो मैं हंसने के अलावा क्या करूं? अगर किसी को लग रहा है कि हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के प्रति आस्था को यह दक्षिणा मिली है तो मैं रोने के अलावा क्या करूं? जो हुआ वह राजकाज की मोदी-शैली से इनकार की बौछार है। इसके छींटों ने प्रतिपक्ष के गाल स्वयमेव गुलाबी कर दिए हैं।
यह सवाल उठाने वालों को, कि क्या धारा 370 हटने से महाराष्ट्र की ज़मीनी समस्याएं हल हो जाएंगी, नरेंद्र भाई ने ‘डूब मरो-डूब मरो’ कह कर धिक्कारा था। महाराष्ट्रवासियों ने इसका जवाब उस परली विधानसभा क्षेत्र से पंकजा मुंडे को करारी शिक़स्त दे कर दे डाला, जहां से नरेंद्र भाई ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की थी और अमित शाह भी जहां घनघोर प्रचार के लिए गए थे। यह जवाब है कि आसमान की सुल्तानी अपनी जगह है, ज़मीनी मसले अपनी जगह। हरियाणा में भी भाजपा-सरकार के आठ मंत्रियों को बुरी तरह हरा कर वापस भेज देने के पीछे इसी सोच ने काम किया। पांच महीने पहले हुए लोकसभा के चुनावों के समय महाराष्ट्र में विधानसभा की 140 सीटों पर भाजपा को बढ़त मिली थी और हरियाणा में 80 पर। अब विधानसभा के चुनाव हुए तो महाराष्ट्र में भाजपा को 105 सीटें मिली हैं और हरियाणा में सिर्फ़ 40। डेढ़ सौ दिन के भीतर-भीतर महाराष्ट्र में भाजपा का वोट 23.2 प्रतिशत कम हो गया और हरियाणा में 2.1 प्रतिशत।
यह हालत तब हुई है, जब विपक्ष के सारे घोड़े ज़ख़्मी थे, जब उसके योद्धाओं के हाथों में टूटी तलवारें थीं और जब उसकी मंज़िल की तमाम दिशाएं घने कोहरे की वजह से अदृश्य थीं। पिलपिले मनोबल और अनमने विपक्ष के सामने भी अगर मतदाताओं ने भाजपा की यह हालत कर दी तो तब क्या होता, जब विपक्ष ने भी जनता की ताल से ताल मिला ली होती? क्या मेरे साथ आप ऐसे मतदाताओं को सलाम नहीं करेंगे, जो विपक्ष के अष्टावक्री आकार-प्रकार से हताश नहीं हुए? सकल-विपक्ष को यह तथ्य अपनी आत्मा में बसा लेना चाहिए कि 2019 के जिस लोकसभा चुनाव में नरेंद्र भाई की दुंदुभी बजी है, उसमें भी मतदान केंद्रों तक गए 61 करोड़ मतदाताओं में से 38 करोड़ भाजपा के ख़िलाफ़ वोट दे कर लौटे थे। और, ऐसा उन्होंने अपने आप किया था। उनमें से साढ़े ग्यारह करोड़ मतदाताओं ने यह काम राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस के भरोसे किया था। इसके बाद भी अगर चंद चुनमुनियों के चलते राहुल उन्हें छोड़ चलें तो मैं राहुल से क्या कहूं? मैं तो इतना ही जानता हूं कि हरियाणा और महाराष्ट्र में आए जनादेश ने विपक्ष की जवाबदेही और भी बढ़ा दी है। बाकी विपक्ष जाने! 

डूब मरो-डूब मरो, देशवासियों, डूब मरो


पंकज शर्मा
हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने विपक्ष के लिए ‘डूब मरो, डूब मरो’ का नारा बुलंद कर दिया है। मैं इसका फ़लक और व्यापक करते हुए उनके अ-सुर में अपना स्व-सुर मिलाता हूं–‘डूब मरो, डूब मरो’। बल्कि जहां चुल्लू भर पानी भी न मिले, वहां जा कर डूब मरो। देशवासियो, क्या-क्या देखोगे? क्या-क्या भुगतोगे? कब तक हाथ बांधे बैठे रहोगे? इससे तो डूब ही मरो। नरेंद्र भाई क्या ग़लत कह रहे हैं? भारत का प्रधानमंत्री इस बुरी क़दर धिक्कार रहा है और भारतवासी फिर भी डूब नहीं मरते!
विपक्ष को तो छोड़िए। उसकी तो हैसियत ही क्या है? इतनी भर है कि 2019 के आम चुनाव में जब 61 करोड़ लोग मतदान केंद्रों पर अपनी राय ज़ाहिर करने पहुंचे तो उनमें से 38 करोड़ लोग नरेंद्र भाई के ख़िलाफ़ वोट दे कर वापस आए। 63 प्रतिMत मतदाताओं ने विपक्ष के किसी एक राजनीतिक दल को वोट भले ही नहीं दिए, मगर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को तो सिरे से नकारा। फिर भी अगर सीटों के अंकगणित ने नरेंद्र भाई को प्रधानमंत्री की गद्दी दे दी तो इसमें उनका क्या कसूर है? ऐसे में अगर विपक्ष गुनाह करेगा तो उसे डूब मरने की सलाह देना देश के प्रथम सेवक का प्रथम कर्तव्य है।
विपक्ष इससे बड़ा गुनाह और क्या कर सकता है कि उसने कह दिया कि जिस महाराष्ट्र में डूब रहे बैंकों के मारे लोगों की हिचकियां नहीं थम रही हैं, वहां धारा-370 के हटने का आलाप उन्हें कौन-सा मरहम लगा देगा? बात पकड़ने, उसे अपने हिसाब से मरोड़ने और ढोल-नगाड़ा ले कर पिल पड़ने की महारत न होती तो क्या नरेंद्र भाई अपनी ही पार्टी की छाती पर चढ़ कर 2014 में रायसीना-पहाड़ी फ़तह कर लेते? अगर धराभीम ऊर्जा से वे सराबोर न होते तो क्या पांच साल में पूरे मुल्क़ को गऊ बना कर 2019 में वे दोबारा ‘थ्री-नॉट-थ्री जीत’ हासिल कर लेते? सो, नरेंद्र भाई ने ऐलान कर दिया कि विपक्ष कह रहा है कि महाराष्ट्र का कश्मीर से क्या लेना-देना और ऐसा कहने वालों को डूब मरना चाहिए।
नरेंद्र भाई के अनुचरों को छोड़ दें तो बाकी पूरा भारत पूछ रहा है कि आज की घनघोर आर्थिक मंदी क्या धारा-370 हटाने से दूर हो जाएगी? क्या यह भीषण बेरोज़गारी धारा-370 हटाने से दूर हो जाएगी? क्या नोट-बंदी के दुष्परिणाम धारा-370 हटाने से धुल जाएंगे? क्या ठप्प हो गए उद्योग-धंधे धारा-370 हटाने से वापस आ जाएंगे? पिछले पांच साल में हर साल भुखमरी के विश्व-सूचकांक में नीचे गिरते जा रहे भारत की समस्याएं क्या धारा-370 हटाने से दूर हो जाएंगी? नरेंद्र भाई का फ़रमान है कि ये सवाल उठा रहे सभी भारतवासी डूब मरें।नरेंद्र भाई के जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने का पुण्य अगर चित्रगुप्त के बहीखाते में दर्ज़ हो ही गया है तो फिर ऐसा क्या उद्विग्न होना कि ज़रा-सा कोई पूछे कि इसका हमारी दो जून की रोटी से क्या ताल्लुक़ तो ‘डूब मरो-डूब मरो’ चिल्लाने लगना! हिकारत का जैसा भाव अपने चेहरे पर लिए एक प्रधानमंत्री को मैं ने ‘डूब मरो, डूब मरो’ का शंखनाद करते देखा, मुझे भीतर से यह सोच कर ख़ुद पर इतनी घिन आई कि मैं 2014 की गर्मियों में ही क्यों नहीं डूब मरा? नहीं तो कम-से-कम चार महीने पहले इस साल की गर्मियों में तो मुझे डूब कर मर ही जाना चाहिए था।
लेकिन लोग इसलिए डूब कर नहीं मर रहे हैं कि जिन्हें डूब मरना चाहिए, वे तो लाज के किसी भी तालाब में डूब कर मरने को तैयार नहीं हैं। सो, उनकी उम्र बढ़ाने के लिए हमीं क्यों डूब मरें? जब देश को नोट-बंदी की खाई में धकेलने के बाद पचास दिन मांगने वाले 1075 दिन बाद भी डूब मरने को तैयार नहीं हैं तो डूबते बाज़ार और डूबते बैंकों में अपने पसीने की कमाई डूबती देख रहे देशवासी क्यों डूब मरें? किन्हें डूब मरना चाहिए? मुंह का निवाला छीनने वालों को या रोटी का सवाल उठाने वालों को? भूखे पेट भी तिरंगा लहराना भारतवासियों को किसी से सीखना नहीं है। इसीलिए तिरंगे की आड़ में बने अंतःकक्षों में क्या घट रहा है, यह जानने का हक़ भी हरेक देशवासी को है। यह पहली बार है कि जवाब देने वालों के बजाय सवाल पूछने वालों को डूब मरने की सलाह मिल रही है। जिन्हें करना हो, इस नए भारत का स्वागत करें, मैं इस शोर में डूबने से इनकार करता हूं।
बुनियादी प्रश्न खड़े करने से नहीं, विपक्ष तब बिना किसी के कहे भी डूब कर मर जाएगा, जब नागरिकों के असली सरोकार उसकी प्राथमिकता-सूची से बाहर हो जाएंगे। अभी ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ है। मगर इतना ज़रूर हो गया है कि तरह-तरह के कारणों से सकल-विपक्ष अपनी बुनियादी भूमिका निभाने में आनाकानी कर रहा है। यह लड़ाई विपक्ष के किसी एक धड़े के बूते की नहीं रह गई है। जनतंत्र के उसूलों से लिपटे किसी अकेले चने में वह ताक़त नहीं बची है कि एकतंत्र की भाड़ फोड़ दे। इसके लिए तो समूचे विपक्ष को एकल-सेना बनानी होगी। ऐसा नहीं हुआ तो फिर कोई प्रधानमंत्री नहीं, पूरा देष नारा लगाएगा–‘डूब मरो, डूब मरो’।
राजनीति के मूल्यहीन होने का ऐसा दौर पहले कभी नहीं था। जब हम इस दौर से गुजरने को अभिशप्त हों तो उम्मीद भरी आंखें इसके अलावा क्या करें कि षब्दों की आहट का इंतज़ार करें। मगर अब यह इंतज़ार बहुत लंबा होता जा रहा है। यह इतना खिंच गया है कि टूटन के किनारे है। नए साल के पहले दिन अकेले दिल्ली में एक लाख लोग अपने आप इंडिया गेट पहुंच जाते हैं, ढाई लाख लोग ख़ुद-ब-ख़ुद हनुमान मंदिर चले जाते हैं, पांच लाख लोग बंगला साहिब गुरुद्वारा मत्था टेक आते हैं और चिड़ियाघर तक की सैर करने भी पचास हज़ार लोग पहुंच जाते हैं। ऐसे उत्साही मुल्क़ में अगर हज़ार-पांच सौ लोगों में भी राजनीतिक फूहड़पन के खि़लाफ़ कहीं इकट्ठे होने की इच्छा नहीं जागती तो आस्थाहीनता की इस स्थिति के लिए विपक्ष नही तो कौन ज़िम्मेदार है?
मगर फिर भी विपक्ष को नरेंद्र भाई के कहने पर तो क़तई डूब कर नहीं मरना चाहिए। उसे इसलिए ज़रूर डूब कर मरने के बारे में सोचना चाहिए कि आज के तांडवी-माहौल में भी वह देशवासियों की आस्था का चुंबक नहीं बन पा रहा है। राख सरीखे शोलों पर आस्था रख कर देशवासी क्या करें? अगर उन्हें सत्तालोलुपों में से ही किसी को चुनना है तो फिर नरेंद्र भाई की भाजपा ही क्या बुरी है? दशकों की अपनी वैचारिक तपस्या का गाना गाते रहने भर से अब बदलाव की अलख नहीं जगने वाली। विपक्ष के बंजारे अब तो जब तक बस्ती-बस्ती परबत-परबत गाते नहीं घूमेंगे, कोई उनकी सुनने वाला नहीं है।
इस बेतरह ऊबड़खाबड़ समय में भी मुझे नरेंद्र भाई ने उम्मीद की लौ से इसलिए गुनगुना कर रखा है कि मैं जानता हूं कि बाहर का खेल कितना ही मजबूत हो, भीतर को साधे बिना बात नहीं बनती है। और, नरेंद्र भाई की भीतरी साधना क्षरित होती जा रही है। इसके बगूले बीच-बीच में तेज़ी से कौंधते हैं। ऐसे में वे अपने पद की तमाम असाधारणताएं भूल कर निरे दोपाया प्राणी बन कर रह जाते हैं। भीतर की ये गांठें देर-सबेर व्यक्ति को उलझा ही देती हैं। इसलिए आज नहीं तो कल, उनका पैर उलझेगा। तब उन्हें डूबने से बचाने को कौन होगा?

वैराग्य, संन्यास और मुक्ति का असली मार्ग


राहुल गांधी चाहते क्या हैं? यह मानने को तो उनके दुश्मनों का भी मन नहीं करेगा कि वे चाहते हैं कि कांग्रेस ख़त्म हो जाए। वे तो कह रहे थे कि मेरी शादी तो अब कांग्रेस से हो गई है। अब कांग्रेस ही मेरा जीवन है। तो फिर भरी जवानी में बेबात कोई क्यों विधुर होना चाहेगा? लेकिन कांग्रेस की तबीयत जब इतनी नासाज़ चल रही है तो राहुल उसके इलाज़ पर ठीक से ध्यान क्यों नहीं दे रहे हैं? उसे झोला-छाप चिकित्सकों की मेज पर उन्होंने क्यों छोड़ रखा है?
प्रियंका गांधी क्या चाहती हैं? अपनी दादी और पिता के ज़माने से कांग्रेस के जिस अहसास के साथ वे बड़ी हुई हैं, कौन मानेगा कि आज के हालात उन्हें ग़मज़दा न करते होंगे? उनके पैर उत्तर प्रदेश की सरहद से बांध दिए गए हैं। सो, सांगठनिक मर्यादा की शराफ़त का वे पालन कर रही हैं और अपने मतलब-से-मतलब रखने के अलावा और कुछ करने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस में मौजूद प्रतिभाओं की ऊर्जा के न्यूनतम-उपयोग की इस वक़्त वे सबसे बड़ी मिसाल हैं।
सोनिया गांधी क्या चाहती हैं? दो दशक पहले के अंधकूप से जिस कांग्रेस को बाहर ला कर उन्होंने रायसीना की पहाड़ियों पर दोबारा आसीन करा दिया था, क्या उसकी ऐसी अधमरी हालत उन्हें सुख पहुंचाती होगी? राहुल के अध-बीच इस्तीफ़े के बाद अंतरिम-कमान संभालने के लिए तैयार होना क्या उनके लिए आसान फ़ैसला रहा होगा? मगर फिर भी अगर उन्होंने यह किया तो उनकी यह मंशा साफ़ है कि अपने होते तो वे कांग्रेस को लुट-पिट जाने देंगी नहीं।
कांग्रेसी नेता क्या चाहते हैं? ज़्यादातर को कांग्रेस से पहले भी कोई लेना-देना नहीं था, आज भी नहीं है। वे आज की कमज़ोर हालत का फ़ायदा उठा कर और ज़ोर-शोर से बची-खुची नोंच-खसोट में लग गए हैं। इनेगिने हैं, जो पहले भी दधीचि थे और अब भी सोचते हैं कि रही-सही हड्डियां भी अगर कांग्रेस को जिलाने के काम आ जाएं तो इतना आत्म-संतोष ही काफी है। मगर उन्हें पूछ कौन रहा है?
कांग्रेस के आम कार्यकर्ता क्या चाहते हैं? अगर यह सवाल कभी कांग्रेस का केंद्रीय-प्रश्न रहा होता तो आज की नौबत ही क्यों आती? इसलिए, हालांकि इसकी कोई अहमियत नहीं है कि वे क्या चाहते हैं, वे बेचारे चाहते हैं कि कांग्रेस किसी तरह कफ़न फाड़ कर आज के मुर्दाघर से बाहर आ जाए। वे इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। लेकिन कोई उन्हें बताए तो कि करना क्या है? कोई मतलब, राहुल, प्रियंका और सोनिया में से कोई। वे चाहे जिस बांसुरी-गोपाल के पीछे चलने को तैयार नहीं हैं।
चार महीने पहले हुए आम चुनावों के नतीजो से भी ज़्यादा विचलित राहुल को उनके सहयोगियों के व्यवहार ने किया। जवाबदेही के उनके मार्ग पर साथ चलने को सचमुच में जब कोई भी राज़ी नहीं हुआ तो राहुल ने भी उस राह से लौटने से पूरी तरह इनकार कर दिया। मुझे नहीं मालूम कि राहुल को यह मालूम था कि नहीं कि यह झटका कांग्रेस को ले बैठेगा। लेकिन अब तो उन्हें यह पता है कि उनके इस मूसल ने कांग्रेस को चूर-चूर कर दिया है। कांग्रेस का यह दर्द किसी और की दी दवा से ठीक नहीं होने वाला है। इसलिए रात के सन्नाटे में ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्ही दवा देना’ की दूर से आती धुन सुनाई दे रही है।
चुनावों के नतीजों से आहत हो कर वन-गमन कर देने से क्या होगा? नतीजे तो 2024 के आम चुनावों से पहले अभी और आएंगे। हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव हो रहे हैं। क्या कांग्रेस वहां सरकारें बना लेगी? अगले साल जनवरी और फरवरी में झारखंड और दिल्ली के चुनाव होंगे और नवंबर में बिहार के। 2021 के मई-जून में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के चुनाव आ जाएंगे। 2022 के मार्च-मई में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के चुनाव-मैदान में जाना होगा। 2023 गुजरात, हिमाचल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के चुनावों का साल होगा। इन सब की तैयारियां अगर नेतृत्व-शून्यता के माहौल में ही हुईं तो कांग्रेस में कब-कब और कौन-कौन वानप्रस्थी होता रहेगा?
इसलिए कांग्रेस के कर्ताधर्ताओं को जल्दी ही सोचना होगा कि अब उन्हें करना क्या है? राहुल गांधी अध्यक्ष के पद पर वापसी के कितने ही ख़िलाफ़ हों, मेरा मानना है कि कांग्रेस को उन्हें यह मनमानी करने का हक़ कतई नहीं देना चाहिए। उनकी निजता का, उनकी भावनाओं का और उनकी ताजा मनःस्थिति का पूरा सम्मान करते हुए, मुझे खुलेआम यह कहने में कोई हिचक नहीं है, कि अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी से किनारा कर के राहुल बुनियादी जवाबदेही के तमाम सिद्धांतों की अवहेलना कर रहे हैं। फ़ौरन लौट कर अगर वे कांग्रेस की खर-पतवार साफ़ नहीं करेंगे तो इस अन्याय का पाप उनके सिर पर चढ़ कर आजीवन बोलता रहेगा।
राहुल-प्रियंका-सोनिया कितना जानते हैं, मैं नहीं जानता; लेकिन जानने वाले यह जानते हैं कि पिछले चार महीनों में, ग़ैर-कांग्रेसी जड़ों से जन्मे घुसपैठियों की, कांग्रेसी बरामदों में कैसी बहार आ गई है! यह घेराबंदी जब अपनी सफलतम स्थिति को हासिल कर लेगी तो कांग्रेस उस सियासी-रसातल की तलहटी छू लेगी, जहां से उबरना उसके लिए मुमकिन ही नहीं होगा। इसलिए इतना भी क्या ग़रीब की जोरू होना? राहुल को असली झटका तो कांग्रेस को अपनी वापसी का देना चाहिए। इसकी घोषणा भर से कांग्रेस नक़ाबपोशों के चंगुल से बाहर आ जाएगी।
लोकतांत्रिक राजनीति के मूल में जन-जुड़ाव का सिर्फ़ कारण होता है–ख़ुशहाली का पूर्वानुमान। जो विवेकवान हैं, वे इसमें देश की ख़ुशहाली ढूंढते हैं। जो आत्मकेंद्रित हैं, वे ख़ुद की। लेकिन दोनों के लक्ष्य तभी सधते हैं, जब उनका राजनीतिक दल मज़बूत होता है। कांग्रेस के बारे में तरह-तरह के संशय तो इन चार महीनों में ज़रूर उपजे हैं, मगर अभी ऐसा नहीं हुआ है कि उसके भविष्य पर लोगों ने पूर्णविराम लगा दिया हो। इसके पहले कि ऐसा हो, राहुल-प्रियंका को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी।
सिर्फ़ अपना लक्ष्य-वेधन कर लेने से तमाम जवाबदेहियां पूरी हो जातीं तो फिर बात ही क्या थी? लेकिन ऐसा होता नहीं है। महाभारत के अर्जुन को पानी की परछाई में भी मछली की आंख तो दिखाई दे गई, लेकिन भरी सभा में द्रोपदी की डबडबाई आंखें उन्हें भी नहीं दिखी थीं। इसलिए यह प्रश्न आज भी क़ायम है कि क्या निजी लक्ष्य-संधान ही जीवन है? सो, जो विपासना यह भी न समझा सके कि जीवन इससे बहुत आगे की चीज़ है, वो विपासना किस काम की? कांग्रेस के भीगे नयन राहुल को अगर आज भी नहीं दिखेंगे तो कब दिखेंगे?
राहुल को अगर वैराग्य लेना ही है तो किनाराक़शी से लें। उन्हें अगर संन्यास लेना ही है तो अपने अनमनेपन से लें। उन्हें अगर मुक्त होना ही है तो आसपास की अमरबेलों से हों। उनके कल्याण का यही एक मार्ग है। कांग्रेस के कल्याण का भी यही एक मार्ग है। इसी मार्ग पर चल कर वे कांग्रेस का पुनरोदय कर पाएंगे। वरना रही-सही कांग्रेस भी तिल-तिल कर नष्ट हो जाएगी। इसलिए राहुल को तय करना है कि वे नई सृष्टि के रचयिता के तौर पर हम सब की स्मृतियों का हिस्सा बनेंगे या विनाश के देवता बन कर? राहुल-प्रियंका बुरा न मानें, मगर छद्म-मित्रों से स्वयं को विलग कर वापसी की दृढ़-प्रतिज्ञा किए बिना वे भारत के लोकतंत्र को नहीं बचा पाएंगे।

Image may contain: Pankaj Sharma

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