Sunday, January 27, 2019

प्रियंका, राहुल, सियासी गिल्ली-डंडा और अश्वमेध



पंकज शर्मा

    प्रियंका गांधी की बलैयां लेने को कम-से-कम डेढ़ दशक से आतुर बैठे सियासत के सेकुलर-गलियारों के लिए यह बुधवार वह बयार ले कर आया है, जिसका बहाव जैसे-जैसे तेज़ होगा, गंगा की लहरें वैसे-वैसे अपने स्वयंभू पुत्र-पुत्रियों को राजनीतिक-सामाजिक पवित्रता का आचमन कराएंगी। जो प्रियंका के बाक़ायदा सियासी-मैदान में आने को उत्तर प्रदेश, देश और कांग्रेस की राजनीति भर से जोड़ कर देख रहे हैं, मैं उनकी स्थूल-बुद्धि के प्रति पूरे आदर-भाव के साथ कहना चाहता हूं कि प्रियंका का आगमन इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में घटी, भारतीय राजनीति की ही नहीं, दक्षिण एशियाई और विश्व-राजनीति की सबसे महती घटना है। आज जिन्हें इस बात में ख़ुशामदगीरी की बू आ रही हो, वे ज़्यादा नहीं, फ़िलहाल चार महीने और फिर दो बरस इंतज़ार करें और अपनी आंखों से सियासत का पूरा नज़ारा बदलते देखें।
    मैं प्रियंका को काफी-कुछ जानता हूं। वे मुझे बिलकुल नहीं जानती हैं। पिछले एक-डेढ़ दशक में मैं ने कांग्रेस में उनकी नेपथ्य-भूमिका की गुनगुनाहट गहराई से महसूस की है। इस नाते बिना लाग-लपेट के मैं यह कह सकता हूं कि बीस बरस पहले रेतीले टीलों में तब्दील हो रही कांग्रेस को अगर सोनिया गांधी संभाल कर यहां तक ले आईं तो इसलिए कि प्रियंका इस मुहीम में अनवरत उनके साथ थीं। राहुल गांधी की शुरुआती डगमगाहट और हड़बड़ाहट को थामने का श्रेय मां सोनिया के अलावा बहन प्रियंका को भी देने में जिन्हें झिझक हो, होती रहे, मुझे इसमें कोई झिझक नहीं है। वे न होतीं तो राहुल अपने आरंभिक दिशा-भ्रम के जंजाल से कितनी जल्दी बाहर आ पाते, मुझे नहीं मालूम।
    राहुल की वर्तमान सोच गढ़ने में उनकी मां सोनिया का तो जो हाथ है, सो है; इसमें प्रियंका की परोक्ष-भूमिका की छांह उससे ज़्यादा गहन है। राहुल की बुनियादी दृढ़ता को ज़िद के नकारात्मक अंध-कूप से बाहर ला कर सकारात्मक-संकल्प में तब्दील करने का काम, कोई माने-न-माने, प्रियंका ने किया है। इसलिए आज के राहुल, वो राहुल नहीं हैं, जो वे ढाई साल पहले तक थे। राजनीति के संसार में प्रियंका की उपस्थिति के इस आध्यात्मिक-प्रभाव के सार्वजनिक अहसास का दौर तो दरअसल अब शुरू हुआ है। बहुतों को नहीं होगी, मगर मुझे पूरी उम्मीद है कि चौतरफ़ा सड़न की शिकार हमारी राजनीति में उनकी मौजूदगी गंगाजल और आबे-ज़मज़म की फुआर लाएगी।
    प्रियंका के आने से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा, यह बहुत छोटी बात है। उनका आगमन कांग्रेस के विरोधियों की नाक में कितना दम करेगा, यह भी बहुत छोटी बात है। वे उत्तर प्रदेश के पूरब में कौन-सा सूरज उगाएंगी, यह पचड़ा भी बेमानी है। कांग्रेस को तो प्रियंका के आने से फ़ायदा होने ही वाला है। उनका आना कांग्रेस के विरोधियों की मुश्कें तो कसने ही वाला है। वे उत्तर प्रदेश के पूरब में तो छोड़िए, पूरे मुल्क़ में एक नए सूरज की रचना का माद्दा रखती हैं। यह सब देखने के लिए किसी अंतरिक्ष-भेदी दूरबीन का ज़रूरत नहीं है। प्रियंका के आने को राहुल की नाकामी का प्रतीक बताने वालों की मूर्खता पर भी तरस खाने के अलावा क्या किया जा सकता है? एक दशक से भी ज़्यादा वक़्त तक प्रियंका की मर्यादा-परिधि को खुली आंखों से देखने वाले अब अगर जानबूझ कर अपनी आंखें बंद कर फ़तवागीरी करना चाहते हैं तो करते रहें। मैं आश्वस्त हूं कि कांग्रेस के आंगन में प्रियंका की औपचारिक पदचाप राहुल की छलांग-क्षमता को उस संतुलित-चरम तक ले जाएगी, जहां से एक सचेत, सतर्क और समीचीन पार्टी-संगठन का निर्माण तो होगा ही; देश में एक नई राजनीतिक सृष्टि की रचना भी होगी। 
    राहुल और प्रियंका की पारस्परिक पूरक-शक्ति के आयाम जिनकी समझ में नहीं आ रहे हैं, ईश्वर उनका ख़्याल रखे! जो ‘प्रथमग्रासे मक्षिकापात’ की कामना लिए तामसी-पूजन में मशगूल हो गए हैं, ईश्वर उनका भी ख़्याल रखे! मैं तो इतना जानता हूं कि नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी का भारतीय राजनीतिक पटल पर फू-फॉ आगमन तो एक अल्पजीवी चमत्कार था, मगर भरत-खंड के लोकनीतिक पटल पर प्रियंका का मृदु-पदार्पण दीर्घजीवी चमत्कार साबित होगा। वंशावलियों के विशेषज्ञ राहुल-प्रियंका की सार्वजनिक जीवन में मौजूदगी को आज जो रंग देना चाहें, दें। मगर थोड़ा समय बीतने दीजिए, वे देखेंगे कि दोनों ने मिल कर हमारी सियासी-सृष्टि से लुप्त होते जा रहे सेमल और पलाश के वृक्षों को कैसे पुनर्जीवन दिया है। 
    सामाजिक-राजनीतिक बेचैनी के इस बीहड़ समय में राहुल-प्रियंका को जिन चुनौतियों का सामना करना है, वे मामूली नहीं हैं। मैं जांच एजेंसियों द्वारा गढ़े गए बहेलिया-जाल की बात नहीं कर रहा। सत्ताधीश जब तमाम आचार संहिताओं को रौंदने पर आमादा हो तो यह सब तो चलता ही रहता है। अपने को चारों तरफ़ से घिरा पाने के बाद इक्कादुक्का हुक़्मरान ही संयत रह पाता है। आमतौर पर तो ऐसे में अविवेक ऐसा हावी हो जाता है कि षड्यत्रों और दमन का चक्का तेज़ी से घूमने लगता है। राहुल-प्रियंका की कांग्रेस क्षुद्रता की इन करतूतों का जवाब तो दे ही लेगी। लेकिन असली चुनौतियां दूसरी हैं। असली चुनौती कांग्रेस को उस कायाकल्प के लिए तैयार करने की है, जिसके बिना विश्वास-बहाली का युद्ध लड़ना आसान नहीं है।
    कांग्रेस एक राजनीतिक दल से ज़्यादा एक अवधारणा है। यह अवधारणा एक दिन में नहीं बनी है। इस अवधारणा को कुछ मूलभूत तत्वों के समन्वय ने दशकों-दशक सींचा है। यह अवधारणा एक अमूर्त शक्ति की मानिंद भारतीय मानस में रच-बस गई है। जब-जब यह अवधारणा ज़ख़्मी होती है, मौन-चीखें उठने लगती हैं। राहुल-प्रियंका को यह ख़ामोश-ध्वनि सुनने की विद्या में अब और ज़्यादा पारंगत होना होगा। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि यह उनके लिए या कांग्रेस के लिए आखि़री मौक़ा है या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि यह भारत की सर्वसमावेशी संस्कृति को बचाने का अंतिम अवसर है। महाभारत के युद्ध के लिए अग्नि देव ने अर्जुन को अपना रथ कपि-ध्वज दिया था। साढ़े चार बरस की हाहाकारी राख में दबी चिनगारी से जन्मे कपि-ध्वज पर सवारी आज राहुल-प्रियंका के ज़िम्मे आन पड़ी है। इसके लौकिक कारण होंगे, मगर इसके अलौकिक कारण भी हैं। इसलिए इस कर्तव्य-बोध का मर्म समझना भाई-बहन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
    रोज़मर्रा के चुनावी अंकगणित के समीकरणों के हिसाब से क़दमताल ज़रूरी है। लेकिन कांग्रेस सिर्फ़ इतनी-सी मंज़िल हासिल करने के लिए बना वाहन नहीं है। चुनावी मंज़िलों तक तो कई लोग अपने-अपने छकड़े बना कर पहुंच गए। कांग्रेस भी अगर अपने को इसी दायरे में समेट लेगी तो उस अंतर्निहित दैवीय-शक्ति का क्या होगा, जो गु़लामी से आज़ादी दिलाने के लिए कांग्रेस की रगों में बहने आई थी? आज़ादी का यह सफ़र अभी ख़त्म कहां हुआ है? राष्ट्रवाद की अधकचरी सोच से आज़ाद होना अभी बाकी है। बेकाबू उदारवाद से उपजी असुरक्षा से आज़ाद होना अभी बाकी है। राज्य-व्यवस्था पर काबिज़ प्रतिगामी प्रवृत्तियों से आज़ाद होना अभी बाकी है। सो, बुनियादी बदलाव के एक लंबे युद्ध के लिए कांग्रेस को मनसा-वाचा-कर्मणा तैयार करना राहुल-प्रियंका की असली चुनौती है। भटके भारत को सही सम्यक-दिशा देने का काम अगर दोनों कर सकें, तब तो कोई बात है। वरना अगर कांग्रेस भी छोटे पड़ावों की आरामदेह रजाई में घुस जाएगी तो फिर क्या तू-तू और क्या मैं-मैं? कांग्रेस राजनीति का गिल्ली-डंडा खेलने के लिए नहीं बनी थी। इसलिए लाख कलियुग सही, प्रियंका-राहुल को तो अश्वमेध के नियमों का ही पालन करना होगा।

    खच्चर-मुक्त घुड़साल के इंतज़ार में राहुल


    पंकज शर्मा

      तीन राज्यों में जीत के बाद खुद ही खुद की पीठ थपथपा रहे कांग्रेस के प्रादेशिक शिल्पकार अपनी गदगद-मुद्रा से अगर जल्दी ही बाहर नहीं आए तो अप्रैल-मई में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी से होने वाले मल्ल-युद्ध में वे कहीं लड़खड़ा न जाएं! इसलिए कि विधानसभा चुनावों की जीत का शिला-लेख इतना भी अमिट नहीं है कि दशकों उस पर धूल न जमे। कांग्रेस जीती तो है, लेकिन उसने कोई धोबियापाट लगा कर भारतीय जनता पार्टी को चारों खाने चित्त भी नहीं कर दिया है। इसकी बानगी के लिए आगे चल कर राजस्थान और छत्तीसगढ़ को भी लेंगे, मगर फ़िलहाल मध्यप्रदेश को ही लीजिए। जीत की सतह के नीचे तैरती काई की अनदेखी करने वालों को आने वाला ज़माना सूरमा-भोपाली के अलावा क्या समझेगा?
      मध्यप्रदेश में कांग्रेस 230 में से 229 सीटों पर लड़ी थी और 114 जीती। भाजपा सभी 230 पर लड़ी और 109 जीती। कांग्रेस और भाजपा के बीच सिर्फ़ 5 सीटों का फ़र्क़ रहा। बसपा 227 पर लड़ी और महज़ 2 सीटें जीत पाई। सपा 52 पर लड़ी और 1 पर जीती। 214 निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में थे। उनमें से 4 जीते। भाजपा को कांग्रेस से सीटें भले ही 5 कम मिलीं, लेकिन उसका वोट प्रतिशत कांग्रेस से कम नहीं है। अलबत्ता, ज़रा-सा ज़्यादा है। कांग्रेस को 41.5 प्रतिशत वोट मिले तो भाजपा को 41.6 प्रतिशत। भाजपा को पूरे प्रदेश में कांग्रेस से 47,827 वोट ज़्यादा मिले हैं। 
      कांग्रेस को एक और तथ्य अपने ज़ेहन में रखना होगा। 13 विधानसभा क्षेत्रों में उसके उम्मीदवार तीसरे क्रम पर रहे और 12 सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा जितने मतों के अंतर से हारी, उससे ज़्यादा वोट ‘नोटा’ को मिले। मैं मानता हूं कि मध्यप्रदेश में ‘नोटा’ की गोद में गिरे 5 लाख 42 हजार 295 मतों का नब्बे प्रतिशत भाजपा से नाराज़ उन मतदाताओं का था, जो भाजपा से तो नाराज़ थे, मगर अपनी निष्ठा को दूसरे पाले में कुदा देने को भी तैयार नहीं थे। 1.4 प्रतिशत का ‘नोटा’ भले ही ज़्यादा मोटा नहीं लगे, मगर लोकसभा में अगर भाजपा से रूठा यह मतदाता वर्ग अपने कोप-भवन से बाहर आ कर नरेंद्र भाई के कंधे पर बैठा तो कांग्रेस की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर ही तो डालेगा। 
      मध्यप्रदेश को मोटे तौर पर छह अंचलों में बांट कर देखा जाता है। मालवा-निमाड़, मालवा, चम्बल, बुंदेलखंड, विंध्य और महाकौशल। अब तक मालवा-निमाड़ और मालवा में भाजपा की जड़ों का गहराई-समीकरण विधानसभा के इस चुनाव में बदला है। सो, भाजपा ने इन इलाक़ों में नए सिरे से बीज बोने शुरू कर दिए हैं। कांग्रेस को इस बार सबसे कम वोट विंध्य में मिले हैं और सबसे ज़्यादा महाकौशल में। उसके बाद मालवा-निमाड़ में। प्रदेश के सभी अंचलों में कांग्रेस का मत-प्रतिशत पहले के मुकाबले में बढ़ा है। विंध्य तक में उसे पहले की तुलना में 2.51 प्रतिशत वोट ज़्यादा मिले हैं। भाजपा का वोट प्रतिशत विंध्य को छोड़ कर हर अंचल में घटा है। मगर बावजूद इसके उसके मतों का जोड़ कांग्रेस से आगे ही है। 
      बसपा को मिले सवा 19 लाख वोट, सपा के खाते में गए 5 लाख वोट और निर्दलीय प्रत्याशियों के पक्ष में पड़े सवा 22 लाख वोट का प्रबंधन भी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए ज़रूरी होगा। बसपा मध्यप्रदेश में साफतौर पर तीसरे क्रम का राजनीतिक दल है। उसे सबसे ज़्यादा वोट चम्बल और विंध्य में मिलते रहे हैं और इस बार भी मिले हैं। चम्बल में बसपा को 14 प्रतिशत वोट मिले हैं और विंध्य में 11 प्रतिशत। तीसरे क्रम पर मज़बूती से अपनी हाज़िरी दर्ज़ कराने वालों में इस बार गोंडवाना और सपाक्स भी रहे हैं। तीसरे क्रम पर आम आदमी पार्टी की छुटपुट मौजूदगी को भी लोकसभा के लिहाज से नकारना बुद्धिमानी नहीं होगी।
      विधानसभा चुनाव के नतीजों ने अगर अपनी चदरिया मध्यप्रदेश के लोकसभा-मैदान में ज्यों-की-त्यों रख दी तो कांग्रेस को 29 में से 12 या 13 और भाजपा को भी इतनी ही सीटें मिलने का अंकगणित हमारे सामने है। ऐसे में 3 से 5 सीटें बसपा इत्यादि के पल्लू से बंधेंगी। लेकिन चार महीने बाद जब लोकसभा चुनाव का रथ भिंड-मुरेना के बीहड़ों से चल कर ज्योतिरादित्य सिंधिया के ग्वालियर-गुना होता हुआ जबलपुर में भेड़ाघाट के जलप्रपात की मूसलाधार से भीगता खजुराहो के मंदिरों से गुजर रहा होगा तो क्या मतों का अंकगणित ऐसा ही रह पाएगा? क्या जब इस रथ के कांग्रेसी घोड़े रीवा और सीधी की पगडंडियों से चल कर छिंदवाड़ा की विकास अट्टालिकाओं तक पहुंचेंगे तो बिलकुल भी थके हुए नहीं होंगे? कमलनाथ के छिंदवाड़ा से ऊर्जा-पेय का बड़ा घूंट लेने के बाद जब यह रथ होशंगाबाद और मंदसौर हो कर उज्जैन के महाकाल की परिक्रमा करने पहुंचेगा तो कितना चमचमा रहा होगा? 
      पंद्रह बरस बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए अपना-तेरी छोड़ कर सब-कुछ दांव पर इसलिए लग गया था कि अगर बूंदी इकट्ठी कर लड्डू बनाएंगे ही नहीं, तो प्रसाद बंटेगा कैसे? बाद में, ये मेरा, ये मेरे भाई का, ये मेरी अम्मा का, कह-कह कर प्रसाद के ज़्यादा-से-ज़्यादा दोने बटोरने की संभावनाएं चूंकि शेष थीं, इसलिए मध्यप्रदेश में कांग्रेस की नैया पार लग गई। मगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनवाने की ऐसी ही ललक कितनी है, कौन जाने! ख़ासकर पिछले पांच साल में बुरी तरह आजिज़ आ गए मतदाताओं को भाजपा को हटाना ही था। इसलिए मध्यप्रदेश में कांग्रेस पांच कदम आगे निकल गई। लेकिन केंद्र में कांग्रेस को बैठाने के लिए भी मतदाता कितने लालायित हैं, कौन जाने!
      मतदाताओं की इस ललक को खौलती आंच पर रखने का ज़िम्मा किसका है? सियासत के चकमक पत्थरों से यह आंच पैदा करने का ज़िम्मा किसका है? जिन्हें अपने निजी, पारिवारिक और कबीलाई किलों को मजबूत करने के लिए सारे प्रपंच करने में कभी थकान नहीं होती, वे राहुल गांधी के लिए दधीचि बनने से पीठ क्यों फेर लेते हैं? मैं तो अब तक यही नहीं समझ पाया हूं कि राहुल की राह का रोड़ा भाजपा है या कांग्रेसी बरामदों में टंगे चंद चेहरे? राहुल को भाजपा के तीरंदाज़ों से नहीं, दरअसल अपने दरबानों से निबटना है। 
      अब तो इसमें किसी को कोई खटका नहीं रह गया है कि राहुल गांधी मेहनती हैं, उनकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय छवि में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ आ गया है, मंचीय-लफ्फाज़ी को छोड़ कर वे नरेंद्र भाई मोदी से हर हाल में इक्कीसे हैं और मौक़ा मिलने पर प्रधानमंत्रित्व की नेहरू-अटल आचरण-परंपरा के सशक्त वाहक साबित होंगे। सियासत की ऋणात्मकता से आरंभ हुआ राहुल का इस मंज़िल तक बावजूद इसके पहुंचे हैं कि उनके आसपास ऐसे तमाम तत्व डेरा जमाए बैठे हैं, जो अपने को समझते कुछ भी हों; जाने-अनजाने, हैं राहुल की राह के कंटक ही। इतनी खटारा व्यवस्था के साथ अगर राहुल अपने को यहां तक खींच लाए तो जिस दिन वे अपनी घुड़साल को खच्चरों से मुक्त कर लेंगे, इतने सरपट दौडेंगे कि आपकी आंखें फटी रह जाएंगी। मैं तो पता नहीं कब से यह प्रार्थना कर रहा हूं कि राहुल के ईष्ट भोलेनाथ उनमें यह तांडव-भाव उत्पन्न करें! 

      Tuesday, January 15, 2019

      कमलनाथ, दिग्विजय, सिंधिया और सभा-पर्व



      पंकज शर्मा

        मैं इस हफ्ते भोपाल में था। भोपाल का ताल पंद्रह बरस बाद हिलोरें ले रही नई सियासी-तालों से ताल मिलाने के लिए पांव थिरका रहा है। जिन्हें लगता था कि अपने राजनीतिक जीवन के चार दशक रायसीना की पहाड़ियों पर तफ़रीह में गुज़ार देने वाले कमलनाथ भोपाल के टीलों पर शायद ही ठीक से चढ़ पाएं, वे उनके कदमों की जुंबिश देख कर अवाक हैं। मैं ने कमलनाथ के चार दशक के सफ़र को पहले पत्रकारिता में रह कर और बाद में राजनीति में आ कर संजीदगी से समझा है। अपने कुलीन-कोने से पल्लू झटक कर जिस तरह वे दीवाने-आम में आ कर जम गए हैं, अगर उससे उकताए बिना वे अपने बरामदे का दायरा बढ़ाते रहे तो मध्यप्रदेश विकास के एक नए मुहावरे को जन्म देगा।
        भोपाल के नए निज़ाम पर दिग्विजय सिंह की गहरी छाप देखने के लिए आपको किसी दूरबीन की ज़रूरत नहीं है। वे कुछ भी नहीं हैं, मगर सब-कुछ हैं। मध्यप्रदेश में इस बार कांग्रेस की बढ़त उनके समन्वय-कौशल का नतीजा है। अपनी समन्वय-कला को उन्होंने लचीलेपन और दृढ़ता के ऐसे मिश्रण में डुबो रखा है, जिसका गुण-सूत्र राजनीति के बड़े-बड़े रसायनशास्त्रियों को भी नहीं मालूम। नर्मदा प्रसाद प्रजापति को विधानसभा-अध्यक्ष निर्वाचित कराते वक़्त दिग्विजय की दुंदुभी बजते सभी ने खुलेआम सुनी। प्रजापति इंदौर में क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई के दिनों से हम में से बहुतों के अनवरत-साथी रहे हैं और अपने मध्यममार्गी स्वभाव ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है। बावजूद इसके कि भारतीय जनता पार्टी के बेवजह आक्रामक रवैये की वजह से पांच दशक में पहली बार विधानसभा-अध्यक्ष सर्वानुमति से नहीं चुना गया, मैं जानता हूं कि प्रजापति सदन की कार्यवाही पर इस मलाल की छांह नहीं पड़ने देंगे।
        जिन्हें रखना है, रखें, लेकिन मैं तो इतना छोटा दिल नहीं रख सकता कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनवाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया की भाग-दौड़ और खुद सिंहासन पर बैठने को ले कर उनकी अनाग्रही गरिमा को श्रेय न दूं। उन्होंने अपने को सचिनीकरण से बचाया। इसके बाद इतना हक़ तो उन्हें बनता ही था कि अपने सात-आठ समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह दिलाएं। सो, उन्होंने इतना करने के बाद खुद को रोज़मर्रा की प्रादेशिक सियासत से फ़िलवक़्त तो दूर-सा कर लिया है। यह भी कमलनाथ-सरकार का शक्ति-बीज है।
        अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह और सियासी-दस्तरखान पर रखी तश्तरियों का व्यंजन-मर्म समझने वाले सुरेश पचौरी अगर चुनाव जीत जाते तो कांग्रेसी सरकार का और भला होता। लोग मानते हैं कि दोनों भाजपा के ईवीएम-प्रबंधन की भेंट चढ़ गए। पचौरी तो फिर भी रोज़-ब-रोज़ की उठापटक में नज़र दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अजय सिंह ने अपनी राजनीतिक-देगची धीमी आंच पर रख दी है। आगे-पीछे दोनों को हम-आप फिर मैदान में देखेंगे ही। इसलिए कि इतनी-सी ऊंच-नीच के चलते हथियार फेंक देने वालों में दोनों ही नहीं हैं।
        कुछ तो सचमुच हैं, लेकिन उनके अलावा भी खुद को कांग्रेस की जीत का शिल्पकार समझने वालों से भोपाल का ताल मैं ने लबालब भरा देखा। नई सरकार के पहले विधानसभा सत्र के बाहरी गलियारे इन स्वयंभू-शिल्पकारों के बोझ से चरमरा रहे थे। निजी आकांक्षाओं की इस मूसलाधार के थपेड़ों से निबटना कमलनाथ नहीं जानते, ऐसा नहीं है, मगर लोकसभा के चुनाव होने तक उनकी आंख-मिचौली देखना दिलचस्प होगा। इसलिए कि अपनी शिल्पकारी पर स्वयं रीझे बैठे लोगों की फ़ौज राजनीतिकों की ही नहीं, अफ़सरों की भी है। ऐसे बहुत-से हैं, जिन्हें लगता है कि अगर वे नहीं होते तो कमलनाथ-दिग्विजय-सिंधिया त्रिमूर्ति भी भाजपा से सत्ता नहीं छीन पाती। 
        भोपाल के मीना-बाज़ार में इस वक़्त पाजामा-कुर्ताधारी और सूट-बूटधारी जो प्राणी विचर रहे हैं उनकी दो श्रेणियां हैं। एक वे राजनीतिक हैं, जो भाजपा से पंद्रह बरस जूझते रहे और अब अपनों का ध्यान चाहते हैं। दूसरे वे राजनीतिक हैं, जो भाजपा की नृत्य-शाला में भी बैठे रहे और अब कांग्रेसी अंतःपुर में प्रवेश की खिड़कियां तलाश रहे हैं। इसी तरह वे अफ़सर हैं, जो भाजपा-राज में किनारे पड़े रहे और अब दीवाने-ख़ास में जगह चाहते हैं और वे अफ़सर भी हैं, जो भाजपा के हरम का हिस्सा थे और अब कांग्रेसी शैया पर लोट लगाना चाहते हैं। मैं तो यही दुआ कर सकता हूं कि ईश्वर कमलनाथ की दिव्य-दृष्टि बरकरार रखे! कलियुग में दुआएं चूंकि आसानी से नहीं फलती हैं, इसलिए मैं आप से भी गुज़ारिश करता हूं कि मेरे साथ ज़ोर-ज़ोर से यह दुआ करें। 
        नरेंद्र भाई मोदी के पराक्रम तले हांफ रही मौजूदा लोकसभा के अब महज सवा सौ दिन बचे हैं। कमलनाथ, दिग्विजय और सिंधिया को मिल कर यह वर्जिश भी करनी है कि इन सवा सौ सीढ़ियों पर चढ़ते समय कांग्रेस का दम न फूले। विधानसभा चुनाव के वक़्त की तेल-मालिश के भरोसे लोकसभा का समंदर पार नहीं होगा। अभी की तीन सीटों को बीस के पार कुदाना खाला का खेल नहीं है। और, अगर कांग्रेस इस बार मध्यप्रदेश से अपने बीस सांसद भी लोकसभा की देहरी तक नहीं पहुंचा पाए तो फिर मुल्क़ की रंगत कैसे बदलेगी? तीन प्रदेशों से भाजपा की विदाई ने कांग्रेस को सुस्ताने का मौक़ा तो दे दिया है, मगर लोकसभा का ज़ीना चढ़ने के लिए उसे दुगना दम लगाना है।
        जब केंद्रीय संस्थाओं के चप्पे-चप्पे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने साढ़े चार बरस में ही अपने स्वयंसेवक तैनात कर डाले तो सोचिए कि पंद्रह साल में मध्यप्रदेश का क्या हाल हुआ होगा? पूरे राज्य की प्रशासनिक गलियों में लहरा रहे संघ-ध्वज को नर्मदा में तिरोहित करना मामूली काम नहीं है। सिर्फ़ हो-हल्ला करने से ये बलाएं नहीं टलने वाली। सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और प्रशासनिक परिसरों से इस गाजर-घास को जड़ तक खुरचने का ज़िम्मा देने के लिए खुरपियां चुनने का काम भी कमलनाथ को इन्हीं सवा सौ दिनों में पूरी संजीदगी से करना होगा। इसमें एक-एक दिन की देरी लोकसभा के लिए कांग्रेस की राह में कंटक बढ़ाएगी। 
        मध्यप्रदेश की शिल्प-त्रिमूर्ति को मैं महाभारत का सभा-पर्व पढ़ने की बिन-मांगी सलाह देना चाहता हूं, जिसमें इंद्रप्रस्थ की स्थापना के बाद महर्षि नारद द्वारा युवराज युधिष्ठिर से पूछे गए प्रश्नों का ज़िक्र है। इसमें उन 14 दोषों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें त्यागे बिना कोई भी राजा लंबा राज कर ही नहीं सकता है। विधानसभा के चुनावों में मतदाताओं ने भाजपा को उसके पाप की सजा दी है। ये चुनाव-परिणाम कांग्रेस की पुरानी पुण्याई के छींटे हैं। ज़रूरी नहीं कि पुण्य-पाप की ये स्मृतियां अगले सवा सौ दिन अपने प्रवाह का वेग वैसा ही बनाए रख पाएं। 
        इसलिए कांग्रेस के लिए यह समय भोपाल के ताल में लगातार तरंगे उठाते रहने का है। पानी की तरह आकारहीन रहने से कुछ नहीं होगा। जिस सुबह की ख़तिर मर-मर कर हम सब जुग-जुग से जी रहे थे, वह मध्यप्रदेश में तो जैसे-तैसे आ गई है। लेकिन उसका सूरज उगाए रख कर उसकी धूप लोकसभा के आंगन में पहुंचाना अभी बाकी है। तभी जा कर इन गर्मियों में देश में शीतल बयार बहेगी। भाजपा-संघ के दावानल से निकलने वाली भावी लपटों के बीच से गुज़रना ऐसा भी आसान नहीं होगा। इसके लिए कमलनाथ-दिग्विजय-सिंधिया की संयुक्त दमकलों के अलावा पैदल-टुकड़ियों का शंखनादी-कूच भी ज़रूरी होगा। आप करें-न-करें, मैं तो विश्वास करता हूं कि कांग्रेस अपने आत्म-बोध से नहीं भटकेगी। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

        Saturday, January 5, 2019

        सिंहासन का दायित्व-बोध उनके ठेंगे पर



        पंकज शर्मा

          भारत के अच्छे दिन लाने की शपथ ले कर सत्ता में आए और साढ़े चार बरस में देश को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्कारों के पाषाण-काल में खींच ले गए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने और कुछ चुराया है या नहीं, मालूम नहीं, मगर कुछ चीजें तो ज़रूर चुराई हैं। अपने पूरे कार्यकाल भर उन्होंने मीडिया से नज़रें चुराई हैं। देशवासियों का विश्वास चुराया है। राष्ट्रीय इतिहास का गौरव चुराया है। परंपराओं का सम्मान चुराया है। समाज का सद्भाव चुराया है। अर्थव्यवस्था की नींव से ईंटें चुराई हैं। राजनीतिक आचार-संहिता के बुनियादी पन्ने चुराए हैं।
          सो, अपने कार्यकाल के डेढ़ सौ दिन पहले अगर नरेंद्र भाई ने मीडिया की पैनी निगाहों का सामना करने के बजाय मिमियाते सवालों के जवाब में अपना छवि-निर्माण प्रायोजित किया है तो आप उन्हें माफ़ कर दीजिए। वे पराक्रमी हैं, उनके पास छप्पन इंच की छाती है, वे बातें बनाने की कला जानते हैं और उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली है। लेकिन इसका मतलब यह कहां से हो गया कि वे हर तरह के सवालों का सामना करने को तैयार हो जाएं! वे जवाबदेह हैं, मगर सिर्फ़ उन सवालों के जवाब देंगे, जिनका वे देना चाहते हैं। वो भी तब, जब वे सवाल उस तरह पूछे जाएं, जिस तरह वे चाहते हैं।
          नरेंद्र भाई जानते हैं कि पत्रकार बिरादरी में गोस्वामियों, चावलाओं और जोशियों की कमी नहीं है। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि सवाल उठाते पत्रकारों के किसी सामूहिक बाड़े में कूद पड़ने में कितना बड़ा जोखि़म है। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार भी यह साहस नहीं दिखाया कि किसी को दुस्साहस दिखाने का मौक़ा मिल जाए। सो, नए साल का इंटरव्यू उन्होंने बहुत सोच-समझ कर बड़े सादे माहौल में पूरी मासूमियत ओढ़ कर देने का काम किया।
          प्रधानमंत्री के इस इंटरव्यू से जिन्हें ‘वाह-वाह’ की गूंज बिखरने की उम्मीद थी, वे सब मुंह लटकाए बैठे हैं। मेरे पास देश-विदेश से पचासों फोन आए और उनमें से एक भी ऐसा नहीं था, जिसने माशाअल्लाह कहा हो। सबने इंटरव्यू को ढाक के तीन पात बताया। इनमें वे लोग भी थे, जिन्होंने नरेंद्र भाई की हर अदा पर मर मिटने के लिए ही जन्म लिया है। उनका तालठोकू अंदाज़ भी तिरोहित-सा जान पड़ा। इस इंटरव्यू ने एक पराक्रमी प्रधानमंत्री की बेचारगी जग-ज़ाहिर करने के अलावा और कुछ नहीं किया। बेचारग़ी इस बात की कि कहें तो क्या कहें और बताएं तो क्या बताएं?
          क्या आप सोच भी सकते हैं कि व्लादिमीर पुतिन अपना इंटरव्यू रूस के किसी कपिल शर्मा से करवाएंगे? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि शी जिन पिंग अपना इंटरव्यू चीन की किसी भारती सिंह से करवाएंगे? और-तो-और, क्या डोनाल्ड ट्रंप तक अपना इंटरव्यू अमेरिका के किसी राजू श्रीवास्तव से करवा लेंगे? लेकिन ये हमारे नरेंद्र भाई हैं, जिन्हें इस बात से फ़र्क़ पड़ता है कि कहीं वे अपना इंटरव्यू किसी धीर-गंभीर प्रश्नकर्ता को न दे बैठें! इसलिए वे जब से प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने फूंक-फूंक कर यह सावधानी बरती है कि सिर्फ़ उन्हीं के पूछे सवालों के जवाब दें, जिन्हें सवाल पूछने का सलीका आता हो। क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले कई बार उन्हें बेसलीकेदार सवालियों के सामने से बीच में ही उठ कर चले जाने का पराक्रम दिखाना पड़ गया था। अब भारत का प्रधानमंत्री रोज़-रोज़ ऐसा करता फिरे, यह भी तो शोभा नहीं देता। सो, फ़जीहत से ऐहतियात भली!
          मीडिया-प्रबंधन के लिए बंद समाजों वाले मुल्क़ों के हुक़्मरानों द्वारा अपनाए जाने वाले तौर-तरीक़ों और लोकतंत्र में निर्वाचित किसी प्रधानमंत्री के प्रयोजनों में कुछ तो फ़र्क़ होना चाहिए। पहले के किसी प्रधानमंत्री ने पत्रकारों को अपने से दूर रखने के लिए इस तरह दिन-रात एक नहीं किए। नरेंद्र भाई ने आते ही अपने दरवाज़े तो उन पत्रकारों के लिए पूरी तरह बंद कर ही लिए, जो उनकी तरह सोचने से इनकार करते हों, अपनी पूरी सरकार के गलियारों में भी उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। हो सकता है, पत्रकारिता के नाम पर फैल गई खर-पतवार को नियंत्रित करना हमारे प्रधानमंत्री को खुद की प्राथमिक ज़िम्मेदारी लगती हो, मगर इस प्रक्रिया में सारा धान ढाई पसेरी परोस देना कौन-सी बुद्धिमानी है?
          नरेंद्र भाई को मालूम है या नहीं, किसी को नहीं मालूम, लेकिन देश को यह मालूम है कि लोकतंत्र एक व्यवस्था भर नहीं है, जिसे नाम के लिए बनाए रखा जाए। जनतंत्र एक संपूर्ण सभ्यता है। सभ्यताओं का विकास एक दिन में नहीं होता है। वे सदियों के परिश्रम और एकाग्रता का नतीजा हैं। लोकतंत्र की एक-एक ईंट जमाने में लाखों-करोड़ों लोगों की मनसा-वाचा-कर्मणा ने भूमिका निभाई है। इन ईंटों को खिसकाने का अधिकार किसी को नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री जन-प्रतिनिधि हैं। जन-प्रतिनिधि केवल मतदान से उपजे विश्वास का प्रतिनिधि नहीं होता है। वह भाषा, संस्कृति और समाज का प्रतिनिधि भी होता है। वह पूरे लोकाचार का प्रतिनिधि होता है। प्रश्नों का उत्तर देना-न-देना उसकी मर्ज़ी पर नहीं है। प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वह बाध्य है।
          सिंहासन के दायित्व-बोध को समझने से इनकार करने वाले ज़्यादा दिनों तक सिंहासन पर आसीन नहीं रह पाते हैं। नरेंद्र भाई की विचार-काठी उन्हें कभी लचीला नहीं होने देगी। वे अपने को बदलें, इसमें अब बहुत देर हो गई है। इसलिए अब उन्हें बदलने का समय आ गया है। अब तक हम वास्तविकता में कम, सपनों में ज़्यादा जीते रहे। देश कैसा बनना चाहता था, हमारे प्रधानमंत्री समझ ही नहीं पाए। वे अपनी तरह का देश बनाने की ज़िद पर अड़ गए। देश ने उनके सपनों का स्वर्ग बनने से अब तक अपने को हर दिन किसी-न-किसी तरह बचाया। 
          नरेंद्र भाई दोबारा आए तो फिर नहीं मानेंगे। तब हमारी उम्मीदों का चांद नरेंद्र-निर्मित बादलों में खो जाएगा। जिन्हें यह दृश्य डरावना लगता है, वे अगर अगले डेढ़ सौ दिन उनींदे रहे तो अपना खेल ख़त्म कर लेंगे। सो, यह समय हाथ पसारे घूमने का नहीं, बाज़ुओं को आज़माने का है। यह अपनी आंखों में अपने ख़्वाब ज़िंदा रखने का समय है। अगर आज इन ख़्वाबों ने दम तोड़ दिया तो आने वाली पीढ़ियां हमारी आंखों में झांक कर कैसी ज़िंदगी देखेंगी? सवाल यह नहीं है कि भारत के प्रधानमंत्री भारत के सवालों के जवाब देते हैं या नहीं। सवाल यह है कि भारत अपने प्रधानमंत्री से अब एक-के-बाद-एक सवाल पूछता रहेगा या नहीं। जवाब आएं, आएं, न आएं; सवाल पूछते रहिए। इसलिए कि सवाल रुके तो जनतंत्र ठहर जाएगा। और, कुछ लोग हैं, जो यही तो चाहते हैं। यह लड़ाई इस बार सवाल पूछने वालों और जवाब न देने वालों के बीच है। इस लड़ाई का नतीजा तय करेगा कि सवाल उठाने की शाश्वत परंपरा मजबूत होगी या हम अनसुनी के रेगिस्तान में भटकेंगे। लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।

          मोदी का पूर्ण-विराम और भाजपा का अर्द्ध-विराम



          पंकज शर्मा

            दो दिन बाद 2019 शुरू हो जाएगा। नरेंद्र भाई मोदी के पराक्रम तले कराहती मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल 154 दिन बाकी रह जाएगा। 3 जून की सांझ ढलने के पहले 17वीं लोकसभा का गठन होना है। सो, नया साल शुरू होते ही क़रीब तीन दर्जन प्रमुख राजनीतिक दल और बीसियों ओनी-पौनी सियासी गुमटियां अपनी-अपनी जुगाड़ में लग जाएंगे। हम टुकुर-टुकुर ताकेंगे कि इस बार कौन कहां पहुंचता है।
            गोकि हरचंद कोशिश हो रही है कि अगला मुक़ाबला त्रिकोणीय हो जाए, मोटे तौर पर मत-कुरुक्षेत्र का फ़ैसला दो समूहों के बीच ही होना है। एक समूह की अगुवाई नरेंद्र मोदी अपने सियासी साजिंदे अमित शाह के साथ करेंगे। इस समूह में कोई और चेहरा दूर-दूर तक कहीं नहीं होगा। लालकृष्ण आडवाड़ी और मुरली मनोहर जोशी जैसे चेहरों की विदाई तो नरेंद्र भाई कभी की कर चुके हैं, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली जैसे चेहरों को भी उन्होंने रायसीना-पहाड़ी की प्रतिमाओं में तब्दील कर दिया है। चुनावी खलिहान में बस नरेंद्र भाई ही नरेंद्र भाई रहेंगे।
            दूसरे समूह का प्रमुख चेहरा राहुल गांधी होंगे तो सही, लेकिन उनके आसपास और भी बहुत-से चेहरे मौजूद रहेंगे। वाम दलों के अलावा शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, चंद्राबाबू नायडू, देवेगौड़ा और स्तालिन जैसे चेहरे तो राहुल के अलग-बगल दिखेंगे ही; कांग्रेस ने सहयोगी दलों से तालमेल का ज़िम्मा अगर खुद को राजनीतिक कत्थक का विशेषज्ञ समझने वाले नौसिखिए नचनियों के हवाले नहीं किया तो ममता बनर्जी, मायावती और मुलायम सिंह यादव भी राहुल की जाजम पर ही बैठे दिखाई देंगे।
            लेकिन होगा क्या? इतना तो हो गया है कि यह मिथक अब पूरी तरह टूट गया है कि नरेंद्र मोदी दस-बीस साल के लिए अजेय हैं। राहुल का पप्पूपन भी कल्पित-कथा साबित हो गया है। कांग्रेस-मुक्त भारत को संघ-प्रमुख मोहन भागवत तक ख़ामख़याली बता चुके हैं। लेकिन क्या अगले बरस की गर्मियों में नरेंद्र भाई विदा होंगे? क्या आज का कोई विपक्षी चेहरा उनकी जगह लेगा?
            2014 में नरेंद्र भाई के नगाड़े ने भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसद लोकसभा में पहुंचा दिए थे। आज वे 268 रह गए हैं। यानी भाजपा का अपने अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत अब नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष और दो नामजद सदस्यों को भी अगर भाजपा का ही हिस्सा मान लिया जाए तो भी स्पष्ट बहुमत में एक का टोटा है। भाजपा में आज दो तरह के सांसद हैं। एक, जो मोदी-मय हैं। दूसरे, जो मोदी-भय से ग्रस्त हैं। दूसरी श्रेणी के सांसदों का प्रतिशत 70 के आसपास है। सो, उनकी बात छोड़िए, मगर मोदी-मय सांसद भी मानते हैं कि अगले चुनाव में भाजपा दो सौ की संख्या पर सिमट जाएगी।
            नरेंद्र भाई के पास सहयोगी दलों के इस वक़्त 36 सांसद हैं। अगले चुनाव में वे जस-के-तस भी रहे तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन 236 के नजदीक आ कर ठहर जाएगा। शिवसेना के आज 18 सांसद हैं। अगली बार भी उनकी तादाद इसी के आसपास रहेगी। अगर उन्होंने नरेंद्र भाई की गोद में बैठने से इनकार कर दिया तो क्या होगा? अकाली दल और अपना दल भी तब कितने भरोसे के रहेंगे, कौन जाने? इसलिए इतनी इबारत तो आसमान पर अभी से साफ लिखी दिखाई देने लगी है कि नरेंद्र भाई से प्रधानमंत्री की कुर्सी पांच महीने बाद विदाई ले रही है।
            मगर नरेंद्र भाई ज़िद्दी हैं। वे प्रधानमंत्री की कुर्सी से विदाई न लेने में कोई कमी नहीं रखने वाले। वे साम-दाम-दंड-भेद के अध्येता हैं। अगला चुनाव उनके लिए सब-कुछ है। इसलिए कि अपने निर्माण में उन्होंने ऐसी मिट्टी का उपयोग किया है कि अगर वे प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे तो कुछ भी नहीं रहेंगे। अपने अमित भाई का वारिस बन कर पार्टी चलाना उन्हें सुहाएगा नहीं और उन्हें विपक्ष का नेता बनाना कइयों को भाएगा नहीं। इसलिए दोबारा प्रधानमंत्री बनने के लिए नरेंद्र भाई कुछ भी करेंगे।
            लेकिन वे कर ही क्या सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं कि वे ईवीएम का जादू जानते हैं। मगर क्या पूरा देश अब हाथ की इस सफाई को ले कर सचेत नहीं हो गया है? ऐसे में कोई कितना बड़ा इंद्रजाल रच सकता है? कुछ लोग कहते हैं कि वे सरहदों को किसी भी हद तक गरमा देने की विद्या में माहिर हैं। मगर क्या देशवासी सचमुच इतने पोंगे हैं कि ऐसा कोई भी तीर बूमरेंग न करे? कुछ लोग कहते हैं कि वे चुनाव के ऐन पहले कांग्रेस के खि़लाफ़ ऐसा भंडाफोड़ करने वाले हैं कि हाहाकार मच जाएगा। मगर साढ़े चार बरस से हर तरह की गप्पों को देख रहा देश अब भी किसी झक्कू में फंस पाएगा?
            अपनी जांच-कोतवालियों के ज़रिए अब तक नरेंद्र भाई ने कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं को अपनी मनचाही करने से रोक रखा है। लेकिन जिस दिन अगले लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाएगी, उस रात सब की रूहों को आज़ाद होने से कौन रोकेगा? कसमसाहट अपने अंतिम मुक़ाम पर तो कब की पहुंच चुकी है। सुनने में भले अजीब लगे, मगर भीतर का सच यही है कि मुलायम और मायावती ही नहीं, नवीन पटनायक तक भी सिर्फ़ मौक़े भर का ही तो इंतज़ार कर रहे हैं।
            पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के जनादेश ने लोकसभा चुनाव की एक नई बिसात बिछा दी है। तीन प्रदेशों में अपने मुख्यमंत्री बनाने, मंत्री तय करने और उनके बीच महकमे बांटने के काम में अगर कांग्रेस ने ज़रा गरिमा से काम लिया होता तो और बेहतर होता, लेकिन बावजूद इस सब के भाजपा की आगे की राह तो जितनी ऊबड़-खाबड़ हो गई है, हो ही गई है। नरेंद्र भाई के फावड़े और अमित भाई की तगाड़ी अब उसे इसलिए समतल नहीं कर सकती है कि उसे पोला बनाने में इन दोनों के योगदान की चालीसा तो खुद भाजपा के लोग ही जप रहे हैं। मोदी-सरकार के संसद में अब तक दिए गए 4505 आश्वासनों की कथा केंद्रीय कक्ष में गूंज रही है। नरेंद्र भाई के दिखाए ख़्वाब अपने तकिए के नीचे रखे सो रहे मुल्क़ ने अपनी आंखें मसलनी शुरू कर दी हैं। अगले चार महीनों में अंगड़ाइयां ले-ले कर जब वह पूरी तरह खड़ा हो जाएगा तो, बात मानिए, आप उसे पहचान ही नहीं पाएंगे।
            इसलिए नरेंद्र भाई के वानप्रस्थ की दहलीज़ हर दिन नज़दीक आती जा रही है। असमानता, असंयम, असहिष्णुता, अन्याय और उत्पीड़न के जिस झंझावात से भारत 2014 के बाद गुज़रा है, उसने नरेंद्र भाई की असंदिग्ध प्रथम पुरुष की छवि को अधमरा कर दिया है। मैं मानता हूं कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की तलाश में 17वीं लोकसभा की तरफ बढ़ते भारत के पिटारे से निकलने वाला नतीजा हम सब की आंखें चुंधिया देने वाला होगा। क्रूर समय में ज़मीन से आसमान तक एक गूंगापन तन जाता है। दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। सो, दुनिया के इतिहास में ऐसा भी पहली बार नहीं होगा कि हम सब इस गूंगेपन से निकलने वाली कानफाड़ू चीख भी जल्दी ही सुनेंगे। मनमौजी और हेकड़ीबाज़ शासकों के कर्म उन्हें ध्वस्त करने के लिए खुद ही काफी होते हैं। सो, महागठबंधन आकार ले, न ले, नरेंद्र भाई के पूर्ण-विराम और भाजपा के अर्द्ध-विराम की घड़ी अब आ गई है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

            कमलनाथ, गहलोत और बघेल का कर्मयोग



            पंकज शर्मा

              मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें अगर इस बार न बनतीं और तेलंगाना और मिजोरम में लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को दूर से ही प्रणाम न कर दिया होता तो और जो भी होता, सो, होता, हमारे हरफ़नमौला प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी और भाजपा के कंपनी-बहादुर अमित भाई शाह का भारतीय मतदाता के भेड़-पन पर भरोसा और पुख़्ता हो जाता। इसलिए पांच राज्यों में टूटी भेड़-चाल ने सब से बड़ा काम यह किया है कि सियासी-हेकड़ी के बांस उलटे लाद दिए हैं।
              लेकिन देश के हृदय-प्रदेशों में अपने सिर पर बंध गई पगड़ियों को ले कर कमलनाथ, अशोक गहलोत और भूपेश बघेल के लिए यह समय फूले-फूले फिरने का नहीं है। मतदाता कांग्रेस के माथे पर साफा बांधने के लिए नहीं, भाजपा के सिर से साफा उतारने के लिए अपने घरों से निकले थे। इसलिए यह वोट कमलनाथ, गहलोत या बघेल के लिए नहीं था। नरेंद्र भाई की धमकाऊ-मुद्रा से गुस्साए मतदाता का यह वोट उन राहुल गांधी की तरफ मुड़ा है, जो तमाम मखौल, अवहेलना और अपमान झेल कर भी नीलकंठी-मुद्रा में पिछले एक-दो बरस से सियासी-पानीपत में अविचल डटे रहे। 
              कमलनाथ, गहलोत और बघेल की ताजपोशी तो उनकी भाग्य-कुंडलियों में लिखे राज-योग का नतीजा है। तीनों के असली कर्म-योग के आकलन की अंतरदशाएं तो अब शुरू हुई हैं।
              मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की 520 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 281 मिल गई हैं। पांच साल पहले हुए चुनावों में कांग्रेस को सिर्फ़ 117 सीटें मिली थीं। यानी इस बार 164 सीटों का इजाफ़ा हुआ है। जिस दौर में राजनीतिक विश्लेषकों की ‘चेतन भगतीय मंडली’ राहुल गांधी की कांग्रेस का मर्सिया पढ़़ने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही थी, उस दौर में मतदाताओं के थप्पड़ ने सियासी-आसमान गुंजा दिया है। देश की सवा 18 करोड़ की आबादी वाले तीन प्रदेशों में कांग्रेस के हाथ की छाप ने भाजपा के छक्के छुड़ा दिए हैं। भारत के 14 फ़ीसदी लोग मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में रहते हैं और देश के कुल मतदाताओं का भी 14 प्रतिशत इन राज्यों में है। इसलिए कांग्रेस के पुनर्जीवन का यह आरंभ मामूली नहीं है। 
              मगर एक तथ्य और भी है। इन तीन प्रदेशों में मौजूद लोकसभा की 65 सीटों में से अभी सिर्फ़ 6 कांग्रेस के पास हैं। बाकी 59 भाजपा की मुट्ठी में हैं। चार महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में अगर कमलनाथ, गहलोत और बघेल मिल कर कांग्रेसी सीटों का आंकड़ा अगर 50 तक नहीं छुआ पाए तो उनके कर्मयोगी होने पर सवाल खड़े होंगे। तीनों प्रदेशों में विधानसभा चुनावों के नतीजों का लोकसभा में सीधा अंकगणतीय अनुवाद कांग्रेस को 35 सीटें तो अपने आप दिला रहा है। बाकी तीनों मुख्यमंत्रियों की निजी कार्यशैली, उनके प्रशासनिक अमले के तौर-तरीकों और सरकारी सिंहासनों पर अब जमने वाले लोगों का कांग्रेस की पैदल-सेना के साथ व्यवहार से तय होगा। सत्ता की जन्म-घुट्टी में अपनों की अवहेलना का मूल-सत्व मौजूद रहता है। इस सत्व की वंश-वृद्धि पर नियंत्रण रखने वाला ही सियासी लहरों पर लंबे समय राज करता है। कमलनाथ और गहलोत के राजनीतिक-प्रशासनिक प्रबंधन को दशकों से देखने के बाद मैं तो आश्वस्त हूं कि मध्यप्रदेश और राजस्थाऩ में चुस्ती और स्फूर्ति के नए अध्याय लिखे जाएंगे। छत्तीसगढ़ में भारी जीत की खुमारी से अपनों को बचाए रखना फ़िलहाल बघेल की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होगी। 
              आने वाली गर्मियों की तैयारी करते वक़्त तीनों प्रदेशों को ताजा विधानसभा चुनावों से टपके कुछ और तथ्यों को अपने गले उतारना होगा। मध्यप्रदेश में विधानसभा की 25 सीटें कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी की वजह से हारी है। 6 सीटें कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के कारण गंवाई हैं। 6 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी ने कांग्रेस को पीछे किया है। 8 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहां अगर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी न होती तो कांग्रेस और अच्छे मतों से जीतती। इन 45 सीटों के समीकरण पांच-छह लोकसभा सीटों के लिए मायने रखेंगे।
              राजस्थान में कांग्रेस 14 सीटें तो निर्दलीय प्रत्याशियों के कारण ही हार गई। बसपा की वजह से भी उसे 9 सीटें खोनी पड़ीं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने भी 16 सीटों पर जीत का अंतर प्रभावित किया। 39 सीटों का यह गणित अगले साल अप्रैल-मई में पांच लोकसभा सीटों को प्रभावित करेगा। छत्तीसगढ़ में जोगी-बसपा की जुगलबंदी ने हालांकि भाजपा को ज़्यादा नुकसान पहुंचाया है, मगर 9 सीटों पर कांग्रेस की हार में भी उसकी भूमिका रही है। ऐसे में बघेल को अभी से दिन-रात एक करने होंगे।
              मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ग़रीब मतदाता कांग्रेस की तरफ तेज़ी से मुड़ा है। दलितों ने भाजपा को सिरे से नकारा है। भाजपा का आदिवासी आधार भी भरभरा कर गिर गया है। बावजूद इसके कांग्रेस को अभी बहुत पसीना बहाना है। 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी एक-एक सीट पर जीत के लिए अपना सब-कुछ दांव पर लगा रहे होंगे तो कांग्रेस को भी उनकी विदाई के लिए सब-कुछ झोंक देना होगा। लोकसभा के चुनावों तक कांग्रेस को अपनी स्थिति इन तीन प्रदेशों में अभी बहुत मजबूत करनी होगी। अगर आज की स्थिति ही बनी रही तो मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा को मतों का बराबर-बराबर प्रतिशत ही मिलेगा। राजस्थान में उसे मिलने वाले मतों का प्रतिशत भाजपा से कम रहेगा। छत्तीसगढ़ में ज़रूर कांग्रेस का मत-प्रतिशत भाजपा से ज़्यादा रहेगा।
              विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस की शिराओं को नए सिरे से तरंगित तो कर दिया है, लेकिन यह तरंग लोकसभा चुनाव तक, न सिर्फ़ बनी रहनी ज़रूरी है, बल्कि बढ़ती रहनी ज़रूरी है। यह आसान नहीं है। ठीक है कि लोग नरेंद्र मोदी के खोखले ज़ुमलों से ऊब गए हैं, ठीक है कि बेरोज़गारी, नोटबंदी और चौपट अर्थव्यवस्था को ले कर लोगों में गुस्सा है; मगर कांग्रेस को भी अभी उस दहलीज़ तक पहुंचना है, जहां से उसके घुड़सवार संसद की तरफ कूच करें। मतदाताओं में सरकार बदलने की चाहत तो है, लेकिन इसे जुनून में बदल कर ही दिल्ली की दूरी कम की जा सकती है।
              कमलनाथ, गहलोत और बघेल के सामने असली चुनौती अपने राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोगी चुनने की है। राजनीतिक हमजोलियों का चयन तो कई स्तर की संतुलन-चक्की से हो कर गुजरता है, इसलिए उसमें ग़लतियां होने की गुंज़ाइश कम हो जाती है। मगर अफ़सरशाही के जाल-बट्टे और घेरेबंदी से बचना राजनीतिक खलीफ़ाओं के लिए भी आसान नहीं होता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पंद्रह-पंद्रह बरस से जड़ें जमा चुकी प्रशासनिक-धड़ेबाज़ी की सुरंग से कमलनाथ और बघेल को गुजरता देखना दिलचस्प होगा। राजस्थान में हर पांचवे बरस वेशभूषा बदल कर सामने आ जाने वाले नौकरशाहों से खो-खो खेलते गहलोत को देखना भी उतना ही मजे़दार रहेगा। अगर अपने शुरुआती चयन में तीनों राज्यों के सूबेदार गच्चा खा गए तो उनके राज्यों पर तो साढ़े साती लगेगी ही, कांग्रेस की भावी संभावनाएं भी अपने पैरों में काले घोड़े की नाल ठुकवाए बिना बेहतर नहीं हो पाएंगी। मैं मानता हूं कि तीनों प्रदेशों के सूबेदार इतने घुटे हुए तो हैं ही कि नौकरशाही की रासमंडली का नृत्य-संयोजन करते वक़्त झपकी लेने का जोखिम नहीं उठाएंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

              Sunday, December 16, 2018

              ऐरावत पर बैठे राहुल की जिम्मेदारियां



              पंकज शर्मा

                विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से एक पखवाड़े पहले, 24 नवंबर को, अपने इस स्तंभ में मैं ने लिखा था कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा की 679 सीटों में से इस बार भारतीय जनता पार्टी 200 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी। वही हुआ। मैं ने यह भी लिखा था कि इस हालात में जब अगले बरस आम-चुनाव होंगे तो इन पांच राज्यों में मौजूद लोकसभा की 83 सीटों में से भाजपा 20 भी हासिल करने के लिए ऐड़ियां रगड़ रही होगी। चार महीने बाद सियासी-परदे पर यह दृष्य देखने के लिए भी आप तैयार रहिए। चुनावों नतीजों का ऐरावत दिल्ली की तरफ़ चल दिया है।
                पांच राज्यों की चुनाव-टोपी से बाहर निकले खरगोश का आकलन सब अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं। लेकिन अगर कोई यह सोच रहा हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी और भाजपा-अध्यक्ष अमित भाई शाह ने युद्ध के नियमों का पालन करने में अपनी जी-जान झोंक रखी थी तो वह ग़लत है। भाजपा-शासित राज्यों को अपनी ही गठरी में बांधे रखने के लिए सूबेदारों ने सब-कुछ किया। ईवीएम जगह-जगह अपना खेल दिखाती रहीं। प्रशासनिक अमले ने अपने सियासी-आकाओं के इशारे पर चित-पट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चुनावी डांस-बार में बरसते भाजपा के नोटों ने नोटबंदी की धज्जियां बिखेर दीं। चुनावी भाषणों के ज़रिए मोदी-शाह की भट्टी ने आग की वे लपटें लपकाईं, जो सामाजिक सद्भाव को लील लेने और निजी दामनों को अमिट धब्बों से सान देने का माद्दा रखती हैं।
                ये नतीजे इस सब के बावजूद आए हैं कि पांच में से तीन राज्यों में भाजपा की सरकारें लौट नहीं पाईं। बाकी दो राज्यों में उसकी उपस्थिति दूर-दूर तक है नहीं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मत-कुरुक्षेत्र में भाजपा के पचासों मंत्री टपटप गिर गए। ऐसे-ऐसे दिग्गज हारे कि मोदी-शाह को बहुत दिनों तक अपनी ठोड़ी खुजानी पड़ेगी। अपने को सामाजिक ताने-बाने बुनने-बिगाड़ने में माहिर मानने वाली भाजपा की सारी अभियांत्रिकी इन चुनावों में धरी रह गई। देश की हृदयस्थली के तीन प्रदेशों के आदिवासी इलाक़ों में संघ के स्वयंसेवकों ने पिछले कई बरस तरह-तरह के पापड़ बेल कर भाजपा की जड़ें जमाई थीं। इस चुनाव के मट्ठे में वे आधी से ज्यादा साफ़ हो गईं। मध्यप्रदेश के घनघोर आदिवासी इलाक़े धार-झाबुआ-अलीराजपुर में तो मोदी-शाह-योगी की जनसभाओं के बावजूद 12 में से 10 सीटों पर भाजपा हार गई। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों ने भी भाजपा को सिरे से नकार दिया।
                देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों के गाल भाजपा के तमाचों से वैसे ही इतने लाल हो चुके थे कि विधानसभाओं के इस चुनाव पर उसका असर न दिखता तो ताज्जुब होता। मुस्लिम-समुदाय से संगम की भाजपा की दिखावटी ख़्वाहिश भी इतनी बदनाम हो चुकी है कि उसे तीन बार ‘नहीं, नहीं, नहीं’ का जवाब इस बार की चुनावी-राधा से मिलना ही था। छत्तीसगढ़ में भाजपा ने एक भी मुस्लिम को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया था, लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान में उसने एक-एक मुस्लिम प्रत्याशी उतारने की उदारता दिखाई थी। दोनों ही हार गए। अब तक माना जाता था कि भाजपा मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाने से बचती है। अब हालात यह हो गए हैं कि मुस्लिम भाजपा का उम्मीदवार बनने से बचेंगे। 2019 में वे उसे ढूंढे नहीं मिलेंगे।
                मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के नतीजों को शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे से असंतोष का प्रतिफल भर मानने की चालाकी दिखा रहे भाजपाइयों को ईश्वर सद्बुद्धि दे। ये नतीजे नरेंद्र भाई और अमित भाई की दोहरी-हेकड़ी का अस्वीकार हैं। ये देश के बुनियादी संस्थानों पर कब्जे और उनके दुरुपयोग की अस्वीकृति हैं। ये नोटबंदी की तालठोकू नामंजूरी हैं। ये जीएसटी लागू करने के तरीके को ठेंगा हैं। ये राष्ट्रवाद की संघी-परिभाषा का नकार हैं। ये हिंदुत्व को अपनी सियासत का हथियार बनाने की करतूत के खि़लाफ़ फ़ैसला हैं। ये नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं को हथेली-पर-हथेली मार कर असहमतियों की खिल्ली उड़ाने वाला प्रधानमंत्री नहीं चाहिए। ये नतीजे बताते हैं कि उन्हें जनसभाओं में ‘ओए-ओए’ चिल्ला कर अपनी फूहड़ अक्खड़ता दिखाने वाला भाजपा-अध्यक्ष नहीं चाहिए।
                ये नतीजे यह भी साफ़ करते हैं कि राजस्थान के सिंहासन पर ऐंठ कर बैठने वालों-वालियों को वहां के लोग बरदाश्त नहीं करते। इन नतीजों से यह भी साफ होता है कि मामा बन कर घूमने से ही मध्यप्रदेश पर कोई राज नहीं कर सकता। ये नतीजे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के छत्तीसों गढ़ों में राजा नहीं, प्रजा अंतिम फ़ैसला करती है। तीन प्रदेशों से आई हवा के संकेत हैं कि हद दर्ज़े के कुराज, हर हद पार कर गए भ्रष्टाचार और बुनियादी मुद्दों की अवहेलना से उपजा गुस्सा न तो किसी हेकड़ हुक्मरान के डर से दबता है और न किसी विनम्र देहभाषा-धारी के झक्कू से। यही वजह है कि वसुंधरा को भी मतदाताओं ने ठिकाने लगा दिया और षिवराज सिंह-रमन सिंह को भी नहीं बख्शा। ऐसे में जब देश की बारी आएगी तो मतदाता मोदी-शाह को कैसे छोड़ देंगे?
                इसीलिए राहुल गांधी ने कहा है कि उन्होंने नरेंद्र भाई से यह सीखा है कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए। सीख का यह ताबीज़ अपनी बांह पर बांध कर राहुल ने वह कवच धारण कर लिया है, जो उन्हें हर चक्रव्यूह-भेदन में सुरक्षित रखेगा। विधानसभाओं के चुनाव नतीजों ने राहुल की ज़िम्मेदारियां और बढ़ा दी हैं। उन्हें अपने अगलियों-बगलियों को विजयी-भंगेड़ी बनने से रोकना होगा। राहुल को अपने कनखजूरों के चंगुल से और तेज़ी से बाहर आना होगा। उन्हें अपनी व्यवस्था को कारकूनी और दरबानी प्रवृत्ति से मुक्त करना होगा। सपने बिखरने से बेतरह आहत लोगों के भाजपा-नकार को कांग्रेस की सकारात्मक शक्ति बनाने का काम शुरू करने का असली वक़्त तो राहुल के लिए अब आया है। यह चुनाव नतीजा सरकारें तो बनवा देगा, मगर पार्टी का बुनियादी संगठन तो राहुल को खुद ही बनाना होगा। यह व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के रथ पर सवार, अपने क्षुद्र स्वार्थ साधने की ताक में लगे और आसपास घेरा डाले बैठे नचनियों के भरोसे नहीं होगा। मोदी-शाह से जनतंत्र को मुक्त कराने के लिए 2019 में जो संग्राम राहुल को लड़ना है, उसके घुड़सवारों के चयन पर ही सारा दारामेदार है।
                राजस्थानी झंझावात इतनी धूल न उड़ाता तो कांग्रेस की इस जीत से ज़्यादा गरिमामयी धुन बिखरती। बावजूद इसके राहुल ने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के चयन में अपना राजनीतिक-कौशल दिखाया। चुनाव नतीजों से उपजी तात्कालिक ऊर्जा को वे कांग्रेस के दीर्घकालीन हित में ठीक से प्रवाहित करने में क़ामयाब रहे। आने वाले दिनों में उन्हें और भी ऊबड़-खाबड़ राह पर चलना है। कांग्रेस के संगठन की राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से संरचना करनी है और प्रदेशों में संगठन को नए चेहरे देने हैं। आम-चुनाव के लिए उम्मीदवारों को चुनते वक़्त नेताओं की आपसी खींचतान को संतुलित करना है। नरेंद्र भाई और अमित भाई 2019 का मैदान किसी के भी लिए ऐसे ही खाली नहीं छोड़ देंगे। इसलिए राहुल को अभी उनके गढ़े और लगातार तीखे होने वाले हर हमले का सामना भी करना है। यह काम सिर्फ़ सियासी-बिलबोर्ड के सितारे बन बैठे चेहरों के भरोसे नहीं होगा। इसके लिए तो ऐसा म्यूज़िक-बैंड बनाना होगा, जिसे भारत के असली लोकगीतों की समझ हो। मैं समझता हूं कि पिछले साढ़े चार साल ने राहुल में इतनी समझ उंड़ेल दी है कि अगले साढ़े चार महीने वे अपना हर क़दम फूंक-फूंक कर रखेंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

                Saturday, December 8, 2018

                सामाजिक बोध के सूर्योदय का समय



                पंकज शर्मा

                  नरेंद्र भाई मोदी ने केंद्र की सरकार संभालने के बाद अपने प्रचार पर सरकारी ख़जाने से 50 अरब रुपए खर्च कर डाले हैं। इतना पैसा हमारे देश में ग़रीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों की एक हफ़्ते की ज़रूरतें पूरी करने को काफी था। भारत में 28 करोड़ लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे अपना जीवन गुज़ार रहे हैं। 32 रुपए रोज़ पर ज़िंदगी बसर करने वालों को ग़रीबी-रेखा से भी नीचे माना गया है। कुछ को लगता होगा कि इन अति-ग़रीबों को पांच बरस में पांच-सात दिन भी चैन के मिल जाते तो उनकी आत्मा प्रसन्न होती। लेकिन फिर जंगल में नाच रहे उपलब्धियों के मोर को आप कैसे देख पाते? 
                  कइयों को ऐतराज़ है कि अपने किए-कराए के महिमा-मंडन पर नरेंद्र भई ने खर्च के सभी पुराने कीर्तिमान भंग कर दिए हैं। सो भी मामूली फ़र्क़ से नहीं, पूरी दुगनी छलांग लगा कर। ऐसा प्रचार-प्रिय प्रधानमंत्री भारत की प्रजा ने पहले कभी नहीं देखा था। सरकार ने तो नरेंद्र भाई के ढोल-तमाशे पर जो खर्च किया, सो किया ही; उनकी भारतीय जनता पार्टी ने भी उनका नगाड़ा बजाने में सब को दसियों कोस पीछे छोड़ दिया। आंकड़े कहते हैं कि नवंबर के महीने में तमाम प्रचार माध्यमों पर सब से ज़्यादा विज्ञापन भाजपा के थे। इतने कि अगली दस सीढ़ियों तक कोई और राजनीतिक दल खड़ा दिखाई नहीं दिया। और-तो-और, देश-दुनिया का कोई व्यवसायिक-उत्पाद भी भाजपा से होड़ नहीं ले पाया। हिंदुस्तान लीवर, सैमसंग, अमेजन और रामदेव का पतंजलि तक विज्ञापन देने के मुकाबले में भजपा से मीलों पीछे रह गए। पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में भाजपा ने टेलीविजन के बड़े-छोटे परदों पर, अख़बारों के पन्नों पर, राजमार्गों के होर्डिंग पर और डिजिटल-संसार की आभासी वैतरिणी पर सिक्के बरसाने में अपनी फ़राखदिली का चरम प्रदर्शन किया।
                  जब ख़ुदा मेहरबान हो तो किसी को भी पहलवानी करने से कौन रोक सकता है? केंद्र की सरकार संभालने के बाद से भाजपा के ख़जाने की तरफ़ बह रही दान की रक़म ने भी बाकी सभी राजनीतिक दलों को बहुत पीछे खदेड़ रखा है। दूसरों को एक रुपए का दान मिलता है तो भाजपा को दस रुपए का। पुण्याई भले ही कमज़ोर को दान देने में मानी जाती हो, सियासत में दान उन्हें नहीं मिलता, जो कटोरा ले कर खड़े हों; ताल ठोकने वालों को मिलता है। अब आप भले ही कहते रहें कि ताल ठोक कर तो उगाही की जाती है, भिक्षा तो कटोरा ले कर ही मांगी जाती है। लेकिन जब दानवीर ऐसे हों, जिनकी अंटी दया और करुणा से भीग कर ढीली होने के बजाय लाल-लाल आंखें देख कर गांठहीन होती हो तो आप-हम कर भी क्या लेंगे?
                  नोटबंदी से बिलबिला रहे देश में, गिरती जीडीपी से कराह रहे देश में, बढ़ती बेरोज़गारी से माथा पीट रहे देश में और चौपट होते उद्योग-धंधों से कंपकंपा रहे देश में एक राजनीतिक दल के गालों का गुलाबीपन देख कर मेरे तो होश उड़े हुए हैं। मेरी समझ में ही नहीं आ रहा कि आखि़र वह कौन चित्रकार है, जो अपनी रचना में ऐसा चमत्कार भर सकता है कि एक घर के बाकी कमरे तो सीलन भरे हों और उनमें पड़े लोग दम तोड़ रहे हों और एक कमरा ऐसा हो, जिसकी दीवारों से इतना ऐश्वर्य टपक रहा हो कि उसके रहवासी गले-गले तक गच्च हों! नरेंद्र भाई के भीतर मौजूद इस चित्रकार के इस चमत्कार को देखने के बाद मेरे हाथ तो अब अपने-अपनों के लिए कोई दुआ मांगने के लिए उठने से भी इनकार कर चुके हैं।
                  हमारी सेना को तोपखाने के साज-सामान की ख़रीदी के लिए सौ अरब रुपए चाहिए। लेकिन सेना प्रतीक्षालय में बैठी है और नरेंद्र भाई के गुणगान पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। सेना को हैलीकाप्टर ख़रीदने के लिए साठ अरब रुपए चाहिए। वह प्रतीक्षालय में बैठी है और नरेंद्र भाई की जलवा-बखानी पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। एंटी-टैंक मिसाइलों की ख़रीद के लिए सेना तीस अरब रुपए मांगती रही और नरेंद्र भाई की मुंह-दिखाई पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। राइफलें ख़रीदने के लिए सेना तरस रही है और नरेंद्र भाई की रंगाई-पुताई पर पचास अरब रुपए खर्च हो गए। सरकारी प्राथमिकताओं का ऐसा नज़ारा आप ने पहले कभी देखा था?
                  अपने सवा सौ करोड़ देशवासियों पर गर्व करते प्रधानमंत्री को देख कर मुझे भी गर्व होता है। वे मुझ पर गर्व करते हैं, मैं उन पर गर्व करता हूं। हम दोनों मिल कर उस भारत पर गर्व करते हैं, जो 70 बरस की भटकन के बाद अब जा कर संभला है। पांच साल में अगर नरेंद्र भाई ने इस देश के लालन-पालन में रातों की नींद न गंवाई होती तो क्या आज हम यहां होते? सो, अगर उन्होंने अपने कर्म-गृह की दीवारों पर लिखी इबारत को रोशनी से नहलाने में पचास अरब रुपए बहा दिए तो कौन-सा गुनाह कर डाला? आप तो उनकी पीठ थपथपाएंगे नहीं और उन्हें भी खुद की पीठ नहीं थपथपाने देंगे! यह क्या बात हुई? मैं तो मानता हूं कि लोकतंत्र में एक निर्वाचित प्रधानमंत्री का मूल कर्तव्य ही यह है कि जब लोगों को कुछ दिखाई न दे रहा हो तो वह उनकी आंखों में अपनी सारी उंगलियां डाल कर यह दिखाए कि उसके चलते देश चल कर कहां आ गया है।
                  ‘श्रद्धा भाव लभते ज्ञानम’। गीता ने हमें बताया है कि जिसके अंतःकरण में श्रद्धा है, उसे आत्मज्ञान सहजता से हो जाता है। लेकिन कलियुग में लोग किसी के भी प्रति श्रद्धा कहां रखते हैं? फिर चाहे वह नरेंद्र भाई जैसा परोपकारी और पराक्रमी प्रधानमंत्री ही क्यों न हो! जब हमें ऐसे प्रधानमंत्री देखने की आदत ही नहीं है तो हुकूमत तो श्रद्धालुओं के निर्माण का अपना फ़र्ज़ पूरा करेगी ही। जनहित के ऐस कार्यों पर पचास अरब रुपए जैसी तुच्छ रकम खर्च करने पर जिन्हें दीदे बहाने हों, बहाएं। वैसे भी साथ तो कुछ जाता नहीं, सब यही धरा रह जाने वाला है।
                  यह सियासी-हवस के अभूतपूर्व पोषण का समय है। यह भारतीय राज्य-व्यवस्था के रूपांतरण का संक्रमण-काल है। यह जनतंत्र के घंटाघर की सुइयों को अपने-अपने इशारे पर टिक-टिक करने को मजबूर करने का दौर है। इस समय-चक्र से फूटने वाला लावा क्या-क्या जलाएगा, पता नहीं। इससे उड़ने वाली राख की परतें क्या-क्या धूसर करेंगी, कौन जाने! सिर्फ़ इतना मालूम है कि हमें सपना देखते हुए नहीं मरना है। हमें नींद में नहीं मरना है। हमें डर कर नहीं मरना है। हमें रोज़-रोज़ नहीं मरना है। अगर यह समय मुनादी और नगाड़ेबाज़ी का है तो हम ही बिना मुनादी के क्यों मर जाएं? हम ही बिना अपना नगाड़ा बजाए रुख़सत क्यों हों? जन-मुक्ति के योद्धा क्या आसमान से उतरेंगे? उन्हें तो इन्हीं गली-मुहल्लों से निकलना होगा। इसलिए मैं तो मानता हूं कि यह समय जैसा भी है, सब के लिए है। सामाजिक-बोध का सूरज भी इसी दौर से निकलेगा। आपको दे रही है कि नहीं, मालूम नहीं, मुझे तो इसकी आहट सुनाई दे रही है। ( लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

                  सूंड में चींटी के प्रवेश का जीवंत नज़ारा



                  पंकज शर्मा

                    छह महीने में हुआ राहुल गांधी का रूपांतरण कुछ लोगों के लिए कल्पनातीत है। लेकिन पिछले कम-से-कम आठ साल से, और ख़ासकर पिछले साढ़े चार साल में, मैं ने बार-बार लिखा कि एक दिन आएगा कि राहुल गांधी सब को आंखें फाड़ कर उनकी तरफ़ देखने को मज़बूर कर देंगे। आज उन्हें देख कर सब अपनी आंखें मसल रहे हैं। उनके सियासी-विरोधी हक्काबक्का हैं। हर रोज़ फ़तवा जारी करने वाले मीडिया-पंडे चारों खाने चित्त हैं। कांग्रेस का वह तबका सुट्ट बैठा है, जिसने राहुल-राज की आंगनवाड़ी शुरू होते ही लोकसभा में 44 पर पहुंच गए आंकड़े के बाद अपनी पार्टी के पिंडदान का ऐलान कर दिया था।
                    एक-एक डग भर कर राहुल आखिर अपनी संभावनाओं के उस मानसरोवर तक पहुंच ही गए, जिसके अभिमंत्रित जल के छिड़काव ने उनके बारे में तो देश की राय बदल ही दी है, हमारे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी की चालीसा के छंद भी नए सिरे से लिख दिए हैं। सब को च्यूंटी में मसल देने का पराक्रम दिखा रहे हाथी की सूंड में अंततः चींटी के घुस जाने का यह दृश्य भारतीय जनतंत्र के अब तक के इतिहास का सब से जीवंत नज़ारा है। 
                    पांच प्रदेशों के लिए हो रहे विधानसभा चुनावों में दिखे राहुल के जज़्बे ने कांग्रेस की शिराओं में नई घुट्टी घोल दी है। नरेंद्र भाई की कनखियों के इशारे पर अमित भाई शाह के हस्ताक्षरों से चल रही भारतीय जनता पार्टी की नसें ढीली पड़ गई हैं। हथेली पर हथेली मार कर दूसरों की खिल्ली उड़ाने वाली जुगल-जोड़ी अपनी फ़ज़ीहत का अट्टहास दिनों-दिन नज़दीक आता देख रही है। पूरे दस दिन बाद ईवीएम से पांच राज्यों में जो घर्घर नाद सुनाई देगा, वह अगर अगले साल अप्रैल-मई का क़ौमी-तराना बन गया तो नरेंद्र भाई झोला ले कर अपने घर जा रहे होंगे।
                    सियासत के ये बांस उलटे लदने ऐसे ही शुरू नहीं हो गए हैं। मैं जानता हूं कि मेरा यह कहना कइयों को नागवार गुज़रेगा कि अगर राहुल गांधी न होते तो चार बरस बीतते-बीतते नरेंद्र भाई का वापसी-सफ़र शुरू नहीं हो पाता। राहुल का सब से बड़ा योगदान यह है कि वे डटे रहे। वे डिगे नहीं। न परायों के मखौल की उन्होंने परवाह की और न अपनों की अवहेलना से वे विचलित हुए। इसलिए आज कांग्रेस की प्राण-प्रतिष्ठा का श्रेय अगर सोनिया गांधी के बाद किसी को है तो राहुल गांधी को। उनकी इस कुव्वत पर ज़्यादातर को भरोसा नहीं था। मगर अपनी बेलौसी और बेबाकी से राहुल ने यह कर दिखाया। 
                    मैं यह मान कर चल रहा हूं कि विधानसभाओं के आने वाले नतीजे कांग्रेस को पुनर्स्थापित करेंगे। मैं यह भी मान कर चल रहा हूं कि लोकसभा के चुनावों में केंद्र में कांग्रेस-समर्थित सरकार बनने जा रही है। राहुल अभी प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं, इससे बड़ा सवाल दूसरा है। सवाल यह है कि कांग्रेस की जड़ों को सींचने का काम वे आगे कैसे करेंगे! मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से भाजपा की विदाई हो रही है या वहां कांग्रेस की वापसी हो रही है? तैलंगाना में भाजपा के सहयोगी दल के दिन पूरे हो रहे हैं या कांग्रेस के दिन वापस आ रहे हैं? कांग्रेस आ रही है, लेकिन उससे ज़्यादा तेज़ी से भाजपा दिलों से उतरती जा रही है। आने वाले दिनों में राहुल को कांग्रेसी खेत में हल उससे भी ज़्यादा शिद्दत से चलाना होगा, जितनी निष्ठा से उन्होंने इन दिनों ‘चौकीदार’ का नक़ाब नोच कर उसे लाइन-हाज़िर करने की मुहिम चला रखी है।
                    सांगठनिक सियासत की शुरुआती भूलों के अहसास ने राहुल की परिपक्वता में आमूल-चूल बदलाव ला दिया है। विधानसभाओं के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया में इस बार जिसके पास लाठी थी, भैंस उसी की नहीं हो पाई। उम्मीदवारी की एक चौथाई रेवड़ियां जिस पार्टी में आंखें बंद कर अपने-अपनों में बांट देने का बिचौलिया-दस्तूर था, उसमें अगर इस बार चंद मामलों को छोड़ कर टिकट ठीक लोगों को मिल गए तो इसका सेहरा राहुल के सिर पर बांधने में कंजूसी मत बरतिए। उन्होंने दृढ़ता से काम न लिया होता तो सेंधमार तो हमेशा की तरह अपनी बिसात बिछाने में लगे ही हुए थे। 
                    बावजूद इसके, मैं यह कहने का जोख़िम लेने को तैयार हूं कि राहुल को अपने बगलगीरों की उठाईगीरी पर काबू पाने की ज़रूरत आने वाले दिनों में और भी ज़्यादा पड़ेगी। चुनावी कुरुक्षेत्र में तो कांग्रेस का रथ अब रफ़्तार पकड़ चुका है। मगर चुनावी कामयाबी और सांगठनिक मज़बूती दो अलग-अलग चीज़ें हैं। केंद्र में अपनी सरकार के दस बरस अगर हाथ मल-मल कर कुर्सी ताप रहे ‘साहबों’ ने कांग्रेस की जड़ें जमाने में भी लगाए होते तो मोदी-लहर के छद्म ने उनके ऐसे चिथड़े न उड़ाए होते। सो, अब, जब कांग्रेस सिंहासन पर वापसी की दिशा में चल पड़ी है, राहुल को कांग्रेसी पेड़ की फुनगियों पर बैठ कुहू-कुहू करती फ़ाख़्ताओं से ज़्यादा भरोसा उन पर करना होगा, जो ईंट-ईंट पर ईमान उकेरे बैठे हैं। 
                    अंधियारे इसलिए टलने लगे हैं कि लोग कांग्रेस की राह में अपनी दुआओं के दीप जला रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो जनतंत्र के प्रतिमान देखने की हसरत लिए ज़िंदा हैं। ये वे लोग हैं, जिनका तन मीरा और मन कबीर है। इसलिए उनका कभी कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया। ये वे लोग हैं, जो क्षेत्र, जाति और मज़हब के लम्बरदारों पर बिफ़रे बिना रह ही नहीं सकते। ये वे लोग हैं, जिनका जन्म सिर्फ़ फूल बरसाने के लिए खड़े रहने को हुआ ही नहीं है। ये वे लोग हैं, जो अपने सपनों को बुनने जितनी डोर कहीं से भी ले ही आते हैं। कांग्रेस का भाग्य है कि इन लोगों का साथ उसे मिल रहा है। लेकिन कांग्रेस का सौभाग्य तब होगा, जब वह इस साथ की चिरंतनता बनाए रखने की तरीक़े पर अमल करेगी।
                    राजा के कर्तव्यों और अमात्यों के गुणों को महाभारत में बहुत विस्तार से समझाया गया है। रामायण में भी राज्य-व्यवस्था के लिए ज़रूरी संस्कारों की अनगिनत गठरियां हैं। हमारे पुरातन-ग्रंथों ने हमें समझाया है कि किसी भी शासन व्यवस्था का मुख्य घटक मनुष्य है। सिर्फ़ वही राजकाज का प्राणवान संसाधन है। उस पर ही बाकी सब केंद्रित है। इसलिए प्राणवान मानव संसाधन का कुशल प्रबंधन ही किसी भी शासन व्यवस्था की सफलता का मूल-मंत्र है। सरकारें हो, राजनीतिक संगठन हों, कारोबारी-समूह हों, परिवार हो--मनुष्य प्रबंधन के बिखरते ही सब बिखर जाता है। 
                    नरेंद्र भाई ने महाभारत और रामायण पढ़ी होतीं तो उनके हाथ से साढ़े चार साल में दिल्ली नहीं फिसलती। यह सही समय है कि राहुल गांधी इन दोनों पौराणिक ग्रंथों पर निगाह डालें। उनकी सरकारें तो लोग बना ही देंगे, लेकिन अपनी पार्टी तो उन्हें ख़ुद ही बनानी होगी। वैसे ही, जैसे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने बनाई थी। अपनी पार्टी तो राहुल को ही सहेजनी होगी। वैसे ही, जैसे राजीव गांधी और सोनिया ने सहेजी। तीर खाने का वक़्त जब-जब आता है, अपने मतलब का मशवरा देते रहने वाले खंडाला चले जाते हैं। इसलिए राहुल को अपना समूचा चिंतन ख़ुद के पसीने की एक-एक पाई पर पहरा देने पर केंद्रित करना होगा। कोई बुरा न माने, अभी तक तो कांग्रेस में ‘मेहनत उनकी, मौज हमारी’ का आलम ही चलता-फिरता दिखता है। यह नहीं बदला तो सरकारें बदलने से भी क्या हो जाएगा! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

                    Wednesday, November 28, 2018

                    पांच प्रदेशों के चुनावी नतीजों का पवन-सुत



                    पंकज शर्मा

                      मैं इस बीच, पूरे एक पखवाड़े, मध्यप्रदेश के घनघोर आदिवासी इलाक़ों में भी था और कारोबारी महानगरीय इलाक़ों में भी। पांच विधानसभाओं के लिए हो रहे इन चुनावों को अगले बरस के आम चुनावों की परछाईं माना जा रहा है और वे हैं भी। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी और उनके कठपुतले भाजपा-अध्यक्ष अमित भाई अनिलचंद्र शाह की नींद ग़ायब है। मैं मध्यप्रदेश के 18 विधानसभा क्षेत्रों में गांव-गांव, जंगल-जंगल और मॉल-मॉल घूमा। हवा में जो सनसनी है, वह भारतीय जनता पार्टी के परखच्चे बिखेर देने वाली है। अगर हर चुनाव का अंतिम अध्याय, सारे दंद-फंद अपना कर, अपने हिसाब से लिखने की महारत रखने वाले गुरू-चेले के हथकंडों से कांग्रेस निबट सकी तो कुम्हला गए कमल के फूलों से परेशान भोपाल के तालाब का पानी पंद्रह बरस बाद इस दिसंबर के दूसरे हफ़्ते में पूरी तरह बदल जाएगा।
                      मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में लोकसभा की 83 और विधानसभा की कुल 679 सीटें हैं। मेरा आकलन है कि पांचों राज्यों में इस बार भाजपा और उसके सहयोगी दलों की जीत का आंकड़ा महज़ 200 सीटों के आसपास रहने वाला है। सो, विधानसभाओं के इन चुनावों में यह संकेत गहराई से छिपा है कि अगले साल की गर्मियों में भाजपा इन पांच राज्यों में लोकसभा की 20 सीटें भी हासिल करने के लिए अपनी ऐड़ियां रगड़ रही होगी। अभी सहयोगी दलों के साथ इन प्रदेशों में वह लोकसभा की 72 सीटों पर काबिज़ है। सो, 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र भाई के 50 सांसद तो इन पांच प्रदेशों में ही हाथ से चले जाएंगे। ज़ाहिर है कि इस अहसास ने उनके हाथ-पांव फुला दिए हैं और चुनावी जनसभाओं में उनकी ज़ुबानी भाषा और शारीरिक भंगिमा सुन-देख कर उनके अपने लोग भी ज़ोरों से माथा पीट रहे हैं।
                      मुझे चिंता इस बात की है कि नरेंद्र भाई की छटपटाहट का अगर अभी से ही यह आलम है कि वे पूरी तरह भूल गए हैं कि वे भारत के प्रधानमंत्री भी हैं तो जब लोकसभा चुनाव की लू चलेगी तब वे क्या करेंगे? मुट्ठी से फिसलती सियासी रेत अगर उन्हें अभी इतना बेचैन कर रही है तो चार-पांच महीने बाद तो उनका छाती पीटना देख देश अपना सिर पीटने लगेगा। सरकारें तो बहुत आई-गईं, मगर उनके आते-जाते वक़्त एक प्रधानमंत्री को पहले ऐसा मस्त-मस्त और फिर ऐसा पस्त-पस्त क्या आपने कभी देखा था? इसीलिए बुज़ुर्ग कहा करते हैं कि वे बिरले ही होते हैं, जो सत्ता के अंतःपुर में बौराते नहीं हैं और सिंहासन जाते देख पगलाते नहीं हैं।
                      नरेंद्र भाई और उनकी आंख के एक इशारे पर काम करने वाले अमित भाई अगर जानबूझ कर यह  नहीं भूलते कि भाजपा का विस्तार किसी राजनीतिक लठैत की तुर्रेदार मूंछों की वजह से नहीं, एक कवि-हृदय की थोड़ी उदारवादी छवि के कारण हुआ था तो साढ़े चार साल के भीतर-भीतर भाजपा इतनी बेतरह तहस-नहस नहीं होती। आंखों पर पड़ा परदा उठा कर चूंकि कोई कुछ देखना नहीं चाहता, इसलिए मोदी-शाह मंडली को मध्यप्रदेश के जंगल-जंगल चल रही इस बात का पता ही नहीं है कि चड्डी पहन कर जो फूल खिला था, वह कभी का मुरझा चुका है। आदिवासियों के, किसानों के, कारोबारियों के, नौजवानों के और सरकारी कर्मचारियों के नथुने जिस तरह फड़कते मैंने मध्यप्रदेश के अपने दौरे में देखे हैं, उसके बाद मुझे तो नहीं लगता कि कोई भी जादू-टोना भोपाल को फिर ‘शव-राज’ की गोद में डाल सकता है।
                      राजस्थान में वसुंधरा राजे के दिन लदने के संकेत तो बहुत पहले से आने लगे थे। लेकिन जिस तरह मध्यप्रदेश ने शिवराज सिंह चौहान के और छत्तीसगढ़ ने रमन सिंह के ख़िलाफ़ करवट ली है, उससे भारतीय लोकतंत्र की अंतर्निहित सकारात्मकता पर आपका विश्वास भी और मजबूत ही हुआ होगा। रही-सही कसर तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव के उखड़ते पैरों ने पूरी कर दी है। क्या आप यह देख कर गदगद नहीं हैं कि हमारे जनतंत्र के पास उस हर टोटके की काट मौजूद है, जो उसे बांधने के लिए किया जाता है? जब-जब लगता है कि सब के हाथ बंधे हैं और अब पांवों की ज़ंजीरें कौन खोलेगा, मतदाताओं के मन से एक अदृश्य बगूला उठता है और सारी ज़ंजीरें टूट कर बिखर जाती हैं। पांच प्रदेशेम के चुनावों में जिन्हें खुली आंखों से भी यह बगूला दिखाई नहीं दे रहा है, उन्हें दिसंबर के दूसरे मंगलवार को नतीजों के पवन-सुत बंद आंखों से भी दिखाई देंगे।
                      उत्तर, दक्षिण और पूर्व दिशाओं से उठ रही ये चिनगारियां इसलिए सुखद हैं कि उन्होंने न्यूनतम बीस साल के लिए टस-से-मस न होने का ऐलान करने वालों के छक्के अभी से छुड़ा दिए हैं। हमारी अवामी-दिलरुबा की यही बात तो बार-बार देखने वाली है कि जिस-जिसने उसे अपनी जागीर समझने की भूल की, उस-उस को उसने ऐसी लात जमाई कि सारे जाले साफ कर डाले। लगता किसी को कुछ भी हो, मगर हमारी जम्हूरियत न जयकारों से प्रभावित होती है, न जुमलों से। वह न वंदन की मोहताज है, न अभिनंदन की। उसे नेकनीयती और फ़रेब में फ़र्क़ करना भी ख़ूब आता है। जब हम कहते हैं कि हमारा देश भगवान भरोसे चलता है तो इसीलिए कहते हैं कि जब हमारे सारे भरोसे ढहने लगते हैं तो पता नहीं कैसे ऐसा कुछ होता है कि हम अपने संकटों से बाहर की तरफ़ ख़ुद-ब-ख़ुद बहने लगते हैं। यह वही मौक़ा है।
                      मैं मतदाताओं की जैसी भावनात्मक जागरूकता इन चुनावों में देख रहा हूं, कम में देखी है। जिस एकाग्रता से वे अपनी खुरपी ले कर भाजपा की गाजर-घास छील रहे हैं, वैसा कम होता है। जिस तल्लीनता से वे नई फ़सल रोपने के लिए गुड़ाई कर रहे हैं, वह अद्भुत है। जितने मग्न वे इस बार हैं, उतने कभी-कभार ही होते हैं। चालाकी भरे तर्कों को मतदाता नकार रहे हैं। राजनीति के लिए धर्म को विकृत करने के प्रयासों को वे नकार रहे हैं। सच के साथ होते छल से वे नाराज़ हैं। 
                      लोग तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में कांग्रेस के पीछे खड़े होने को बहुत पहले से तैयार थे, लेकिन वे इंतज़ार कर रहे थे कि कांग्रेस तो उनके आगे खड़ी हो। राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में कांग्रेस की मुट्ठियां जिस तरह तान दी हैं, मैं आश्वस्त हूं कि पांच प्रदेशों में हो रहा क़लम-दवात पूजन आने वाले दिनों में पूरे देश में होने वाली पट्टी-पूजा का आगाज़ है। जो इस हवा को पढ़ना चाहते हैं, पढ़ें। जिन्हें इतना अक्षर-ज्ञान नहीं है कि इस इबारत की अहमियत समझें, वे जो चाहें, करें। असलियत यही है कि तीन दिशाओं में बसे पांच राज्यों में एक नया सियासी सूरज आकार ले चुका है। लेकिन जो आंखें खोलने को ही तैयार न हों, उजाला उनका क्या करे! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)