Saturday, January 5, 2019

मोदी का पूर्ण-विराम और भाजपा का अर्द्ध-विराम



पंकज शर्मा

    दो दिन बाद 2019 शुरू हो जाएगा। नरेंद्र भाई मोदी के पराक्रम तले कराहती मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल 154 दिन बाकी रह जाएगा। 3 जून की सांझ ढलने के पहले 17वीं लोकसभा का गठन होना है। सो, नया साल शुरू होते ही क़रीब तीन दर्जन प्रमुख राजनीतिक दल और बीसियों ओनी-पौनी सियासी गुमटियां अपनी-अपनी जुगाड़ में लग जाएंगे। हम टुकुर-टुकुर ताकेंगे कि इस बार कौन कहां पहुंचता है।
    गोकि हरचंद कोशिश हो रही है कि अगला मुक़ाबला त्रिकोणीय हो जाए, मोटे तौर पर मत-कुरुक्षेत्र का फ़ैसला दो समूहों के बीच ही होना है। एक समूह की अगुवाई नरेंद्र मोदी अपने सियासी साजिंदे अमित शाह के साथ करेंगे। इस समूह में कोई और चेहरा दूर-दूर तक कहीं नहीं होगा। लालकृष्ण आडवाड़ी और मुरली मनोहर जोशी जैसे चेहरों की विदाई तो नरेंद्र भाई कभी की कर चुके हैं, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और अरुण जेटली जैसे चेहरों को भी उन्होंने रायसीना-पहाड़ी की प्रतिमाओं में तब्दील कर दिया है। चुनावी खलिहान में बस नरेंद्र भाई ही नरेंद्र भाई रहेंगे।
    दूसरे समूह का प्रमुख चेहरा राहुल गांधी होंगे तो सही, लेकिन उनके आसपास और भी बहुत-से चेहरे मौजूद रहेंगे। वाम दलों के अलावा शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, चंद्राबाबू नायडू, देवेगौड़ा और स्तालिन जैसे चेहरे तो राहुल के अलग-बगल दिखेंगे ही; कांग्रेस ने सहयोगी दलों से तालमेल का ज़िम्मा अगर खुद को राजनीतिक कत्थक का विशेषज्ञ समझने वाले नौसिखिए नचनियों के हवाले नहीं किया तो ममता बनर्जी, मायावती और मुलायम सिंह यादव भी राहुल की जाजम पर ही बैठे दिखाई देंगे।
    लेकिन होगा क्या? इतना तो हो गया है कि यह मिथक अब पूरी तरह टूट गया है कि नरेंद्र मोदी दस-बीस साल के लिए अजेय हैं। राहुल का पप्पूपन भी कल्पित-कथा साबित हो गया है। कांग्रेस-मुक्त भारत को संघ-प्रमुख मोहन भागवत तक ख़ामख़याली बता चुके हैं। लेकिन क्या अगले बरस की गर्मियों में नरेंद्र भाई विदा होंगे? क्या आज का कोई विपक्षी चेहरा उनकी जगह लेगा?
    2014 में नरेंद्र भाई के नगाड़े ने भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसद लोकसभा में पहुंचा दिए थे। आज वे 268 रह गए हैं। यानी भाजपा का अपने अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत अब नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष और दो नामजद सदस्यों को भी अगर भाजपा का ही हिस्सा मान लिया जाए तो भी स्पष्ट बहुमत में एक का टोटा है। भाजपा में आज दो तरह के सांसद हैं। एक, जो मोदी-मय हैं। दूसरे, जो मोदी-भय से ग्रस्त हैं। दूसरी श्रेणी के सांसदों का प्रतिशत 70 के आसपास है। सो, उनकी बात छोड़िए, मगर मोदी-मय सांसद भी मानते हैं कि अगले चुनाव में भाजपा दो सौ की संख्या पर सिमट जाएगी।
    नरेंद्र भाई के पास सहयोगी दलों के इस वक़्त 36 सांसद हैं। अगले चुनाव में वे जस-के-तस भी रहे तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन 236 के नजदीक आ कर ठहर जाएगा। शिवसेना के आज 18 सांसद हैं। अगली बार भी उनकी तादाद इसी के आसपास रहेगी। अगर उन्होंने नरेंद्र भाई की गोद में बैठने से इनकार कर दिया तो क्या होगा? अकाली दल और अपना दल भी तब कितने भरोसे के रहेंगे, कौन जाने? इसलिए इतनी इबारत तो आसमान पर अभी से साफ लिखी दिखाई देने लगी है कि नरेंद्र भाई से प्रधानमंत्री की कुर्सी पांच महीने बाद विदाई ले रही है।
    मगर नरेंद्र भाई ज़िद्दी हैं। वे प्रधानमंत्री की कुर्सी से विदाई न लेने में कोई कमी नहीं रखने वाले। वे साम-दाम-दंड-भेद के अध्येता हैं। अगला चुनाव उनके लिए सब-कुछ है। इसलिए कि अपने निर्माण में उन्होंने ऐसी मिट्टी का उपयोग किया है कि अगर वे प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे तो कुछ भी नहीं रहेंगे। अपने अमित भाई का वारिस बन कर पार्टी चलाना उन्हें सुहाएगा नहीं और उन्हें विपक्ष का नेता बनाना कइयों को भाएगा नहीं। इसलिए दोबारा प्रधानमंत्री बनने के लिए नरेंद्र भाई कुछ भी करेंगे।
    लेकिन वे कर ही क्या सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं कि वे ईवीएम का जादू जानते हैं। मगर क्या पूरा देश अब हाथ की इस सफाई को ले कर सचेत नहीं हो गया है? ऐसे में कोई कितना बड़ा इंद्रजाल रच सकता है? कुछ लोग कहते हैं कि वे सरहदों को किसी भी हद तक गरमा देने की विद्या में माहिर हैं। मगर क्या देशवासी सचमुच इतने पोंगे हैं कि ऐसा कोई भी तीर बूमरेंग न करे? कुछ लोग कहते हैं कि वे चुनाव के ऐन पहले कांग्रेस के खि़लाफ़ ऐसा भंडाफोड़ करने वाले हैं कि हाहाकार मच जाएगा। मगर साढ़े चार बरस से हर तरह की गप्पों को देख रहा देश अब भी किसी झक्कू में फंस पाएगा?
    अपनी जांच-कोतवालियों के ज़रिए अब तक नरेंद्र भाई ने कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं को अपनी मनचाही करने से रोक रखा है। लेकिन जिस दिन अगले लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाएगी, उस रात सब की रूहों को आज़ाद होने से कौन रोकेगा? कसमसाहट अपने अंतिम मुक़ाम पर तो कब की पहुंच चुकी है। सुनने में भले अजीब लगे, मगर भीतर का सच यही है कि मुलायम और मायावती ही नहीं, नवीन पटनायक तक भी सिर्फ़ मौक़े भर का ही तो इंतज़ार कर रहे हैं।
    पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के जनादेश ने लोकसभा चुनाव की एक नई बिसात बिछा दी है। तीन प्रदेशों में अपने मुख्यमंत्री बनाने, मंत्री तय करने और उनके बीच महकमे बांटने के काम में अगर कांग्रेस ने ज़रा गरिमा से काम लिया होता तो और बेहतर होता, लेकिन बावजूद इस सब के भाजपा की आगे की राह तो जितनी ऊबड़-खाबड़ हो गई है, हो ही गई है। नरेंद्र भाई के फावड़े और अमित भाई की तगाड़ी अब उसे इसलिए समतल नहीं कर सकती है कि उसे पोला बनाने में इन दोनों के योगदान की चालीसा तो खुद भाजपा के लोग ही जप रहे हैं। मोदी-सरकार के संसद में अब तक दिए गए 4505 आश्वासनों की कथा केंद्रीय कक्ष में गूंज रही है। नरेंद्र भाई के दिखाए ख़्वाब अपने तकिए के नीचे रखे सो रहे मुल्क़ ने अपनी आंखें मसलनी शुरू कर दी हैं। अगले चार महीनों में अंगड़ाइयां ले-ले कर जब वह पूरी तरह खड़ा हो जाएगा तो, बात मानिए, आप उसे पहचान ही नहीं पाएंगे।
    इसलिए नरेंद्र भाई के वानप्रस्थ की दहलीज़ हर दिन नज़दीक आती जा रही है। असमानता, असंयम, असहिष्णुता, अन्याय और उत्पीड़न के जिस झंझावात से भारत 2014 के बाद गुज़रा है, उसने नरेंद्र भाई की असंदिग्ध प्रथम पुरुष की छवि को अधमरा कर दिया है। मैं मानता हूं कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की तलाश में 17वीं लोकसभा की तरफ बढ़ते भारत के पिटारे से निकलने वाला नतीजा हम सब की आंखें चुंधिया देने वाला होगा। क्रूर समय में ज़मीन से आसमान तक एक गूंगापन तन जाता है। दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। सो, दुनिया के इतिहास में ऐसा भी पहली बार नहीं होगा कि हम सब इस गूंगेपन से निकलने वाली कानफाड़ू चीख भी जल्दी ही सुनेंगे। मनमौजी और हेकड़ीबाज़ शासकों के कर्म उन्हें ध्वस्त करने के लिए खुद ही काफी होते हैं। सो, महागठबंधन आकार ले, न ले, नरेंद्र भाई के पूर्ण-विराम और भाजपा के अर्द्ध-विराम की घड़ी अब आ गई है। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

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