Tuesday, June 25, 2019

राहुल जी, ‘एतान्न हन्तुमिच्छामि’ का यह समय नहीं

PANKAJ SHARMA
1 June 2019


आदरणीय राहुल जी,
जिनकी राजनीति में भावनाएं और संवेदनाएं शुरू से ही ताक पर रखी हुई हैं, वे ताज़ा चुनाव नतीजों के बाद आपके दर्द को सात जनम भी नहीं समझेंगे। आप सियासी-संपेरे होते तो न तो सच्चे मन से ख़ुद को अध्यक्ष पद से अलग करने का इरादा ज़ाहिर करते और न  कांग्रेस की कार्यसमिति में अपनांे का नाम लेकर ऐसी विकट कसमसाहट का ज़िक्र करते। आप चूंकि कलियुगी हैं ही नहीं, सो, जो दिल में था, बाहर निकल आया। आपको लगा होगा कि कार्यसमिति तो पार्टी का घरेलू दालान है और पर्दा नहीं जब कोई ख़ुदा से तो अपने ही बंदो से पर्दा करना क्या? लेकिन ऐसा ही अपनापन अगर दूसरों में भी होता तो फिर आज के दुर्दिनों की नौबत आती ही क्यों?
आप दरअसल भले-मानस हैं। जिन्हें लगता था कि राजनीतिक परिश्रम आपके वश की बात नहीं है, उनके दिमाग़ के जाले भी आपने पिछले दो साल में पूरी तरह साफ़ कर दिए हैं। कांग्रेस के भीतर और बाहर आपके धुर-विरोधी भी अपना मन मार कर मान रहे हैं कि आपकी ग़जब की मेहनत ने इस चुनाव में मोशा (मोदी-शाह) की नींद उड़ा दी थी। नतीजों को छोड़िए। वे क्यों आए हैं, कैसे आए हैं; जितने मुंह, उतनी बातें हैं। ये नतीजे इसलिए नहीं आए हैं कि आपने वैचारिक-शारीरिक-नैतिक परिश्रम में कोई कोताही की। मुझे तो एक भी नहीं मिला, जो कांग्रेस की इस बार की हार के लिए आपको ज़िम्मेदार बता रहा हो। मैं तो जितनी उंगलियां उठते देख रहा हूं, आपके आसपास की दिशाओं में लहराती देख रहा हूं।
ऐसे भी होंगे, जो आपकी अध्यक्ष पद से विदाई की राह तक रहे होंगे, मगर मेरे जैसे करोड़ों लोग हैं, जो मानते हैं कि आपकी अगुआई से वंचित पार्टी नरेंद्र भाई मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत का ख़्वाब ही पूरा करेगी। कांग्रेस की क़ब्र को अपनी मुट्ठी की मिट्टी डाल कर पाटने की ललक लिए लोग कोई आज से मौजूद नहीं हैं। वे तो हर ज़माने में रहे हैं। मैं ने पढ़ा है कि जवाहरलाल नेहरू उनसे कैसे लड़े। मैं ने पढ़ा है कि इंदिरा गांधी उनसे कैसे लड़ीं। राजीव गांधी और सोनिया गांधी को तो ऐसे कनखजूरों से लड़ते मैं ने अपनी आंखों से देखा है। आपकी लड़ाई तो अभी शुरू ही हुई है, राहुल जी।
बाहर वालों से तो जम कर निपट लें, मगर अपनों से कैसे निपटें? कलियुग तो कलियुग, यह विवशता हर युग में किस के सामने नहीं रही? द्वापर के कुरुक्षेत्र में गांडीव थामे अर्जुन के हाथ अगर कांपने लगे तो हम-आप क्या हैं? अर्जुन ने श्रीकृष्ण से करुणामयी होकर यही तो कहा था कि युद्ध के मैदान में मौजूद इन मित्रों और संबंधियों को देख कर मेरा तो मंुह सूखा जा रहा है, मेरे तो हाथ कांप रहे हैं।
‘ कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ ’
अर्जुन तो तब भी घनघोर भ्रमित थे, और उनके हाथ से तो गांडीव तब भी छूटा जा रहा था, जब मित्र-संबंधी खुल कर विरोध में सामने खड़े थे। लेकिन जब वे अगल-बगल अपने ही बन कर बैठे हों तो कोई कितना विचलित होगा, इसे समझने के लिए वेदव्यास होना ज़रूरी नहीं है। इसलिए मुझे तो आपकी व्यथा अच्छी तरह समझ में आ रही है।
लेकिन क्या ‘‘ एतान्न हन्तुमिच्छामि ’’ भाव आज की समस्या का समाधान है? मैं इन्हें नहीं मारूंगा, भले ही ये सब मुझे मार दें। मुझे लगता है, राहुल जी, कि आपका यह भाव स्वयं से तो अन्याय है ही, भारत के कोने-कोने में बैठे कांग्रेसजन से भी बेइंसाफ़ी है। कांग्रेस को बनाने में और उसे बचाए रखने में आपके साथ करोड़ों और भी अनजान लोगों का पसीना बहा है। उनसे ऐसे आंखें फेर लेेने को क्या इतिहास माफ़ कर देगा?
इन दिनों आप भीतरी अति-उदारता से जन्मा प्यार बांट रहे हैं। कुछ बरस पहले आप घनघोर उकताहट से उपजी खीज बांटा करते थे। मैं तो पत्रकारिता की अपनी अच्छी-ख़ासी स्थिति को लतिया कर कांग्रेस में आया था, इसलिए ज़रा खुल कर कहने का आदी हूं। पार्टी में कभी क़ायदे की कोई ज़िम्मेदारी नहीं मिली, इसलिए नहीं कह रहा हूं। मैं कहने में पीछे नहीं रहा, ज़िम्मेदारियों तो इसलिए नहीं मिलीं। सो, मुझे कोई मलाल नहीं है। इसलिए फिर कहता हूं कि अपने बारह-तेरह साल में मैं ने देखा है कि आप जो भी बांटते हैं, खुले हाथों से बांटते हैं। जिसे देते हैं, छप्पर फाड़ कर देते हैं। जिससे लेते हैं, पूरा उलीच देते हैं। ऐसे में ऐसे-वैसे कैसे-कैसे बन गए और कैसे-कैसे ऐसे-वैसे बने टप्पे खाते रहे। 
आपकी भलमनसाहत ने आपसे बस यही चूक करा दी। सारे नहीं, मगर आपके आसपास ज़्यादातर ऐसे लोग जुट गए, जिनके दिखावटी मलबूस तो बहुत ख़ुशनुमा थे, लेकिन जिनकी बुनियादें हर लिहाज़ से एकदम खोखली थीं। उनमें वैचारिक, नैतिक, सांगठनिक और निजी प्रतिबद्धता दूर-दूर तक थी ही नहीं। वे ‘रात गई, बात गई’ की जन्म-घुट्टी पी कर बड़े हुए थे। बीच में एक दौर ऐसा आया कि इन फुदकियों की घेराबंदी ने बाप-दादाओं के ज़माने के संजीदा विश्वस्तों को आपसे दूर कर दिया। अर्थवान मशविरों की नदियां आपके समंदर तक पहुंचने के पहले ही सूखने लगीं। कुछ वक़्त पहले ही तो कांग्रेस का यह सौभाग्य फिर शुरू हुआ था कि आपकी विचार-प्रक्रिया में बदलाव की ठोस बयार दिखाई देने लगी और आपने पूरे दम-ख़म से मैदान संभाल लिया। मौजूदा झंझावात के बहेलिया-जाल को अगर आपने नहीं काटा तो भीतर-बाहर की वे ताक़तें ही मज़बूत होंगी, जिनसे अनवरत जूझने का संकल्प आपने किया था।
करोड़ों कंठों से निकला यह गीत आपको वापस बुला रहा है। आप लौट आइए। अपने लिए नहीं, उन उसूलों के लिए, जिन पर कांग्रेस को क़ायम रखना अभी तो किसी के वश में है नहीं। सोचिए तो सही कि कांग्रेस में अगर आपकी ही उतनी नहीं चलती है तो कोई और क्या ख़ाक इस पार्टी को सही रास्ते पर चला पाएगा? पार्टी के भीतर आपके पास नए-पुरानों का एक अद्भुत प्रतिभा-कोष उपलब्ध है। करना सिर्फ़ इतना है कि आप स्व-विवेक से उसका उपयोग करें। सभी नए देवलोक से नहीं उतरे हैं। न सभी पुराने असुरलोकवासी हैं। नयों में भी बेताल-पचीसी का जाप करने वालों की कमी नहीं है। पुरानों में भी सच्चे नमाज़ी बहुत हैं। आपको कांग्रेस का आंचल कांटों से खींचना भर है। 
आज्ञाकारी दिखाई देने वालों को ज़रा ग़ौर से देखिए। अवज्ञाकारी करार दे दिए गयों पर फिर सतयुगी निग़ाह डालिए। महिमा-गान करने वालों की तरफ़ एक बार मुड़ कर दोबारा देखिए। निंदक समझ कर परे कर दिए गए लोगों के मन में झांकिए। जितना विशाल भाव-संासाधन, मानव-संसाधन और प्रतिभा-संसाधन आपके सामने मौजूद है, इतना कितनों को प्राप्य है? सेनापति को उसी के जज़्बे वाले सत्य-निष्ठ सैनिक एक बार मिल जाएं तो कौन-सी ज़ंग नहीं जीती जा सकती? इसलिए अब तक बनाए अपने पैरों के निशान मुल्क़ के खेत-खलिहानों से ख़ुद ही ऐसे मत मिटाइए। अगर आपने यह ग़लती दुरुस्त नहीं की तो इसकी सज़ा सदियां भुगतेंगी। तमाम पराक्रम और परिश्रम के बावजूद, राजधर्म के इतिहास में आपको महावीर और बुद्ध की तरह नहीं, जरासंध के आक्रमणों से रणछोड़ बन गए कृष्ण की तरह याद किया जाएगा। समर अभी शेष है। शेष क्या है, अभी तो वह शुरू हुआ है। ऐसे में तटस्थ होने का अपराध अपने माथे मत लीजिए, राहुल जी! लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।

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