Monday, October 15, 2018

मूर्ति-भंजन युग की बिगुलवादिकाओं को नमन!




    पिछले बरस अक्टूबर में जब अमेरिकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने ‘मी टू’ को एक अभियान की शक़्ल दे डाली थी तो किसे पता था कि एक साल बीतते-बीतते ही हमारे चेतन भगत, मोबाशर जावद अकबर, नाना पाटेकर और आलोक नाथ जैसों की मूर्तियां यूं भरभरा कर गिर पड़ेंगी? परदे जब उठते हैं तो यही होता है। असली व्यक्ति जब अपने कपड़ों से बाहर आता है तो कई बार उसके घिनौनेपन की मवाद पूरे संसार को सडांध से भर देती है। ‘मी टू’ अमेरिका से निकल कर अगर भारत तक पहुंच गया है तो यह साफ है कि उसमें धरती के हर कोने में ऐसा हड़कंप मचाने की ताक़त है कि बड़े-बड़ों के रुख से नक़ाब उतरती जाए।
    विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर, युवाओं के चहेते लेखक चेतन भगत, धारावाहिकों के बाबूजी आलोक नाथ, फिल्मी परदे के क्रंातिवीर नाना पाटेकर, तीसरे पन्ने के जुगाड़ू सुहैल सेठ, गायक कैलाश खेर, फिल्मी दुनिया की बड़ी-छोटी हस्तियां--वरुण ग्रोवर, गुरंग दोषी, विवेक अग्निहोत्री, विकास बहल, उत्सव चक्रवर्ती, रजत कपूर, पत्रकार--सिद्धार्थ भाटिया, गौतम अधिकारी, प्रशांत झा, के. आर. श्रीनिवास, मयंक जैन और न जाने कौन-कौन ‘मी टू’ के जंजाल में फंसे छटपटा रहे हैं। ऐसा भले ही नहीं है कि ये सब सामाजिक आचरण की हमारी पवित्रता के सर्वोच्च प्रतिमान माने जाते रहे हों, मगर ऐसा ज़रूर है कि इनमें से कई हमारे समय के ख़ासे प्रखर और प्रतिभावान चेहरे रहे हैं। 
    इनमें से कइयों के बारे में आज कही जा रही बातें सुन कर बहुतों को आश्चर्य नहीं हुआ है। मुझे भी नहीं हुआ। अपनी ललित-कलाओं के लिए इनमें से कइयों की कुख्याति के क़िस्से बरसों से मशहूर रहे हैं। लेकिन जब तक कोई सामने न आए, आसाराम बापुओं और राम-रहीमों का पूजन कैसे रुके? सो, ‘मी टू’ ने सबसे बड़ा काम यह किया है कि प्रभावित-वर्ग को मुखौटे नोचने की हिम्मत से भर दिया है। इसलिए अब यह तय है कि ‘मी टू’ बिगुल फिल्मी दुनिया और पत्रकारिता की गलियों से निकल कर राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी दुनिया के राजमार्गों पर भी एक न एक दिन गूंजेगा।
    जिस दिन यह शुरू होगा, हम मूर्ति-भंजन से हक्काबक्का एक ऐसे युग में प्रवेश करेंगे, जिसकी आयु सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की तरह किसी सीमा से बंधी नहीं होगी। वह एक अनंत युग होगा। अब से बारह बरस पहले समाजसेवी तराना बू्रक ने जब पहले-पहल ‘मी टू’ मुहावरा गढ़ा था तो उन्हें यह थोड़े ही पता था कि वे कलियुग में एक ऐसे उप-युग का नामकरण कर रही हैं, जिसमें लिखी इबारत पुरुषवादी समाज को अपनी औकात में रहने का चिरंतन पाठ पढ़ाएगी। अच्छा हुआ कि वह दिन जल्दी आ गया।
    मैं मानता हूं कि ‘मी टू’ के छींटे जिन पर भी पड़े हैं या पड़ेंगे, ऐसा नहीं है कि वे सब सचमुच ही मानव-काया ओढ़े पिशाच हैं। उनमें से कुछ पर उठाई जाने वाली उंगलियां बेबात भी हो सकती हैं। मैं यह भी मानता हूं कि ‘मी टू’ कहने का हक़ स्त्रियों को ही नहीं, पुरुषों को भी होना चाहिए। यह सही है कि पुरुषों द्वारा स्त्रियों के शोषण की संभावनाएं बहुत ज़्यादा होती हैं। मगर ऐसा भी नहीं है कि स्त्री द्वारा किसी पुरुष के शोषण की पृथ्वी पर कहीं कोई घटना घटती ही नहीं होगी। फिर एक क़दम आगे बढ़ कर हमें पुरुष द्वारा पुरुष के और स्त्री द्वारा स़्त्री के शोषण की संभावनाओं पर भी तो ध्यान देना होगा। ‘मी टू’ के इन तमाम आयामों का सोच आपको भीतर तक नहीं कंपा रहा?
    तो अब जो हो, सो हो। जब अग्निबाण कमान से निकल ही गया है तो उससे होने वाली अग्निवर्षा से संसार के झुलस जाने का डर दिमाग़ से निकाल दीजिए। इसलिए कि यह आग हमें जलाने के लिए नहीं, तपाने के लिए शुरू हुई है। इस आग में इस्पाती दिखने वाले कई लौह-पुरुष आने वाले दिनों में पिघल कर लौंदे बन जाएंगे। लेकिन पांच-दस बरस बीतते-बीतते हम देखेंगे कि हमारे समाज को सुहैल सेठों की विदाई ने पहले से कितना ज़्यादा परिष्कृत बना दिया है!
    हमारी सामाजिक व्यवस्था मुलम्मा उतरने से इसलिए घबराती है कि असली चेहरे बहुत बार इतने कुरूप होते हैं कि हम उन्हें देख कर अवसाद में जाने के बजाय लिपे-पुते नकलीपन के कृत्रिम नृत्य में मग्न रहना बेहतर समझते हैं। किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ती किसी स्त्री के बारे में यह दावा करने वालों की कोई कमी नहीं दीखती है कि वे जानते हैं कि वह कैसे वहां तक पहुंची है। लेकिन बहुत-से पुरुष जहां पहुंचे हैं, वे किस बिचौलिया-भूमिका की बदौलत वहां हैं, यह कौन किसे बतलाए? सियासत और कारोबार की दुनिया में हर कोई अपनी प्रतिभा, योग्यता और परिश्रम के बूते ही शिखर-यात्रा नहीं कर रहा है। इनमें बहुत-से कमाठीपुर के मदारी भी हैं। उनकी डमरू-प्रतिभा के अभिनंदन का भी एक अभियान शुरू क्यों न हो?
    मुझे लगता है कि ‘मी टू’ से इसलिए एक युगांतकारी शुरुआत हुई है कि पहली बार इस बात का सार्वजनिक उद्घोष हो रहा है कि भद्र वर्ग ने जो मानदंड तय कर दिए हैं, वे ही अंतिम सत्य नहीं हैं। इसलिए हम देख रहे हैं कि ‘मी टू’ की आवाज़ स्पर्धी-संसार के मध्य-वर्ग ने उठाना शुरू किया है। कुलीन और उच्च-वर्ग के शब्दकोष में ‘मी टू’ अहसास की कोई अवधारणा ही नहीं है। जिन नामी-गिरामी हस्तियों के खि़लाफ़ मुट्ठियां तन रही हैं, क्या उनके जाल में रोहू मछलियां नहीं तड़पी होंगी? मगर बोलता तो हमेशा नीचे का व्यक्ति है। अट्टालिकाओं से तो चीख नहीं, हंसी सुनाई देती है। इसलिए बावजूद इसके कि आप भी ऐसे कई प्रसंगों को जानते होंगे, जिसकी भुक्तभोगी आज की कई कद्दावर स्त्रियां रही हैं, वे न बोली हैं, न बोलेंगी।
    आज के हमारे ‘युग-पुरुषों’ में से कई किस कीमत पर इतने बड़े बने हैं, वे ही जानते हैं। आज की हमारी ‘युग-स्त्रियों’ में से कई किस कीमत पर इतनी बड़ी बनी हैं, यह भी वे ही जानती हैं। किस-किस ने कहां-कहां पहुंचने के लिए किस-किस भूमिका का निर्वाह किया, कोई और जाने-न-जाने, वे खुद तो खूब जानते ही हैं। उन्हें खुद पर घिन आती हो, न आती हो, बाकियों को तो उन पर आती ही है। घिन से घिरी इन मूर्तियों के दरकने का आगाज़ हुआ, अच्छा हुआ। इन मूर्तियों की आरती हम कब तक उतारते? इसलिए वे सब, जो ‘मी टू’ कहने की हिम्मत कर रही हैं, प्रणम्य हैं। बावजूद इसके कि कुछ के द्वारा ‘मी टू’ की गंगा में अपना हाथ धोने की ग़लत संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता, आइए, इस अभियान की क़ामयाबी के लिए दुआ करें! इसलिए कि व्यक्तिगत आचरण शास्त्र और सामाजिक आचार संहिता की मज़बूती के लिए अब तक हुए सभी आंदोलनों में ‘मी टू’ सबसे मारक है। यह जितना तेज़ होगा, इसके जितने ज्यादा आयाम होंगे, पृथ्वी पर आपसी संबंधों में छीना-झपटी का कुत्सित खेल उतना ही किनारे होता जाएगा। ऐसा हो जाए तो फिर और क्या चाहिए! ( लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    जनतंत्र के पहरुए से कर-बद्ध निवेदन


    अगर अभी कोई माने तो ठीक और न माने तो ठीक, मगर मेरा मानना है कि हमारे प्रधानमंत्री अगले बरस की गर्मियां आते-आते घरेलू सियासत की लपटों से इतने झुलस चुके होंगे कि उनके बचे-खुचे आभा-मंडल की परतें पूरी तरह दरक जाएंगी। उनके आलीशान किले में दरारें पड़ने की रफ़्तार इतनी तेज़ हो गई है कि संभाले नहीं संभल रही है। ऐसा न होता तो नरेंद्र भाई को विपक्ष के महागठबंधन के पीछे परदेसी साए नज़र नहीं आ रहे होते। अब तक अपने पराक्रम से पूरी दुनिया में परचम लहराने की आत्म-मुग्धता से लबरेज़ भारत के प्रधानमंत्री को 2019 के चुनाव में देसी विपक्ष की विदेशी शक्तियों से सांठगांठ का भूत सताने लगे तो इसका साफ़ मतलब है कि उनके पैरों के नीचे की ज़मीन पोली हो गई है।
    परदेसी जिन्न के सपने इन दिनों दुनिया के सिर्फ़ दो दिग्गजों को आ रहे हैं। एक हैं, जर्मन पितृ-पुरुषों के वंशज अमेरिका के ‘रंगीले रतन’ राष्ट्रपति डोनाल्ड जॉन फ्रेडरिक क्राइस्ट ट्रंप, और दूसरे हैं, गुजरात के मेहसाणा ज़िले से रायसीना पहाड़ी पहुंचे नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी। ट्रंप को अमेरिका के पिछले चुनाव में रूस के दखल का दर्द तो साल ही रहा था और अब अगले चुनाव में चीन की चिनगारी भी उन्हें अभी से चिकौटी काटने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री और चार क़दम आगे हैं। वे राहुग्रस्त-मुद्रा में ऐलान कर रहे हैं कि भारत की विपक्षी ताक़तें उन्हें हटाने के लिए रूस, चीन, पाकिस्तान--सब से आंखें चार कर रही हैं।
    अगर यह सच है तो मैं ऐसे विपक्षी-महागठबंधन को सियासी-सूली पर लटका देने का हिमायती हूं, जो भारत के प्रधानमंत्री को गद्दी से उतारने के लिए विदेशी शक्तियों का मोहरा बनने को तैयार हो जाए। और, ऐसे विपक्षी धड़े, जो अपनी मज़बूती के लिए परदेसी गांठ में बंधने को बेताब घूम रहे हों, उन्हें तो कोई एक क्षण भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। ट्रंप को आ रहे बुरे सपनों का हिसाब-क़िताब अमेरिकी करें। लेकिन नरेंद्र भाई जिन भयावह ख़्वाबों को देख कर इन दिनों पसीना पोंछते हुए बीच-बीच में उठ जाते हैं, उनकी चिंता तो हमें ही करनी है। इसलिए मैं भी आजकल नींद से कई बार यह सोच-सोच कर जाग जाता हूं कि क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि हमारे विपक्षी नेता सत्ता पाने के लिए इतने लार-टपकाऊ हो गए हैं कि ‘हिंदू हृदय सम्राट’ को तख़्त से उतारने के लिए चीन-पाकिस्तान तक से नैन-मटक्के पर उतर जाएं?
    बावजूद इसके कि पिछले साढ़े चार साल से देश में हुए तमाम चुनावों के बारे में ईवीएम से लेकर धन-पशुओं तक के व्यवहार पर और सामाजिक संगठनों से लेकर मीडिया के एक बड़े हिस्से की भूमिका तक पर तरह-तरह के गहरे छींटे दीवारों पर दिखाई देते रहे हैं,  मुझे नरेंद्र भाई की राष्ट्र-भक्ति पर कोई संदेह नहीं है। मुझे भारतीय जनता पार्टी की भारतीयता पर भी कोई संदेह नहीं है। ऐसे में मैं राहुल गांधी की राष्ट्र-भक्ति पर और कांग्रेस की भारतीयता पर कैसे शक़ करूं? शरद पवार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती, लालू प्रसाद, चंद्राबाबू नायडू, फ़ारूख अब्दुल्ला, सीताराम येचुरी, उद्धव ठाकरे--सबको एकाएक कैसे परदेसियों की गोद में जाने को आतुर मान लूं? ये सब इतने बच्चे तो नहीं हैं कि कोई चांद-खिलौना लेने के लिए ऐसे मचल उठेंगे कि किसी की भी गोद में जा कर बैठ जाएं! जब बरसों विपक्ष में रहने के दौरान जनसंघ-भाजपा के शिखर-पुरुष नहीं बहके, तो इक्कीसवीं सदी के बेहद पारदर्शी संसार में, आज के विपक्षी, परदेसियों की कमर में हाथ डाले नाचने को, अपनी कमर कसे बैठे होंगे, ऐसा आप मान लेंगे?
    किसी भी प्रधानमंत्री के पास सूचनाओं का ढेर होता है। नरेंद्र भाई के पहले जितने प्रधानमंत्री हुए, वे भी कोई ढब्बू तो थे नहीं। उनके पास भी सूचनाएं खुद चल कर आती रही होंगी। उन्होंने भी अपने तंत्र के ज़रिए सूचनाएं हासिल करने में कोई कसर नहीं रखी होगी। इसमें कौन-सा रहस्य है कि विदेशी शक्तियां अपने-अपने मतलब के मुल्क़ों की सियासत, समाज, संस्कृति और बाज़ार को प्रभावित करने की हर-संभव कोशिशें करती हैं। लेकिन क्या किसी भी देश के लिए, किसी दूसरे देश के सियासी-रहनुमाओं को, गप्प से लील लेना इतना आसान होता होगा, जैसा हमें समझाने की कोशिश आज हो रही है?
    जयप्रकाश नारायण 45 साल पहले हुए उस आंदोलन के महानायक थे, जो इंदिरा गांधी को हटाने के लिए शुरू हुआ था। जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस अंदोलन का मेरुदंड थे। तब मैं स्कूल-कॉलेज में पढ़ा करता था। आज भी मेरा मन उन दिनों ज़ोर-शोर से कही जाने वाली इन बातों को मानने को नहीं करता कि भारत से समाजवादी संस्कारों वाली सत्ता की विदाई के लिए अमेरिका ने सीआईए को मुक्त-हस्त दे दिया था और जयप्रकाश उस हाथ के इशारे पर नाच रहे थे; कि जयप्रकाश तो बीस के दशक से ही जवाहरलाल नेहरू से ख़फ़ा रहने लगे थे; कि जयप्रकाश उस ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के भारतीय चेप्टर के अध्यक्ष रहे थे, जिसके बारे में माना जाता था कि उस पर सीआईए की छाया है; कि जयप्रकाश भले ही आठ साल अमेरिका में पढ़ाई करने के बाद मार्क्सवादी बन कर भारत लौटे थे, मगर इस बीच सीआईए ने उनके विचारों में वे बीज भी बो दिए थे, जो साढ़े चार दशक बाद जब उगे तो अमेरिकी सियासत के काम आए।
    हमारे स्वाधीनता संग्राम के चुनींदा सेनानियों में से एक, महात्मा गांधी के नज़दीकियों में से एक और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दिनों में भारत रत्न से अलंकृत किए गए जयप्रकाश नारायण के बारे में कही गई इन बातों में से कितनी आपके गले उतरती हैं? प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की अमेरिका-परस्ती के बारे में, पता नहीं क्या-क्या, कहा गया। 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हार के महज पांच महीने बाद अगस्त में जब इज़राइल के विदेश मंत्री मोशे दायां गुपचुप भारत आए तो मोरारजी भाई प्रधानमंत्री थे। इज़राइल को अमेरिकी सीआईए का दत्तक पुत्र-देश कहा जाता था और भारत के तो उससे राजनयिक संबंध तक नहीं थे। लेकिन क्या इतने भर से हम रोम-रोम में गांधीवाद गूंथ कर जीवन बिताने वाले मोरारजी देसाई की राष्ट्र-भक्ति पर संदेह करने लगें?
    इसलिए, जो आप कहते हैं नरेंद्र भाई, वही मैं कहता हूं कि चुनाव तो आते-जाते हैं। जीत-हार भी होती रहती है। लेकिन इस होड़ में दौड़ते-दौड़ते किसी को भी इतनी रपटीली राह पर जाने से बचना चाहिए कि वह हमें प्रलय के छोर पर पहुंचा दे। भारत का प्रधानमंत्री भारत के जनतंत्र का पहरुआ है। उसे और कुछ भी अधिकार हों, जनतंत्र से खेलने का अधिकार नहीं है। चुनाव जनतंत्र का पहिया हैं। जनतंत्र की मज़बूती के लिए साधना करनी होती है। यह साधना अब तक के हर प्रधानमंत्री ने की है, हर राजनीतिक दल ने की है और उनमें काम करने वाले हर बड़े-छोटे ने की है। किसी भी तरह के विदेशी आक्रमण से देश को बचाने की ज़िम्मेदारी किसी एक की नहीं, सब की है। अगर कोई कहता है कि वह तो रक्षक है और बाक़ी सब परदेसी दुश्मनों के संगी-साथी तो इससे बड़ी गाली कोई किसी को क्या दे सकता है? ऐसी गालियों से जनतंत्र की गलियां मैली होंगी। उस मैले से लिथड़े सिंहासन पर बैठ कर भी कोई क्या लेगा? इसलिए जितनी जल्दी हम इससे बाज़ आएं, अच्छा। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    भागवत-कथा से झांकता भविष्य का भारत



    पंकज शर्मा— 
    मोहन भागवत ने अपनी तरफ़ से यह बताने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी है कि ‘भविष्य का भारत’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नज़रिए से कैसा होना चाहिए। उन्हें सुनने के लिए ख़ासतौर पर आमंत्रित किए गए लोगों का जमावड़ा तीन दिनों तक राजधानी के विज्ञान भवन में लगा रहा। पाकिस्तान को बुलाया नहीं, मगर भागवत को सुनने के लिए चीन जैसे देशों के राजदूत मौजूद थे। समान विचारों वाले राजनीतिक दलों के नामी चेहरे तो नदारद रहे, मगर जया जेटली जैसों ने अपनी हाजि़री दर्ज़ कराई। अब तक संघ-भाजपा को रह-रह कर कोसते रहने वाले अमर सिंह भी अपना बदला हुआ लबादा ओढ़े भागवत को मंत्र-मुग्ध मुद्रा में सुन रहे थे। 
    दलबीर सिंह जैसे सेवानिवृत्त सेनाधिकारी ललचाई ललक लिए हिंदुत्व का असली अर्थ समझने में जुटे हुए थे। मनीषा कोइराला, अन्नू कपूर, और रवि किशन जैसे चौथी पायदान के अदाकारों को भी संघ से हुआ मौसमी प्यार भागवत की शाखा में खींच लाया था। मधुर भंडारकर जैसे फिल्म निर्माता-निदेशक और हंसराज हंस जैसे सुर-जीवी भी उबासियां लेते हुए हिंदू होने का अर्थ समझ रहे थे। शोवना नारायण और प्रतिभा प्रहलाद अगर किसी कुलीन-समूह में निमंत्रित-अनिमंत्रित न पहुंचें तो फिर उनका होना-न-होना ही बराबर है, सो, वे भी श्रोता कम, दर्शक ज़्यादा की भूमिका में विराजमान थीं।
    विज्ञान भवन की भागवत-कथा के श्रोता-समूह और दर्शक-मंडली की गुणवत्ता पर जिन्हें उंगली उठानी हो, उठाएं, मगर मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि मोहन भागवत ने भविष्य का जो भारत हमें दिखाया है, उस पर कोई खुल कर उंगली नहीं उठा सकता। इसलिए नहीं कि भागवत ने जो कहा, उससे संघ की छत पर अब तक तनी दिख रहीं सारी बर्छियां पिघल कर मोम बन गई हैं। बल्कि इसलिए कि असली मंशा पर शब्द-जाल का वह मुलम्मा चढ़ाना भागवत को आता है, जो कुछ देर के लिए आपको सोच में डाल दे और आपको लगे कि अरे, उनकी बातों में ग़लत क्या 
    है?
    पहले दिन ही भागवत ने यह साफ़ कर दिया था कि संघ के नज़रिए से आपको कायल कर देना उनका मक़सद नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ का दृष्टिकोण आप मानें-न-मानें, आपकी मर्ज़ी। मैं तो अपनी बात बता रहा हूं। फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार कौन थे और उन्होंने संघ की स्थापना क्यों की? भागवत का कहना था कि हेडगेवार को जाने बिना संघ को जाना ही नहीं जा सकता। इसलिए हेडगेवार की सुभाषचंद्र बोस से ले कर विनायक दामोदर सावरकर तक से मुलाक़ात का ज़िक्र उन्होंने किया।
    यह बात सुन कर बहुत-से कांग्रेसियों के मन भागवत की निष्पक्षता पर फुदक रहे हैं कि आज़ादी के पहले राजनीतिक जागृति के लिए देश भर में बड़ा आंदोलन कांग्रेस ने षुरू किया और उसमें भी ऐसे कई सर्वस्व त्यागी महापुरुष थे, जिनकी प्रेरणा आज भी हमारे जीवन में काम करती है। लेकिन भागवत की इस मासूमियत पर इतना फि़दा होने की ज़रूरत नहीं है। अगर हेडगेवार ने खुद अपने सामाजिक-राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से नहीं की होती तो भागवत कांग्रेस को इत्ता-सा भी श्रेय नहीं देते। भागवत ने आज़ादी के आंदोलन के बारे में कहा कि ‘कांग्रेस में भी’ सर्वस्व त्यागने वाले लोग थे। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति में ‘एक बड़ा योगदान’ कांग्रेस की धारा का भी है। इसके बाद भागवत ने कांग्रेस पर छींटाकसी की। बोले कि आज कई राजनीतिक धाराएं हैं और उनमें कांग्रेस की स्थिति क्या है, उस पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। वह आप खुद जानते हैं।
    भागवत ने हमें बताया कि संघ और कुछ नहीं है, वह तो एक प्रणाली-विज्ञान है। एक मैथोडोलॉजी है। वाह! संघ की इस अद्भुत परिभाषा ने मुझे भागवत के समक्ष नतमस्तक कर दिया है। इसलिए कि अगर सामाजिक बंटवारे के इस प्रणाली-विज्ञान पर भी मेरा सिर नीचा न हो तो मुझे धिक्कार है। मैं तो भागवत को यह बोलते देख हक्काबक्का था कि संघ का उद्देश्य भेदमुक्त, समतायुक्त और शोषणमुक्त समाज की रचना करना है। अगर ऐसा ही है तो हमारे स्वयंसेवक प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी से संघ-प्रमुख यह जवाब-तलब क्यों नहीं करते कि पिछले सवा चार साल में इस दिशा में वे कितने क़दम आगे बढ़े हैं? मगर जवाब तो भागवत की बातों में ही छिपा है। वे बोले कि विविधताओं का उत्सव मनाओ, मगर वे यह भी बोले कि अपनी विविधता पर पक्के रहो, अपनी विशिष्टता पर अडिग रहो। उन्होंने कहा कि ‘भारत के बाहर से जो लोग आए हैं’ और उनके आज जो अनुयायी हैं, वे आज भारतीय हैं। हमारे यहां इस्लाम है, ईसाइयत है। ‘अगर’ वे भारतीय है तो उनके घरों में भी भारतीय संस्कारों का प्रचलन दिखाई देता है।
    आप भागवत के उर्वरा मस्तिष्क की दाद दें-न-दें, मैं तो दूंगा। उन्होंने मानवेंद्र नाथ रॉय के सुधारवादी मानवतावाद से ले कर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम और अमूल-प्रसिद्ध वर्गीज कुरियन द्वारा लोकशक्ति जागरण की अवधारणाओं तक को संघ के विचारों में गूंथ लिया। मगर साथ-ही-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि संघ का गुरु तो उसका भगवा-ध्वज भी है। थोड़ी मुरव्वत की और अहसान-मुद्रा में कहा कि ‘लेकिन तिरंगे का भी पूर्ण सम्मान हम रखते ही हैं’। बहुत मेहरबानी आपकी। भारतमाता धन्य हुईं।
    भागवत-कथा के दूसरे दिन का प्रवचन सुन कर हमें मालूम हुआ कि संघ ने हमें यह आज़ादी दे रखी है कि भारत पर कौन राज करेगा, यह हम तय कर सकते हैं। लेकिन फिर आगाह किया कि लेकिन राष्ट्र कैसे चलेगा, इस पर संघ का भी मत है। भागवत ने ज़ोर दे कर कहा कि संघ राजनीति से परे रहेगा, इसका मतलब यह नहीं है कि घुसपैठियों जैसे मसलों पर हम अपनी बात नहीं कहेंगे। बड़े भोलेपन से भागवत ने हमें बताया कि संघ के स्वयंसेवक ‘किसी भी’ राजनीतिक दल में जा कर काम कर सकते हैं। वह स्वयंसेवक-भूमिका के बाद अपने बाकी राजनीतिक जीवन में क्या करता है, उससे संघ को कोई मतलब नहीं। वह किस राजनीतिक दल में जाता है, वह उसका काम है। वह किसी दूसरे राजनीतिक दल में क्यों नहीं जाता, यह विचार करना भी उसी का काम है। 
     ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम बेहतरी’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ से सराबोर भागवत के मन से जब जब ‘एतद देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः; स्वं स्वं चरित्रां शिक्षरेन पृथिव्यां सर्वमानवाः’ का झरना बहा तो मैं उसमें डूबते-डूबते बचा। अगर राजधर्म का पालन करने जैसी सलाहों की यादों की नुकीली चट्टानों ने मुझे थाम न लिया होता तो भागवत-सरोवर के भंवर ने तो मेरे प्राण ही हर लिए होते। 
    तीसरे दिन सवालों के जवाब देने के बहाने भागवत ने जो किया, वह सबके वश का नहीं है। हिंदूवाद के वाद पर बात की। कहा कि वाद तो बंद होता है, हिंदुत्व तो सतत प्रक्रिया है। लेकिन जब समूचे हिंदू समाज में रोटी-बेटी के व्यवहार पर बात आई तो रोटी के कौर तो भागवत आसानी से निगल गए, मगर बेटी-व्यवहार के प्रश्न पर उनकी हिचक झलके बिना नहीं रही। भागवत ने जाति व्यवस्था, शिक्षा, भाषा, स्त्री, जनसंख्या, आरक्षण, गौरक्षा, धर्म-परिवर्तन, अल्पसंख्यक, धारा 370, समान नागरिक संहिता, संविधान, राम मंदिर, आर्थिक परिस्थिति और समलैंगिकता जैसे मसलों पर विस्तार से सवालों के जवाब दिए। भागवत की बातों में कितने ही पेंच क्यों न हों, तीन दिन इस चक्रव्यूह में अपनी नटबाज़ी दिखाने का माद्दा तो उनसे किसी को भी सीखना चाहिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी है।)

    राहुल गांधी की नील-कंठी भूमिका का समय



    बुधवार-गुरुवार को राहुल गांधी कैलाश-मानसरोवर से जब दिल्ली लौटेंगे तो फिर एक सियासी-मगजपच्ची उनका इंतज़ार कर रही होगी। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के इस साल की सर्दियों में होने वाले विधानसभा चुनावों की सर्द हवाओं ने दिल्ली को सिहराना शुरू कर ही दिया है और अगले बरस की गर्मियों में होने वाले लोकसभा चुनावों की लू भी भीतर-ही-भीतर चलने लगी है। इस बीच, ग्रह-नक्षत्रों ने, तेलंगाना में चुनावी बिसात भी बिछा दी है। सो, राहुल के लिए अगले सात-आठ महीने दिन-रात हर तरह के झमेलों का मकड़जाल भेदने के होंगे।
    खारे कलियुगी समुद्र की सतह से साढ़े चार किलोमीटर ऊपर भगवान शिव के चरण-तले स्थित मानसरोवर झील की निःशब्द शांति के बाद, धम्म से सवा चार किलोमीटर नीचे दिल्ली के कोलाहल में गिर कर, अपने को राहुल तो क्या, कोई भी माथा ही पीटेगा। मगर मुझे पूरी उम्मीद है कि कैलाश पर्वत के पैर पखारते मन के सरोवर में डुबकी लगाने के बाद अपने झंझावाती-संसार में लौटे राहुल एक नई आत्म-शक्ति से सराबोर होंगे। मानस यानी मनःशक्ति। मन की यह ताकत मेधा, प्रज्ञा, ज्ञान, अनुभूति, चेतना और अंतःकरण का विलीनीकरण है। एक बार जब ये भीतर घुल जाएं तो बाहर की आंधियां बेअसर हो जाती हैं।
    2013 की जनवरी के तीसरे हफ़्ते में जयपुर के कांग्रेस के चिंतन शिविर में मॉ सोनिया ने राहुल से ग़लत नहीं कहा था कि सत्ता ज़हर है। लेकिन फिर भी राहुल इस विषपान से इसलिए नहीं बच सकते थे कि सत्ता लोकतंत्र को सहेजे रखने का वाहन है और उसका संचालन सही हाथों में बनाए रखने की ज़िम्मेदारी सब की है। राहुल गांधी की भी। बल्कि उनकी जवाबदेही हम सब से ज़्यादा है। इसलिए एक नई नील-कंठी भूमिका के लिए अपना मन-कल्प राहुल को करना ही था। सो, मानसरोवर की उनकी यात्रा के बाद देश की मन्नत पूरी होने की रफ़्तार सचमुच तेज़ होगी।
    नमो-धुन पर नाचती जिस मंडली ने राहुल गांधी को कांग्रेस की मुसीबत साबित करने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी, आज वह मन-ही-मन यह मानने लगी है कि राहुल कांग्रेस की शक्ति बन गए हैं। अब देश में यह भाव भी जड़ें पकड़ चुका है कि नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के अलावा भारत की भी मुसीबत बन गए हैं। चार बरस बीतते-बीतते किसी और ‘हृदय-सम्राट’ को इस तरह किसी भी मुल्क़ के मन से उतरते दुनिया ने कभी नहीं देखा था। प्रायोजित-आकलन जैसी चाहें, तस्वीर दिखाएं, मगर असलियत यही है कि नरेंद्र मोदी के इशारे पर, अमित शाह की औपचारिक अगुवाई में, चल रही भाजपा के पास 2019 में अपनी लाज बचाने लायक़ वस्त्र नहीं बचे हैं। नंगई पर उतारू न होता तो शायद इतनी जल्दी नहीं होता, पर कोई कहे-न-कहे, अब राजा नंगा हो चुका है।
    2014 में नरेंद्र मोदी के तूफ़ानी दिनों में भाजपा को 282 सीटें ज़रूर मिली थीं, लेकिन ज़मीनी इबारत तो तब भी उसके लिए इतनी पुख़्ता नहीं थी। देश के कुल साढ़े 88 करोड़ मतदाताओं में से पौने 55 करोड़ अपनी राय ज़ाहिर करने मतदान केंद्रों पर गए थे और उनमें से साढ़े 37 करोड़ मोदी की भाजपा के खि़लाफ़ बटन दबा कर आए थे। महज सवा 17 करोड़ मतदाताओं के समर्थन से जीते भाजपा उम्मीदवारों की बदौलत नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन बैठे थे। इतने कम प्रतिशत-मतों के साथ इससे पहले किसी भी एक राजनीतिक दल की सरकार भारत में नहीं बनी। लेकिन तब भी इस छद्म-जीत ने हमारे प्रधानमंत्री और उनके दरबारियों की पलकें इतनी भारी कर दीं कि उनके पांव ज़मीं पर पड़ते ही नहीं हैं। सो, ज़मीन कब पांवों से नीचे से खिसक गई, इसका अंदाज़ आज भी उन्हें नहीं हो रहा है।
    राहुल गांधी की कांग्रेस और पूरे विपक्ष को इसका जो स्वाभाविक लाभ मिलना है, सो मिलना ही है। मगर राहुल की नीलकंठ-भूमिका की कसौटी अब यह है कि, एक तो, वे अपनी पार्टी के भीतर बिखरी किरचों को कैसे बुहारते हैं, और दूसरे, समूचे विपक्ष में विचर रही बेचैन आत्माओं की शांति के लिए कौन-सा हवन करते हैं। इन दोनों ही मोर्चों पर राहुल के धैर्य और मुस्तैदी का इम्तहान आने वाले दिनों में होना है। मैं जानता हूं कि अगर राहुल ने अपने कुछ अगलियों-बग़लियों के चक्रव्यूह से बाहर आने के रास्तों की मशालें जला लीं तो अगले साल होली के बाद भारत को उसके चिरंतन रंग में रंगने निकल पड़े समूह के वे सूत्रधार होंगे।
    कांग्रेस की मुसीबत बाहर कम, भीतर ज़्यादा है। दक्षिण-भारत में भाजपा नाम भर को है और उत्तर-भारत में लोग अब उसे एक दिन भी अपने सिर पर सवार देखना नहीं चाहते हैं। मगर दिक़्कत यह है कि कांग्रेस के ज़्यादातर प्रादेशिक क्षत्रपों को पार्टी की नहीं, खुद की चिंता है। चुनावों में जा रहे सभी राज्यों की कमोबेश यही हालत है। विधानसभा चुनावों को तीन महीने बचे हैं, मगर तालमेल के ऊपरी ढोंग तले खींचतान का पतनाला बहना थमा नहीं है। राहुल को इस से पूरी तरह बेमुरव्वत हो कर निबटना होगा, क्योंकि प्रदेशों में बारूद बिछा रहे चेहरों की कोशिशें दरअसल तो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस-विपक्ष की संभावनाओं को पलीता लगाएंगी।
    विपक्षी-बाड़े में घूम रही काली भेड़ों पर सहज-विश्वास करने का भी यह समय नहीं है। इस में कोई रहस्योद्घाटन नहीं है कि मोदी-मंडली इतनी मासूम नहीं है कि विपक्षी-एकता का रथ ऐसे ही तैयार हो जाने देगी। प्रादेशिक चुनावों में कई विपक्षी-धड़ों द्वारा उम्मीदवार उतारने के ऐलान को, जितना देख रहे हैं, उससे ज़्यादा संदेह की निग़ाह से देखने की ज़रूरत है। अपने प्रभाव-क्षेत्र से बाहर जा कर दूसरे राज्यों में भी पैठ बनाने की कोशिशें क्या ऐसे ही हो रही हैं? भाजपा-विरोधी राजनीतिक दलों का यह रवैया कांग्रेस के अलावा और किसे नुक़सान पहुंचाएगा? इसलिए राहुल गांधी को पूरी विनम्र-दृढ़ता के साथ इस समस्या से भी आर-पार की लड़ाई लड़नी होगी।
    कैलाश-मानसरोवर ने और जो भी किया हो, मुझे लगता है कि, राहुल के जीवन में वह भाव ज़रूर उंडेल दिया होगा, जो कहता है कि ‘‘मनुष्यः स्व विश्वासेन निर्मितः, यत् विश्वास करोतितेन इव भवति।’’ मनुष्य का निर्माण अपने विश्वासों से होता है, वह जैसा विश्वास करता है, वैसा ही बन जाता है। बहुत बार हमारे ही बनाए राक्षस हमें खाने दौड़ते हैं। भगवान शिव के सामने भी तो ऐसा समय आया था। आइए, उम्मीद करें कि राहुल के पास भी अपने भस्मासुरों का संहार करने की कोई जुगत ज़रूर होगी। जितनी जल्दी यह बात सब की समझ में आ जाए, बेहतर है, कि जब तक धाराएं एक नहीं होतीं, नदी नहीं बनती। और, बिना नदी बने कांग्रेस अपने खेत को कैसे सींचेगी? (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    परदेसी धरती, राहुल गांधी और भाजपा-विलाप




    जर्मनी और ब्रिटेन में, भारत की घरेलू सियासत पर राहुल गांधी के मन की बातें सुन कर, भारतीय जनता पार्टी के तन-बदन में आग लग गई। अमित भाई शाह के तमाम जमूरे छोटे-परदों और अख़बारी-पन्नों पर मुट्ठियां ताने पैर पटकने लगे। ‘देशद्रोही’ राहुल पर लानत भेजने लगे। उन्हें भारत माता का ‘सुपारी हत्यारा’ करार दे दिया गया। दो-तीन दिनों तक राष्ट्रीय विलाप का एकमात्र सुर यह था कि सवा चार साल में दिन-रात अपने को झौंक कर प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने जो गर्वीला हिंदुस्तान बनाया, परदेस में राहुल ने उसकी मिट्टी पलीद कर दी। ऐसा तो कभी हमारे दुश्मन देशों ने भी नहीं किया।
    राहुल की एक लुहारी-चोट से सकपकाई भाजपा यह भूल गई कि विदेशों में भारतीय अतीत की चमक को धुधला करने की सौ सुनारी-चोटें किसने की थीं? अब तक हमारे-आपके पंद्रह अरब रुपए से ज़्यादा खर्च कर प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी क़रीब साठ देशों का सफ़र कर चुके हैं। इनमें से अमेरिका और चीन वे पांच-पांच बार गए हैं। जर्मनी और रूस चार-चार बार घूम आए हैं। फ्रांस, नेपाल और सिंगापुर की तफ़रीह उन्होंने तीन-तीन बार की हैं। ग्यारह मुल्क़ ऐसे हैं, जहां वे दो-दो बार गए हैं और 40 देशों को एक-एक बार नवाज़ आए हैं। इनमें से शायद ही कोई देश ऐसा हो, जहां हमारे नरेंद्र भाई ने यह न बताया हो कि उनके सत्ता में आने से पहले तो कोई भारत की नमस्ते तक नहीं लेता था, हम किस कोने में पड़े हैं--कोई पूछता ही नहीं था और आज कैसे सब हमसे गले मिलने को आतुर हैं!
    विदेशी भूमि पर अपनी इस भारत-गाथा की औपचारिक शुरुआत नरेंद्र भाई ने प्रधानमंत्री की गद्दी संभालने के चौथे महीने ही अमेरिका में कर दी थी। 28 सितंबर 2014 को न्यू यॉर्क के मेडिसन स्क्वॉयर पर वे बोलते हुए उन्होंने बैंक राष्ट्रीयकरण से ले कर पिछली सरकारों की लालफीताशाही, ग़ैर-ज़रूरी नियम-क़ानूनों और गंगा की गंदगी पर तीखे इशारे किए और बताया कि कैसे अब उनके आने के बाद इन सब दिशाओं में सकारात्मक काम शुरू हुए हैं। महाशक्ति अमेरिका में अपने देश की हालत पर दीदे बहाने के बाद हमारे प्रधानमंत्री ने नवंबर 2014 को म्यांमार जैसे छोटे-से देश तक में भारत की अब तक की बदहाली की तोहमत दूसरों पर मढ़ने से गुरेज़ नहीं किया।
    आज जिस लंदन में राहुल गांधी की कही बातें भाजपा को नागवार लग रही हैं, उसी लंदन के वेम्बले स्टेडियम में हमारे प्रधानमंत्री ने 2015 के नवंबर में लोगों को बताया था कि भारत के 18 हज़ार गांवों में 68 साल बाद भी बिजली नहीं पहुंची है और ज़ोर-शोर से पूछा था कि अगर इतने साल बाद भी हमारे देशवासी अंधेरे में रहने को मजबूर हैं तो हमें प्रायश्चित करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? फिर उन्होंने बताया कि भारत दुनिया के भ्रष्टतम मुल्क़ों में है और हाथ पर हाथ मार कर पूछा कि जनता के पैसे की पाई-पाई का हिसाब जनता को मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए? जनता का धन किसी का घर भरने के लिए होता है क्या? नरेंद्र भाई ने हरियाणा में बेटे-बेटी के अनुपात में बहुत फ़र्क होने का मुद्दा भी उठाया और कहा कि अब वे इसे दुरुस्त कर रहे हैं। 
    अभी जुलाई में नरेंद्र भाई उगांडा गए तो बोले कि भारत यानी सांप-संपेरों का देश, यही तो थी भारत की पहचान, हम उसे इस पहचान से बाहर लाए हैं। इसके पहले मई में इंडोनेशिया गए तो वहां बोले कि हमारे देश में एक एलईडी बल्ब तक साढ़े तीन सौ रुपए का मिलता था। मैं ने 40-50 रुपए का कर दिया। कहा कि पहले की सरकार के ज़माने में सिर्फ़ 28 सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लोगों के बैंक खातों में जाता था, मैं 400 योजनाओं का पैसा सीधे लोगों को भेज रहा हूं। 
    फरवरी में ओमान गए थे तो बताया कि कैसे भारत में अगर कोई उद्योग लगाना चाहता था तो कंपनी बनाने में ही महीनों लग जाते थे। कहा कि पहले ऐसी शासन-व्यवस्था थी कि योजनाएं तीस-तीस चालीस-चालीस साल पूरी नहीं होती थीं। नहरों का पता नहीं था। बिजली के खंभे गड़ जाते थे, उन पर तार नहीं लग पाते थे। 
    नई रेलों को चलाने का ऐलान हो जाता था, लेकिन कोई पटरियां बिछाने के बारे में नहीं सोचता था। बोले कि कितनी ही सरकारें आई-गईं, लेकिन हमारे देश में कोई उड्डयन नीति ही नहीं थी। मैं आया तो बनाई। कहा कि घोटालों की लंबी सूची थी। दुनिया भर में भारत की साख पर बट्टा लगा हुआ था। नरेंद्र भाई ने फ़रमाया कि जब से मैं आया हूं, कोई नहीं कहता कि मोदी कितना ले गया? पहले लोग पूछते थे, कितना गया? अब पूछते हैं कि कितना आया? मस्कट में हमारे प्रधानमंत्री ने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां भींच कर कहा कि भारत में काले धन का बोलबाला था। साढे तीन लाख फ़र्जी कंपनियां चल रही थीं। मैं ने सब पर ताले लगा दिए। 
    नरेंद्र भाई की कही इन बातों की सच्चाई के फेरे में पड़ने के बजाय मैं सिर्फ़ यह जानना चाहता हूं कि अगर परदेसी-ज़मीनों पर वे ये सब बातें कह सकते हैं तो राहुल गांधी ने जर्मनी और ब्रिटेन में अपना दिल खोल कर रख देने में कौन-सा गुनाह कर दिया? अगर उन्होंने कहा कि भारत में सामाजिक सद्भाव खतरे में है, महिलाओं के खि़लाफ़ अत्याचार बढ़ रहे हैं और नोटबंदी ने मुल्क़ की अर्थव्यवस्था चौपट कर दी है तो क्या ग़लत कह दिया? रिज़र्व बैंक द्वारा नोटबंदी के बारे में जारी किए गए ताजा आंकड़े क्या राहुल की बात से अलग कुछ कह रहे हैं?
    8 नवंबर 2016 को नोटबंदी का तुगलकी पराक्रम दिखाने के चार दिन बाद 12 नवंबर को नरेंद्र भाई ने जापान की धरती पर क्या कहा था, बताऊं आपको? उन्होंने अपनी भुजाएं फड़काते हुए कहा था: ‘‘अचानक आठ तारीख़ को रात आठ बजे पांच सौ और हज़ार के नोट ठप्प। घर में शादी है, पैसे नहीं हैं, मां बीमार है, मुश्क़िल है, तक़लीफ़ है, कोई चार घंटे लाइन में खड़ा है, कोई छह घंटे खड़ा है, लोगों ने तक़लीफ़ झेली, लेकिन देश के हित में इस निर्णय को स्वीकार किया। मैं अपने देश की जनता को सौ-सौ सलाम करता हूं। पहले गंगा में कोई चवन्नी नहीं डालता था। अब नोट बह रहे हैं गंगा में। अब मुझे बताइए, चोरी का माल निकालना चाहिए या नहीं निकालना चाहिए?’’
    अपने देशवासियों को जापान की धरती पर खड़े हो कर चोर-उचक्का बताने वाले हमारे प्रधानमंत्री की चपर-चपर टोली किस मुंह से राहुल की कही बातों पर बुक्का फाड़ कर रो रही है? विदेशी धरती पर कही, न कही, जाने वाली बातों की आचार-संहिता क्या इसके पहले किसी और प्रधानमंत्री ने तोड़ी थी? परदेस में हर जगह ताल ठोक-ठोक कर साठ साल को नाहक ही कोसते वक़्त जिन्हें उनकी आत्मा ने नहीं कचोटा, अब वे क्यों ताताथैया कर रहे हैं? राहुल गांधी ने हमारे मुल्क़ में बढ़ते असमानता, असंयम, असहिष्णुता, अन्याय और उत्पीड़न के तथ्यों को जर्मनी और ब्रिटेन में रह रहे भारतवशियों के सामने उधेड़ा तो एकदम ठीक किया। झूठे चिराग़ों को बुझाने का फर्ज अगर राहुल अदा नहीं करेंगे तो क्या इतिहास उन्हें माफ़ कर देगा? (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    अटल जी का देवव्रत-भाव और ये ठट्ठामार



    अपने पितृ-पुरुष की इससे ज़्यादा फ़जीहत कोई और क्या कर सकता है कि स्वर्ग-गमन के बाद उसे इस कलियुगी पृथ्वी पर एक ऐसे तमाशे का केंद्र बनाने की कोशिश करे, जिसे देख कर दूसरों की नम आंखें दर्द के समंदर में डूब जाएं? भारतीय जनता पार्टी ने किया या नहीं, पता नहीं, लेकिन भारतवर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी और दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल के मुखिया अमित भाई अनिलचंद्र शाह ने, भरत-खंड के राजनीतिक सपूतों की सबसे अगली कतार में पूरी शालीनता से बैठे, अटल बिहारी वाजपेयी के अस्थि-कलशों को ठट्ठामारों के हाथ सौंपने का जो मंचन किया, उसे देख कर मेरा तो भेजा फिर गया है। ठीक है कि अटल जी संघ के थे, जनसंघ के थे, भाजपा के थे; मगर बावजूद इसके कि इन संगठनों में से हरेक के विचारों पर मैं जीवन भर लानत भेजता रहा हूं, अटल जी मेरे भी थे। इसलिए कि देवव्रत की तरह अगर उन्होंने भी भाजपाई-हस्तिनापुर की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा कर के खुद को भीष्म में तब्दील न कर लिया होता तो, मैं जानता हूं कि, वे कब के खुल कर ताल ठोक चुके होते।
    जो अटल जी को जानते थे, वे जानते हैं कि 1990 का सितंबर आते-आते उनके दूधिया मन में दरार पड़ चुकी थी। वे अपना मन मसोसने लगे थे। एक दशक से भी ज़्यादा वे इसी मनोदशा में कसमसाते रहे और 2002 की गर्मियां शुरू होते-होते तो अटल जी का भीतरी उबाल खुल कर बाहर भी रिसने लगा था। मैं जानता हूं कि भाजपा में वे अपने को कितना असहज महसूस करने लगे थे। अटल जी से मेरी पहली मुलाकात पत्रकार के नाते 1981 की सर्दियों में हुई थी। एक साल पहले ही वे भाजपा के अध्यक्ष बने थे और तब किसी भी राजनीतिक दल के अध्यक्ष से मिलना आज की तरह मानसरोवर यात्रा पर जाने जैसा नहीं था। 
    2004 में अटल जी का बतौर प्रधानमंत्री कार्यकाल ख़त्म होने के एक बरस बाद हालांकि उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था, मगर मैं 2007 की शुरुआत में तब तक उनके संपर्क में बना रहा, जब तक कि मैं ने पत्रकारिता की नौकरी से तकनीकी-विदा ले कर बाक़ायदा कांग्रेस में प्रवेश नहीं कर लिया। बहुतों की तरह मैं अटल जी का बग़लगीर तो नहीं था, मगर वे मांगने पर मिलने का समय हमेशा दे देते थे, पूरे स्नेह और विश्वास से मिलते थे और मेरे कई निजी क़िस्म के बाल-सुलभ सवालों के जवाब भी बेहद अंतरंगता से दे देते थे। शरारत भरे सियासी सवालों पर भी नाराज़ नहीं होते थे। यह सिलसिला रायसीना रोड के उनके बंगले से शुरू हो कर रेसकोर्स रोड होता हुआ कृष्ण मेनन मार्ग तक पसरा हुआ है। 
    इसलिए मुझे लगता है कि कहां अटल जी और कहां मोदी-शाह? 1968 में अटल जी जब भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने थे, तब नरेंद्र भाई सन्यासी बनने की नाकाम कोशिशें कर कोलकाता के बेलूर मठ और अल्मोड़ा के रामकृष्ण आश्रम की सीढ़ियों उतर कर वडनगर और अहमदाबाद के रास्ते में थे। 1972 तक अटल जी जनसंघ के अध्यक्ष रहे और इस दौरान, अगर सच है तो, नरेंद्र भाई अपनी चाय-यात्रा पूरी करने के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए थे। जनसंघ के अध्यक्ष पद का कार्यकाल जब अटल जी ने पूरा किया, तब अमित भाई तो दूसरी-तीसरी कक्षा में पढ़ रहे होंगे।
    जब अटल जी भाजपा के पहले अध्यक्ष बने तो नरेंद्र भाई को स्वयंसेवक संघ गुजरात से दिल्ली लाया-ही-लाया था और उन्हें संघ के नज़रिए से आपातकाल का इतिहास रचने का ज़िम्मा सौंपा गया था। नरेंद्र भाई को जब संघ ने भाजपा में काम करने भेजा, तब तक अटल जी अपना अध्यक्षीय कार्यकाल क़रीब-क़रीब ख़त्म कर रहे थे। अमित भाई तो तब तक छात्र-नेता ही थे और अपनी महत्वाकांक्षाओं की उड़ान पूरी करने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से विदा ले कर भाजपा में आने की कगार पर थे। अटल जी के अस्थि-कलश वितरण प्रसंग की नरेंद्र भाई और अमित भाई की संकल्पना से भाजपा के कितने लोग सहमत हैं, मैं नहीं जानता, मगर मैं इतना जानता हूं कि देश भर के ऐसे तमाम लोग, जो भाजपा से असहमत होते हुए भी, अटल जी के व्यक्तित्व को विराट मानते हैं, इस उपक्रम के बौनेपन से आहत हैं। हमारे प्रधानमंत्री से अटल जी 26 साल तो उम्र में बड़े थे और कम-से-कम 104 साल अनुभव में। अमित भाई का तो मैं कहूं क्या? वे अटल जी से उम्र में 40 साल छोटे हैं। अनुभव में, मुझे लगता है कि, ज़्यादा नही तो 320 साल छोटे तो होंगे ही। वह राजनीति, जो राजधर्म का पालन करने की नीयत से होती है, उसका तुलनात्मक दृश्य तो यही है। हां, कलियुगी सियासत में दोनों अटल जी के सामने इस आंकड़े का संपूर्ण उलटबांसी-नृत्य दिखाने की क़ाबलियत रखते हैं। आख़िर उनके उपासकों की तादाद ऐसे ही इतनी थोड़े है! नरेंद्र भाई की बलैयां लेने वाले ही तो आज अटल जी के अस्थि-कलशों को थामे ठट्ठा लगाने में नहीं लजा रहे हैं।
    मैं इसमें नहीं जाना चाहता कि अटल जी की भतीजी पूरे अस्थि-कलश मामले पर क्या कह रही हैं। इसलिए कि तलाशने वाले इसमें सियासी-बू सूंघे बिना भला कैसे मानेंगे? लेकिन सियासत की शतरंज के ऊंट-हाथी-घोड़ों में भावनाएं ढूंढने वाले मूर्ख माने जाते हैं। फिर प्यादों की संवेदनाओं का तो मतलब ही क्या? अटल जी की अस्थियों को देश भर की नदियों में विसर्जित करने की मूल-अवधारणा से मेरा कोई विरोध नहीं है। नरेंद्र भाई बुलाते तो मैं खुद भी अटल जी की अस्थियों का एक कलश लेने ज़रूर जाता और ओंकारेश्वर में पूरी श्रद्धा से प्रवाह-कर्म करता। मेरा विरोध सिर्फ़ इस बात से है कि इस पूरे स्वांग में शामिल लोगों को इतना भी शऊर भी नहीं है कि उन अटल बिहारी की अस्थियां अपनी झोली में ले कर ‘दे ताली मुद्रा’ में कुलांचे न भरें; जिन्होंने, कैसी भी सही; एक विचारधारा को लोकसभा में दो से दो सौ बयासी आसनों तक बिछाने में, चाहे-अनचाहे, इसलिए अपनी अस्थियां गला दीं कि वे प्रतिज्ञाबद्ध थे।
    अटल जी के जाने के बाद लोगों को उनकी बहुत-सी कविताएं याद आईं। मगर मुझे उनकी जो कविता याद है, वह कहती है: ‘क्षमा करो बापू तुम हमको, वचन-भंग के हम अपराधी; राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी।’ मुझे उनकी एक और कविता भूले नहीं भूलती, जिसमें वे ‘शव के अर्चन’ और ‘शिव के वर्जन’ की बात करते हैं और जिसमें वे ‘वैभव दूना’ और ‘अंतर सूना’ की तरफ़ खुल कर इशारा करते हैं। यह अटल जी की वह कविता है, जो ‘शिव ही सत्य है और सत्य ही सुंदर है’ की शाश्वत आधारभूमि पर लिखी गई है। इसलिए मैं नरेंद्र भाई और अमित भाई के गलियारों में बज रहे आत्म-मुग्ध संगीत के बीच यह कर्कश-घ्वनि छेड़ने की हिमाकत कर रहा हूं कि शिव की वर्जना कर शव का अर्चन करने से अटल जी को मोक्ष कैसे मिलेगा? दूने वैभव तले सिसकते सूने अंतर से आगे की राह कैसे तय होगी? अटल जी की स्मृति तक सौदा बन जाए तो भी आपको चिंता नहीं हो रही है क्या? ऊॅ शातिः ! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

    Monday, August 20, 2018

    बेसब्र, बेसबब, बेख़बर प्रधानमंत्री के देश में




    प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी को, अब किराए पर जा चुके हमारे लालकिले ने, इस स्वतंत्रता दिवस पर, तकनीकी तौर पर अंतिम बार, अपने कंधे पर खड़ा किया। हम सब ने पूरे 82 मिनट तक उनकी गिनाई उपलब्धियों पर सीना फुलाया, उनके दिखाए सपनो की चमक अपनी आंखों में बसाई, अम्बर से भी ऊपर जाने की उनकी कवितामयी ख्वाहिश से अपने को सराबोर किया और उनके साथ पूरा दम लगा कर भारत माता की जय बोली। बावजूद इसके कि मैं देश के उन 69 प्रतिशत मतदाताओं में से एक हूं, जिन्होंने 2014 की गर्मियों में नरेंद्र भाई के पक्ष में मतदान नहीं किया था, वे मेरे भी प्रधानमंत्री हैं। इसलिए मुझे लग रहा था कि कम-से-कम इस बार तो वे अपने भाजपाई-खोल से बाहर आएंगे और हमें बताएंगे कि देश सचमुच कहां-से-कहां पहुंच गया है।
    लेकिन प्रधानमंत्री हैं कि सब का प्रधानमंत्री बनने को तैयार ही नहीं हैं। सो, वे अपनी सियासी जन्मघुट्टी के मुताबिक़ संघ-प्रचारक की मुद्रा में ही बोले। उनके बोले हुए में कितना सच था, वे जानते हुए भी नहीं जानते होंगे, लेकिन देश तो जानता ही है। इसलिए उनके बिगुल से सवा चार साल की सरकारी उपलब्धियों की धुन सुन कर मेरे तो पैर नहीं थिरके। नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उन्हें यह कहने से कौन रोक सकता है कि पहले के किसी गैऱ-भाजपाई प्रधानमंत्री ने इस देश के लिए कुछ किया ही नहीं, लेकिन मैं चूंकि एक अदना पत्रकार हूं इसलिए यह नहीं कहता कि हमारे प्रधानमंत्री ने सिंहासन संभालने के बाद कुछ किया ही नहीं है। उन्होंने बहुत कुछ एक साथ करने की कोशिश की है। अपनी इस हड़बड़ी में वे ऐसा गच्चा खा गए हैं कि कुछ ख़ास न हो पाने का मलाल, लगता है कि, उन्हें भी अब भीतर-ही-भीतर कचोटने लगा है। इसीलिए लालकिले की प्राचीर से सफाई देने लगे कि वे क्यों इतने बेसब्र हैं, क्यों इतने बेचैन हैं, क्यों इतने व्याकुल हैं, क्यों इतने व्यग्र हैं, क्यों इतने अधीर हैं और क्यों इतने आतुर हैं?
    मुझे उनसे इसलिए सहानुभूति नहीं है कि वे क्यों इतने बेसब्र वगैरह-वगैरह हैं। मुझे तो इसलिए उन पर दया-सी आती है कि वे क्यों इतने बेख़बर हैं कि उन्हें इसका अहसास तक नहीं है कि सवा चार साल में उनके प्यारे देशवाािसयों के एक बहुत बड़ें हिस्से को अपने सब्र का, अपने चैन का, अपने शांत-चित्त होने का, अपनी एकाग्रता का, अपने धीरज का और अपने गांभीर्य का कैसा-कैसा इम्तहान देना पड़ा है? आचरण, व्यवहार और क्रिया-कलापों के सदियों पुराने संस्कारों से बंधे भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री की इतनी आकुलता-व्याकुलता का कोई सबब भी तो हो! नाहक ही ‘बे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंगÓ की दर्द भरी इबारत से हर दीवार रंगी पड़ी है। रहीम ने लिखा है कि बेर की झाड़ी और केले के पेड़ का साथ भला कैसे निभे? बेर का झाड़ तो अपनी मौज में डोल रहा है, मगर उसके बेतरह हिलने-डुलने से बगल में खड़े केले के पेड़ का तो अंग-अंग फटा जा रहा है।
    जैसा कि नरेंद्र भाई मानते हैं, हो सकता है कि जिन साठ वर्षों में देश को भाजपा-सरकारों का सौभाग्य नहीं मिला, उस दौरान सचमुच कुछ नहीं हुआ हो। अगर ऐसा होता तो हमारे आज के प्रधानमंत्री को इस तरह आगा-पीछा देखे बिना दिन-रात काम करना काम क्यों करना पड़ता? लालकिले से उन्होंने 2013 और 2018 की रफ़्तार का फ़कऱ् हमें बताया। लेकिन यह नहीं बताया कि ऐसी कौन-सी मालिश-विधि उनके पास है, जिसने भारत के सूखे-पांखरे बदन को रातों-रात गामा-पहलवान बना दिया? नरेंद्र भाई हमारे देश को अम्बर से ऊपर ले चलें तो हम से ज़्यादा ख़ुश कौन होगा? हमें कौन-सा पाताल में पड़े रहने का शौक़ है? मगर बिना ख़ास सोचे-समझे, बिना किसी तैयारी के, महज़ अपनी झौंक पूरी करने के लिए, जिस अंतरिक्ष-गुब्बारे पर उन्होंने भारत को लाद दिया है, उसने मुल्क़ की हड्डी-पसली एक कर दी है।
    जिन्हें यह यात्रा सुखद लग रही है, वे अपनी जानें; मैं तो इतना जानता हूं कि हमारे प्रधानमंत्री के प्यारे देशवासियों में से तीन-चौथाई से ज़्यादा तो दर्द से बिलबिला रहे हैं। लेकिन अगर नरेंद्र भाई को जऱा भी इल्म होता तो क्या वे लालकिले से इसका जि़क्र तक न करते? ईमानदारी के उत्सव में कंधे-से-कंधा मिला कर साथ देने वाले अपने देशवासियों के दर्द को ले कर क्या वे इतने उदासीन रहते? यह तो अच्छा है कि वे बेसब्र हैं। लेकिन यह घातक हैं कि वे बेख़बर हैं। इसलिए यह सोच-सोच कर मुझे रात भर नींद नहीं आती है कि एक बेख़बर चौकीदार के साए तले हम कब तक महफूज़़ रह पाएंगे?
    प्रधानमंत्री आश्वस्त हैं कि उन्होंने सत्ता के गलियारों से दलाली ख़त्म कर दी। उन्हें गर्व है कि वे भाई-भतीजावाद हिंद महासागर में तिरोहित कर आए हैं। उनका सिर ऊंचा है कि लाखों छद्म-कंपनियों पर ताला लगा कर चाबी उन्होंने अपनी जेब में रख ली है। मगर मैं प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा आश्वस्त हूं कि प्रधानमंत्री को ख़ुद की पार्टी की राज्य सरकारों के गलियारों की कोई जानकारी ही नहीं है। उन्हें यह मालूम ही नहीं है कि देसी-परदेसी अफ़सरशाही के बरामदों में किस के भाई-भतीजे क्या कर रहे हैं? वे इस तथ्य से आंखें फेरे हुए हैं कि आज भी मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और सूरत जैसे टापुओं का दुबई, सिंगापुर, हांगकांग और मॉरीशस जैसे द्वीपों से कितना ख़ुशनुमा बिरादराना क़ायम है?
    इसलिए लालकिले पर खड़े हो कर बोले गए शब्दों से ज़्यादा बड़ी तो प्रधानमंत्री की वह ख़ामोशी है, जो पता नहीं क्या-क्या जवाब मांग रही है। ऐसा क्यों है कि आजकल नरेंद्र भाई नोट-बंदी की बात करने से लजा रहे हैं? वे हमें यह क्यों नहीं बताते कि रिज़र्व बैंक के हाथों पर ऐसी भी कौन-सी मेहंदी लगी है कि वह पुराने नोट अब तक नहीं गिन पाया है? क्यों वे पड़ौसी देशों से संबंधों के मसले पर बगले झांक रहे हैं? वे भारत के महाशक्ति बनते वक़्त इस बात का जि़क्र करने से क्यों बचते हैं कि दुनिया की बाकी महाशक्तियों से हमारे संबंधों का समीकरण किस दिशा में जा रहा है? नरेंद्र भाई के संकल्पों के लिए अब भी लोग अपनी बची-खुची काया खपाने को तैयार बैठे हैं, मगर पता तो चले कि आखिऱ उन्होंने तय क्या कर रखा है?
    मुझे अपने प्रधानमंत्री के कुछ गुण बहुत पसंद है। कहां क्या बोलना है, वे जानते हैं। नफ़े को तौलना वे जानते हैं। अदा से डोलना वे जानते हैं। अपनी मंजि़ल उन्हें हमेशा से मालूम थी और उसे हासिल करने के सफऱ में लोकतांत्रिक यातायात के नियमों का पालन करने में उनकी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के बाद लालकिले से जब वे पहली बार बोले और दस साल के लिए फिऱकापरस्ती-स्थगन का आह्वान किया तो मेरा रोम-रोम खिल उठा था। मगर इन सवा चार साल में वे सारी कोंपले कुम्हला गईं, जिनके भरोसे हम अच्छे दिनों की आस लगाए बैठे थे। उनके ताज़ा संबोधन के बाद तो हरियाली की रही-सही उम्मीद भी झुलस गई। अगर अगले साल भी हम लालकिले की छाती पर नरेंद्र भाई को ही चढ़ा पाएंगे तो भारत प्रजातांत्रिक दरिद्रता के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका होगा।
    लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।

    Friday, August 10, 2018

    सियासी बवाल की तरफ़ बढ़ती भाजपा



    पंकज शर्मा

     (Dainik Bhaskar. 9 August 2018)

                भारतीय जनता पार्टी सियासी बवाल की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रही है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के विधानसभा चुनावों में तो इसकी जो झलक देखने को मिलेगी, सो मिलेगी ही; अगले बरस संसद के बजट सत्र के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा-अध्यक्ष अमित शाह का इम्तहान और कड़ा हो जाएगा। केंद्र और राज्य सरकारों के खुफ़िया महकमों से अनौपचारिक तौर पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आकलन दलों से अर्द्ध-औपचारिक तौर पर और भाजपा द्वारा नियुक्त सर्वे-कंपनियों से औपचारिक तौर पर अमित शाह को मिली रपटों ने मोटे तौर पर यह तय कर दिया है कि मौजूदा 273 में से 142 भाजपाई-सांसदों को अगले चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा।

                उम्मीदवारी गंवाने वाले संभावित लोकसभा सदस्यों की सूची संकेत देती है कि 2019 के आम-चुनाव से पहले भाजपा के लिए सबसे बड़ा बखेड़ा उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और कर्नाटक में खड़ा होने वाला है। इन 12 राज्यों में भाजपा के फ़िलहाल 230 लोकसभा सदस्य हैं। इनमें से 149 को बाहर का रास्ता दिखाया जाने वाला है।

                उत्तर प्रदेश में भाजपा के मौजूदा 68 सांसदों में से 42 के नाम संदिग्ध-सूची में हैं। बिहार के 22 में से 13 सांसदों को दोबारा प्रत्याशी नहीं बनाए जाने की संभावना है। गुजरात में भी भाजपा ने अपने 16 सांसदों को मैदान में उतारने का फ़ैसला फ़िलहाल तो कर ही रखा है। राजस्थान में 15, मध्यप्रदेश में 17 और महाराष्ट्र के 14 सांसदों के सिर पर भी अमित शाह की तलवार लटक चुकी है। छत्तीसगढ़ में भाजपा अपने 7 लोकसभा सदस्यों को अगली बार मैदान में नहीं उतारेगी। झारखंड में भी 5 मौजूदा सांसदों की जगह दूसरों को मौक़ा देने का उसका इरादा है। हरियाणा में अपने 5 सांसदों को वह वापस बुलाएगी। हिमाचल प्रदेश में भी 3 मौजूदा सांसदों को वह उम्मीदवार नहीं बनाएगी। दिल्ली में भी भाजपा 5 सांसदों को दोबारा लड़ने का मौक़ा नहीं देने की तैयारी में है। कर्नाटक में वह अपने 7 लोकसभा सदस्यों के चेहरे बदलेगी।

                इनके अलावा आंध्र प्रदेश के एक, असम के दो, गोआ के एक, जम्मू-कश्मीर के एक, पश्चिम बंगाल के एक और चंडीगढ़ के एकमात्र लोकसभा सदस्य को फिर चुनाव लड़ने का मौक़ा भी अमित शाह शायद ही देंगे। यानी कुल मिला कर भाजपा के 156 लोकसभा सदस्यों को घर भेजने की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। इन सभी लोकसभा क्षेत्रों में दो-दो संभावित नामों के चयन की प्रक्रिया इस साल के अंत तक शक़्ल ले लेगी।
               
                बावजूद इसके कि मोदी-शाह के पराक्रमी फ़ैसलों को चुनौती देने लायक सियासतदां अब भाजपा में हैं ही कहां, मुझे लगता है कि क़रीब 57 प्रतिशत मौजूदा सांसदों को धकियाने का जोख़िम दोनों के लिए ख़ासा बड़ा है। इसका अंतिम खाका तो दिसंबर में चार राज्यों के चुनाव निबट जाने के बाद ही तैयार होगा, मगर पिछले तीन महीने से भाजपा के गर्भ-गृह में चल रही 2019 की तैयारियों के जानकार कहते हैं कि पार्टी की शिखर जुगल-जोड़ी अभी तो किसी की सुनने को तैयार नहीं है।

                इस वक़्त लोकसभा में भाजपा की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से ज़रा-सी ज़्यादा है। यह इसलिए और भी अहम है कि दूसरी सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस की हिस्सेदारी सिर्फ़ 9 प्रतिशत पर लटकी हुई है। लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी में 42 फ़ीसदी की यह खाई विकट दिखती ज़रूर है। लेकिन विपक्ष अगर एकजुट हो गया तो कोई हैरत नहीं कि इसे पाट कर भाजपा से एकाध क़दम आगे निकलने की उसकी मंशा पूरी हो जाए। इसलिए कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का रेखागणित पिछले डेढ़ साल से बेतरह हिचकोले खा रहा है और जिन धुरंधरों की उम्मीदवारी पर पानी फिरेगा, उनमें से ज़्यादातर, क्या नए चेहरों को पानी पिलाने में कोई कोताही छोड़ेंगे?

    लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।